Tuesday, February 17, 2009

हिंदुत्व एजेंडे का अर्थ


बलबीर पुंज
हिंदुत्व एजेंडे का अर्थ नागपुर बैठक के बाद राजनीतिक हलके में चुनावी रणनीति के तहत भाजपा के अयोध्या और हिंदुत्व एजेंडे की ओर वापस लौटने की चर्चा चल रही है। यह बहस निरर्थक है, क्योंकि भाजपा ने कभी अयोध्या और हिंदुत्व का मुद्दा छोड़ा ही नहीं था। भाजपा की विचारधारा में हिंदुत्व ही मूल है। भारत के पंथनिरपेक्ष और बहुलवादी चरित्र का मूलाधार भी यही सनातन चिंतन है। हिंदुत्व के बिना भारत मजहब आधारित जिहादी पाकिस्तान का प्रतिरूप होगा। विभाजन के साथ पाकिस्तान ने अपने हिंदू अतीत को नकारा और वहां बचे हिंदुओं को मतांतरण अथवा पलायन के लिए विवश किया। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान वैश्विक आतंकवाद की राजधानी के रूप में कुख्यात हो चुका है।

वैदिक ऋचाओं के माध्यम से विश्व बंधुत्व का संदेश देने वाला सिंधु नदी का पावन तट आज आतंकवाद की उपजाऊ भूमि के रूप में उभरा है। हिंदुत्वविहीन पाकिस्तान का एजेंडा जिहादी तय कर रहे हैं। क्यों? हमें जिस बहुलतावादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत पर गर्व है उसका यह स्वरूप संविधान के कारण नहीं है, बल्कि हिंदुत्व की बहुलतावादी सनातनी संस्कृति के कारण संविधान पंथनिरपेक्ष और सम्मानित है। जिस सभ्यता-संस्कृति में संविधान को क्रियाशील रहना है उसकी मूल प्रकृति और प्रवृत्ति से साम्य नहीं रखने वाला संविधान कभी भी दीर्घजीवी नहीं रह सकता। इसीलिए पाकिस्तान में पंथनिरपेक्षता और प्रजातंत्र जड़ नहीं पकड़ सके। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय मुस्लिम लीग को छोड़कर प्राय: सभी राजनीतिक दल विभाजन के खिलाफ थे, किंतु कम्युनिस्टों ने जिन्ना को वे सारे तर्क-कुतर्क उपलब्ध कराए जो मजहब आधारित राष्ट्र की मांग के लिए जरूरी थे। क्यों? इसलिए कि कम्युनिस्ट भारत की मूल प्रकृति व संस्कृति से कटे-छंटे थे। 1962 के चीन के आक्रमण के समय कम्युनिस्ट चीन के साथ थे। जब चीन परमाणु शक्ति से संपन्न हुआ तो कम्युनिस्टों ने तालियां बजाईं, किंतु पोखरण में दूसरे परमाणु परीक्षण से उन्हें बड़ी तकलीफ हुई।

वामपंथियों और भारत के बीच जो असंगति है उसका कारण यही है कि मा‌र्क्स के मानसपुत्रों में हिंदुत्व का अभाव है। दुर्भाग्य से मीडिया के एक बड़े वर्ग में विकृत सेकुलरवाद के प्रति आसक्ति और हिंदू विरोधी मानसिकता हावी है। तकरीबन पिछली दो पीढ़ी नेहरूवादी स्वाधीन भारत में पल कर बड़ी हुई हैं। नेहरूवादी पाश्चात्य उन्मुक्तता इस्लामी कट्टरवाद के लिए सहिष्णुता और हिंदू पहचान के प्रति वैमनस्य का ही नाम था। उनके बाद इंदिरा गांधी के दौर में वामपंथियों का गुट मीडिया और शीर्षस्थ बौद्धिक संस्थानों पर हावी हुआ। वामपंथियों के लिए राष्ट्रवाद कोई मायने नहीं रखता था, इसलिए इस राष्ट्र का गौरव उन्हें आकर्षित नहीं कर सका। जिस मानसिकता ने देश का विभाजन कराया, आजादी के बाद जिसने सांप्रदायिक वैमनस्य के बीज बोए उसके लिए देश की पुरातन मान्यताएं व उसकी गरिमा गौण है। रोम, मिस्त्र, यूनान आदि सभ्यताएं काल के गाल में समा गईं, किंतु हिंदू सभ्यता नित नूतन है। इसीलिए, क्योंकि भारत का सतत अस्तित्व हिंदू दर्शन पर आधारित है। भारत की पहचान किसी एक पंथ या पूजा पद्धति से नहीं जोड़ी जा सकती।

