Saturday, July 29, 2017

वंदे मातरम का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद होगा

डॊ. सौरभ मालवीय
राष्ट्र गीत वंदे मातरम एक बार भी चर्चा में है. इस बार मद्रास उच्च न्यायालय की वजह से इसके गायन का मुद्दा गरमाया है.   मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायधीश एमवी मुरलीधरन ने आदेश दिया है कि राष्ट्रगीत वंदे-मातरम को हर सरकारी/ग़ैर-सरकारी कार्यालयों/संस्थानों/उद्योगों में हर महीने कम से कम एक बार गाना होगा. यह गीत मूल रूप से बांग्ला और संस्कृत भाषा में है, इसलिए इसे तमिल और अंग्रेज़ी में अनुवाद करने के भी आदेश दिए गए हैं. उल्लेखनीय है कि एक ओर मुस्लिम समुदाय से ही वंदे मातरम के विरोध में स्वर उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक मुस्लिम लड़की ने ही वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद कर सराहनीय कार्य किया है.वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद करने वाली फ़िरदौस ख़ान शाइरा, लेखिका और पत्रकार हैं. अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने उर्दू में अनुवाद किया. उर्दू में ’वंदे मातरम’ का अर्थ है ’मां तुझे सलाम’. ऐसे में किसी को भी अपनी मां को सलाम करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए. आशा है कि आगे भी देश-विदेश की अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद होगा.

उल्लेखनीय यह भी है कि जिस मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया गया है, उसमें वंदे मातरम को गाने या न गाने से संबंधित किसी तरह की अपील नहीं की गई थी. यह गीत शिक्षा संस्थाओं में अनिवार्य रूप से गाया जाए या नहीं, इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय में आगामी 25 अगस्त को सुनवाई होनी है.

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. फिर अपनी मातृभूमि से प्रेम क्यों नहीं ? अपनी मातृभूमि की अस्मिता से संबद्ध प्रतीक चिन्हों से घृणा क्यों? प्रश्न अनेक हैं, परंतु उत्तर कोई नहीं. प्रश्न है राष्ट्रगीत वंदे मातरम का. क्यों कुछ लोग इसका इतना विरोध करते हैं कि वे यह भी भूल जाते हैं कि वे जिस भूमि पर रहते हैं, जिस राष्ट्र में निवास करते हैं, यह उसी राष्ट्र का गीत है, उस राष्ट्र की महिमा का गीत है?

वंदे मातरम को लेकर प्रारंभ से ही विवाद होते रहे हैं, परंतु इसकी लोकप्रियता में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती चली गई.  2003 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार वंदे मातरम विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है. इस सर्वेक्षण विश्व के लगभग सात हज़ार गीतों को चुना गया था. बीबीसी के अनुसार 155 देशों और द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था.  उल्लेखनीय है कि विगत दिनों कर्नाटक विधानसभा के इतिहास में पहली बार शीतकालीन सत्र की कार्यवाही राष्ट्रगीत वंदे मातरम के साथ शुरू हुई. अधिकारियों के अनुसार कई विधानसभा सदस्यों के सुझावों के बाद यह निर्णय लिया गया था. विधानसभा अध्यक्ष कागोदू थिमप्पा ने कहा था कि लोकसभा और राज्यसभा में वंदे मातरम गाया जाता है और सदस्य बसवराज रायारेड्डी ने इस मुद्दे पर एक प्रस्ताव दिया था, जिसे आम-सहमति से स्वीकार कर लिया गया.

वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है. वंदे मातरम बहुत लंबी रचना है, जिसमें मां दुर्गा की शक्ति की महिमा का वर्णन किया गया है. भारत में पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है. इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा कर इसकी धुन और गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है, जो 52 सेकेंड है. उल्लेखनीय है कि 1870 के दौरान ब्रिटिश शासन ने 'गॉड सेव द क्वीन' गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था. बंकिमचंद्र चटर्जी को इससे बहुत दुख पहुंचा. उस समय वह एक सरकारी अधिकारी थे. उन्होंने इसके विकल्प के तौर पर 7 नवंबर, 1876 को बंगाल के कांतल पाडा नामक गांव में वंदे मातरम की रचना की. गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में हैं. राष्ट्रकवि रबींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया और पहली बार 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत गाया गया. 1880 के दशक के मध्य में गीत को नया आयाम मिलना शुरू हो गया. वास्तव में बंकिमचंद्र ने 1881 में अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में इस गीत को सम्मिलित कर लिया. उसके बाद कहानी की मांग को देखते हुए उन्होंने इस गीत को और लंबा किया, अर्थात बाद में जोड़े गए भाग में ही दशप्रहरणधारिणी, कमला और वाणी के उद्धरण दिए गए हैं. बाद में इस गीत को लेकर विवाद पैदा हो गया.

वंदे मातरम स्वतंत्रता संग्राम में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था. इसके बावजूद इसे राष्ट्रगान के रूप में नहीं चुना गया. वंदे मातरम के स्थान पर वर्ष 1911 में इंग्लैंड से भारत आए जॊर्ज पंचम के सम्मान में रबींद्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखे और गाये गए गीत जन गण मन को वरीयता दी गई. इसका सबसे बड़ा कारण यही था कि कुछ मुसलमानों को वंदे मातरम गाने पर आपत्ति थी. उनका कहना था कि वंदे मातरम में मूर्ति पूजा का उल्लेख है, इसलिए इसे गाना उनके धर्म के विरुद्ध है. इसके अतिरिक्त यह गीत जिस आनंद मठ से लिया गया है, वह मुसलमानों के विरुद्ध लिखा गया है. इसमें मुसलमानों को विदेशी और देशद्रोही बताया गया है.  1923 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम के विरोध में स्वर उठे. कुछ मुसलमानों की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने इस पर विचार-विमर्श किया. पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव भी शामिल थे. समिति का मानना था कि इस गीत के प्रथम दो पदों में मातृभूमि की प्रशंसा की गई है, जबकि बाद के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं का उल्लेख किया गया है. समिति ने 28 अक्टूबर, 1937 को कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस गीत के प्रारंभिक दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में प्रयुक्त किया जाएगा. इस समिति का मार्गदर्शन रबींद्रनाथ ठाकुर ने किया था. मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के क़ौमी तराने ’सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ के साथ बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित प्रारंभिक दो पदों का गीत वंदे मातरम राष्ट्रगीत स्वीकृत हुआ. 14 अगस्त, 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ वंदे मातरम के साथ हुआ. फिर 15 अगस्त, 1947 को प्रातः 6:30 बजे आकाशवाणी से पंडित ओंकारनाथ ठाकुर का राग-देश में निबद्ध वंदे मातरम के गायन का सजीव प्रसारण हुआ था. डॊ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी, 1950 को  वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया.  वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समकक्ष मान्यता मिल जाने पर अनेक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसरों पर यह  गीत गाया जाता है. आज भी आकाशवाणी के सभी केंद्रों का प्रसारण वंदे मातरम से ही होता है. वर्ष 1882 में प्रकाशित इस गीत को सर्वप्रथम 7 सितंबर, 1905 के कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया था. इसलिए वर्ष 2005 में इसके सौ वर्ष पूरे होने पर साल भर समारोह का आयोजन किया गया. 7 सितंबर, 2006 को इस समारोह के समापन के अवसर पर मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को स्कूलों में गाये जाने पर विशेष बल दिया था.  इसके बाद देशभर में वंदे मातरम का विरोध प्रारंभ हो गया. परिणामस्वरूप तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह को संसद में यह वक्तव्य देना पड़ा कि वंदे मातरम गाना अनिवार्य नहीं है. यह व्यक्ति की स्वेच्छा पर निर्भर करता है कि वह वंदे मातरम गाये अथवा न गाये. इस तरह कुछ दिन के लिए यह मामला थमा अवश्य, परंतु वंदे मातरम के गायन को लेकर उठा विवाद अब तक समाप्त नहीं हुआ है. जब भी वंदे मातरम के गायन की बात आती है, तभी इसके विरोध में स्वर सुनाई देने लगते हैं. इस गीत के पहले दो पदों में कोई भी मुस्लिम विरोधी बात नहीं है और न ही किसी देवी या दुर्गा की आराधना है. इसके बाद भी कुछ मुसलमानों का कहना है कि इस गीत में दुर्गा की वंदना की गई है, जबकि इस्लाम में किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने की मनाही है. इसके अतिरिक्त यह गीत ऐसे उपन्यास से लिया गया है, जो मुस्लिम विरोधी है. गीत के पहले दो पदों में मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन किया गया है. इसके बाद के दो पदों में मां दुर्गा की अराधना है, लेकिन इसे कोई महत्व नहीं दिया गया है. ऐसा भी नहीं है कि भारत के सभी मुसलमानों को वंदे मातरम के गायन पर आपत्ति है या सब हिन्दू इसे गाने पर विशेष बल देते हैं. कुछ वर्ष पूर्व विख्यात संगीतकार एआर रहमान ने वंदे मातरम को लेकर एक संगीत एलबम तैयार किया था, जो बहुत लोकप्रिय हुआ. उल्लेखनीय बात यह भी है कि ईसाई समुदाय के लोग भी मूर्ति-पूजा नहीं करते, इसके बावजूद उन्होंने कभी वंदे मातरम के गायन का विरोध नहीं किया.  

