Saturday, April 1, 2017

डॉ. हेडगेवार : भारत के परिवर्तन के वास्तुकार

तरुण विजय
यदि हमें किसी ऐसे व्यक्तित्व का चयन करना हो, जिनके जीवन और संगठनात्म क्षमता ने किसी औसत भारतीय के जीवन को सर्वाधिक प्रभावित किया हो, वह व्यक्तित्व निर्विवाद रूप से डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार होंगे।
नागपुर में 1889 में हिंदू नव वर्ष (1 अप्रैल)  को जन्मे, डॉ हेडगेवार आगे चलकर राष्ट्र की हिंदू सभ्यता से संबंधित विरासत के प्रति सुस्पष्ट गौरवयुक्त आधुनिक सर्वशक्तिमान भारत के वास्तुकार बनें।
यह एक ऐसे महान व्यक्ति की अविश्वसनीय गाथा है, जो समर्पित युवाओं की एक ऐसी नई व्यवस्था के साथ समाज में परिवर्तन लाने में सफल रहा, जिसका प्रसार आज - तवांग से लेकर लेह तक और ओकहा से लेकर अंडमान तक भारत के कोने-कोने में देखा जा रहा है।
उन्होंने 1925 में विजय दशमी के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की थी, लेकिन इसे यह नाम एक वर्ष बाद दिया गया। इस संगठन के बारे में पहली घोषणा एक साधारण वाक्य - ‘’मैं आज संघ (संगठन) की स्थापना की घोषणा करता हूं‘’  के साथ की गई। इस संगठन को आरएसएस का नाम साल भर के गहन वि‍चार-विमर्श और अनेक सुझावों के बाद दिया गया, जिनमें - भारत उद्धारक मंडल (जिसका अस्पष्ट अनुवाद- भारत को पुनर्जीवित करने वाला समाज) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शामिल थे। इसका प्रमुख उद्देश्य आंतरिक झगड़ों का शिकार न बनने वाले समाज की रचना करना और एकजुटता कायम करना था, ताकि भविष्य में कोई भी हमें अपना गुलाम न बना सके। इससे पहले वे कांग्रेस के सक्रिय सदस्य और कांग्रेस के प्रसिद्ध नागपुर अधिवेशन के आयोजन के सह-प्रभारी रह चुके थे। उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया था और  आजादी के लिए जोशीले भाषण देने के कारण उन्हें एक साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी। वह अनुशीलन समिति के क्रांतिकारियों और उसके नेता पुलिन बिहारी बोस के साथ संबंधों के कारण भी ब्रिटेन के निशाने पर  थे।
लेकिन उन्‍हें अधिक प्रसिद्धि नहीं मिली और उनके जीवन के बारे में उन लोगों से भी कम जाना गया, जिनको उन्होंने सांचे में ढाला था और जो आगे चलकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जानी-मानी हस्तियां बनें। आज भारत में अगर किसी संगठन द्वारा सेवाओं और परियोजनाओं का विशालतम नेटवर्क संचालित किया जा रहा है, तो वह संभवत: आरएसएस – डॉ. हेडगेवार से प्ररेणा प्राप्‍त लोगों द्वारा संचालित जा रहा नेटवर्क ही है। इन परियोजनाओं की संख्या एक लाख 70 हजार है, जिनमें अस्पताल, ब्लड बैंक, आइ बैंक, दिव्यांगों, दृष्टि बाधितों और थेलेसीमिया से पीड़ित बच्चों  की सहायता के लिए विशेष केंद्र शामिल हैं। चाहे युद्ध काल हो या प्राकृतिक आपदा की घड़ी- हेडगेवार के समर्थक मौके पर सबसे पहले पहुंचते हैं और राहत पहुंचाते हैं। चाहे चरखी दादरी विमान दुर्घटना हो, त्‍सुनामी, भुज, उत्‍तरकाशी भूकंप या केदारनाथ त्रासदी हो- आरएसएस के स्वयंसेवक पीड़ितों की मदद के लिए और बाद में पुनर्वास के कार्यों में भी सबसे आगे रहते हैं।
यह सत्य है कि भाजपा अपने नैतिक बल के लिए आरएसएस की ऋणी है और उसके बहुत से नेता स्वयंसेवक हैं, तो भी भारतीय समाज पर डॉ. हेडगेवार के प्रभाव का आकलन केवल भाजपा के राजनीतिक प्रसार से करना, उसे बहुत कम करके आंकना होगा। भारत-म्‍यांमार सीमा के अंतिम छोर पर बसे गांव – मोरेह को ही लीजिए- वहां स्कूल कौन चला रहा है और स्थानीय ग्रामीणों को दवाइयां कौन उप्लब्ध करवा रहा है ? ये वे लोग हैं, जो डॉ. हेडगेवार के विज़न से प्रेरित हैं। इसी तरह पूर्वोत्तर में स्‍थानीय लोगों की सेवा के लिए मोकुकचेंग और चांगलांग परियोजनाएं और अंडमान के जनजातीय विद्यार्थियों के लिए पोर्टब्लेयर आश्रम भी इन्हीं केवल लोगों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। आरएसएस के पास आज स्कूलों और शिक्षकों तथा शैक्षणिक संस्थाओं का विशालतम नेटवर्क है। विद्या भारती आज 25000 से ज्यादा स्कूल चलाती है, उनमें पूर्वोत्तर के सुदूर गांव से लेकर लद्दाख का बर्फीले क्षेत्रों तक,  राजस्थान, जम्मू और पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों में 2,50,000 छात्र पढ़ते हैं और एक लाख अध्यापक शिक्षा प्रदान करते हैं।