हिंदू दर्शन में अनंत काल से विचार-विमर्श और श्रेष्ठ चिंतन के आदान-प्रदान की दीर्घ परंपरा रही है। यूरोप में रोमन साम्राज्य की छत्रछाया में ईसाइयत ने मूर्तिपूजकों के साथ लड़ाई लड़ खुद को स्थापित किया। लिथुआनिया में 14वीं सदी तक मूर्तिपूजन विद्यमान था, किंतु ईसाइयत उसे निगल गई। वह एक बर्बर सामूहिक नरसंहार का दौर था जब श्वेत ईसाइयत लेकर अमेरिका पहुंचे और वहां के निवासियों को ईसाई बनाया। मध्यकाल इस्लामी बर्बरता और हिंसा के बल पर मतांतरण का साक्षी है। इस तरह की असहिष्णुता के लिए हिंदू दर्शन में कभी कोई स्थान नहीं रहा है। हिंदुत्व को फासीवादी और सांप्रदायिक संज्ञा देना वास्तव में भारत के सनातन चरित्र को कमजोर करने का षड्यंत्र है। इस कुप्रचार का लक्ष्य प्रजातांत्रिक और सहिष्णु मूल्यों को कमजोर कर मध्यकालीन कट्टरता को वापस लाना है।

आज भारत सहित दुनिया के अधिकांश देश इस्लामी जिहाद से त्रस्त हैं। राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए भाजपा यदि इस्लामी आतंकवाद से कड़ाई से निपटने की मांग करती है, मौत के सौदागरों को मिल रहे स्थानीय समर्थन पर प्रश्न खड़ा करती है तो इसे किस तरह सांप्रदायिकता से जोड़ा जाता है? महात्मा गांधी ने रामराज्य के आधार पर ही एक पंथनिरपेक्ष जनकल्याणकारी राष्ट्र की कल्पना की थी। क्या गांधीजी और भाजपा के राम अलग-अलग हैं? राम तो हिंदुत्व के प्राण हैं। हिंदुत्व केवल राम मंदिर तक सीमित नहीं है। पोखरण द्वितीय भी हिंदुत्व एजेंडा का अंग था। भाजपा नीत राजग सरकार के काल में प्रारंभ किए गए राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण, दूरसंचार क्रांति, सर्व शिक्षा अभियान आदि भी उसी एजेंडे से प्रसूत थे। उसी एजेंडे से दीप्त गुजरात आज विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ रहा है। हिंदुत्व भारतीयों को खुशहाल, समृद्ध, शांतिप्रद भारत के लिए प्रेरित करता है, जहां सब के विकास के लिए समान अवसर उपलब्ध हों, जहां सार्वजनिक जीवन में मर्यादा और शुचिता का महत्व हो। वर्तमान संप्रग सरकार में आधा दर्जन ऐसे मंत्री हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं। एक पर हत्या का आरोप है, किंतु वह महत्वपूर्ण पद पर कायम हैं।

श्रीराम ने पिता के आदेश का पालन करने के लिए राजपाट का मोह छोड़ वनवास स्वीकार किया। उसी हिंदुत्व के कारण लालकृष्ण आडवाणी ने हवाला कांड में अपना नाम शामिल होने पर सार्वजनिक जीवन से तब तक के लिए अवकाश ले लिया था जब तक जांच में वह निर्दोष साबित न हो जाएं। क्या हिंदुत्व इस सनातन राष्ट्र की कालजयी सभ्यता का बोधक नहीं है? सेकुलरिस्ट अगर इसी देश में कश्मीरियत को स्वीकार सकते हैं तो समग्र रूप से पूरे हिंदुस्तान की सभ्यता के लिए हिंदुत्व के प्रयोग पर आपत्ति क्यों है? इस देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं तो उन पर समान नागरिक संहिता क्यों नहीं लागू की जा सकती है? एक समुदाय अपने लिए अलग कानून और अदालत की मांग क्यों करता है और उस मांग को सेकुलरिस्टों का समर्थन क्यों मिलता है? हिंदुत्व का अर्थ सर्वधर्म समादर है। यह मजहब के आधार पर किसी समुदाय के लिए विशेष अधिकारों की व्यवस्था नहीं देता।