Wednesday, April 26, 2017

राष्ट्र सर्वोपरि

डॉ. सौरभ मालवीय
भारत यह एक ऐसा अद्भुत शब्द है जिसका उच्चारण ही मन को झंकृत कर देता है। जिस शब्द की कल्पना से ही संगीत निकलने लगे वह भारत है। ‘भारत’ में ‘भा’ का अर्थ होता है उजाला, सत्य, प्रकाश, आभा, ज्ञान, मोक्ष, परिपूर्ण, पोषण, जीवन आनन्द आदि आदि...। कहां तक कहें यहां तो सहस्र नाम की परम्परा ही है। विष्णु सहस्र नाम, शिव सहस्र नाम श्रीराम सहस्र नाम, गोपाल सहस्र नाम...। तो भारत के अनन्त नाम हैं अनन्त अर्थ हैं और यह संस्कृत का शब्द है संस्कृत इतनी तरल भाषा ;सपुनपपिकि संदहनंहद्ध है कि इसके अर्थ की अनन्तता सहज ही हो जाती है। भारत में ‘रत’ का अर्थ है लीन तल्लीन, लवलीन विलीन आदि। भारत का अर्थ हुआ ज्ञान में तल्लीन, भरणपोषण करने वाला, परम प्रकाशक अतएव इस धरा पर जहां भी ज्ञान की सत्य की साधना हो वह भारत भूमि है। प्रख्यात दार्शनिक ओशो की रचना ‘भारत एक सनातन यात्रा’ की प्रस्तावना में विख्यात साहित्यकर्तृ श्रीमती अमृता प्रीतम कहती हैं- ‘‘भारत एक भाव दशा है और इस जगत में जहां भी ज्ञान के अनन्त ऊंचाइयों को छूने का परम्परागत प्रयास चलता है वह भारत है।’’ इन विशिष्टताओं के बिना भारत अधूरा है। भारतीय संस्कृति के महानायक श्रीराम इस पावन भारत को माता कहते हैं वे इसे स्वर्ग से भी महनीय बताते हैं।
‘‘अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपिगरीयसी।।’’
(श्री बालमीकि रामायण, लंका काण्ड)

हे लक्ष्मण यद्यपि यह लंका सुवर्ण की है फिर भी मुझे रूचिकर नहीं लग रही है क्योंकि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान् है।
ऋग्वेद के ऋषि तन्मय भाव से भारत की वन्दना में अपनी ऋचाओं को चढ़ाकर अपने को निष्क्रय कर रहे हैं कि-
यस्य इमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रंरसया सह आहुः।
यस्येंमे प्रदिशो यस्य तस्मै देवा हविषा विधेम।।  (ऋग्वेद)

महिमावान हिमालय जिसका गुण गा रहा है। नदियों समेत समुद्र जिसके यशोगान में निरत है, बाहु सदृश दिशाएं जिसकी वन्दना कर रही हैं उस परम राष्ट्र देव को हम हविष्य दें।
श्रीमद् भागवत् में भगवान् वेदव्यास जी कहते है कि-
अहो अमीषां किमकारिशोभनं
प्रसन्न एषां स्विदुत स्वयं हरिः।
यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे
मुकुन्द सेवौपयिकं स्पृहा हि नः।।
(श्रीमद् भागवत् 3.19.21)
देवतागण आपस में बात करते हुए कह रहे हैं कि-
अहो वे लोग ऐसा कौन सा पुण्य किये हैं कि उनका जन्म भगवत्सेवार्थ पवित्र भारतवर्ष के आंगन में हुआ है। इन लोगों पर श्री हरि स्वयं प्रसन्न हैं। इस सौभाग्य पर तो हम भी तरसते हैं।
पुराण तो भारत की वन्दना से आपूरित हैं-
गायन्ति देवाः किल गीतकानि
धन्यास्तुते भारत भूमि भागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते
भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।
(श्री विष्णु पुराण 2.3.24)

देवतागण भी अहर्निश यही गाते रहते हैं कि वे लोग धन्य हैं जो भारतवर्ष में जन्मे है क्योंकि यह भूमि मोक्ष भूमि है।
भारत शब्द का जो अर्थ होता है वही अर्थ ‘काशी’ शब्द का भी होता है।
काश्यां काशते काशी
काशी सर्वप्रकाशिका।
और काशी में मरना मोक्षकारी माना जाता है।
काश्यां मरणान्मुक्तिः
(काशी में मरना मोक्षकर है)

परमपूज्य गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि-
मुक्ति जन्म महि जानि ज्ञान खानि अघ हानिकर।
जहं बस सम्भु भवानि सो कासी सेइय कस न।।
(श्रीरामचरित मानस उत्तर काण्ड)

‘‘यह पवित्र भूमि मोक्ष भू है ज्ञान की खान है, पापनाशी है, यहां भगवान शिव और मां पार्वती सदा विराजते रहते हैं। इस काशी का सेवन क्यों नहीं किया जाय।’’
राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने इसी भारत के भावभूमि की वन्दना में लिखा है कि-
मानचित्र में जो मिलता है नहीं देश भारत है।
भूपर नहीं मनों में ही बस कहीं शेष भारत है।।
भारत एक स्वप्नभू को ऊपर ले जाने वाला।
भारत एक विचार स्वर्ग को भू पर लाने वाला।।
भारत एक भाव जिसको पाकर मनुष्य जगता है,
भारत एक जलज जिस पर जल का न दाग लगता है।।
भारत है संज्ञा विराग के उज्जवल आत्म उदय की,
भारत है आभा मनुष्य की सबसे बड़ी विजय की।
भारत है भावना दाह जगजीवन का हरने की,
भारत है कल्पना मनुज को राग मुक्त करने की।।
जहां कहीं एकता अखण्डित जहां प्रेम का स्वर है,
देश-देश में खड़ा वहां भारत जीवित भास्वर है।
भारत वहां जहां जीवन साधना नहीं है भ्रम में,
धाराओं का समाधान है मिला हुआ संगम में।।
जहां त्याग माधुर्यपूर्ण हो जहां भोग निष्काम।
समरस हो कामना वहीं भारत को करो प्रणाम।।
वृथा मत लो भारत का नाम।।

भारत के भाव भूमि का वन्दन करते हुए भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी कहते हैं-
यह राष्ट्र केवल एक भूमि का टुकड़ा नहीं है, यह जीता जागता राष्ट्र पुरुष है। हिमालय इसका मस्तक है, गौरीशंकर शिखा है। कश्मीर इसका किरीट है। पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं। दिल्ली इसका हृदय है, नर्मदा करधनी है। पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघाएं हैं। इसका सागर चरण धुलाता है, मलयानिल विजन डुलाता है। सावन के काले-काले मेघ इसकी कुन्तल केश राशि हैं। चांद और सूरज इसकी आरती उतारते हैं। यह देवताओं की भूमि है। यह संन्यासियों की भूमि है। यह ऋषि की भूमि है, यह कृषि की भूमि है। यह सम्राटों की भूमि है, यह सेनानियों की भूमि है। यह सन्तों की भूमि है, यह तीर्थकरों की भूमि है। यह अर्पण की भूमि है, यह तर्पण की भूमि है, यह वन्दन की भूमि है, यह अभिनन्दन की भूमि है। इसका कंकर-कंकर शंकर है, इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है। इसका कण-कण हमें प्यारा है इसका जन-जन हमारा दुलारा है। हम जियेंगे तो इसके लिये और यदि मृत्यु ने बुलाया तो मरेंगे भी इसके लिये। अगर मृत्यु के बाद हमारी हड्डियां गंगाजी में फंेक दी गयी और कोई कान लगाकर सुने तो एक ही आवाज सुनायी देगी वन्दे मातरम्। वन्दे मातरम्।।
(श्री अटल बिहारी वाजपेयी)

युग पुरुष स्वामी विवेकानन्द इस पवित्र भारत माता के प्रति कुछ ऐसा विचार रखते थे-
यदि इस पृथ्वीतल पर कोई एक ऐसा देश है, जो मंगलमयी पुण्यभूमि कहलाने का अधिकारी है, ऐसा देश जहां संसार के समस्त जीवों को अपना कर्मफल भोगने के लिये आना ही है, ऐसा देश जहां ईश्वरोन्मुख प्रत्येक आत्मा को अन्तिम लक्ष्य प्राप्त करने के लिये पहुंचना अनिवार्य है, ऐसा देश जहां मानवता ने ऋजुजा उदारता, शुचिता एवं शान्ति का चरम शिखर स्पर्श किया हो तथा इन सबसे आगे बढक़र भी जो देश अन्तदृष्टि एवं आध्यात्मिकता का घर हो तो वह देश भारत है।
-स्वामी विवेकानन्द, बौद्धिक पुस्तिका 1979 का आमुख
इसी भारत के गुणानुवाद में कवि समाधिस्थ सा होकर गा उठता है कि-
ऊंचा ललाट जिसका हिमगिरि चमक रहा है,
स्वर्णिम किरीट जिस पर आदित्य रख रहा है।
साक्षात् शिव की प्रतिमा जो सब प्रकार उज्जवल,
बहता है जिसके सिर पर गंगा का नीर निर्मल।
वह पुण्य भूमि मेरी यह जन्मभूमि मेरी
यह मातृ भूमि मेरी यह पितृ मेरी।।
अमर साहित्यकार श्री जयशंकर प्रसाद जी कहते हैं कि
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
सरस तामरस गर्भ विभा पर नाच रही तरु शिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर मंगल कुंकुाम सारा।। (‘चंद्रगुप्त’ नाटक)
भारत की संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति होने के बावजूद आज भी जीवंत है और मानवता के विकास में सहायक-इससे संभवतः कोई इनकार न कर सकेगा। प्राचीनतम संस्कृति होने के कारण इसका इतिहास मानवता के हर पग से जुडा़ हुआ है। विश्व के इतिहास का कोई भी प्रमुख पृष्ठ ऐसा नहीं है जो भारतीय संस्कृति से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित न रहा हो। मेसोपोटामिया, मिस्र, रोम, यूनान तथा और, ‘इन्का’ और ‘एजटेक’ सरीखी लुप्त संस्कृतियां भी भारतीय संस्कृति से प्रभावित रही हैं तथा इनके प्रणाम भी हैं। यह एक पृथक बात है कि विश्व के सभी इतिहासकारों से उसे मान्यता न मिली हो; पर जो भी इतिहासकार भारतीय संस्कृति के प्रभाव को खोजने मैक्सिको या दक्षिणी अमेरीका के सुदूर क्षेत्रों में गए हैं, वे वहां की लुप्त संस्कृतियों पर भारतीयता की छाप को जान सकने में समर्थ रहे हैं।

