Tuesday, March 8, 2016

भारतीय संस्कृति में नारी कल, आज और कल


डॉ. सौरभ मालवीय
‘नारी’ इस शब्द में इतनी ऊर्जा है कि इसका उच्चारण ही मन-मस्तक को झंकृत कर देता है, इसके पर्यायी शब्द स्त्री, भामिनी, कांता आदि है, इसका पूर्ण स्वरूप मातृत्व में विलसित होता है. नारी, मानव की ही नहीं अपितु मानवता की भी जन्मदात्री है, क्योंकि मानवता के आधार रूप में प्रतिष्ठित संपूर्ण गुणों की वही जननी है. जो इस ब्रह्मांड को संचालित करने वाला विधाता है, उसकी प्रतिनिधि है नारी. अर्थात समग्र सृष्टि ही नारी है, इसके इतर कुछ भी नही है. इस सृष्टि में मनुष्य ने जब बोध पाया और उस अप्रतिम ऊर्जा के प्रति अपना आभार प्रकट करने का प्रयास किया, तो वरवश मानव के मुख से निकला–
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विधा द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
अर्थात हे प्रभु तुम माँ हो...।
अकसर यह होता है कि जब इस सांसारिक आवरण मैं फंस जाते हैं या मानव की किसी चेष्टा से आहत हो जाते हैं, तो बरबस हमें एक ही व्यक्ति की याद आती है और वह है मां. अत्यंत दुःख की घड़ी में भी हमारे मुख से जो ध्वनि उच्चरित होती है वह सिर्फ मां ही होती है. क्योंकि मां की ध्वनि आत्मा से ही गुंजायमान होती है.  और शब्द हमारे कंठ से निकलते हैं, लेकिन मां ही एक ऐसा शब्द है जो हमारी रूह से निकलता है. मातृत्वरूप में ही उस परम शक्ति को मानव ने पहली बार देखा और बाद में उसे पिता भी माना. बंधु, मित्र आदि भी माना. इसी की अभिव्यक्ति कालिदास करते है-
वागार्थविव संप्रक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये।
जगतः पीतरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ ॥ (कुमार सम्भवम)
जगत के माता-पिता (पीतर) भवानी शंकर, वाणी और अर्थ के सदृश एकीभूत है उन्हें वंदन।
इसी क्रम में गोस्वामी तुलसीदास भी यही कहते हैं –
जगत मातु पितु संभु-भवानी। (बालकांड मानस)
अतएव नारी से उत्पन्न सब नारी ही होते है, शारीरिक आकार-प्रकार में भेद हो सकता है परंतु, वस्तुतः और तत्वतः सब नारी ही होते है. संत ज्ञानेश्वर ने तो स्वयं को“माऊली’’ (मातृत्व,स्त्रीवत) कहा है.
कबीर ने तो स्वयं समेत सभी शिष्यों को भी स्त्री रूप में ही संबोधित किया है वे कहते है–
दुलहिनी गावहु मंगलाचार
रामचन्द्र मोरे पाहुन आये धनि धनि भाग हमार
दुलहिनी गावहु मंगलाचार ।
(रमैनी )
घूँघट के पट खोल रे तुझे पीव मिलेंगे
अनहद में मत डोल रे तुझे पीव मिलेंगे।
(सबद )
सूली ऊपर सेज पिया कि केहि बिधि मिलना होय ।
(रमैनी )
जीव को संत कबीर स्त्री मानते हैं और शिव (ब्रह्म) को पुरुष यह स्त्री–पुरुष का मिलना ही कल्याण है मोक्ष और सुगति है.
भारतीय संस्कृति में तो स्त्री ही सृष्टि की समग्र अधिष्ठात्री है, पूरी सृष्टि ही स्त्री है क्योंकि इस सृष्टि में बुद्दि ,निद्रा, सुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, जाति, लज्जा, शान्ति, श्रद्धा, चेतना और लक्ष्मी आदि अनेक रूपों में स्त्री ही व्याप्त है. इसी पूर्णता से स्त्रियां भाव-प्रधान होती हैं, सच कहिये तो उनके शरीर में केवल हृदय ही होता है,बुद्दि में भी ह्रदय ही प्रभावी रहता है, तभी तो गर्भधारण से पालन पोषण तक असीम कष्ट में भी आनंद की अनुभूति करती रहती है. कोई भी हिसाबी चतुर यह कार्य एक पल भी नहीं कर सकता. भावप्रधान नारी चित्त ही पति, पुत्र और परिजनों द्वारा वृद्दावस्था में भी अनेकविध कष्ट दिए जाने के बावजूद उनके प्रति शुभशंसा रखती है उनका बुरा नहीं करती, जबकि पुरुष तो ऐसा कभी कर ही नहीं सकता, क्योंकि नर विवेक प्रधान है, हिसाबी है, विवेक हिसाब करता है घाटा लाभ जोड़ता है, और हृदय हिसाब नही करता. जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में लिखा है-
यह आज समझ मैं पायी हूं कि
दुर्बलता में नारी हूं।
अवयन की सुन्दर कोमलता
लेकर में सबसे हारी हूं ।।
भावप्रधान नारी का यह चित्त जिसे प्रसाद जी कहते है-
नारी जीवन का चित्र यही
क्या विकल रंग भर देती है।
स्फुट रेखा की सीमा में
आकार कला को देती है।।
परिवार व्यवस्था हमारी सामाजिक व्यवस्था का आधार स्तंभ है, इसके दो स्तंभ है- स्त्री और पुरुष. परिवार को सुचारू रूप देने में दोनों की भूमिका अत्यंत महतवपूर्ण है, समय के साथ मानवीय विचारों में बदलाव आया है. कई पुरानी परंपराओं, रूढ़िवादिता एवं अज्ञान का समापन हुआ. महिलाएं अब घर से बाहर आने लगी है कदम से कदम मिलाकर सभी क्षेत्रों में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दे रही हैं. अपनी इच्छा शक्ति के कारण सभी क्षेत्रों में अपना परचम लहरा रही हैं. अंतरिक्ष हो या प्रशासनिक सेवा, शिक्षा, राजनीति, खेल, मीडिया सहित विविध विधावों में अपनी गुणवत्ता सिद्ध कर कुशलता से प्रत्येक जिम्मेदारी के पद को संभालने लगी हैं. आज आवश्यकता यह समझने की है कि नारी विकास की केंद्र है और भविष्य भी उसी का है, स्त्री के सुव्यवस्थित एवं सुप्रतिष्ठित जीवन के अभाव में सुव्यवस्थित समाज की रचना नहीं हो सकती. अतः मानव और मानवता दोनों को बनाए रखने के लिए नारी के गौरव को समझना होगा.

संपर्क
डॉ. सौरभ मालवीय
सहायक प्राध्यापक
माखनलाल चतुर्वेदी
राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्य प्रदेश)
मो. +919907890614
ईमेल : drsourabhmalviya@gmail.com

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