हिंदुत्व के समर्थक क्या कभी ऐसे राज्य की कल्पना करते हैं जिसमें शंकराचार्य फतवा जारी कर रहे हों और संत न्यायाधीश की कुर्सी पर विराजमान हों? भाजपा के हिंदुत्व का जिस सेकुलरवाद के नाम पर विरोध किया जा रहा है उसका भारत में क्या अर्थ है? बहुसंख्यक हिंदू समाज को अपनी शिक्षण संस्था चलाने के अधिकार से वंचित रखना और अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम व ईसाइयों को न केवल यह अधिकार देना, बल्कि उनकी संस्थाओं को राज्याश्रय और वित्तीय मदद उपलब्ध कराना, जम्मू-कश्मीर के मुस्लिम बहुल चरित्र को कायम रखने के लिए धारा 370 की व्यवस्था के अंतर्गत शेष भारतीयों की वहां रिहायश पर पाबंदी लगाना, हिंदू तीर्थस्थलों का अधिग्रहण और उन तीर्थस्थलों से हुई आमदनी से हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये हज सब्सिडी के रूब में बांट देना क्या सेकुलरवाद की विकृति को उजागर नहीं करते? इस विकृत सेकुलरवाद का विरोध आज सांप्रदायिकता है। क्यों?
साभार-जागरण
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)

Sunday, February 8, 2009

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के कारण ही हम अपराजित हैं


डॉ. मुरली मनोहर जोशी
यह तो निर्विवाद ही है कि हिन्दुत्व भारत की वर्तमान राजनीति का केन्द्र बिन्दु बन गया है।
कहते हैं सबसे पुराना यहूदी पूजा स्थल (साइनेगॉग) भारत में लगभग 2000 वर्ष पुराना है। पारसी ईरान से आये - सूफी, संत, विचारक और व्यापारी। कुछ आक्रमणकारी थे कुछ अन्य भी। अंत में सब एक देह के अंगी बने। भारत एक महामानव सागर बना। महाकवि रवीन्द्र ठाकुर के शब्दों में एई भारतेर महामानव सागर तीरे। इस्लाम को मानने वालों ने, जो इसी महामानव के अंग हैं, अलग उपासना पध्दति अपनायी पर अपने पुरखों से उन्होंने अपना सम्बन्ध नहीं तोड़ा था। उनमें से बहुतेरे अपने वंश के अनुसार मुसलमान, राजपूत, गूजर, चौहान आदि का उल्लेख गर्व से करते रहे हैं। इस देश में यूनान, फारस, अरब, मंगोल कौन नहीं आया? पर सब ने इस देश की संस्कृति को आत्मसात किया।जो लोग हिन्दुत्व को समझे बिना, उसके स्रोतों का अनुसंधान किये बिना पाश्चात्य लेखकों के अर्धपक्व ग्रंथों के आधार पर हिंदुत्व की आलोचना करते हैं उनके बारे में क्या कहा जाय? वस्तुत: यह मानसिकता नई नहीं है। अयोध्‍या एवं रामजन्मभूमि विवाद से भी यह नहीं उपजी।

सन् 1857 के बाद अंग्रेजों को यह अनुभव हुआ था कि भारत की राष्ट्रीयता की आधारशिला राजनीति नहीं थी वरन् उसका अधिष्ठान सांस्कृतिक था। प्राचीन संस्कृति और वाड्मय ने हिंदुओं को शिक्षा दी थी कि स्वदेश निर्जीव भूमि मात्र न होकर चैतन्यमयी मातृभूमि है। इस प्रकार देशभक्ति स्वधर्म का स्वरूप है। 1857 की लड़ाई में भारतवासियों ने पंथ, सम्प्रदाय, मजहब तथा जाति के भेदभाव से ऊपर उठकर मातृभूमि पर ब्रिटिश आधिपत्य को चुनौती दी थी। अंग्रेज यह समझ गया कि भारत की सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रवाद के चलते भारत पर विजय असंभव है अत: उसने अपने आगे की नीति में इस सांस्कृतिक एकता को खंडित करने का सिध्दांत अपनाया। इसके बाद की ब्रिटिश नीति को जरा धयान से देखा जाय तो पता चलेगा कि साम्प्रदायिक परिवेश में हिन्दुत्व की परिभाषा ब्रिटिश कुटिलता की देन है। भारतीय जनमानस का मज़हब के आधार पर बंटवारा करने के बाद अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा प्रणाली और पाठयक्रम में आमूल परिवर्तन किये। चुन-चुन कर भारतीय कला-कौशल, शिल्प और उद्योगों को तबाह किया। ब्रिटिश संरक्षण में ईसाई मिशनरियों को धार्म परिवर्तन के लिए सुविधाएं दीं। इस प्रकार भारतीय मनोबल को हर प्रकार पराजित करने का प्रयत्न किया गया, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

ब्रिटिश दमनचक्र के बीच भारत का क्रांतिकारी आन्दोलन सक्रिय हुआ। यहां भी पंथ और मज़हब का कोई भेद नहीं था। पराधीन भारत में नवचेतना का संचार करने एवं राष्ट्रीय पुनर्जागरण का मन्त्र फूंकने का काम राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानन्द, लोकमान्य बालगंगाधार तिलक, महर्षि श्री अरविन्द जैसे महानुभावों ने किया। इन क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत कृष्ण की गीता थी। लक्ष्य मातृभूमि की स्वतंत्रता और वन्देमातरम् उनका राष्ट्रगान था। सैकड़ों युवकों ने इन प्रतीकों को लेकर मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर किये।