भारत, जो ऋग्वेद काल से एक राष्ट्र है, जिसके अभिनंदन में वैदिक ऋचाएं रची गईं और जिसकी समृद्धि के लिए भारतीय ऋषियों ने बार-बार प्रार्थनाएं कीं, उन सबको जाने-अनजाने हमारे संविधान निर्माताओं ने भुला दिया-यह एक ऐसी वास्तविकता है जिसका स्मरण आज भी दुःखदायी है।
‘इदं राष्ट्रं पिपृहि सौभगाय’
-अथर्व.,7-35-1
‘इस राष्ट्र की श्रीवृद्धि हो।
‘बृहद् राष्ट्रं संवेश्यं दधातु’
-अथर्व-3-8-1
हमें एक महान् राष्ट्र प्राप्त हो।

जीवन की विश्वात्म धारणा को प्रतिदिन करनेवाला भारत, जिसका कभी विश्वास रहा ‘वसुधैव कुटंुबकम्’; पर वह दुष्प्रचार का शिकार होकर स्वयं ही अपने मूल्य छोड़ बैठा और सांस्कृतिक रूप से बिखर गया। यह सांस्कृतिक बिखराव आज भी राजनीति में स्तर पर दिखाई दे रहा है। लेकिन फिर भी न तो इस राष्ट्र के कर्णधारों को इसकी चिंता है और न भूल का एहसास है जो कि जाने-अनजाने संविधान निर्माताओं से हो गई। भारत एक सांस्कृतिक इकाई है- भले ही यह बात इस राष्ट्र के अनेक महान् नेतााओं ने बार-बार विभिन्न संदर्भाें में तथा विभिन्न स्तरों पर कही हो; पर उनकी इस अवधारणा की छाया तक भारतीय संविधान में नहीं है। यह सब इसलिए हुआ, क्यांेकि संविधान सतत् उपलब्ध थी, उसका कहीं भी प्रयोग न करके सारी सामग्री योरोप और अमेरिका में खोजी गई। पश्चिम का राजनैतिक व सांस्कृतिक चिंतन तथा दर्शन भारत से मौलिक रूप से भिन्न है, यह सब जानते हुए भी संविधान निर्माण में अनुच्छेदों के लेखन के समय विदेशी मूल्यों, आदर्शांे, परिपाटियों एवं व्यवस्थाओं का ही प्रयोग किया गया।

‘‘प्रत्येक समाज की अपनी एक मूल प्रकृति होती है और भारत की मूल प्रकृति सहिष्णुता प्रधान व समन्वयात्मक है, इसीलिए उसका उद्देश्य है- ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’। सभी सुखी हों, सभी का कल्याण हो-इसी भाव को लेकर भारत में जीवन-मूल्यों को विकसित किया गया। ये जीवन-मूल्य जितने उदार व उच्च होंगे, उनसे जुडी़ संस्कृति भी उतनी ही उदार व उच्च होगी। अतः हमें अपने श्रेय प्रधान जीवन-मूल्यों को उन भोगवादी मूल्यों तथा रूढ़िवादिता के प्रहार से बचाना होगा, जो इधर समाज में बढे़ हैं।’’

जे. रैम्जे मैक्डोनाल्ड नामक एक अंग्रेज ने, जो कभी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे, लिखा था, ‘‘जो भी हो, हिन्दू अपनी परम्परा और धर्म के अनुसार भारत को न केवल एक प्रभुसŸाा के अधीन एक राजनीतिक इकाई मानता है, बल्कि अपनी आध्यात्मिक संस्कृति को साकार मन्दिर और उससे भी बढक़र देवी मां का रूप मानता है। भारत और हिन्दुत्व एक दूसरे से ऐसे जुडे़ है, जैसे शरीर से आत्मा। राष्ट्रीयता की व्याख्या करना, उसकी परख करना और उसेे सिद्ध करना एक कठिन काम है, किन्तु जहां तक भारत और आर्यपुत्र का सम्बन्ध है, निश्चय ही उसने उसे अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित किया है ‘‘
जार्ज ओटो ट्रेविलयनः द लाइफ एण्ड लेटर्स आफ लार्ड मैकाले, पृ.421

भारत उपासना-पंथों की भूमि, मानव-जाति का पालन, भाषा की जन्मभूमि, इतिहास की माता, पुराणों की दादी एवं परंपरा की परदादी है। मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान एवं सर्जनशील सामग्री है, उसका भंडार अकेले भारत में है। यह ऐसी भूमि है जिसके दर्शन के लिए सब लालायित ही रहते है और एक बार इसकी झलक मिल जाय तो दुनिया के अन्य सारे दृश्यों के बदले में भी वे उसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं होंगे।

मार्क ट्वेन मानव ने आदिकाल से जो सपने देखने शुरू किये, उनके साकार होने का इस धरती पर कोई स्थान है तो वह है भारत।
रोमां रोला (फ्रांस के विद्वान)

हिन्दुत्व धार्मिक एकरूपता पर जोर नहीं देता, वरन् आध्यात्मिक दृष्टिकोण अपनाता है। यह जीवन-पद्धति है, न कि कोई विचारधारा।

स्वामी विवेकानन्द का ‘‘राष्ट्रदेव की पूजा’’ का आह्वान
‘‘आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्म भूमि भारतमाता ही हमारी आराध्य देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं है। सर्वत्र उसके हाथ हैं, सर्वत्र उसके पैर हैं, और सर्वत्र उसके कान हैं। समझ लो कि दूसरे देवी-देवता सो रहे हैं जिन व्यर्थ के देवी-देवताओं को हम देख नहीं पाते, उनके पीछे तो हम इस प्रत्यक्ष देवता की पूजा कर लेंगे तभी हम दूसरे देव-देवियों की पूजा करने ‘‘योग्य होंगे, अन्यथा नहीं’’
(भारत का भविष्य पृ.19)।

हिन्दुओं को प्रेरणा देते हुए स्वामी जी कहते हैं, ‘‘उŸिाष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’’ (कठोप.1.3.4) यानी उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति से पहले रूको नहीं। यानी पूर्ण हिन्दूराज स्थापित करो। हिन्दू के अस्तित्व की सुरक्षा का यही एकमेव मार्ग रह गया है।

योगी श्री अरविन्द ने 1918 में युवकों का कहाः
‘‘मैं केवल इतना ही कह सकता हूं कि ऐसी सभी बातों को मेरा पूर्ण समर्थन मिलेगा जो एक शक्तिशाली समाज के ढाचे में व्यक्ति के जीवन को मुक्त करने और सशक्त बनाने में सहायक हों तथा उस स्वाधीनता और ऊर्जा को फिर से वापस दिलायें जो भारत के पास उसकी महानता और विस्तार के वीरत्वपूर्ण काल में थी। हमारे अनेक वर्तमान सामाजिक ढांचे जब गढे़ गये थे, हमारी अनेक रीति-नीति व परम्पराएं जब उत्पन्न हुए थे, वह समय सिकुड़न और अवनति का था। आत्मरक्षा और टिके रहने के लिए संकीर्ण सीमाओं में उनकी उपादेयता थी, पर वर्तमान घड़ी में, जब हमसे एक बार फिर एक स्वतंत्र और साहसपूर्ण आत्म रुपांतरण और विस्तार में प्रविष्ट होने की अपेक्षा की जा रही है, वे हमारी प्रगति में रुकावट बन रही है। मैं एक आक्रामक और विस्तारशील हिन्दुत्व में विश्वास करता हूं, संकीर्णता के साथ रक्षात्मक और आत्मसंकोचशील हिन्दुत्व में नहीं।’’
‘‘सर्व साधारण लोगों को सम्मिलित व राष्ट्र के नवजागरण में करना, भविष्य की महानता पर आधारित करना, भारतीय राजनीति को भारतीय धार्मिक भाव-प्रवणता और आध्यात्मिक में भिगोना-ये भारत में एक महान और शक्तिशाली राजनैतिक जागृति की अपरिहार्य शर्तें है।’’
(1918, भारत का पुनर्जन्म पृ.140.)