     मैं पिछले सप्ताह एक वृत्तचित्र बनाने के लिए हेडगेवार के पैतृक गांव तेलंगाना के कंडाकुर्ती गया था। यह गोदावरी, हरिद्र और मंजरी के संगम पर बसा एक ऐतिहासिक गांव है। हेडगेवार परिवार का पैतृक घर लगभग 50 फुट बाइ 28 फुट का है, जिसे आरएसएस के वरिष्ठ नेता मोरोपंत पिंगले की सहायता और प्रेरणा से स्स्‍थानीय ग्रामीणों द्वारा स्मारक का रूप दिया जा चुका है। यहां एक उत्कृष्ट सह-शिक्षा विद्यालय केशव बाल विद्या मंदिर का संचालन किया जा रहा है, जिसमें लगभग 200 बच्चे पढ़ते हैं। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि उस स्कूल के विद्यार्थियों की काफी बड़ी संख्या, लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम लड़कियों और लड़कों की थी। ऐसा नहीं कि उस गांव में और स्कूल नहीं हैं। इस शांत, प्रशांत गांव में लगभग 65 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों और 35 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है। वहां जितने प्राचीन मंदिर हैं, उतनी ही मस्जिदे भी हैं। दोनों साथ- साथ स्थित हैं और वहां एक भी अप्रिय घटना नहीं हुई है। मुस्लिम अपने बच्चों को ऐसे स्कूल में पढ़ने क्‍यों भेजते हैं, जिसकी स्पथापना आरएसएस के संस्थापक की याद में की गई है?
     मेरी मुलाकात एक अभिभावक – श्री जलील बेग से हुई, जिनके वंश का संबंध मुगलों से है। वे पत्रकार हैं और उर्दू दैनिक मुन्सिफ के लिए लिखते हैं। उन्होंने कहा कि उनका परिवार इस स्कूल को पढ़ाई के लिए अच्छा मानता है, क्योंकि यह स्कूल गरीबों और आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर वर्गों को उत्कृष्ट सुविधाएं उपलब्ध कराता है। सबसे बढ़कर इस स्कूल का स्तर अच्छा है और उसमें डिजिटल क्लास भी है, जहां बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा प्रदान की जाती है। मैंने स्कूल की नन्ही सी छात्रा राफिया को लयबद्ध ढंग से ‘’हिंद देश के निवासी सभी हम एक हैं, रंग रूप वेश भाषा चाहे अनेक हैं’’ गाते सुना।
     कई प्रमुख नेताओं पर बहुत अधिक प्रभावित करने वाले डॉ हेडगेवार ने ‘सबका साथ सबका विकास’ थीम को पूर्ण गौरव के साथ प्रस्‍तुत करते अपने पैतृक गांव के माध्यम से एक सर्वोत्तम उपहार दिया है।
     जिस व्यक्ति ने लाखों लोगों को अखिल भारतीय विज़न प्रदान किया, प्रतिभाशाली भारतीय युवाओं को प्रचारक – भिक्षुओं के रूप में एक ऐसी नई विचारधारा का अंग बनने के लिए प्रेरित किया, जो भले ही गेरूआ वस्त्र धारण न करें, लेकिन तप‍स्वी जैसा जीवन व्यतीत करते हुए लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, शांति के साथ, बिना किसी प्रचार के, मीडिया की चकाचौंध से दूर रहते हुए सभ्यता के उत्थान में अपना उत्कृष्ट योगदान दें।  यह एक ऐसे भारत की गाथा है, जो अभूतपूर्व रूप से बदल रहा है।
     डॉ हेडगेवार ने लाखों लोगों को राष्ट्र के व्यापक कल्याण के लिए कार्य करने के लिए प्रेरित किया, भारत के सार्वभौमिक मूल्यों और धार्मिक परंपराओं के लिए गर्व और साहस की भावना से ओत-प्रोत किया, जिसके बारे में  देश को अधिक जानकारी प्राप्त करने और उसका आकलन किए जाने की आवश्यकता है। वे भारत में परिवर्तन के अब तक के सबसे बड़े प्रवर्तक हैं।
(लेखक राज्‍य सभा के पूर्व सदस्यय, वरिष्ठ पत्रकार और समालोचक हैं)

