Saturday, February 10, 2018

भावी भारत, युवा और पंडित दीनदयाल उपध्याय


डॉ. सौरभ मालवीय
वर्ष 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तो देश के सामने उसके स्वरूप की महत्वपूर्ण चुनौती थी कि अंग्रेजों के जाने बाद देश का स्वरूप क्या होगा. कांग्रेसी नेता सहित उस समय के अधिकांश समकालीन विद्वानों का यही मानना था कि अंग्रेजों के जाने के बाद देश अपना स्वरूप स्वतः तय कर लेगा, अर्थात तत्कालीन नेताओं जेहन में देश के स्वरूप से अधिक चिंता अंग्रेजों के जाने को लेकर थी, राष्ट्र के स्वरूप को लेकर गांधी जी के बाद अगर किसी ने सर्वाधिक चिंता या विचार प्रकट किए, उनमें श्यामाप्रसाद मखर्जी के अलावा पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम उन चुनिंदा चिंतकों में शामिल था, जो आजादी मिलने के साथ ही देश का स्वरूप भारतीय परिवेश, परिस्थिति और सांस्कृतिक, आर्थिक मान्यता के अनुरूप करना चाहते थे. वे इस कार्य में पश्चिम के दर्शन और विचार को प्रमुख मानने के बजाय सहयोगी भूमिका तक ही सीमित करना चाहते थे, जबकि तत्कालीन प्रमुख नेता और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू पश्चिमी खाके में ही राष्ट्र का ताना-बाना बुनना चहते थे.

अगर हम गांधीजी और दीनदयाल जी के विचारों के निर्मेष भाव से विवेचना करें, तो दोनों नेता राष्ट्र के अंतिम व्यक्ति के अभ्युदय और उत्थान में ही उसका वास्तविक विकास मानते थे. हालांकि दोनों के दृष्टिकोंण में या इसके लिए अपनाए जाने वाले साधनों और दर्शन तत्त्वों में मूलभूत विभेद भी था. दीनदयाल जी इस राष्ट्र नव-जागरण में युवाओं की भूमिका को भी महत्त्वपूर्ण मानते थे. उनका मानना था कि किसी राष्ट्र का स्वरूप उसके युवा ही तय करते हैं. किसी राष्ट्र को जानना हो तो सर्वप्रथम राष्ट्र के युवा को जानना चाहिए. पथभ्रष्ट और विचलित युवाओं का साम्राज्य खड़ा करके कभी कोई राष्ट्र अपना चिरकालिक सांस्कृतिक स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकता. दीनदयाल जी की दृष्टि में युवा राष्ट्र की थाती है, एवं युवा-युवा के बीच भेद नहीं करता वह समग्र युवाओं को राष्ट्र की थाती मानता है. राष्ट्र जीवंत और प्राणवान सांस्कृतिक अवधारणा है. पंडित जी राष्ट्र को जल, जंगल, जमीन का सिर्फ समन्वय नहीं मानते थे.

राष्ट्र और युवा के संबंध में दीनदयाल जी की मान्यता थी कि राष्ट्र का वास्तविक विकास सिर्फ उसके द्वारा औद्योगिक होना, और बड़े पैमाने पर किया गया पूंजी निवेश मात्र नहीं है. उनका स्पष्ट मानना था कि किसी राष्ट्र का संपूर्ण और समग्र विकास तब तक नहीं जब तक कि राष्ट्र का युवा सुशिक्षित और सुसंस्कृत नहीं होगा. सुसंस्कृत से पंडित जी का आशय सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान तक नहीं था, बल्कि वह ऐसी युवा शक्ति निर्माण की बात करते थे, जो राष्ट्र की मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव महसूस करता हो, उनके अनुसार यह तब तक संभव नहीं था, जब तक युवा, देश की संस्कृति और उसकी बहुलतावादी सोच में राष्ट्र की समग्रता का दर्शन न करता हो. अगर इसे हम भारत जैसे बहुलवादी राष्ट्र के संदर्भ में देखें, तो ज्ञात होगा कि उसकी सांस्कृतिक बहुलता में भी एक समग्र संस्कृति का बोध होता है. जो उसे अनेकता में भी एकता के सूत्र में पिरोये रखने की ताकत रखता है. यही वह धागा है, जिसने सहस्त्रों विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के बाद भी राष्ट्र को कभी विखंडित नहीं होने दिया, और एक सूत्र में पिरोए रखा.