‘‘हम प्रकृति के जंगल में से चीरकर अपनी राह निकालने वाले अग्रदूत हैं। कायर चोर कामचोर बनने तथा भार उठाने से मना करने और सब कुछ हमारे लिए शीघ्र और सरल बनाये जाने हेतु शोर मचाने से काम नहीं चलेगा। सबसे ऊपर मैं तुमसे सहनशीलता, दृढ़ता, वीरता-सच्ची आध्यात्मिक वीरता की मांग करता हूं। मुझे शक्तिशाली मनुष्य चाहिए। भावुक बच्चे मुझे नहीं चाहिए। (1919 वहीं. पृ. 154)। ‘‘एक अकेले वीर का संकल्प हजारों कायरों के हृदय में साहस फूंक सकता है।’’
(1920 वहीं. पृ. 157)।

हमने अपने सामने जो काम रखा है वह यांत्रिक नहीं है, किन्तु नैतिक और आध्यात्मिक है। हमारे लक्ष्य किसी एक प्रकार की सरकार को बदल डालना नहीं है, प्रत्युत एक राष्ट्र का निर्माण करना है। उस काम का राजनीति भी एक भाग है, परन्तु एक भाग मात्र है। हम अपनी सारी शक्ति राजनीति पर ही नहीं लगाएंगे, ना ही केवल सामाजिक प्रश्नों पर या ब्रह्मविद्या का दर्शन या साहित्य या विज्ञान के विषयों पर, परन्तु इन सबको हम उस एक ही वस्तु के अर्न्तगत समझते हैं जिसे हम सबसे आवश्यक मानते है। वह वस्तु है धर्म, राष्ट्रीय धर्म, जो हमारा विश्वास है, सार्वभौम भी है।’’

श्री अरविन्द का राष्ट्र को आह्वान
महाभारत की एक आख्या के अनुसार-
अभगच्छत राजेन्द्र देविकां लोक विश्रुताम्।
प्रसूर्तियत्र विप्राणां श्रूयते भरतर्षभ।।

अर्थात् ‘‘सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। प्रमाण यही बताते हैं कि यदि सृष्टि की उत्पत्ति भारत के उत्तराखण्ड अर्थात् ब्रह्मावर्त क्षेत्र में ही हुई।

संसार भर में गोरे, पीले, लाल और श्याम (काले) ये चार रंगों के लोग विभिन्न क्षेत्रों में पाए जाते हैं। एक भारत ही ऐसा देश है, जहां इन चार रंगों का भरपूर मिश्रण एक साथ देखने को मिलता है। वस्तुतः श्वेत-काकेशस, पीले-मंगोलियन, काले-नीग्रो तथा लाल रेड इंडियन इन चार प्रकार के रंगविभाजनों के बाद पांचवी मूल एवं मुख्य नस्ल है, जो भारतीय कहलाती है। इस जाति में उपर्युक्त चारों का सम्मिश्रण है। ऐसा कहीं सिद्ध नहीं हेाता कि भारतीय मानव जाति उपर्युक्त चारों जातियों की वर्ण संकरता से उत्पन्न हुई। उलटे नेतृत्व विज्ञानी यह कहते हैं कि भारतीय सम्मिश्रिण वर्ण ही यहां से विस्तरित होकर दीर्घकाल में जलवायु आदि के भेद से चार मुख्य रूप लेता चला गया।

न केवल रंग यहां चारों के सम्मिश्रित पाए जाते हैं, वरन् भारतीयों का शारीरिक गठन भी एक विलक्षणता लिए है। ऊंची दबी, गोल-लम्बी मस्तकाकृति उठी या चपटी नाक, लम्बी-ठिगनी, पतली-मोटी शरीराकृति, एक्जो व एण्डोमॉर्फिक (एकहरी या दुहरी गठन वाली) आकृतियां भारत में पाई जाती हैं। यहां से अन्यत्र बस जाने पर इनके जो गुण सूत्र उस जलवायु में प्रभावी रहे, वे काकेशस, मंगोलियन, नीग्रॉइड व रेडइंडियंस के रूप में विकसित होते चले गए। अतः मूल आर्य जाति की उत्पत्ति स्थली भारत ही है, बाहर कहीं नहीं, यह स्पष्ट तथ्य एक हाथ लगता है। पाश्चात्य विद्वानों ने एक प्रचार किया कि आर्य भारत से कहीं बाहर विदेश से आकर यहां बसे थे। संभवतः इसके साथ दूसरी निम्न जातियों को जनजाति-आदिवासी वर्ग का बताकर, वे उन्हें उच्च वर्ग के विरूद्ध उभारना चाहते थे। द्रविड़ तथा कोल, ये जो दो जातियां भारत में बाहर से आईं बतायी जाती हैं, वस्तुतः आर्य जाति से ही उत्पन्न हुई थीं, इनकी एक शाखा जो बाहर गयी थी पुनः भारत वापस आकर यहां बस गयी।

भारतीय जातियों पर शोध करने वाले नेतृत्व विज्ञानी श्रनैसफील्ड लिखते हैं कि ‘‘भारत में बाहर से आए आर्य विजेता और मूल आदिम मानव (बरबोरिजिन) जैसे कोई विभाजन नहीं है। ये विभाग सर्वथा आधुनिक है। यहां तो समस्त भारतीयेां में एक विलक्षण स्तर की एकता है। ब्राह्मणों से लेकर सड़क साफ करने वाले भंगियों तक की आकृति और रक्त समान हैं।’’
मनुसंहिता (10/43-44) का एक उदाहरण है
शनकैस्तु क्रियालोपदिनाः क्षत्रिय जातयः।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणा दर्शनेन च।।

पौण्ड्राकाशचौण्ड्रद्रविडाः काम्बोजाः शकाः।
पादराः पहल्वाश्चीनाः काम्बोजाः दरदाः खशाः।।

अर्थात् ‘‘ब्राह्मणत्व की उपलब्धि को प्राप्त न हानेे के कारण उस क्रिया का लोप होने से पौण्ड्र, चौण्ड्र, द्रविड़ काम्बोज, भवन, शक पादर, पहल्व, चीनी किरात, दरद व खश ये क्षत्रिय जातियां धीरे-धीरे शूद्रत्व को प्राप्त हो गयीं।’’ स्मरण रहे यहां ब्राह्मणत्व से तात्पर्य है श्रेष्ठ चिन्तन, ज्ञान का उपार्जन व श्रेष्ठ कर्म तथा शूद्रत्व से अर्थ है निकृष्ट चिंतन व निकृष्ट कर्म। क्षत्रिय वे जो पुरूषार्थी थे व बाहुबल से क्षेत्रों की विजय करके राज्य स्थापना हेतु बाहर जाते रहे।

मूल आर्य जाति ने उत्तराखण्ड से नीचे की भूमि में वनों को काटकर, जलाकर उन्हें


भारत में भारतीयता विषय पर सब पहलुओं से विचार किया गया है। इस शरीर के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, अतएव-
यावज्जीवं सुखं जीवेद् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।।

भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी तभी हम पुनः भारत को विश्व में प्रतिष्ठापित कर पायेंगे। इसी भावना और विचार में भारत की एकता तथा अखण्डता बनी रह सकती है। तभी भारत परम वैभव को प्राप्त कर सकता है।
विश्व के अनेक विद्याविदों, दार्शनिकांे, वैज्ञानिकों और प्रतिभावानों ने भारत के समर्थ को सिद्ध किया है। किसी ने इसे ज्ञान की भूमि कहा है तो किसी ने मोक्ष की, किसी ने इसे सभ्यताओं का मूल कहा है तो किसी ने इसे भाषाओं की जननी, किसी ने यहां आत्मिक पीपासा बुझाई है तो कोई यहां के वैभव से चमत्कृत हुआ है, कोई इसे मानवता का पालना मानता है तो किसी ने इसे संस्कृतियों का संगीत कहा है। तप, ज्ञान, योग, ध्यान, सत्संग, यज्ञ, भजन, कीर्तन, कुम्भ तीर्थ, देवालय और विश्व मंगल के शुभ मानवीय कर्म एवं भावों से निर्मित भारतीय समाज अपने में समेटे खड़ा है इसी से पूरा  भू-मण्डल भारत की ओर आकर्षित होता रहा है और होता रहेगा। भारतीय संस्कृति की यही विकिरण ऊर्जा ही हमारी चिरंतन परम्परा की थाती है।
विश्व सभ्यता और विचार-चिन्तन का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन इस समूची पृथ्वी पर पहली बार भारत में ही मनुष्य की संवेदनाओं चिंतन प्रारंभ किया भारतीय चिंतन का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है। भारत एक देश है और सभी भारतीय जन एक है, परन्तु हमारा यह विश्वास है कि भारत के एकत्व का आधार उसकी युगों पुरानी अपनी संस्कृति में निहित है- इस बात को न्यायालयों ने उनके निर्णयों में स्वीकार किया है। सांस्कृतिक चिंतन  एक आध्यात्मिक अवधारणा है और यही है भारतीय का वैशिष्ट्य। राष्ट्र का आधार हमारी संस्कृति और विरासत है। हमारे लिए ऐसे राष्ट्रवाद का कोई अर्थ नहीं जो हमे वेदांे, पुराणों, रामायण, महाभारत, गौतमबुद्ध, भगवान महावीर स्वामी, शंकराचार्य, गुरूनानक, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज, स्वामी दयानन्द, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, पण्डित दीनदयाल उपाध्याय और असंख्य अन्य राष्ट्रीय अधिनायकों से अलग करता हो। यह राष्ट्रवाद ही हमारा धर्म है।

संप्रति
सहायक प्राध्यापक
माखनलाल चतुर्वेदी
राष्ट्री य पत्रकारिता एवं संचार विश्वेविद्यालयए नोएडा
मोबाइल 8750820740




Monday, April 3, 2017

गाय की रक्षा पर बहस क्यों ?