Tuesday, February 28, 2017

Dr. Sourabh Malviya


Born in Patnejee  village of  Deorai district of Uttar Pradesh, Dr. Sourabh Malviya has been associated with movements in the field of  the social change and the national constructions from child hood. He has great impact of the teachings and  philosophy of Jatatguru Shankaracharya  and  Dr. Baliram Keshav Hedgewar. He  has his own explicit ground of thoughts. Dr. Malviya has done his Ph D  on the “Cultural Nationalism and Media” which is in itself an experimental  approach.  He continues his expressive writing on national and regional magazines and newspapers beside regular participation in the television and radio discussion. Keeping in view  his aptness in the nationalism and other media concerns, he has been honoured with several awards and the prizes including prestigious MotiBA  Naya Media Samman, Vishnu Prabhakar Patrikarita Samman and Pravakta Dot Com Samman. Dr. Sourabh Malviya is currently Assistant Professor in Makhanlal Chaturvedi National University  of Journalism and Communication, Bhopal, Madhya Pradesh and posted at its Noida Campus.
He can be contact on:

Mobile : 8750820740
Email : malviya.sourabh@gmail.com
drsourabhmalviya@gmail.com
Website : sourabhmalviya.com

C-56/4, Sector 62, NOIDA- 201301
Uttar Pradesh


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Dr. Sourabh Malviya


Born in Patnejee  village of  Deorai district of Uttar Pradesh, Dr. Sourabh Malviya has been associated with movements in the field of  the social change and the national constructions from child hood. He has great impact of the teachings and  philosophy of Jatatguru Shankaracharya  and  Dr. Baliram Keshav Hedgewar. He  has his own explicit ground of thoughts. Dr. Malviya has done his Ph D  on the “Cultural Nationalism and Media” which is in itself an experimental  approach.  He continues his expressive writing on national and regional magazines and newspapers beside regular participation in the television and radio discussion. Keeping in view  his aptness in the nationalism and other media concerns, he has been honoured with several awards and the prizes including prestigious MotiBA  Naya Media Samman, Vishnu Prabhakar Patrikarita Samman and Pravakta Dot Com Samman. Dr. Sourabh Malviya is currently Assistant Professor in Makhanlal Chaturvedi National University  of Journalism and Communication, Bhopal, Madhya Pradesh and posted at its Noida Campus.
He can be contact on:

