Sunday, March 13, 2016

राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ और राष्ट्र


डॉ. सौरभ मालवीय
राष्ट्र, किसी भूभाग पर रहने वालो का भू भाग, भूसंस्कृति, उसभूमि का प्राकृतिक वैभव, उस भूमि पर रहने वालों के बीच श्रद्धा और प्रेम, उनकी समान परंपरा, समान सुख¬दुख, किन्ही अर्थों में भाषिक एकरूपता, दैशिक स्तर पर समान शत्रु मित्र आदि अनेक भावों का समेकित रूप होता है. यह भाव बाहर से संप्रेषित नहीं किया जाता, अपितु जन्मजात होता है.
भारत में यह बोध अनादिकाल से है. अभी वैज्ञानिक युग में भी यह तय नहीं हो पा रहा है कि वेदों की रचना कब हुई और वेदों में राष्ट्रवाद अपने उत्कर्ष पर है. इसी संकल्पना के कारण वैदिक ऋषियों ने घोषणा की है-
समानो मन्त्रः समितिः समानी
समानं मनः सहचित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः
समानेन वो हविषा जुहोमि।।
अर्थात् हम लोगों के मंत्र (कार्यसूत्र का सिद्धांत) एक जैसे हो. उस मंत्र के अनुरूप हमलोगो की समिति (संगठन), हमारे चित्त, हमारी मानसिक दशा और कार्यप्रणाली भी समान हो. हमलोग समेकित रूप से लक्ष्य प्राप्ति हेतु परमात्मा से एक समान प्रार्थना करें.
इसी क्रम में हमारे ऋषियों ने आगे कहा-
समानी वः अकूतीः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।
हमारे लक्ष्य, हमारे हृदय के भाव और हमारे चिंतन भी समान हो और हमलोग आपस में संगठित रहे.
संगच्छध्वं संवध्वं सं वो मनांसि जनताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।
अर्थात हमलोग साथ साथ चले, एक साथ बोलें, हमारे मनोभाव समान रहें. हमलोग समानरूप से अपने लक्ष्य सिद्धि हेतु देवाताओं की साधना करें.
ऋषियों ने यह उद्घोष श्रुतियों में शताधिक बार किया है. हर बार वे हमे संगठित और सुव्यवस्थित रहकर अपने लक्ष्य के लिये समर्पित होने का आदेश दे रहे हैं. ऐसा राष्ट्रगीत धरती के किसी समाज में कभी नहीं पैदा हुआ है. पूरा का पूरा वैदिक वाङ्मय ही भारत का राष्ट्रगान है.
ओउम् सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ओउम् शान्तिः शान्ति: शान्ति।।

हम दोनों की परमात्मा साथ साथ रक्षा करें, हमदोनो साथ साथ लक्ष्य भोग करें, साथ साथ पराक्रम करें, हम दोनों के द्वारा पढ़ी गई विद्या तेजस्वी हो और हम कभी आपस में द्वेष न करें. हमारे त्रितापों (दैविक, दैहिक, भौतिक) का शमन हो.

यहां ऋषि हम दोनो का अर्थ केवल दो से ही नहीं कह रहे हैं, अपितु गुरु शिष्य से है. यह एक परंपरा की वार्ता है. जो सगम्र गुरुओं द्वारा समग्र शिष्यों को अनादिकाल से अविच्छिन्न रूप से दी गईशिक्षा है जिससे भारत की राष्ट्रीयता सिंचित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होती रही है.