डॊ. सौरभ मालवीय
वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति में गाय का विशेष महत्व है. दुख की बात है कि भारतीय संस्कृति में जिस गाय को पूजनीय कहा गया है, आज उसी गाय को भूखा-प्यासा सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ दिया गया है. लोग अपने घरों में कुत्ते तो पाल लेते हैं, लेकिन उनके पास गाय के नाम की एक रोटी तक नहीं है. छोटे गांव-कस्बों की बात तो दूर देश की राजधानी दिल्ली में गाय को कूड़ा-कर्कट खाते हुए देखा जा सकता है. प्लास्टिक और पॊलिथीन खा लेने के कारण उनकी मृत्यु तक हो जाती है. भारतीय राजनीति में जाति, पंथ और धर्म से ऊपर होकर लोकतंत्र और पर्यावरण की भी चिंता होनी चाहिए. गाय की रक्षा, सुरक्षा बहस का मुद्दा आख़िर क्यों बनाया जा रहा है?

धार्मिक ग्रंथों में गाय को पूजनीय माना गया है. श्रीकृष्ण को गाय से विशेष लगाव था. उनकी प्रतिमाओं के साथ गाय देखी जा सकती है.
बिप्र धेनु सूर संत हित, लिन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार॥
अर्थात ब्राह्मण (प्रबुद्ध जन) धेनु (गाय) सूर (देवता) संत (सभ्य लोग) इनके लिए ही परमात्मा अवतरित होते हैं. परमात्मा स्वयं के इच्छा से निर्मित होते हैं और मायातीत, गुणातीत एवम् इन्द्रीयातीत इसमें गाय तत्व इतना महत्वपूर्ण है कि वह सबका आश्रय है. गाय में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास रहता है. इसलिए गाय का प्रत्येक अंग पूज्यनीय माना जाता है. गो सेवा करने से एक साथ 33 करोड़ देवता प्रसन्न होते हैं. गाय सरलता शुद्धता और सात्विकता की मूर्ति है. गऊ माता की पीठ में ब्रह्म, गले में विष्णु और मुख में रूद्र निवास करते हैं, मध्य भाग में सभी देवगण और रोम-रोम में सभी महार्षि बसते हैं. सभी दानों में गो दान सर्वधिक महत्वपूर्ण माना जाता है.

गाय को भारतीय मनीषा में माता केवल इसीलिए नहीं कहा कि हम उसका दूध पीते हैं. मां इसलिए भी नहीं कहा कि उसके बछड़े हमारे लिए कृषि कार्य में श्रेष्ठ रहते हैं, अपितु हमने मां इसलिए कहा है कि गाय की आंख का वात्सल्य सृष्टि के सभी प्राणियों की आंखों से अधिक आकर्षक होता है. अब तो मनोवैज्ञानिक भी इस गाय की आंखों और उसके वात्सल्य संवेदनाओं की महत्ता स्वीकारने लगे हैं. ऋषियों का ऐसा मंतव्य है कि गाय की आंखों में प्रीति पूर्ण ढंग से आंख डालकर देखने से सहज ध्यान फलित होता है. श्रीकृष्ण भगवान को भगवान बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका गायों की ही थी. स्वयं ऋषियों का यह अनुभव है कि गाय की संगति में रहने से तितिक्षा की प्राप्ति होती है. गाय तितिक्षा की मूर्ति होती है. इसी कारण गाय को धर्म की जननी कहते हैं. धर्मग्रंथों में सभी गाय की पूजा को महत्वपूर्ण बताया गया है. हर धार्मिक कार्यों में सर्वप्रथम पूज्य गणेश और देवी पार्वती को गाय के गोबर से बने पूजा स्थल में रखा जाता है.

परोपकारय दुहन्ति गाव:
अर्थात यह परोपकारिणी है. गाय की सेवा करने से से परम पुण्य की प्राप्ति होती है. मानव मन की कामनाओं को पूर्ण करने के कारण इसे कामधेनु कहा जाता है.
ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि:।
प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट नमो नम: स्वाहा।।
ॐ सर्वदेवमये देवि लोकानां शुभनन्दिनि।
मातर्ममाभिषितं सफलं कुरु नन्दिनि।।

उल्लेखनीय यह भी है कि ज्योतिष शास्त्र में नव ग्रहों के अशुभ फल से मुक्ति पाने के लिए गाय से संबंधित उपाय ही बताए जाते जाते हैं. हिन्दू मान्यता के अनुसार गाय ईश्वर का श्रेष्ठ उपहार है. भारतीय परम्परा के पूज्य पशुओं में गाय को सर्वोपरि माना जाता है. गाय से संबंधित गोपाष्‍टमी भारतीय संस्‍कृति का एक महत्‍वपूर्ण पर्व है. यह कार्तिक शुक्ल की अष्टमी को मनाया जाता है, इस कारण इसका नाम गोपाष्टमी पड़ा. इस पावन पर्व पर गौ-माता का पूजन किया जाता है. गाय की परिक्रमा कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है. गोवर्धन के दिन गोबर को जलाकर उसकी पूजा और परिक्रमा की जाती है. धार्मिक प्रवृत्ति के बहुत लोग प्रतिदिन गाय की पूजा करते हैं. भोजन के समय पहली रोटी गाय के लिए निकालने की भी परंपरा है.

भारत में प्राचीन काल से ही गाय का विशेष महत्व रहा है. मानव जाति की समृद्धि को गौ-वंश की समृद्धि की दृष्टि से जोड़ा जाता है. जिसके पास जितनी अधिक गायें होती थीं, उसे समाज में उतना ही समृद्ध माना जाता था. प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं की अपनी गौशालाएं होती थीं, जिनकी व्यवस्था वे स्वयं देखते थे. विजय प्राप्त होने, कन्याओं के विवाह तथा अन्य मंगल उत्सवों पर गाय उपहार स्वरूप या दान स्वरूप दी जाती थीं.

गोहत्या को पापा माना जाता है, जिनका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है.
गोहत्यां ब्रह्महत्यां च करोति ह्यतिदेशिकीम्।
यो हि गच्छत्यगम्यां च यः स्त्रीहत्यां करोति च ॥

भिक्षुहत्यां महापापी भ्रूणहत्यां च भारते।
कुम्भीपाके वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥

गाय संसार में प्राय: सर्वत्र पाई जाती है. एक अनुमान के अनुसार विश्व में कुल गायों की संख्या 13 खरब है. गाय से उत्तम प्रकार का दूध प्राप्त होता है, जो मां के दूध के समान ही माना जाता है. जिन बच्चों को किसी कारण वश उनकी माता का दूध नहीं मिलता, उन्हें गाय का दूध पिलाया जाता है.
उल्लेखनीय है कि हमारे देश में गाय की 30 प्रकार की प्रजातियां पाई जाती हैं. इनमें सायवाल जाति, सिंधी, कांकरेज, मालवी, नागौरी, थरपारकर, पवांर, भगनाड़ी, दज्जल, गावलाव, हरियाना, अंगोल या नीलोर और राठ, गीर, देवनी, नीमाड़ी, अमृतमहल, हल्लीकर, बरगूर, बालमबादी, वत्सप्रधान, कंगायम, कृष्णवल्ली आदि प्रजातियों की गाय सम्मिलित हैं. गाय के शरीर में सूर्य की गो-किरण शोषित करने की अद्भुत शक्ति होती है. इसीलिए गाय का दूध अमृत के समान माना जाता है. गाय के दूध से बने घी-मक्खन से मानव शरीर पुष्ट बनता है. गाय का गोबर उपले बनाने के काम आता है, जो अच्छा ईंधन है. गोबर से जैविक खाद भी बनाई जाती है. इसके मूत्र से भी कई रोगों का उपचार किया जा रहा है. यह अच्छा कीटनाशक भी है.

वास्तव में गाय को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की बजाय राजनीति से जोड़ दिया गया है, जिसके कारण इसे जबरन बहस का विषय बना दिया गया. गाय सबके लिए उपयोगी है. इसलिए गाय पर बहस करने की बजाय इसके संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए. सरकार को चाहिए कि वह सड़कों पर विचरती गायों के लिए गौशालाओं का निर्माण कराए. 