वस्तुत: देशभक्ति की यह अवधारणा भारतीय संस्कृति की अनूठी देन हैं। राष्ट्र का नियामक तत्व संस्कृति है। राजनीति उसका अधिष्ठान कभी नहीं रहा है। राष्ट्र एक सांस्कृतिक इकाई है और राष्ट्रीयता उस संस्कृति से ही उद्भूत हुआ करती है। अत: भारत में राज्य सदा संस्कृति के संरक्षण का उपकरण रहा। जब राज्य ने संस्कृति के विरोध की भूमिका अपनाई उसी क्षण जनता ने उसे बदलने में कोई विलम्ब नहीं किया।

आज के परिप्रेक्ष्य में अगर इस बात को देखें तो दृष्टिगोचर होगा कि राष्ट्र का स्वर सांस्कृतिक एकता है। जबकि राज्य उस सांस्कृतिक एकता को गलत अर्थों में परिभाषित करके देश के एक समुदाय को विभाजन की ओर ले जा रहा है। अगर सारे भारतीय भारत की मूल सांस्कृतिक एकता की अनिवार्यता को समझकर एक पंक्ति में आ जायें तो विभेद नहीं रह जायेगा। ऐसी स्थिति में सबकी विरासत एक होगी और भारतीय एकता के प्रतीक भारतमाता, वन्देमातरम्, भारत के महापुरुष, साधु, संत, सूफी, फकीर सब के सब सांझे होंगे। ''मेरा और तेरा'' के स्थान पर ''हमारा'' शब्द का प्रयोग होगा। थोड़े समय की बात है। भारतीय राजनीति के विभाजक तत्तव भारतीय संस्कृति की सर्वव्यापी सत्ता के समक्ष पराभूत हो जायेंगे।


हिंदुत्व की परिकल्पना विराट हैं। पहले कहा जा चुका है कि हिंदुत्व का सही आकलन सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में ही हो सकता है। उसे उपासना पध्दति तक सीमित करने की भूल के कारण अंग्रेजियत की मानसिकता वाले भटक रहे हैं। वेद, उपनिषद, आदि संकीर्णता या किसी संहिताबध्द मज़हब का प्रतिपादन नहीं करते, वरन् उनमें विराट मानव धर्म का प्रतिपादन किया गया है। उनमें ईश्वर की कल्पना ही विराट रूप में की गई हैं। ईश्वर शांत है, उसका स्वरूप शांत है वह गगन के सदृश विशाल है, वह एक है, वह बहुत भी हो जाता हैं, वह यहां-वहां सब जगह है और कहीं भी नहीं है। वह अणु-परमाणु से भी छोटा है और बड़ी से बड़ी जो कल्पना की जा सकती है वह उससे भी बड़ा है। वह सब प्राणियों में छोटे-बड़े ऊंच-नीच सभी में एक समान व्याप्त है। वह सबको शिवत्व की ओर ही नहीं वरन् शिव से भी श्रेयस्कर मन्तव्य पर ले जाता है। शिवाय च शिवतराय च। उसको प्राप्त करने का उपाय है समता के भाव को प्राप्त करना।

अपने परमात्मा को सर्वत्र देखना।
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानु पश्चति।
सर्व मूतेष आत्मानं ततो न जुगुप्सति॥

यह है विराट हिन्दु संस्कृति। इसने नये विचारों का स्वागत किया। आ नो भद्रा: क्रतवोयन्तु विश्वत:। वस्तुत: कुछ ऐसा है ही नहीं जिसकी हिन्दु वाङ्मय में पूर्व कल्पना न की गयी हो। फिर भी हमारे यहां नये विचारों का समादर हुआ। यह आंगन इतना विराट है कि इसमें सभी के लिए जगह है। जो भी सताये हुए दुनिया के लोग थे, उनका भारतभूमि ने स्वागत किया। पृथ्वी सूक्त में देखिये :

जनं विभ्रति बहुधा विवाचसं
नाना धार्माणि पृथिवी यथौकसम्
सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां
धरुवेव धेनुनपस्फुरन्ती

यह पृथ्वी अनेक प्रकार के जनों तथा अनेक धर्म एवं आस्था वाले जनों का भरण पोषण करती है। मानो वह एक शांतिपूर्ण गृह के वासी हों - ऐसी पृथ्वी पथ की सहस्त्रों धारा की तरह सौभाग्य की वर्षा करे।

