Sunday, March 13, 2016

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया

डॊ. सौरभ मालवीय
हिंदी समाचार पत्रों के आलोक में भारतीय पत्रकारिता विशेषकर हिंदी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति को लेकर किए गए अध्ययन में अनेक महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर सामने आए हैं. सामान्यतः राष्ट्र, राष्ट्रवाद, संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे अस्थुल व गुढ़ विषय के बारे में लोगों की अवधारणाएं काफी गड़मड़ है. आधुनिक षिक्षा पद्धति यानि षिक्षा के मौजूदा सरोकार और तौर-तरीके तथा अध्ययन सामाग्री और विधि इसमें दिखाई दे रहे हैं. मीडिया के प्रचलन और इसके विकास के बाद जो आस जागी थी कि यह भारतीय जनमानस में विषयों को भारतीय दृष्टि से एक समग्र दृष्टिकोण (भारतीय दृष्टिकोण) विकसित करने में उपयोगी भूमिका निभाएगी. दुर्भाग्य से जनमाध्यम भी इस संदर्भ में विभ्रम की स्थिति में है. चूंकि इन माध्यमों पर धारा विशेष के लोगों में से अधिकांष की शिक्षा पद्धति और सोच के सरोकार पश्चिमी है या भारतीय होते हुए भी इनकी सोच पर पश्चिम की श्रेष्ठता का आधिपत्य है. ऐसी स्थिति में इनसे वृहद परिवर्तन कामी दृष्टिकोण की दिशा-दशा में आमूल-चूक परिवर्तन की उम्मीद करना ही बेमानी है.

अध्ययन में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संबंध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह प्रकाश आया है कि राष्ट्र के संबंध में कथित बौद्धिक सभ्रांत लोगों की अवधारणा ही भ्रामक और अस्पष्ट है. प्राकारान्तर से हम यूं कहें कि इनकी सोच पर पश्चिमी शिक्षा का या शिक्षा के यूरोपीकरण का प्रभुत्व है. अतिरेक न होगा. अधिकांश बुद्धिजीवी राष्ट्र का अर्थ सांस्कृतिक सरोकारों से युक्त नहीं मानते. उनकी सोच के भ्रामक स्थिति के चलते राष्ट्रवाद जैसे व्यापक और वृहद अर्थ ग्रहण वाले शब्द का अर्थ संकुचित अर्थों में आकार पाता है. इन लोगों का मनना है कि राष्ट्र का अभिप्राय क्षेत्र विशेष में रहने वाली विशेष या कुछ जातियों से है. प्रायः जिनमें सांस्कृतिक तौर पर सभ्यता पाई जाती है.

राष्ट्र की इनकी परिभाषा को स्वीकार करने पर भारत बहु-सांस्कृतियों वाला राष्ट्र न होकर एक ऐसा क्षेत्र विशेष होगा, जिनको बहुराष्ट्रीय संस्कृति वाला देश कहेंगे. जो देश की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विरासत की दृष्टि से ठीक नहीं होगा. इसको स्वीकार करने का अर्थ होगा कि हम यूरोप और अमेरिका के भारत को खंड-खंड करने वाले दृष्टि के पक्ष में खड़े होंगो जिनका एक मात्र ध्येय भारत को एक राष्ट्र नहीं, राष्ट्रों के समूह के (उप महाद्वीप) रूप में अधिस्थापित करना है. वे भारत को एक राष्ट्र न मानकर भारतीय उप महाद्वीप जैसे नामों से संबोधित करते हैं, जो इनकी अखण्ड भारती की एकता के प्रति संकुचित दृष्टिकोण को परिलक्षित करता है.

’आधुनिक बुद्धिजीवी’ राष्ट्र और देश को प्रायः समानार्थी रूप में न सिर्फ प्रयोग करते हैं, बल्कि स्वीकार भी करते हैं. कुछ कथित बुद्धिजीवी देश को राष्ट्र से व्यापक इकाई के रूप में परिभाषित करते हैं. राष्ट्र के ऊपर देश के व्यापकता स्वीकार करने का अर्थ होगा कि राष्ट्र को सिर्फ भू-स्थैतिक व्यापकत्व को स्वीकार करना. ये राष्ट्र और राज्य और देश किसी भी रूप में एक नहीं है. दुनिया के अधिकांश विद्वान वेद को प्राचीनतम ज्ञान कोश मानते हैं ऋषि परंपरा के अनुसार राष्ट्र शब्द का प्रयोग भारत में राष्ट्रवाद का इतिहास चार सौ वर्ष से ज्यादा पुराना नहीं है. यह अलग विषय है कि छिट-पुट रूप की अवधारणा प्रचलन में थी. राष्ट्र राज्य के संबंध में आधुनिक, राजनीतिक विदों का मानना है कि यह परिस्थितिजन्य प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं है, बल्कि वस्तु स्थिति यह है कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में प्रभुत्व में अभी राष्ट्रवादी चेतना का केंद्रीय स्रोत भारत ही था.

भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूल उसकी संस्कृति में है, जो कि शेष दुनिया में प्रचलित राष्ट्र राज्य की अवधारणा में सर्वथा अनुपस्थित है. संस्कृतिमूलक राष्ट्र भाव का जिक्र वेदों में कई जगह आया है. यजुर्वेद में एक राष्ट्रीय गीत का उल्लेख भी मिलता है जिसमें ऋषि ने राष्ट्र में तेजस्वी विद्वानों, पराक्रमी योद्धाओं, दुधारू पशुओं, तीव्रगामी अश्वों, गुणवती नारीयों, विजय कामी सभ्य जनों, समयानुकूल वर्षा और हरी-भरी कृषि की कामना की है, साथ ही इस गीत में राष्ट्र के योग क्षेम की कामना चाही गई है. प्राकारान्तर से आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को इसके शिशु के रूप में उल्लेखित किया जा सकता है.

अध्ययन से एक ओर जो महत्वपूर्ण तथ्य उजागर हुआ है -राजनीतिक सत्ता के अतिरिक्त भी राष्ट्र का अपना कुछ अलग अस्तित्व होता है जो इसकी संस्कृति और जीवन पद्धति से न सिर्फ पुष्ट होता है, बल्कि अघोषित तौर पर सत्ता जनीत शक्ति का केंद्र होता है. यह दुनिया के प्रत्येक देश में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि अन्यान्य दबाव समूहों के रूप में मौजूद रहता है. कल्पना करें अगर सांस्कृतिक टकराव नहीं होता, तो क्या भारत-पाकिस्तान दो देश बनते और भारत का विभाजन होता ? यह राष्ट्रों के इसी सत्य की ओर इंगित करता है.

कोई माने या न माने दुनिया के प्रत्येक देश की सत्ता उसके सांस्कृतिक सरोकारों से प्रभावित व आप्लावित होती है. अंतर सिर्फ इतना है दुनिया के राष्ट्रों के सांस्कृतिक सरोकार आपस में कई बार चुनौति या प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़े नजर आते हैं. वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भारतीय अवधारणा सिर्फ स्वहित पोषण या संरक्षण की बात नहीं करते, बल्कि दुनिया के हितों में ही खुद के हितों को संरक्षित मानते हैं. यहां बनस्पतियैं शांति की अवधारणा न सिर्फ अभिसिंचित बल्कि जीवंत है.

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की धारणा राष्ट्रीय हितों को सिर्फ आर्थिक सरोकारों से समतुल्य करके नहीं देखती. अपेक्षात्मक तौर पर मानवीय सरोकार और हित इसके लिए अधिक मायने रखते हैं. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद राष्ट्र के लिए सिर्फ राजनीतिक व भू स्थैतिक एकता और संप्रभुता को आधार नहीं मानती, बल्कि सांस्कृतिक एकता को उसका प्रमुख आधार मानती है. इसके अनुसार सांस्कृतिक भिन्नता राष्ट्र के अस्तित्व के लिए कोई खतरा नहीं है, जबकि भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक मूल्यों के बीच अस्तित्व की भावना के आधार पर यह राष्ट्र मूल्य की बात करता है. बहुत सारे विद्वान भारत को एक राष्ट्र के रूप में मौजूदा अस्तित्व के पीछे उसकी द्धैवि शक्ति को मानते हैं- यह दैवीय शक्ति कुछ और नहीं, बल्कि इसके सांस्कृतिक मूल्य ही हैं, जो इसे अखंड राष्ट्र के तौर पर पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक बनाए हुए हैं.

हिंदी पत्रों के प्रकाश में भारतीय पत्रकारिता विशेषकर हिंदी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मीडिया के परिपेक्ष्य में जो अध्ययन किया गया, उसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य प्रथम दृष्टया यह उजागर हुआ कि मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बीच अन्योन्याश्रीत संबंध रहे हैं अभिप्रायतः स्वतंत्रता पूर्ण भारतीय पत्रकारिता के पत्रकारिय सरोकार मूलतः राष्ट्रवादी हैं, इसे हम यू भी कह सकते हैं कि भारती की मूल्य परख राष्ट्रवादी पत्रकारिता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों में कोई विशेष विभेद नहीं है. दोनों समग्र राष्ट्रीय और सांस्कृतिक हितों की वकालत करते हैं. समप्रति नेहरू युगीन पत्रकारिता के सरोकार भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों से उद्देष्यगत विभेद नहीं रखते. इनके विभेद तौर-तरीकों और अपनाए गए संसाधनों को लेकर हैं.