Saturday, April 1, 2017

डॉ. हेडगेवार : भारत के परिवर्तन के वास्तुकार

तरुण विजय
यदि हमें किसी ऐसे व्यक्तित्व का चयन करना हो, जिनके जीवन और संगठनात्म क्षमता ने किसी औसत भारतीय के जीवन को सर्वाधिक प्रभावित किया हो, वह व्यक्तित्व निर्विवाद रूप से डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार होंगे।
नागपुर में 1889 में हिंदू नव वर्ष (1 अप्रैल)  को जन्मे, डॉ हेडगेवार आगे चलकर राष्ट्र की हिंदू सभ्यता से संबंधित विरासत के प्रति सुस्पष्ट गौरवयुक्त आधुनिक सर्वशक्तिमान भारत के वास्तुकार बनें।
यह एक ऐसे महान व्यक्ति की अविश्वसनीय गाथा है, जो समर्पित युवाओं की एक ऐसी नई व्यवस्था के साथ समाज में परिवर्तन लाने में सफल रहा, जिसका प्रसार आज - तवांग से लेकर लेह तक और ओकहा से लेकर अंडमान तक भारत के कोने-कोने में देखा जा रहा है।
उन्होंने 1925 में विजय दशमी के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की थी, लेकिन इसे यह नाम एक वर्ष बाद दिया गया। इस संगठन के बारे में पहली घोषणा एक साधारण वाक्य - ‘’मैं आज संघ (संगठन) की स्थापना की घोषणा करता हूं‘’  के साथ की गई। इस संगठन को आरएसएस का नाम साल भर के गहन वि‍चार-विमर्श और अनेक सुझावों के बाद दिया गया, जिनमें - भारत उद्धारक मंडल (जिसका अस्पष्ट अनुवाद- भारत को पुनर्जीवित करने वाला समाज) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शामिल थे। इसका प्रमुख उद्देश्य आंतरिक झगड़ों का शिकार न बनने वाले समाज की रचना करना और एकजुटता कायम करना था, ताकि भविष्य में कोई भी हमें अपना गुलाम न बना सके। इससे पहले वे कांग्रेस के सक्रिय सदस्य और कांग्रेस के प्रसिद्ध नागपुर अधिवेशन के आयोजन के सह-प्रभारी रह चुके थे। उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया था और  आजादी के लिए जोशीले भाषण देने के कारण उन्हें एक साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी। वह अनुशीलन समिति के क्रांतिकारियों और उसके नेता पुलिन बिहारी बोस के साथ संबंधों के कारण भी ब्रिटेन के निशाने पर  थे।
लेकिन उन्‍हें अधिक प्रसिद्धि नहीं मिली और उनके जीवन के बारे में उन लोगों से भी कम जाना गया, जिनको उन्होंने सांचे में ढाला था और जो आगे चलकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जानी-मानी हस्तियां बनें। आज भारत में अगर किसी संगठन द्वारा सेवाओं और परियोजनाओं का विशालतम नेटवर्क संचालित किया जा रहा है, तो वह संभवत: आरएसएस – डॉ. हेडगेवार से प्ररेणा प्राप्‍त लोगों द्वारा संचालित जा रहा नेटवर्क ही है। इन परियोजनाओं की संख्या एक लाख 70 हजार है, जिनमें अस्पताल, ब्लड बैंक, आइ बैंक, दिव्यांगों, दृष्टि बाधितों और थेलेसीमिया से पीड़ित बच्चों  की सहायता के लिए विशेष केंद्र शामिल हैं। चाहे युद्ध काल हो या प्राकृतिक आपदा की घड़ी- हेडगेवार के समर्थक मौके पर सबसे पहले पहुंचते हैं और राहत पहुंचाते हैं। चाहे चरखी दादरी विमान दुर्घटना हो, त्‍सुनामी, भुज, उत्‍तरकाशी भूकंप या केदारनाथ त्रासदी हो- आरएसएस के स्वयंसेवक पीड़ितों की मदद के लिए और बाद में पुनर्वास के कार्यों में भी सबसे आगे रहते हैं।
यह सत्य है कि भाजपा अपने नैतिक बल के लिए आरएसएस की ऋणी है और उसके बहुत से नेता स्वयंसेवक हैं, तो भी भारतीय समाज पर डॉ. हेडगेवार के प्रभाव का आकलन केवल भाजपा के राजनीतिक प्रसार से करना, उसे बहुत कम करके आंकना होगा। भारत-म्‍यांमार सीमा के अंतिम छोर पर बसे गांव – मोरेह को ही लीजिए- वहां स्कूल कौन चला रहा है और स्थानीय ग्रामीणों को दवाइयां कौन उप्लब्ध करवा रहा है ? ये वे लोग हैं, जो डॉ. हेडगेवार के विज़न से प्रेरित हैं। इसी तरह पूर्वोत्तर में स्‍थानीय लोगों की सेवा के लिए मोकुकचेंग और चांगलांग परियोजनाएं और अंडमान के जनजातीय विद्यार्थियों के लिए पोर्टब्लेयर आश्रम भी इन्हीं केवल लोगों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। आरएसएस के पास आज स्कूलों और शिक्षकों तथा शैक्षणिक संस्थाओं का विशालतम नेटवर्क है। विद्या भारती आज 25000 से ज्यादा स्कूल चलाती है, उनमें पूर्वोत्तर के सुदूर गांव से लेकर लद्दाख का बर्फीले क्षेत्रों तक,  राजस्थान, जम्मू और पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों में 2,50,000 छात्र पढ़ते हैं और एक लाख अध्यापक शिक्षा प्रदान करते हैं।
     मैं पिछले सप्ताह एक वृत्तचित्र बनाने के लिए हेडगेवार के पैतृक गांव तेलंगाना के कंडाकुर्ती गया था। यह गोदावरी, हरिद्र और मंजरी के संगम पर बसा एक ऐतिहासिक गांव है। हेडगेवार परिवार का पैतृक घर लगभग 50 फुट बाइ 28 फुट का है, जिसे आरएसएस के वरिष्ठ नेता मोरोपंत पिंगले की सहायता और प्रेरणा से स्स्‍थानीय ग्रामीणों द्वारा स्मारक का रूप दिया जा चुका है। यहां एक उत्कृष्ट सह-शिक्षा विद्यालय केशव बाल विद्या मंदिर का संचालन किया जा रहा है, जिसमें लगभग 200 बच्चे पढ़ते हैं। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि उस स्कूल के विद्यार्थियों की काफी बड़ी संख्या, लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम लड़कियों और लड़कों की थी। ऐसा नहीं कि उस गांव में और स्कूल नहीं हैं। इस शांत, प्रशांत गांव में लगभग 65 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों और 35 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है। वहां जितने प्राचीन मंदिर हैं, उतनी ही मस्जिदे भी हैं। दोनों साथ- साथ स्थित हैं और वहां एक भी अप्रिय घटना नहीं हुई है। मुस्लिम अपने बच्चों को ऐसे स्कूल में पढ़ने क्‍यों भेजते हैं, जिसकी स्पथापना आरएसएस के संस्थापक की याद में की गई है?
     मेरी मुलाकात एक अभिभावक – श्री जलील बेग से हुई, जिनके वंश का संबंध मुगलों से है। वे पत्रकार हैं और उर्दू दैनिक मुन्सिफ के लिए लिखते हैं। उन्होंने कहा कि उनका परिवार इस स्कूल को पढ़ाई के लिए अच्छा मानता है, क्योंकि यह स्कूल गरीबों और आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर वर्गों को उत्कृष्ट सुविधाएं उपलब्ध कराता है। सबसे बढ़कर इस स्कूल का स्तर अच्छा है और उसमें डिजिटल क्लास भी है, जहां बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा प्रदान की जाती है। मैंने स्कूल की नन्ही सी छात्रा राफिया को लयबद्ध ढंग से ‘’हिंद देश के निवासी सभी हम एक हैं, रंग रूप वेश भाषा चाहे अनेक हैं’’ गाते सुना।
     कई प्रमुख नेताओं पर बहुत अधिक प्रभावित करने वाले डॉ हेडगेवार ने ‘सबका साथ सबका विकास’ थीम को पूर्ण गौरव के साथ प्रस्‍तुत करते अपने पैतृक गांव के माध्यम से एक सर्वोत्तम उपहार दिया है।
     जिस व्यक्ति ने लाखों लोगों को अखिल भारतीय विज़न प्रदान किया, प्रतिभाशाली भारतीय युवाओं को प्रचारक – भिक्षुओं के रूप में एक ऐसी नई विचारधारा का अंग बनने के लिए प्रेरित किया, जो भले ही गेरूआ वस्त्र धारण न करें, लेकिन तप‍स्वी जैसा जीवन व्यतीत करते हुए लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, शांति के साथ, बिना किसी प्रचार के, मीडिया की चकाचौंध से दूर रहते हुए सभ्यता के उत्थान में अपना उत्कृष्ट योगदान दें।  यह एक ऐसे भारत की गाथा है, जो अभूतपूर्व रूप से बदल रहा है।
     डॉ हेडगेवार ने लाखों लोगों को राष्ट्र के व्यापक कल्याण के लिए कार्य करने के लिए प्रेरित किया, भारत के सार्वभौमिक मूल्यों और धार्मिक परंपराओं के लिए गर्व और साहस की भावना से ओत-प्रोत किया, जिसके बारे में  देश को अधिक जानकारी प्राप्त करने और उसका आकलन किए जाने की आवश्यकता है। वे भारत में परिवर्तन के अब तक के सबसे बड़े प्रवर्तक हैं।
(लेखक राज्‍य सभा के पूर्व सदस्यय, वरिष्ठ पत्रकार और समालोचक हैं)

Wednesday, March 22, 2017

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

डॊ. सौरभ मालवीय
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
भगवान श्री कृष्ण ने अपने आप्तवचन श्रीमद्भगवद् गीता में साधिकार घोषणा की है कि
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्र्रुवं जन्म मृतस्य च.
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि
- गीता 2.27
अर्थात् जन्म लिए हुए का मरना सुनिश्चित है. इसी क्रम में नचिकेता ने भी कठोपनिषद में ऐसा ही कहा. ये बातें केवल मनुष्यों पर ही नहीं अपितु, राष्ट्रों पर भी समान रूपेण प्रभावी हैं. राष्ट्रों के जीवन में भी अवसानाविर्भाव आते रहते हैं, अन्यथा पिछली शताब्दी के इस जगतीतल के श्रेष्ठतम प्रतिभा वालों में से एक प्रो. अर्नाल्डटायनवी ने अपने गहन शोधो उपरांत यह घोषणा की है कि समय-समय पर विश्व का सांस्कृतिक नेतृत्व करने वाली 49 सभ्यताएं कठिन काल के कराल गाल में समा गई हैं. कई सभ्यताओं की तो अवशेष भी धराधाम पर शेष नहीं हैं.