भारत का यह अक्षुण्ण राष्ट्र भारत के चप्पे-चप्पे पर सदैव दृष्टिगोचर होता रहता है. देश मे दुर्भाग्य से देश में पराधीनता का काल आ गया. 1235 वर्षो तक के प्रदीर्घ पराधीन काल में, हिमालय, गंगा, काशी, प्रयाग, कुंभमेला, अनेकतीर्थ, अनंत ऋषि, महात्मा, महापुरूष, समुद्र, सरिता पेड, पौधे आदि भारत के राष्ट्रीयता गीत तो अहर्निश गाते ही रहते हैं, पर उनकी मानवीय अभिव्यक्ति सुप्त पड़ गई थी. इस कोढ में खाज जैसी स्थिती मैकाले की शिक्षा पद्धति ने पूरी कर दी. हमें बताया गया कि वेद गडरियो के गीत हैं, भारत कभी एक राष्ट्र नहीं रहा. यहां के मूल निवासी तो कोल भील द्रविड आदि रहे हैं, आर्यों ने मध्य एशिया से आकर उन पर आक्रमण करके देश पर कब्जा कर लिया, भारत गर्म देश है, सपेरों और नटों का बाहुल्य रहा है, यह एक देश ही नहीं रहा है, बल्कि उपमहाद्वीप है, मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत को कपड़ा, भोजन, और अन्य तहजीब सिखाया, अब ईसाई आक्रांता भारतीयों के पाप का बोझ उतारने के लिए भगवान के आदेश पर भारत आए हैं. यह भारत का सौभाग्य है कि प्रभु ईसा मसीह भारत पर प्रसन्न हो गए हैं. अब भारत इन ईसाइयों की कृपा से सुशिक्षित और सभ्य हो जाएगा, शैतानी परंपराओं और झूठे देवताओं से मुक्त होकर असली देवताओं की कृपा पा जाएगा. इस प्रकार के सुझावों को जब सत्ता सहयोग मिल जाता है, तो करैला नीम चढ़ जाता है. और इस स्थिति ने हमें इतना आत्म विस्मृत कर दिया कि हम मूढता की सीमा तक विक्षिप्त हो गए. वैदिक ऋषियों की गरिमावान परंपरा को अपना कहने में लज्जानुभव होने लगा. यत्किञ्चित इसका प्रभाव अभी भी अवशेष है. हम जान ही लिए थे कि हम जादू टोने वालों के वंशज हैं. अपनी किसी भी बात की साक्षी के लिए विदेशी प्रमाण खोजने लगे. यदि गौराड्ग शासकों ने मान्यता दी, तो हमार सीना फूल गया वरना एक अघोषित आत्मग्लानि से हम छूट भी नहीं पाते थे. और तो और हम धर्म की परिभाषा भी ह्विटने, स्पेंसर, थोरो, नीत्से, फिक्टे आदि की डायरियों से खोजना चालू कर दिए. वेदो के भाष्य के संदर्भ में मेक्समूलकर, ए.बी. कीथ अदि भगवान वेदव्यास पर भी भारी पडने लगे. आत्मदीनता की इस पराकाष्ठा में महानायक स्वामी विवेकानंद ने अमृत तत्व भरा और बडे शान से घोषित किया कि हमे हिन्दू होने पर गर्व है. इसी घोषणा के बाद हमारी तंद्रा टूटने लगी. बडे सौभाग्य की बात है कि इस वर्ष उसी महानायक की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ है.
संघ के प्रथमपुरूष जन्मजात क्रांतदर्शी थे. भारत पराधीनदासता से छूटे यह प्रथम प्रयास था, पर उस स्वतंत्रता के बाद का भारत कैसा हो इसका ब्लू प्रिंट समग्र भारत में केवल और केवल डॊ. केशव बलिराम हेडगेवार नें ही तैयार किया था. वे स्वामी विवेकानंद के राष्ट्रीयत्व जागरण से अपने अभियान की ऊर्जा ले रहे थे. या यूं कहें कि स्वामी जी के संकल्पना के 100 तरुण डॊ. हेडगेवार जी ने तैयार किया और भारत की आत्मा को बचा लिया, वरना भारतीय संस्कृति भी बेबीलोन, मिस्र, एजटेक, इन्का, यूफ्रेटस और यूनान आदि की सभ्यताओं जैसे बडे-बडे पुस्तकालयों में भी नही मिलती. प्रो. अर्नाल्ड टायनवी जैसा विद्वान भी भारतीय संस्कृति नहीं खोज पाता.
डॊ. हेडगेवार जी ने अनुभव किया कि भारतीय मानस की आत्म विस्मृति केवल राष्ट्रवाद के मंत्र से ही टूटेगी. इसके लिए स्वामी जी का सैद्धांतिक राजपथ तो उन्होने चुन ही लिया था, पर साक्षात् दर्शन हेतु योगी अरविंद घोष का राष्ट्रीय आह्वान उन्हें सशरीर गुरुतुल्य लगा. श्री अरविंद घोष के संगठन “अनुशीलन समिति” से जुडकर वे सिद्धांत और क्रिया दोनों का अभूतपूर्व प्रयोग किए. सन 1915 से 1925 तक के कालखंड में वे केवल और केवल राष्ट्रवाद का ही चिंतन, मनन और प्रयोग करते रहे. योगी अरविंद अलीपुर जेल से बाहर आने पर कहे थे-
 “ भारत जब भी जागा है तो केवल अपने लिए नहीं, अपितु सनातन धर्म के लिए जागा है. जब भी यह कहा जाता है कि भारत महान है तो इसका अर्थ है कि सनातन धर्म महान है. सनातन धर्म का प्रसार ही भारत का प्रसार है. भारत धर्म है और धर्म ही भारत है.