ईश्वर के उस विराट रूप को कोई नाम नहीं दिया गया है। यह जगत जीव मात्र का उपास्य है क्योंकि चराचर सृष्टि उसकी उपज है। यह बात अनादिकाल से कही जा रही है और संतों-सत्पुरुषों ने अनेक रूपों में इसी सत्य का अनेक बार वर्णन किया है। गुरु ग्रंथ साहिब में बहुत सुंदर आरती आती है।

गगन में थाल रवि चंद दीपक बने
तारिका मंडल जनक मोती
धून मलियानलो पवन चंवर करे
सगल बनराय फूमंत जोती
कैसी आतरी होए भवखंडना तेरी आरती
अनहता शब्द बाजंत मेरी

विशाल गगन रूपी थाल में सूर्य और चंद्र दो दीपक हैं और तारा मंडल मोतियों की शोभा दे रहे हैं। मलय पर्वत की सुगंधित वायु आपको धूप का सुगंध दे रही है, पवन चंवर डुला रहा है। वचनों के वृक्षों के फूल आपको समर्पित हैं। अनहद, नाद मानों आपकी आरती का नाद है - हे भव खंडन कितनी अद्भुत आपकी आरती हो रही है।

यह है उस विराट की कल्पना जो भारत की संस्कृति को अनूठी पहचान और उदारता प्रदान करती है।

कहते हैं सबसे पुराना यहूदी पूजा स्थल (साइनेगॉग) भारत में लगभग 2000 वर्ष पुराना है। पारसी ईरान से आये - सूफी, संत, विचारक और व्यापारी। कुछ आक्रमणकारी थे कुछ अन्य भी। अंत में सब एक देह के अंगी बने। भारत एक महामानव सागर बना। महाकवि रवीन्द्र ठाकुर के शब्दों में एई भारतेर महामानव सागर तीरे। इस्लाम को मानने वालों ने, जो इसी महामानव के अंग हैं, अलग उपासना पध्दति अपनायी पर अपने पुरखों से उन्होंने अपना सम्बन्ध नहीं तोड़ा था। उनमें से बहुतेरे अपने वंश के अनुसार मुसलमान, राजपूत, गूजर, चौहान आदि का उल्लेख गर्व से करते रहे हैं। इस देश में यूनान, फारस, अरब, मंगोल कौन नहीं आया? पर सब ने इस देश की संस्कृति को आत्मसात किया।

राष्ट्रीयता और संस्कृति अविभाज्य हैं। मज़हब और उपासना पध्दतियों को इनसे जोड़ना भूल है। टर्की का उदाहरण हमारे सामने है। कमाल अतातुर्क क्रांतिकारी नेता थे। आज़ादी के बाद उन्होंने अपने नाम के पाशा को हटाकर अतातुर्क जोड़ा। अरबी का स्थान तुर्की ने ले लिया। उपासना पध्दति इस्लाम बनी रही। इस प्रकार टर्की ने अपने संस्कृति के प्रतीकों को पुन:स्थापित करके अपनी संस्कृति का पुनरुध्दार किया। स्मरण रखने की बात है कि संस्कृतियां बनाई नहीं जाती हैं, वह स्वत: प्रवाहमान होती हैं। पुरातन काल में हमारी संस्कृति को भारतीय संस्कृति या भारती कहते थे- वर्ष तत् भारत नाम भारती यत्र संतति। उस देश का नाम भारत है जिसकी संतति भारती है। भारती के पश्चिमी पड़ोसी इसकी पहचान सिंधु नदी के निकटवर्ती देश के रूप में करते थे। फारसी भाषा में ''स'' का उच्चारण ''ह'' हो जाने के कारण वह ''सिंधु'' को ''हिन्दू'' पुकारते थे। यथा सप्तसिंधु का उच्चारण ''हप्त हिन्दू'' हो गया था। प्राचीन फारसी में इस क्षेत्र का नाम ''हिन्दुश'' पुकारा जाता था। अत: भारत को ही हिन्दुस्थान कहा जाता था। इस प्रकार हिंदू संस्कृति एक दूसरे के पर्याय हो गये। यह भारतीय अथवा हिंदू संस्कृति एक दूसरे के पर्याय हो गये। यह भारतीय अथवा हिन्दू संस्कृति अछेद्य है और इसी से हर भारतीय की पहचान बनती है चाहे वह किसी भी मज़हब को मानने वाला हो।

भारत भूमि भारतीय मात्र की जननी है। सभी इस धरती को मस्तक झुका कर प्रणाम करते हैं। मरने पर यह धरती खाक को समेट लेती है। ऐसा नहीं है कि संस्कृति की प्रवाहमान धारा से मुसलमान पृथक रहे हैं। संतों-आचार्यों के साथ सूफियों और कबीर जैसे फकीरों ने संस्कृति को समृध्द बनाया है। बुल्लेशाह जैसे सूफी और कबीर जैसे निर्गुण संत की वाणियों का आदिग्रंथ जैसे ग्रन्थों में समावेश इसका प्रमाण है। मज़हबी मान्यता इसमें कोई बाधा नहीं बनी। इसलिये मज़हब को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना बुध्दिमानी नहीं है।