सच तो यह है कि अनेक सभ्यताओं के खंडहर भी अब केवल विलुप्त जन श्रुतियों के माध्यम से पुस्तकागारों के खंडहर बने हुए हैं. और कई सभ्यताओं के भगना अवशेषों पर तो कई-कई बार नये-नये भगनाअवशेष बन चुके हैं. आज कहां पता है. इन्का और एजेटेक सभ्यताओं के उत्स. खालडियन, सुनेरियन समेत अनेक सभ्यताएं जिस भूमि पर पली-बढ़ीं अब उस भूमि पर अब उस भूमि के वासियों में उन सभ्यताओं के स्वपनावशेष भी नहीं हैं. उनके परिकथाओं में भी अब वे पुरानी बातें नहीं बची हैं.

ऐसा इसलिए हुआ कि उस भू-भाग के मानवों ने एकात्म भाव जीवन से पुष्पित पल्लवित उस संस्कृति का परित्याग कर दिया. यह कोई अल्प समय में घटित होने वाली बात नहीं है, अपितु प्रदीर्घ समयान्तराल एवं तज्जन्य सांस्कृतिक विस्मरण का कुफल होता है.

कभी-कभी इस प्रक्रिया में कई शताब्दियां लग जाती हैं, यही नहीं वह भू-भाग तो वैसे ही रहता है, परंतु उस भू-भाग के मनुष्य जब भिन्न प्रकार की जीवन प्रणाली व्यवहृत करने लगते है तो शनैः शनैः उसी भूमि पर नये राष्ट्र का जन्म होता है. यह भी प्रक्रिया सदियों-सदियों तक चलती रहती है. अधिकांश संस्कृतियों के संदर्भ में तो यह दृष्टिगोचर हुआ है कि नया राष्ट्र पुराने से अधिक जाज्वल्यमान, प्राणवान, महिमावान एवं समर्थवान रहता है. अनेक संस्कृतियों के संदर्भ में यह भी हुआ है कि परवर्ती परंपराएं पूर्ववर्तियों की अपेक्षा अल्पजीवी रही हैं.

आर्ष और आप्त प्रमाणानुसार भारत मृत्युंजय है, विश्व के अनेक विद्याविदों, रहस्यदर्शी, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और प्रतिभावानों ने भारत की अमरता को सिद्ध किया है. किसी ने इसे ज्ञान की भूमि कहा है, तो किसी ने मोक्ष की किसी ने इसे सभ्यताओं का मूल कहा है, तो किसी ने इसे भाषाओं की जननी किसी ने यहां आत्मिक पिपासा बुझाई है, तो कोई यहां के वैभव से चमत्कृत हुआ है, कोई इसे मानवता का पालना मानता है, तो किसी ने इसे संस्कृतियों का संगीत कहा है.

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी. यह अपने आप में एक रहस्य है, पहेली है, यक्ष-प्रश्न है. सिर्फ भारत ही नहीं है, जो नहीं मिटा है. नहीं मिटने वाले याने कायम रहने वाले और देश भी हैं. चीन है, यूनान है, रोम है, बेबीलोन है, ईरान है. ये देश कायम तो हैं, लेकिन क्या भारत की तरह कायम हैं? क्या ये हिन्दुस्तान की तरह कायम हैं? शायद नहीं है. इसीलिए इकबाल ने कहा है कि अगर वे कायम हैं, तो भी सिर्फ नाम के लिए कायम हैं. उनकी हस्ती तो मिट चुकी है. उनकी मूल पहचान नष्ट हो चुकी है. इन पुरानी सभ्यताओं को समय ने इतने थपेड़े मारे हैं कि उनका सातत्य भंग हो चुका है.
जिसे कहते है, परंपरा, वह धागा टूट चुका है. परिवर्तन ने परंपरा को परास्त कर दिया है. कुछ देशों ने अपना धर्म बदल लिया, कुछ ने अपनी भाषा बदल ली, कुछ ने अपना नाम बदल लिया और कुछ ने अपनी जीवन-पद्धति ही बदल ली. परिवर्तन की आंधी ने परंपरा के परखचे उड़ा दिए. यह ठीक हुआ या गलत, यह एक अलग प्रश्न है, लेकिन भारत में ऐसी क्या खूबी है कि परंपरा और परिवर्तन यहां कंधे से कंधे मिलाकर आगे बढ़े जा रहे हैं. उनकी द्वंद्वात्मकता उनके विनाश का पर्याय नहीं बन रही है, बल्कि नित्य नूतन सृजन की गर्भ-स्थली बन गई है.

द्वंद्व में से सृजन की निष्पत्ति भारत में लगभग उसी तरह हो रही है, जैसा कि जर्मन दार्शनिक हीगल ने कभी सोचा था. थीसिस और एंटी-थीसिस के टकराव में से सिन्थेसिस निकलता चला जाता है. वाद, प्रतिवाद और संवाद. संवाद याने सम्यक् वाद, समन्वय वाद! यह समन्वय ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें मूल सदा वर्तमान रहता है. कभी नष्ट नहीं होता. बीज रूप में रहता है. सूक्ष्म रूप मे रहता है. यदि मूल अशक्त है तो उसे निर्मूल होने में देर नहीं लगती. भारत की मूल पहचान इतनी सशक्त है कि सैकड़ों हमलों के बावजूद वह कायम है. हमलावर यों तो सोने की चिड़िया को लूटने के लिए आते रहे, लेकिन उनमें से कुछ को यह बुखार भी चढ़ा कि वे भारत को सभ्य बनाएंगे. उसके धर्म, संस्कृति, भाषा और संपूर्ण जीवन-पद्धति को नए रूप में ढालेंगे. लेकिन हुआ क्या? जो भी भारत में रहे गए, वे भारत के रूप में ढल गए. इकबाल ने गलत नहीं कहा कि भारत के किनारे पर सभ्यताओं के अनेक जहाज आए और डूब गए. आखिर यह हुआ कैसे?

इसका पहला कारण तो मुझे यह सूझता है कि दुनिया की दूसरी सभ्यताएं अभी जब अपने शैशव में भी नहीं पहुंची थीं, भारतीय सभ्यता अपने चीर-यौवन में गमक रही थी. यह वही सभ्यता है, जिसे हमलावर हिंदू सभ्यता कहते रहे. जरा हम पीछे मुड़कर देखें तो पाएंगे कि भारत उस समय बेजोड़ था. जब सिकंदर, हूण, अरब, मंगोल, मुगल आदि भारत आए, तो जिन देशों से वे आए थे, वे देश वहां थे और उस समय भारत काहं था. यदि सिकंदर के यूनान में चलें, तो वह युग प्लेटो और अरस्तू का था. प्लेटो और अरस्तू की रचनाओं रिपब्लिक और पॊलिटिक्स की तुलना जरा करें, हमारे उपनिषदों से रामायण और महाभारत से, कालिदास और कौटिल्य की रचनाओं से तो हम किस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे? ये तो बहुत बाद की रचनाएं हैं.

ऋग्वेद, षड्दर्शन, जैन और बौद्ध धर्म आदि के मुकाबले की कोई चीज क्या हमें पश्चिम मे दिखाई पड़ती हैं? ये सभ्यताएं, ये समाज, ये राष्ट्र जब विकास की पहली सीढ़ी पर पांव रख रहे थे, तब तक भारत में वर्ण-व्यवस्थामूलक समाज स्थापित हो चुका था, राज्य-व्यवस्थाएं परिपक्व हो चुकी थीं, अर्थ-व्यवस्थाएं अपने चरमोत्कर्ष पर थीं. राज्य, परिवार, व्यक्ति और व्यक्तिगत संपदा की संस्थाएं न केवल स्वस्थ रूप से काम कर रही थीं, बल्कि उनके पारस्परिक संबंध भी सुपरिभाषित हो चुके थे. जहां तक पहुंचने में पश्चिम को शताब्दियां लग गईं, पुनर्जागरण और औद्योगिक क्रांति के दौर से गुजरना पड़ा, हजार साल के अंधकार युग में भटकना पड़ा, फ्रांस और रूस की खूनी क्रांतियों के अग्निकुंड में कूदना पड़ा, साम्राज्यवाद के राक्षस को अपने कंधे पर बिठाना पड़ा और विश्व युद्ध की विभिषिकाओं को सहना पड़ा, वहां तक भारत कई हजार साल पहले ही पहुंच चुका था. अब से ढाई-तीन हजार साल पहले के भारत ने जिन विचारों को उछाला था, क्या उनसे बेहतर विचार अभी तक किसी अन्य सभ्यता ने मानवता के सामने प्रस्तुत किए हैं?