राष्ट्रीयता केवल राजनीति नहीं है, अपितु यह एक विश्वास है, एक आस्था है, एक धर्म है. मैं इतना ही नहीं कह रहा हूं, अपितु यह भी कि सनातन धर्म ही हमारी राष्ट्रीयता है. इस हिंदू राष्ट्र की उत्पत्ति ही सनातान धर्म के साथ हुई है. सनातन धर्म के साथ ही यह राष्ट्र आंदोलित होता है और उसी के साथ बढता है. सनातन धर्म कभी नष्ट होगा, तो उसके साथ ही हिन्दू राष्ट्र भी नष्ट हो जाएगा. सनातन धर्म अर्थात् हिन्दू राष्ट्र.”
संघ संस्थापक डॊ. हेडगेवार इन विचारों से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने स्वामी विवेकानंद के समान सगर्व घोषित किया-
“हो ओउम् । हे भारत हिन्दू राष्ट्र आहे ”
और उपर्युक्त मंत्र राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का पथ प्रदर्शक मंत्र बन गया. इसके उच्चारण मात्र से एक ही साथ स्वामी विवेकानंद और योगी अरविंद दोनो ऋषियों की आत्माएं तृप्त होती हैं, अनादि काल से चला आरहा सत्य सनातन धर्म परिपुष्ट होता है, अनादिकाल से चला आर हा सत्य, विज्ञान, धर्म, संस्कार सब मजबूत होते हैं, भारतीय जनमें आत्मविश्वास पैदा होता है, भारत माता गर्वोन्नत होती है और प्रसन्न भाव से अपने पुत्रों को लाख¬लाख आशीषें देती है. यह भारत माता की स्तुति का बीज मंत्र है. इससे सम्पुटित कर काई भी पूजन अर्चन लोक परलोक दोनों में अभ्युदय ओर निःश्रेयस का कारण होता है.
यह कोई योगायोग की बात नही है. नियति के चक्र में सब कुछ नियत है. सड्घ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरुजी स्वामी विवेकानंद के गुरुभाई स्वामी श्री अखंडनंदनजी के दीक्षित शिष्य थे. निश्चित ही स्वामी विवेकानंद अपने सिद्धांतों को साकाररूप देखने हेतु श्री गुरुजी को शिष्य बनन के लिए प्रेरित किए होंगे.
संघ की राष्ट्रभक्ति का ज्वलंत उदाहरण पग पग पर दष्टिगोचर होता है.
शाखा की नित्य प्रार्थना की प्रत्येक पंक्ति इसकी दुंदुभी बजा रही है. नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे से लेकर परं वैभवंनेतु मेतत्स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वा शिषा ते मृशम् तक और अंततः भारत माता की जय में भी केवल राष्ट्रवाद ही तो भासित हो रहा है. कोई पंक्ति ऐसी नही है, जिसमें राष्ट्रवाद का साक्षात्कार न हो. इससे बडा राष्ट्रगीत क्या हो सकता है.
एकात्मता स्त्रोत्र, एकात्मता मंत्र, प्रातःस्मरण, संघ की शाखओं के गीत, बौद्धिक, और शाखा की पूरी संचरना विशुद्ध राष्ट्रवादी प्रयोग है जिससे स्वामी विवेकानंद की आकांक्षाओं के राष्ट्रीय पुरुषों की अखंड मालिका पैदा होती रहे. संघ ने समग्र सांस्कृतिक भारत की वंदना के गीत गाए है, जो किसी भी दृष्टिकोण से भगवान परशुराम, जगद्गुरु शड्कराचार्य और आचार्य चाणक्य के राष्ट्रिय अभियान को ही पुष्ट करते हैं. संघ के कारण सबने जाना कि भारत का परिमाप “हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम्” तक है. छुआछूत, भाषा, क्षेत्र, जाति और ऊंचनीच के भाव तो संघ को समाप्त करने की जरूरत ही नहीं पड़ी. भारत गान की पवित्र गंगा मे स्नान करते ही उपर्युक्त समास्त विकार अनायास भाग गए. बए एक ही मंत्र गूंज उठा कि
रत्नाकराद्यौत पदां हिमालयं किरीटिनीम्।
ब्रम्हराजर्षि रत्नाद्रयां वन्दे भारत मातरम्।।
यही तो राष्ट्रर्षि वंकिम बाबू का राष्ट्रवाद है. श्री गुरुजी ने तो इससे भी आगे बढ़कर शुक्ल यजुर्वेद मे मंत्र में एक नव प्राण भर दिया-
“राष्ट्रीय स्वाहा. राष्ट्रायमिदं न मम।।
यही भारत का सनातन राष्ट्रवाद है जो हिन्दुत्व की जड़ है.
भाषागत समानता राष्ट्रवाद के लिए आति महत्वपूर्ण तत्व नही है. इसी से संघ देश की सारी आंचलिक भाषाओं के पिष्टपोषण की बात कहते हुए संस्कृत को केंद्र में रखता है, क्योंकि संस्कृत समस्त भाषाओं की जननी है.