सारांश यह है कि मुसलमान, हिन्दू संस्कृति का एक अभिन्न अंग हैं। जो लोग इससे जुदा करने के प्रयत्न में लगे हैं वे पूरे भारतीय समाज के साथ द्रोह कर रहे हैं। मुस्लिम पृथकतावादी पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कारण और आज़ादी के बाद कांग्रेस तथा कट्टरपंथियों की सांठगांठ, वोट बैंक की राजनीति और कृत्रिम असुरक्षा भाव के कारण है। जब ये संकीर्ण लोग मुस्लिम सम्प्रदाय को राष्ट्र धारा के साथ बहने देंगे, मुस्लिम अल्पसंख्यक के स्थान पर बहुसंख्यक पंक्ति में आ जायेगा। तब वह अल्पसंख्यक की संकीर्णता और भय से मुक्त हो जायेगा। आज मज़हबी रहनुमा यह कह रहे हैं कि मुस्लिम समुदाय पिछड़ा और ग़रीब है। ग़रीबी मज़हबी नहीं होती लेकिन मुस्लिम वर्गों को शिक्षा, संस्कृति, उद्योग तथा विकास के अन्य क्षेत्रों में पिछड़ा रखने की जितनी जिम्मेदारी कांग्रेस की है उतनी ही संकीर्ण मुस्लिम रहनुमाओं की भी है। विभाजन के समय समृध्द और शिक्षित नौकरी पेशा लोग पाकिस्तान चले गये। जो यहां रहे उन्होंने अपनी धन संपत्ति की हिफाज़त की। जो सम्पन्न थे उन्होंने अपने बच्चों को उच्च शिक्षा केन्द्रों में शिक्षा दी। बाकी समाज को मज़हबी कट्टरपंथियों के हवाले कर दिया। दुर्भाग्य यह है कि आज़ादी के बाद मुसलमानों में कोई ऐसा नेतृत्व पैदा नहीं हुआ जो पूरे समाज को सही दिशा देता। इस प्रकार मुस्लिम वर्ग वोट बैंक तो बना पर उसे उसका फायदा कुछ नहीं मिला। उसे संकीर्ण प्रचार के द्वारा भारतीय संस्कृति की समृध्द परम्परा से काटने का जी तोड़ प्रयास किया गया जिसका परिणाम सामने है।

हमारा विश्वास है कि भ्रम के बादल छंटने वाले हैं। मुस्लिम समाज के अन्दर ही उदारवादी आन्दोलन उठ खड़ा हुआ है। इतना बड़ा मुस्लिम समाज ज्यादा देर तक मज़हब के नाम पर लोगों को अंधकार में रखने के प्रयत्न को बर्दाश्त नहीं करेगा। उसके अंदर ही समाज सुधार के स्वर मुखर हो रहे हैं। अपनी मज़हबी मान्यता और उपासना पध्दति को सुरक्षित रखते हुये मुस्लिम संप्रदाय आज नहीं तो कल सांस्कृतिक जागरण में हमारे साथ कंधे से कंधा मिला कर चलेगा और भारत की समृध्दि में अपना योगदान करेगा।
(लेखक भाजपा के पूर्व अध्यक्ष व सांसद हैं)

Saturday, February 7, 2009

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : वैचारिक मूलमंत्र


लालकृष्ण आडवाणी
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा का सहज स्वरूप हिन्दुत्व बन गया है। हिन्दुत्व केवल अयोध्‍या में मंदिर नहीं है, यह तो हजारों-हजारों वर्षों से हमारे अनुभवों की सामूहिक बुध्दिमत्ता का प्रतीक है। इसलिए अक्टूबर 1961 में मदुरई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक को सम्बोधित करते हुए पंडित नेहरू ने कहा था-''भारत पिछले अनेक युगों से तीर्थ स्थलों के देश में बर्फीली हिमालय पर्वतमाला में स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ और अमरनाथ से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक आपको प्राचीन स्थलों के दर्शन होंगे। इन महान तीर्थों में ऐसी क्या बात हैं जो लोगों को दक्षिण से उत्तर और उत्तर से दक्षिण की यात्रा करने के लिए प्रेरित करती है। यह एक देश और संस्कृति की भावना है और इस भावना ने हम सबको जोड़ रखा है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है कि भारत भूमि उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैली हुई है। भारत को एक महान देश समझने की अवधारणा युगों-युगों से चली आ रही है जिसे लोग पावन भूमि मानते है और इसी अवधारणा ने इसे एकसूत्र में बाँध रखा है। हालांकि यहां विभिन्न राजनैतिक स्वरूप के अलग-अलग राज्य रहे है और हम विभिन्न भाषाएं बोलते है फिर भी यह मृदुल बंधन हमें अनेक रूपों में इकट्ठा बांधे रखता है।''हिन्दुत्व हमारे लिए मात्र नारा नहीं है। यह भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक मूलमंत्र है जिसमें उसकी पहचान और दृष्टि अत्यन्त विशिष्ट रूप से प्रकट होती है।