Mobile : 8750820740
Email : malviya.sourabh@gmail.com
drsourabhmalviya@gmail.com
Website : sourabhmalviya.com

C-56/4, Sector 62, NOIDA- 201301
Uttar Pradesh


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Monday, December 5, 2016

‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श

पटना। भारत हमेशा से ही ज्ञान आराधक राष्ट्र रहा है। भारत की ज्ञान परंपरा औरों से विशेष इसलिए है क्योंकि यह केवल हमारे बाहर मौजूद लौकिक (मटेरियल) ज्ञान को ही महत्वपूर्ण नहीं मानती बल्कि आत्म-चिंतन द्वारा प्राप्त भीतर के ज्ञान को भी समान महत्व देती है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व इन दोनों ही प्रकार के ज्ञान को कड़ी साधना से अर्जित कर ग्रंथो के रूप में मानव समाज के लिए प्रस्तुत किया। आज चाहे योग की बात हो, विज्ञान की या फिर गणित की, पूरी दुनिया ने भारतीय ज्ञान से कुछ न कुछ लिया है। इस प्रकार हम एक श्रेष्ठ ज्ञान परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। यह विचार ‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले व्यक्त किए। अपने रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में इस संविमर्श का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा पटना में किया है।
श्री होसबोले ने कहा की ज्ञान केवल पुस्तकें पढ़कर सूचनाओं को एकत्र करना नहीं है। बल्कि इन सूचनाओं का मानव हित में उपयोग कर पाने की क्षमता ज्ञान है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार पुस्तकों के अलावा, आत्म-चिंतन के द्वारा और विभिन्न प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़कर भी ज्ञान हासिल कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में इस बात तक का उल्लेख किया गया है कि हजारों वर्ष पूर्व किस प्रकार नदियों के रास्तों का भी वैज्ञानिक पद्धति से निर्माण कर उनको प्रवाहित किया गया। उन्होंने भारत की ज्ञान परंपरा के पुनरोत्थान में पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा किये जाने वाले कार्यों की सराहना करते हुए कहा की आज जहाँ कुछ विश्वविद्यालय अपने मूल उद्देश्य से भटक गए हैं, वहीँ यह विश्वविद्यालय सही मायने में ज्ञान साधना कर रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में किये गए अपने महत्वपूर्ण कार्यों को विश्वविद्यालय ने देश के अलग-अलग राज्यों में पहुँचाया है।
संविमर्श की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि आज के परिदृश्य तथा भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए हमें अपने ज्ञान की समृद्ध परंपरा को उपयोग में लाने की आवश्यकता है। आज से हजारों साल पहले जिस प्रकार हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति को समझा था और उसके साथ जैसा सम्बन्ध स्थापित किया था, उसे आज लागू करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा की उस ज्ञान को प्राप्त करने का सबसे प्रभावशाली माध्यम संस्कृत भाषा है, जिसकी आज उपेक्षा हो रही है। उनका मानना है कि आज जिस स्तर पर संस्कृत स्कूल तथा महाविद्यालयों में पढाई जा रही है, वह नाकाफी है। उन्होंने कहा कि आज विश्व को भारत की प्राचीन और समृद्ध ज्ञान की आवश्यकता है, लेकिन हमारे इस ज्ञान के भण्डार को आज पश्चिम के कुछ कथित विद्वान अपनी समझ के अनुसार उसकी व्याख्या करने की चेष्टा कर रहे हैं जबकि आवश्यकता है कि हम उस ज्ञान को भारतीय परंपरा के अनुसार व्याख्या कर दुनिया तक ले जायें ताकि उसमे कोई त्रुटी न हो और उसके औचित्य को सही मायनों में दुनिया को समझा सकें। वहीँ, उद्घाटन समारोह के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शत्रुघ्न प्रसाद ने कहा कि पश्चिमी देशों ने हमेशा से ही अपने ज्ञान परंपरा को हमारे ऊपर थोपने का प्रयास किया है जबकि हमारे देश के विद्वानों ने समय-समय पर इसका विरोध किया। आज आवश्यकता है कि वर्षों से उपेक्षित अपने ज्ञान को आगे लायें।
संविमर्श में सोमवार को ‘भारत में संवाद की परंपरा’ विषय पर काठमांडू विश्वविद्यालय, नेपाल से आये डॉ. निर्मल मणि अधिकारी ने व्याख्यान दिया। उन्होंने भरत मुनि और महर्षि नारद को उल्लेखित करते हुए बताया कि भारत में सदैव लोकहित में संवाद की परंपरा रही है। दूसरे सत्र में ‘भारत में अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र की परंपरा’ विषय पर प्रख्यात साहित्यकार एवं शिक्षाविद प्रो. रामेश्वर पंकज मिश्र ने व्याख्यान दिया। जबकि ‘भारत में अध्यात्म का आधार’ विषय पर बीकानेर से आये स्वामी सुबोधगिरि और ‘आयुर्वेद और जीव विज्ञान की परंपरा’ पर भोपाल से आये वैद्य चन्द्रशेखर ने अपने व्याख्यान दिए।


