Sunday, March 13, 2016

भारतीय संस्कृति


डॉ. सौरभ मालवीय
संस्कृति का उद्देश्य मानव जीवन को सुंदर बनाना है. मानव की जीवन पद्धति और धर्माधिष्ठित उस जीवन पद्धति का विकास भी उस संस्कृति शब्द से प्रकट होने वाला अर्थ है. इस अर्थ में राष्ट्र उसकी संतति रूप समाज, उस समाज का धर्म इतिहास एवं परंपरा आदि सभी बातों का आधार संस्कृति है. संपर्क सूत्र दृष्टि से देखा जाए, तो इस संस्कृति का मूल वेदों में है. भाषा की उच्चता से समृद्ध, विचारों से परिपक्व, मानवीय मूल्यों का संरक्षक, समाज रचना एवं जीवन पद्धति का समुचित मार्गदर्शन कराने वाला यह वैदिक वाङ्मय गुरु शिष्य परंपरा की असाधारण प्रणाली से उसके मूल स्वरूप में आज तक यथावत् चला आ रहा है. ऐतिहासिक रूप में संसार के सभी विद्वान इस बात पर एकमत हैं कि वेद ही इस धरती की प्राचीनतम पुस्तक है और वे वेद जिस संस्कृति के मूल हैं वह संस्कृति भी इस पृथ्वी पर सर्वप्रथम ही उदित हुई. उसका निश्चित काल बताना सम्भव ही नहीं हो रहा है. लाख प्रयत्नों के बावजूद विद्वान इसे ईसा पूर्व 6000 वर्ष के इधर नहीं खींच पा रहे हैं.
भारतीय ऋषियों ने लोकमंगल की कामना से द्रवित होकर मानवीय गुणों को दैवीय उच्चता से विभूषित करने के लिए संस्कारों की अत्यंत वैज्ञानिक एवं सार्वकालिक सार्वभौमिक व्यवस्था दी है. ऐसा नहीं है कि यह केवल भारतीयों के लिए ही उचित है, अपितु किसी भी भू-भाग के मानवीय गुणों के उत्थान हेतु ये संस्कार समीचीन है. इसमें किसी भी प्रकार का बंधन जातीय, वर्णीय, आर्थिक, सामाजिक देशकालीय लागू नहीं होता.

उत्तम से उत्तम कोटि का हीरा खान से निकलता है. उस समय वह मिट्टी आदि अनेक दोषों से दूषित रहता है. पहले इसे सारे दोषों से मुक्त किया जाता है. फिर तराशा जाता है, तराशने के बाद कटिंग की जाती है. यह क्रिया गुणाधान संस्कार है. तब वह हार पहनने लायक होता है. जैसे-जैसे उसका गुणाधान-संस्कार बढत़ा चला जाता है, वैसे ही मूल्य भी बढत़ा चला जाता है. संस्कारों द्वारा ही उसकी कीमत बढी़. संस्कार के बिना कीमत कुछ भी नहीं. इसी प्रकार संस्कारों से विभूषित होने पर ही व्यक्ति का मूल्य और सम्मान बढत़ा है. इसीलिए हमारे यहां संस्कार का महात्म्य है.

संस्कार और संस्कृति में जरा-सा भी भेद नहीं है. भेद केवल प्रत्यय का है. इसीलिए संस्कार और संस्कृति दोनों शब्दों का अर्थ है-धर्म. धर्म का पालन करने से ही मनुष्य, मनुष्य है, अन्यथा खाना, पीना, सोना, रोना, धोना, डरना, मरना, संतान पैदा करना ये सभी काम पशु भी करते हैं. पशु और मनुष्य में भेद यह है कि मनुष्य उक्त सभी कार्य संस्कार के रूप में करता है. गाय, भैंस, घोड़ा, बछडा़ आदि जैसा खेत में अनाज खड़ा रहता है वैसा ही खा जाते हैं. लेकिन कोई मनुष्य खडे़ अनाज को खेतों में खाने को तैयार नहीं होता. खायेगा तो लोग कहेंगे पशुस्वरूप है. इसीलिए संस्कार, संस्कृति और धर्म के द्वारा मानव में मानवता आती है. बिना संस्कृति और संस्कार के मानव में मानवता नहीं आ सकती.