हिन्दुत्व पंथ या मजहब नहीं है और न ही हिन्दुत्व कोई मजहबी राज्य स्थापित करने का नुस्खा है। इसमें राष्ट्रत्व और सत्त्व समाहित है। यह राष्ट्र को एकजुट करने वाली सुदृढ़ शक्ति है। हिन्दुत्व केवल अयोध्‍या में मंदिर नहीं है, यह तो हजारों-हजारों वर्षों से हमारे अनुभवों की सामूहिक बुध्दिमत्ता का प्रतीक है। इसलिए अक्टूबर 1961 में मदुरई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक को सम्बोधित करते हुए पंडित नेहरू ने कहा था-



''भारत पिछले अनेक युगों से तीर्थ स्थलों के देश में बर्फीली हिमालय पर्वतमाला में स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ और अमरनाथ से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक आपको प्राचीन स्थलों के दर्शन होंगे। इन महान तीर्थों में ऐसी क्या बात हैं जो लोगों को दक्षिण से उत्तर और उत्तर से दक्षिण की यात्रा करने के लिए प्रेरित करती है। यह एक देश और संस्कृति की भावना है और इस भावना ने हम सबको जोड़ रखा है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है कि भारत भूमि उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैली हुई है। भारत को एक महान देश समझने की अवधारणा युगों-युगों से चली आ रही है जिसे लोग पावन भूमि मानते है और इसी अवधारणा ने इसे एकसूत्र में बाँध रखा है। हालांकि यहां विभिन्न राजनैतिक स्वरूप के अलग-अलग राज्य रहे है और हम विभिन्न भाषाएं बोलते है फिर भी यह मृदुल बंधन हमें अनेक रूपों में इकट्ठा बांधे रखता है।''

''भारत पिछले अनेक युगों से तीर्थ स्थलों के देश में बर्फीली हिमालय पर्वतमाला में स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ और अमरनाथ से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक आपको प्राचीन स्थलों के दर्शन होंगे। इन महान तीर्थों में ऐसी क्या बात हैं जो लोगों को दक्षिण से उत्तर और उत्तर से दक्षिण की यात्रा करने के लिए प्रेरित करती है। यह एक देश और संस्कृति की भावना है और इस भावना ने हम सबको जोड़ रखा है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है कि भारत भूमि उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैली हुई है। भारत को एक महान देश समझने की अवधारणा युगों-युगों से चली आ रही है जिसे लोग पावन भूमि मानते है और इसी अवधारणा ने इसे एकसूत्र में बाँध रखा है। हालांकि यहां विभिन्न राजनैतिक स्वरूप के अलग-अलग राज्य रहे है और हम विभिन्न भाषाएं बोलते है फिर भी यह मृदुल बंधन हमें अनेक रूपों में इकट्ठा बांधे रखता है।''

पं. नेहरू ने हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं किया। परन्तु भारत की एकता-संस्कृति के मुदृल बंधन का जो आधार स्पष्ट रुप से उन्होंने रखा वह वही है जिसे भाजपा ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हिन्दुत्व की संज्ञा दी है।

भारतीय राष्ट्रवाद का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है। भारत एक देश है और सभी भारतीय एक जन है परन्तु हमारा यह विश्वास है कि भारत के एकत्व का आधार उसकी युगों पुरानी संस्कृति में ही निहित है-इस बात को न्यायालयों ने अनेक निर्णयों में स्वीकार किया है।

प्रदीप जैन बनाम भारत संघ (1984) मामले में निर्णय देते हुए उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस पी.एन. भगवती और अमरेन्द्र नाथ सेन तथा जस्टिस रंगनाथ मिश्र ने कहा था-
यह इतिहास का रोचक तथ्य है कि भारत का राष्ट्र के रूप में अस्तित्तव बनाए रखने का कारण एक समान भाषा या इस क्षेत्र में एक ही राजनैतिक शासन का जारी रहना नहीं है, बल्कि सदियों पुरानी चली आ रही एक समान संस्कृति हैं। यह सांस्कृतिक एकता है, जो किसी भी बंधन से अधिक मूलभूत और टिकाऊ है, जो किसी देश के लोगों को एकजुट करने में सक्षम है और जिसने इस देश को एक राष्ट्र के सूत्र में बाँध रखा है।