पश्चिमी दार्शनिक मनुष्य के सिर्फ शारीरिक और मानसिक विकास की बात करते हैं. वहीं अधिकांश भारतीय दार्शनिक व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक विकास के साथ ही धार्मिक विकास पर भी जोर देते हैं. पंडित दीनदयाल उपाध्याय एकात्म मानव दर्शन की बाद करते हैं, तो उनका भी आशय यही होता है कि पूर्ण मानव बनना तभी संभव है, जब मनुष्य का शारीरिक और बौद्धिक विकास के साथ-साथ उसका अध्यात्मिक विकास भी हो. इस एकात्म मानव दर्शन में व्यष्टि से समष्टि तक सब एक ही सूत्र में गुंथित है युवा व्यक्तित्व का विकास होगा, तो समाज विकसित होगा, समाज विकसित होगा तो राष्ट्र की उन्नति होगी, और राष्ट्र की उन्नति होगी, तो विश्व का कल्याण होगा. राष्ट्र के संबंध में दीनदयाल जी का विचार था कि जब एक मानव समुदाय के समक्ष, एक वृत्त-विचार आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृ भाव से देखता है, तो वह राष्ट्र कहलाता है, अर्थात पंडित जी के अनुसार देश के युवा राष्ट्र के सच्चे सपूत तभी कहलाएंगे जब वे भारत मां को मातृ जमीन का टुकड़ा न समझें, बल्कि उसे सांस्कृतिक मां के रूप में स्वीकार करें. उनका विचार था कि राष्ट्र की भी एक आत्मा होती है, जिसे चिती रूप में जाना जाता है.

प्रसिद्ध विद्वान मैक्डूगल के अनुसार किसी भी समूह की एक मूल प्रवृत्ति होती है, वैसे ही चिती किसी समाज की मूल प्रवृत्ति है, जो जन्मजात है, और उसके होने का कारण ऐतिहासिक नहीं है. इसी क्रम में वर्तमान परिप्रेक्ष्य के भौतिकवादी स्वरूप को देखते हुए एवं युवाओं की मौजूदा स्थिति और स्वभाव के बारे में चिंता प्रकट करते हुए एक बार अपने उद्बोधन में पंडित दीनदयाल जी कहा था कि किसी भी राष्ट्र का युवा का इस कद्र भौतिकवादी होना और राष्ट्र राज्य के प्रति उदासीन होना अत्यंत घातक है. दीनदयाल जी का युवाओं के लिए चिंतन था कि भारत जैसा विशाल एवं सर्वसंपन्न राष्ट्र जिसने अपनी ऐतिहासिक तथा सांस्कृति पृष्ठभूमि के आधार पर संपूर्ण विश्व को अपने ज्ञान पुंज के आलोकित कर मानवता का पाठ पढ़ाया तथा विश्व में जगत गुरु के पद पर प्रतिष्ठापित हुआ. ऐसे विशाल राष्ट्र के पराधीनता के कारणों पर दीनदयाल जी का विचार और स्वाधीनता पश्चात समर्थ सशक्त भारत बनाने में युवाओं के योगदान को महत्त्वपूर्ण माना है.

पंडित दीनदयाल उपध्याय के मन में जो मानवता के प्रति विचार थे, उसे गति 1920 में प्रकाशित पंडित बद्रीशाह कुलधारिया की पुस्तक ‘दैशिक शास्त्रश् से मिली. दैशिक शास्त्र की भावभूमि तो दीनदयाल जी के मन में पहले से ही थी और एक नया विचार उनके मन में उदित हुआ कि संपूर्ण विश्व का प्रतिनिधित्व युवा ही करते हैं. अतः युवाओं के विचारों का अध्ययन करके मानवता के लिए एक शाश्वत जीवन प्रणाली दी जाए, जो युवाओं के लिए प्रेरक तो हो, साथ ही साथ युवाओं के माध्यम से भारत एक वैश्विक शक्ति बन सके.

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