अमेरिका मे अंग्रेजी भाषी लोग ब्रिटिश सत्ता से अलग होकर (1774 अड) में फ्रेंच और स्पेनिशों के साथ मिलकर स्वतंत्र अमेरिकन राष्ट्र गठित कर लिए.
भाषा ही राष्ट्र हेतु मुख्य तत्व होता तो स्विटजर्लेंड चार देशों मे टूट गया होता. वहां चार भाषाएं जर्मन, फ्रेंच, इटेलियन और रोमन चलती है, पर एक ही राष्ट्र है. बेल्जियम के फ्रेंची अपने को बेल्जियमी कहते है फ्रेंच नहीं. भाषाई दृष्टि से स्पेनिश और पोर्तगीज एकदम निकट हैं, पर दो राष्ट्र है.
समान पूजा पद्धति भी राष्ट्र का आधार होती, तो विश्व मे 63 मुस्लिम देश एक राष्ट्र बन जाते. संसार में शाताधिक ईसाई देश एक राष्ट्र बन जाते. पर और तो और अरब के यहूदी और मुस्लिम ही एक राष्ट्र न बन सके. ईरान¬ईराक, लीबिया, मिश्र, सूडान, यमन आदि इसके जीवंत उदाहरण हैं.
रक्तगट भी राष्ट्र का आवश्यक तत्व न होने से स्कैन्डिनेविया और आइबेरिया भी अनेक राष्ट्रों में विभक्त हैं.
राष्ट्र हेतु सर्वाधिक आवश्यक तत्व राष्ट्रजन के हृदय की एकता है. संघ अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा केवल इसी बात पर खर्च कर रहा है-
“भारतवासी एक हृदय हैं”
संघ का भारत राष्ट्र वृहत्तर है. इसमें वे सब देश समाहित हैं, जो किन्हीं राजनीतिक कारणों से अलग हो गए, परंतु उनकी राष्ट्रीय पहचान तो भारत ही है.
पाकिस्तान के “जिए सिंध” के नेता श्री जी.एम. सईद कहते हैं- पाकिस्तान के निर्माण का अर्थ है भारत के भूगोल और इतिहास को नकारना. पाकिस्तान को अब एक संघ राज्य बनकर विशाल भारत में सम्मिलित हो जाना चाहिए. मुहाजिरों को कृष्ण तथा कबीर का अनुयायी होना चाहिए. पंजाबी मुसलमान तो नानक, वारिस शाह तथा बुल्ले शाह के वारिस हैं. मै स्वयं 50 वर्षों से पाकिस्तानी हूं, 500 वर्षो से मुसलमान हूं, लेकिन 5000 वर्षों से सिंधी हूं. मुहम्मद बिन कासिम तो लुटेरा था. सिंध स्वातंत्र्य के बाद वहां का बंदरगाह राजा दाहर सेन के नाम पर हो गया.
(इंडियन एक्सप्रेस 02.02.1992)

यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ही सोच थी कि पंडित श्री दीनदयाल उपाध्याय ने भारत-पाक और बांग्ला संघ बनाने की बात कही थी. बाद में प्रख्यात समाजवादी डॊ. राममनोहर लोहिया भी उपाध्याय जी के साथ जुड गए.
संघ के वरिष्ठतम प्रचारक श्री दत्तोपंत ठेगडी ने तो गहन शोध के उपरांत यह सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्र की और नेशन की अवधारणा अलग-अलग बातें है. “राष्ट्र नेशन एक नहीं है. योगी अरविंद ने भी संयुक्त राष्ट्र संघ मे नामकरण का विरोध किया था. उन्होंने कहा था कि जब तक राष्ट्र की परिभाषा तय न हो, तब तक यह नाम रखना ठीक नहीं होगा. सच में राष्ट्र के समग्र अर्थों में सांगोपांग रूपेण कोई देश इस धरा पर है, तो वह केवल भारत है. भारत में ही राष्ट्र की परिभाषा वैज्ञानिक, सांस्कृतिक तथा दार्शनिक रूपेण तृप्त होती है. अन्य किसी देश में नहीं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मौन तपस्वी के रूप में अहर्निश भारतवासियों में राष्ट्र तत्व भरने का कार्य कर रहा है. संघ के ही कारण राष्ट्र शब्द की गरिमा और महिमा जानने का योग बना है, वरना इतना महत्वपूर्ण शब्द केवल वैदिक वाडम्य का कैदी बनकर रह गया होता.
“संघे शक्ति सर्वदा”
“भारत मातरम् विजयते तराम्”

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