हमारे यहां प्रत्येक कर्म का संस्कृति के साथ संबंध है. जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत और प्रातःकाल शैया त्यागकर पुनः शैया ग्रहणपर्यंत हम जितने कार्य करें, वे सभी वैसे हो, जिससे हमारे जीवन का विकास ही नहीं हो, बल्कि वे अलंकृत, सुशोभित और विभूषित भी करें. ऐसे कर्म कौन से हैं, उनका ज्ञान मनुष्य को अपनी बुद्धि से नहीं हो सकता. सामान्यतया बुद्धिमान व्यक्ति सोचता है कि वह वही कार्य करेगा जिससे उसे लाभ हो. लेकिन मनुष्य अपनी बुद्धि से अपने लाभ और हानि का ज्ञान कर ही नहीं सकता. अन्यथा कोई मनुष्य निर्धन और दुखी नहीं होता. अपने प्रयत्नों से ही उसे हानि भी उठानी पड़ती है. इसलिए कहा जाता है कि हमने अपने हाथों से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली. अतः मनुष्य को कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान शास्त्रों द्वारा हो सकता है. शास्त्रों द्वारा बताये गये अपने-अपने अधिकारानुसार कर्तव्य कर्म और निषिद्ध कर्म को जानकर आचरण करना ही संस्कृति है.
जैसे संस्कार और संस्कृति में कोई अंतर नहीं होता है केवल प्रत्यय भेद है वैसे ही संस्कृति और सभ्यता भी समान अर्थों में प्रयोग होती है. धर्म और संस्कृति भी एक ही अर्थ में प्रयोग होता है लेकिन अंत में एक सूक्ष्म भेद हो जाता है जिसको मोटे तौर पर कह सकते हैं कि धर्म केवल शस्त्रेयीकसमधिगम्य है, अर्थात् शास्त्र के आदेशानुरूप कृत्य धर्म है जब कि संस्कार में शास्त्र से अविरुद्ध लौकिक कर्म भी परिगणित होता है.
अनादि सृष्टि परंपरा के रक्षण हेतु परब्रह्म परमात्मा ने अखिल धर्म मूल वेदों को प्रदान किया. हमारी मान्यता है कि वेद औपौरुषेय है उसे ही श्रुति कहा जाता है. उन्हीं श्रुतियों पर आधारित है धर्म शास्त्र जिसे स्मृति कहते हैं. शृंगेरी शारदा पीठ के प्रमुख जगत गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री भारती तीर्थ जी महाराज के अनुसार-
श्रुति स्मृति पुराणादि के आलय सर्वज्ञ भगवत्पाद श्री जगत गुरु श्री शंकराचार्य जी ने श्रीमदभागवतगीता के शाकर भाष्य के प्रारंभ में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि परमपिता परमात्मा ने जगत की सृष्टि कर उसकी स्थिति के लिए मरीच आदि की सृष्टिकर प्रवृति लक्षण धर्म का प्रबोध किया और सनक सनन्दनादि को उत्पन्न कर के ज्ञान वैराग्य प्रधान निवृति लक्षण धर्म का मार्ग प्रशस्त किया. ये ही दो वैदिक धर्म मार्ग है.
स भगवान सृष्टा इदं जगत् तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः मरीच्यादीन् अग्रे सृष्टा प्रजापतीन् प्रवृति -लक्षणं धर्म ग्राध्यामास वेदोक्तम्. ततः अन्यान् च सनकसनन्दनादीन् उत्पाद्य निवृति -लक्षणं धर्म ज्ञान वैराग्यलक्षणं ग्राध्यामान. द्विविधो हि वेदोक्तो धर्मः प्रवृति लक्षणो निवृति लक्षणच्य. जगतः स्थिति कारणम्..
(जगत गुरु आदि शंकराचार्य, श्रीमदभागवतगीता के शाकर भाष्य में)

इस प्रकार धर्म सम्राट श्री करपात्री जी के अनुसार-
युद्ध भोजनादि में लौकिकता-अलौकिकता दोनों ही है. जितना अंश लोक प्रसिद्ध है उतना लौकिक है और जितना शास्त्रेयीकसमधिगम्य है उतना अलौकिक है. लौकिक अंश धर्म है एवं धर्माविरुद्ध लौकिक अंश धम्र्य है. संस्कृति में दोनों का अंतर भाव है. अनादि अपौरुषेय ग्रन्थ वेद एवं वेदानुसारी आर्ष धर्म ग्रंथों के अनुकूल लौकिक पारलौकिक अभ्युदय एवं निश्श्रेयशोपयोगी व्यापार ही मुख्य संस्कृति है और वही हिन्दू संस्कृति वैदिक संस्कृति अथवा भारतीय संस्कृति है. सनातन परमात्मा ने अपने अंशभूत जीवात्माओं को सनातन अभ्युदय एवं निःश्रेयश परम् पद प्राप्त करने के लिए जिस सनातन मार्ग का निर्देश किया है तदनकूल संस्कृति ही सनातन वैदिक संस्कृति है और वह वैदिक सनातन हिन्दू संस्कृति ही सम्पूर्ण संस्कृतियों की जननी है.
(संस्कार संस्कृति एवं धर्म)

सनातन संस्कृति के कारण इस पावन धरा पर एक अत्यंत दिव्य विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित हुआ. प्राकृतिक पर्यावरण कठिन तप, ज्ञान, योग, ध्यान, सत्संग, यज्ञ, भजन, कीर्तन, कुम्भ तीर्थ, देवालय और विश्व मंगल के शुभ मानवीय कर्म एवं भावों से निर्मित इस दिव्य इलेक्ट्रो-मैगनेटिक फील्ड से अत्यंत प्रभावकारी विद्युत चुम्बकीय तरंगों का विकिरण जारी है, इसी से समग्र भू-मंडल भारत की ओर आकर्षित होता रहा है और होता रहेगा. भारतीय संस्कृति की यही विकिरण ऊर्जा ही हमारी चिरंतन परम्परा की थाती है. भूगोल, इतिहास और राज्य व्यवस्थाओं की क्षुद्र संकीर्णताओं के इतर प्रत्येक मानव का अभ्युदय और निःश्रेयस ही भारत का अभीष्ट है. साम्राज्य भारत का साध्य नहीं वरन् साधन है. परिणामतः हिन्दू साम्राज्य किसी समाज, देश और पूजा पद्धति को त्रस्त करने में कभी उत्सुक नहीं रहे. यहां तो सृष्टि का कण-कण अपनी पूर्णता और दिव्यता के साथ खिले, इसका सतत् प्रयत्न किया जाता है. आवश्यकतानुरूप त्यागमय भोग ही अभीष्ट है तभी तो दातुन हेतु भी वृक्ष की एक टहनी तोड़ने के पूर्व हम वृक्ष की प्रार्थना करते हैं और कहते हैं-
आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजा पशु वसूनिच।
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्ंवनो देहि वनस्पति।।
(वाधूलस्मृति 35, कात्यायन स्मृति 10-4,
विश्वामित्र स्मृति 1-58, नारद पुराण 27-25,
देवी भागवत 11-2-38, पद्म पुराण 92-12)

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