भारत में जो भी आया, वह उसके भौगोलिक सौंदर्य और भौतिक संपन्नता से तो अभिभूत हुआ ही, बौद्धिक दृष्टि से वह भारत का गुलाम होकर रह गया. वह भारत को क्या दे सकता था? भौतिक भारत को उसने लूटा, लेकिन वैचारिक भारत के आगे उसने आत्म-समर्पण कर दिया. ह्वेन-सांग, फाह्यान, इब्न-बतूता, अल-बेरूनी, बर्नियर जैसे असंख्य प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण इस सत्य को प्रमाणित करते हैं. जिस देश के हाथों में वेद हों, सांख्य और वैशेषिक दर्शन हो, उपनिषदें हों, त्रिपिटक हो, अर्थशास्त्र हो, अभिज्ञानशाकुंतलम् हो, रामायण और महाभारत हो, उसके आगे बाइबिल और कुरान, मेकबेथ और प्रिन्स, ओरिजिन ऒफ स्पेसीज या दास केपिटल आदि की क्या बिसात है? दूसरे शब्दों में भारत की बौद्धिक क्षमता ने उसकी हस्ती को कायम रखा.

भारत के इस अखंड बौद्धिक आत्मविश्वास ने उसके जठरानल को अत्यंत प्रबल बना दिया. उसकी पाचन शक्ति इतनी प्रबल हो गई कि इस्लाम और ईसाइयत जैसे एक चालकानुवर्तित्व वाले मजहबों को भी भारत आकर उदारमना बनना पड़ा. भारत ने इन अभारतीय धाराओं को आत्मसात कर लिया और इन धाराओं का भी भारतीयकरण हो गया. मैं तो यहां तक कहता हूं कि इस्लाम और ईसाइयत भारत आकर उच्चतर इस्लाम और उच्चतर ईसाइयत में परिणत हो गए. धर्मध्वजियों और धर्मग्रंथों पर आधारित इन मजहबों में कर्मफल और पुनर्जन्म का प्रावधान कहीं नहीं है, लेकिन इनके भारतीय संस्करण इन बद्धमूल भारतीय धारणाओं से मुक्त नहीं हैं. भक्ति रस में डूबे भारतीयों के मुकाबले इन मजहबों के अभारतीय अनुयायी काफी फीके दिखाई पड़ते हैं. भारतीय मुसलमान और भारतीय ईसाई दुनिया के किसी भी मुसलमान और ईसाई से बेहतर क्यों दिखाई पड़ता है? इसीलिए कि वह पहले से उत्कृष्ट आध्यात्मिक और उन्नत सांस्कृतिक भूमि पर खड़ा है. यह धरोहर उसके लिए अयत्नसिद्ध है. उसे सेत-मेंत में मिली है.यही भारत का रिक्थ है.

सनातन संस्कृति के कारण इस पावन धरा पर एक अत्यंत दिव्य विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित हुआ. प्राकृतिक पर्यावरण कठिन तप, ज्ञान, योग, ध्यान, सत्संग, यज्ञ, भजन, कीर्तन, कुम्भ तीर्थ, देवालय और विश्व मंगल के शुभ मानवीय कर्म एवं भावों से निर्मित इस दिव्य इलेक्ट्रो-मैगनेटिक फील्ड से अत्यंत प्रभावकारी विद्युत चुम्बकीय तरंगों का विकिरण जारी है. इसी से समग्र भू-मंडल भारत की ओर आकर्षित होता रहा है और होता रहेगा. भारतीय संस्कृति की यही विकिरण ऊर्जा ही हमारी चिरंतन परंपरा की थाती है. भूगोल, इतिहास और राज्य व्यवस्थाओं की क्षुद्र संकीर्णताओं के इतर प्रत्येक मानव का अभ्युदय और निःश्रेयस ही भारत का अभीष्ट है. साम्राज्य भारत का साध्य नहीं वरन् साधन है. परिणामतः हिन्दू साम्राज्य किसी समाज, देश और पूजा पद्धति को त्रस्त करने में कभी उत्सुक नहीं रहे. यहां तो सृष्टि का कण-कण अपनी पूर्णता और दिव्यता के साथ खिले, इसका सतत प्रयत्न किया जाता है. आवश्यकतानुरूप त्यागमय भोग ही अभीष्ट है तभी तो दातुन हेतु भी वृक्ष की एक टहनी तोड़ने के पूर्व हम वृक्ष की प्रार्थना करते हैं और कहते हैं-
आयुर्बलं यशो वर्चः
प्रजा
पशु वसूनिच.
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च
त्वनो
देहि वनस्पति..
(वाधूलस्मृति 35, कात्यायन स्मृति 10-4, विश्वामित्र स्मृति 1-58, नारद पुराण 27-25, देवी भागवत 11-2-38, पद्म पुराण 92-12)

दरअसल भारत का राष्ट्रजीवन सत्यकामी है. उसने पाया कि मनुष्य एक रहस्य है. तमाम आधुनिक वैज्ञानिक खोजों और विचार तथा दर्शन की हजारों व्याख्याओं के बावजूद मनुष्य एक पहेली है. एक अचरज है. एक अचम्भा है.

भारत सत्य का सनातन खोजी बना. सत्य की खोज भारत का स्वभाव बना. इसलिए भारत सिर्फ एक भूखंड ही नहीं है. यह सिर्फ एक संप्रभु राज्य भी नहीं है. भारत समूची सृष्टि के रहस्यों को जान लेने की सनातन अभीप्सा है. भारत और सत्य अभीप्सा पर्यायवाची है. भारत और अमृत-प्यास समानार्थी हैं. भारत सनातन यात्रा है. यह यात्रा कब प्रारंभ हुई? किस जगह प्रारंभ हुई? कब समाप्त होगी? इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता. इसीलिए भारत के पास आधुनिक शैली वाला इतिहास नहीं है. ‘सनातन’ का कोई इतिहास होता भी नहीं ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना जरूरी ही हो तो कह सकते हैं भारत की सनातन यात्रा अनन्त से अनंत की दिव्ययात्रा है.

भारत विश्व मनुष्यता का स्वर्णिम अतीत है और भारत ही विश्व मनुष्यता का इंद्रधनुषी सपना भी. भारत उदास होता है, तो विश्व मनुष्यता का कोई भविष्य नहीं है. भारत के भाग्य के साथ समूची विश्व मानवता का भाग्य नत्थी है. समूची पृथ्वी पर सिर्फ भारत ने अपनी समूची जीवन ऊर्जा को सत्य की खोज से जोड़ा. भारत ने पूरी विनम्रता और आत्यंतिक निरंहकारिता के साथ विश्व कल्याण की खातिर ही अपना सर्वस्व लुटाया. हमारे पूर्वजों ने भौतिक समृद्धि की परवाह नहीं की. उन्होंने भूख और नींद जैसी अति आवश्यक जैविक जरूरतों को भी नजरंदाज करते हुए ज्ञान, भक्ति, योग, तंत्र और ध्यान जैसे आंतरिक संसाधनों का विकास किया. इस देश ने विश्वमानवता के ज्ञात इतिहास में कोई 10-12 हजार वर्ष की सत्यखोजी तप साधना चलाई है.

भारत एक देश है और सभी भारतीय जन एक है, परंतु हमारा यह विश्वास है कि भारत के एकत्व का आधार उसकी युगों पुरानी अपनी संस्कृति में निहित है.

अनादिकाल से भारत में वैचारिक स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य को प्राप्त रही है. प्राचीनकाल से ऋषियों, मनीषियों द्वारा समग्र जीवन दाव पर लगाकर भी अप्रतिम जीवन रहस्य खोजे गये. आत्मा और परमात्मा के गूढ़तर सम्बंध के इस सत्य साधकों ने कभी भी अंतिम सत्य प्राप्त कर लेने का दावा नहीं किया. अपना अंतिम अभुभव बताने के पश्चात् भी वे ऋषिगण ‘नेति-नेति’ कहकर अपने आगत पीढ़ियों को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराते थे. ‘‘नेति- (ऩइति, यह अंतिम नहीं है) नेति’’ वालों ने यह उद्घोष कर दिया था कि ‘‘आत्म दीपोभव’’ (उपनिषद वाक्य) अर्थात् स्वयम् का ज्ञानदीप प्रज्जवलित करो. इसी मौलिक विचार सूत्र से अनुप्राणित होकर महात्मा बुद्ध ने भी कहा था कि ‘‘किसी सत्य को इसलिए मत मान लो कि किसी बड़ी पुस्तक में लिखा है या इसलिए भी मत मान लो कि किसी अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति ने कहा है अपितु, उस विचार को अपनी प्रज्ञा की कसौटी पर देखो और यदि सत्य लगे तो ही स्वीकार करना. उपर्युक्त श्रुति को ही उन्होंने पालि भाषा में ‘‘अप्प दीपो भव’’ कहा था. इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य के आत्मविकास की अन्यतम सम्भावनाओं के खिलने का अवसर उपलब्ध कराना भारतीय धर्म का वैचारिक पद्धति रही है.