      आज इन विषयों पर विमर्श : संविमर्श में मंगलवार को वैदिक गणित पर रोहतक के राकेश भाटिया, भारत में विज्ञान की परंपरा पर महाराष्ट्र के प्रो. पीपी होले, डॉ. श्रीराम ज्योतिषी, डॉ. सीएस वार्नेकर, भारत की मेगालिथ रचनाओं की वैज्ञानिकता विषय पर फ़्रांस से आये डॉ. सर्जे ली गुरियक सहित पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. संजय पासवान के व्याख्यान होंगे।

‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श का समापन

पटना। भारतीय परंपरा के अनुसार हमारे चिंतन में कई धाराएँ हैं, लेकिन पश्चिम ने केवल एक ही धारा को समझा और फैलाया। विदेशी ताकतों ने हमेशा से ही हमारी ज्ञान परंपरा को दबाकर रखने की कोशिश की है। हमारे विज्ञान और सेवा भाव को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश की गयी है, जिसके कारण हमने अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा को बहुत हद तक खो दिया है। आज फिर से हमें अपनी ज्ञान परंपरा और सामाजिक व्यवस्था को समझने और अपने तरीके से परिभाषित करने की ज़रूरत है। यह विचार पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने ‘भारतीय की ज्ञान परंपरा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श में व्यक्त किये। यह कार्यक्रम माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा पटना में आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय ने अपने रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में विमर्शों का आयोजन कर रहा है।
श्री पासवान ने कहा की आज हमें अपनी ज्ञान परंपरा, सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली को बाजारवाद से बचने की ज़रूरत है। हमें पश्चिमी सभ्यताओं और विदेशी ज्ञान-विज्ञान को दरकिनार कर अपनी परम्पराओं और मान्यताओं का पुनरोत्थान करते हुए भारतीयता में पूरी तरह रमना होगा। उन्होंने इसके लिए इस बात पर जोर दिया की हमें आज सभी विचारधाराओं के लोगों से संवाद करना होगा और उनको साथ लेकर चलना होगा। जाति व्यवस्था पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा की जातियों के मिटाने की नहीं बल्कि आज उन्हें मिलाने की आवश्यकता है। हमारी परंपरा विविधताओं का सम्मान करने की है और उनमे एकता स्थापित करने की है, जिसे आज अच्छी तरह से व्यवहार में उतारना होगा ताकि भारत पूरे विश्व में एक बड़ी ताकत के रूप में उभर सके।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा की भारतीय ज्ञान को स्थापित करने की नहीं बल्कि इस ज्ञान के व्यापक भंडार को खोजने की ज़रूरत है। प्राचीन ग्रंथों में छुपे इस ज्ञान के खजाने को खोजकर, उसे संवार कर मानव कल्याण के लिए उसको इस्तेमाल में लाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा की आज भारत के शैक्षणिक संस्थाओं को इस कार्य के लिए आगे आना होगा और समर्पित भाव से ऐसी परियोजनाओं में जुटना होगा ताकि कोई बाहरी संस्था या इंसान इस भण्डार की खोजकर उसको एक विकृत रूप में दुनिया के सामने पेश न करे। उन्होंने कहा कि यहाँ का ज्ञान-विज्ञान युगों से प्रकृति के अनुकूल रहा है और इसी कारण भारत की जीवनशैली भी औरों से हमेशा श्रेष्ठ रही है। प्रो. कुठियाला ने कहा की आज इस कार्य को करने में हम पूरी तरह सक्षम हैं आवश्यकता है तो सिर्फ संकल्प की। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग प्राचीन भारतीय ज्ञान की खोज में लगे हैं उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि वह अपने कार्यों को केवल सेमिनार, कांफ्रेंस और पठन-पाठन तक सीमित न रखकर समाज और पूरी मानवता तक लेकर जायें ताकि इससे परम वैभव की स्थिति को प्राप्त किया जा सके। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता विश्वविद्यालय इस कार्य को विद्यार्थियों तक ले जाने की भरपूर कोशिश कर रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार और पांचजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर ने अपने उद्बोधन में कहा की आज पं. दीनदयाल के विचारों को व्यवहार में लाने की आवश्यकता है जिसमें वह समाज और सृष्टि को समझने की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा के उद्द्येश्य, विषयों का चयन, पाठ्यक्रमों में प्रवेश और पात्रता, वातावरण तथा मूल्यांकन जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए ताकि शिक्षा से समाज का पूर्ण विकास हो सके।
सामाजिक कार्यकर्ता स्वांत रंजन ने शिक्षा और ज्ञान को समाज के निचले स्तर तक ले जाने की बात पर जोर दिया और कहा कि ऐसा करने से समाज के हर वर्ग में जागरूकता आयेगी। साथ ही उन्होंने भारत की प्राचीन व्यवस्थाओं और मान्यताओं को समझकर आज के सन्दर्भ में उन्हें इस्तेमाल में लाने की बात कही। श्री रंजन ने पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा किये जा रहे इस अनूठे कार्य की सराहना करते हुए कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान पद्दति को फिर से समझना और इसके लिए विभिन्न जगहों पर जाकर युवाओं और लोगों को प्रेरित करने अपने आप में बेहद प्रशंशनीय कार्य है।

  इससे पूर्व संविमर्श में वैदिक गणित पर रोहतक के राकेश भाटिया, भारत में विज्ञान की परंपरा पर महाराष्ट्र के प्रो. पीपी होले, डॉ. श्रीराम ज्योतिषी, डॉ. सीएस वार्नेकर, भारत की मेगालिथ रचनाओं की वैज्ञानिकता विषय पर फ़्रांस से आये डॉ. सर्जे ली गुरियक ने व्याख्यान दिए। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. सौरभ मालवीय और लोकेन्द्र सिंह ने किया। इस कार्यक्रम में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी, इलेक्ट्रोनिक मीडिया विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्रीकांत सिंह, जनसंपर्क एवं विज्ञापन विभाग के अध्यक्ष डॉ. पवित्र श्रीवास्तव, नॉएडा परिसर से डॉ. अरुण भगत भी शामिल हुए।