इस अध्याय में निर्णायक निष्कर्ष यह उभर कर आया कि राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिय मूल्यों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों में बिभेद उस काल में विषेष तौर पर उभर कर आया. जब भारतीय सकारात्मक अधिष्ठान में वामपंथी हस्तक्षेप शक्तिवत वढ़ गया यह दौर राष्ट्रीय परिदृष्य में स्वतंत्रता के बाद प्रभावी हुआ.

वस्तु स्थिति यह है कि जैसे-जैसे केंद्र और राज्य स्तर पर समाजवादी और वामपंथी विचारधारा सत्ता के करीब आती गई या इनका सीधे या परोक्ष हस्तक्षेप बढ़ने लगा उसी अनुपात में सिर्फ सत्तात्मक अधिष्ठान से बल्कि पत्रकारिय जगत से भी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी विचारधारा का लोप होना या उनका नकारात्मक प्रचार बढ़ गया.

अध्ययन के अनुसार मीडिया जगत में सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े पत्रकारों का कभी कोई अभाव नहीं रहा है, लेकिन सौभाग्य या दुर्भाग्य से इनका नेतृत्व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद विरोधी विचारधारा के लोगों के हाथों में रहा है. इसके पीछे सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण सत्ता में इस विचारधारा के लोगों का अधिक मुखर और शक्तिशाली होना रहा है. निष्कर्षतः सांस्कृतिक राष्ट्रवादी विचारधारा से संबंधित समाचारों का कवरेज नकारात्मक तौर पर अधिक किया जाता है और इसी रूप में वे पत्रों में स्थान भी पा रहे हैं. इसे संबंधित नकरात्मक तथ्यों और मूल्यों को सर्वाधिक तौर पर उभारा जाता है.

अध्ययन के अनुसार जो सर्वाधिक तथ्य यह उभर कर सामने आया कि मांग या रुचि आधारित न होकर अधिरोपित अधिक है. जो इस बात के गवाह है कि मीडिया सत्ता में किन लोगों का आधिपत्य है, जबकि सामाजिक अभिरूचि इस मामले में मीडिया से मेल नहीं खाते शोध में किए गए सर्वेयात्मक अध्ययन के अनुसार 80 प्रतिशत पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में रुचि रखते हैं और वे इसके बारे में वस्तुनिष्ठ जानकारी चाहते हैं.

उपरोक्त सर्वेक्षण से कई भ्रांतियां समाप्त हो जाती हैं. पहली भ्रांति तो यह निर्मूल होती है कि आज का पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ना व जानना नहीं चाहता है. सर्वेक्षण के परिणामों से स्पष्ट होता है कि 80 प्रतिशत पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ने में रुचि रखते हैं (सारणी 39) और 60 प्रतिशत पाठकों का मानना है कि मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उचित महत्व नहीं दिया जाता है. यह आंकड़ा उन संपादकों और मीडिया घरानों के लिए चैंकाने वाला हो सकता है, जो अभी तक यह मानते रहे हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक कालबाह्य विचार है और आज का पाठक उसमें रूची नहीं रखता.

यह आंकड़ा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम यह देखते हैं कि सर्वेक्षण के प्रतिभागियों में सबसे अधिक संख्या युवाओं (40 प्रतिशत; सारणी 21) और स्नातक या उससे अधिक शिक्षितों (44 प्रतिशत; सारणी 26) की है. यानी शिक्षित युवा भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ने और जानकारी रखने में पर्याप्त रुचि रखते हैं. सर्वेक्षण से यह भी स्पष्ट होता है कि पाठक मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दिए जाने वाले महत्व व स्थान से संतुष्ट नहीं हैं और 60 प्रतिशत पाठकों का मानना है कि मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उचित महत्व नहीं दिया जा रहा है.
रोचक बात यह भी है कि 41 प्रतिशत प्रतिभागियों ने इसका कारण मीडिया का अपना पूर्वाग्रह बताया, जबकि 23 प्रतिशत पाठकों का मानना था कि देश में ऐसी गतिविधियों के कम होने के कारण मीडिया में इसे कम स्थान मिलता है.

बहरहाल इस सर्वेक्षण से यह स्पष्ट हो जाता है कि देश का पाठक वर्ग मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दिए जा रहे महत्व व स्थान से असंतुष्ट है और वह इस पर और सामग्री पढ़ना चाहता है.

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