इस प्रकार हिन्दुत्व वह आदर्श है जो भूत और भविष्य को वर्तमान से जोड़ता है। सारे रूप में यही भारत की पहचान है। सेक्यूलरवाद के नाम पर राजनीतिज्ञ चाहते है कि यह देश अपनी पहचान भूल जाए। हिन्दुत्व मात्र सिध्दान्त नहीं है, इससे बढ़कर यह भारत के प्रति हमारी प्रतिबध्दता की वास्तविकता है। जब तक भारतीय सभ्यता है हिन्दुत्व का स्थान है। यह कोई चुनावी मुद्दा नहीं है। यह हमारा मिशन है। इससे भारतीय राजनीति में नैतिक और आचार संबंधी आधार को बल मिलेगा। जिसे जातिवाद और साम्प्रदायिक वोट बैंक की राजनीति को चलाने वाले धीरे-धीरे समाप्त करते जा रहे है।
पिछले कुछ वर्षों में भाजपा की सफलता यह रही है कि मतदाताओं में इस विचारधारा को संगत मुद्दा बना सकी हैं। हम देशभर में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम छद्म सेक्यूलरवाद पर बहस कराने में सफल हुए है। अब अधिक से अधिक लोग महसूस करने लगे है कि सेक्युलरवाद के नाम पर हमारे विरोधी चाहते है कि राष्ट्र अपनी अस्मिता जिसे हिन्दुत्व कहते है उसे नकार दें। इस राष्ट्रीय अस्मिता को भी भारतीयता का नाम दिया जा सकता हैं परन्तु इसका अंतनिर्हित सार एक ही है।

भारतीय सेक्युलरवाद के बारे में एक विशुध्द अध्‍ययन में यूजीन ने लिखा था-भारतीय संस्कृति एक मिली जुली संस्कृति होने के बावजूद उसमें हिन्दुत्व ही अत्यधिक शक्तिशाली और व्यापक रहा है। वे लोग जो बार-बार भारतीय संस्कृति के इस मिले-जुले स्वरुप के बारे में बहुत बल देते है इस बुनियादी तत्तव के महत्व को कम कर देते है। हिन्दुत्व ने ही वास्तव में भारतीय संस्कृति को आवश्यक विशिष्टता प्रदान की है।

हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी ने लिखा था-
अंग्रेजों ने हमें यह सिखाया है कि पहले हम एक राष्ट्र नहीं थे और एक राष्ट्र बनने में अभी हमें शताब्दियां लगेगी। यह बात निराधार है। उनके भारत आने के पहले से ही हम एक राष्ट्र थे। एक ही विचार हमें प्रेरित करते थे। हमारी जीवन शैली एक समान थी। चूंकि हम एक राष्ट्र थे इसलिए वे एक साम्राज्य स्थापित करने में समर्थ हुए।

भारत का राष्ट्रत्व न तो ब्रिटिश शासन की देन है न ही उस स्थिति में स्वतंत्रता आन्दोलन की। न ही वह भारत के संविधान से उपजा है। वास्तव में तो स्वयं स्वतंत्रता आन्दोलन स्वराज के लिए संघर्ष की अग्नि प्रदीप्त करने हेतु जागृत हुई राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति थी। भारत के संविधान में वस्तुत: उस प्राचीन राष्ट्र को मान्य किया है जो इस भूमि में हजारों वर्षों से विद्यमान रहा है। जब संविधान में गोरक्षा को निवेश सिध्दांतों में शामिल किया गया तो यह उस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्वीकारोक्ति थी जो उस राष्ट्र के जीवन का प्राण है।

सामान्यत: हिन्दुस्तान में पिछले 50 सालों में हम साम्प्रदायिक तनाव को दूर नहीं कर पाए। 1947 में तो भयंकर रक्तपात हुआ था और 1947 में रक्तपात होने के बावजूद हमने भारत का जो संविधान बनाया, वह भारत के लिए गर्व की बात है, बहुत गर्व की बात है। ऐसे समय में, जब देश का विभाजन हुआ, जिस विभाजन के लिए महात्मा गांधी ने कहा था कि यह तो पाप है; महात्माजी ने कहा था कि यह तो मेरी मां की हत्या है, एक प्रकार से मातृहत्या है, मेंडीसाइट है। बावजूद इस बात के कि हिन्दुस्तान का बंटवारा धार्म के आधार पर हुआ किन्तु हिन्दुओं का बहुमत कहां है। मुसलमानों का बहुमत कहां है और बावजूद इसके कि हमारे पड़ोसी देश में जिसने कहा कि अगर अखंड हिन्दुस्तान रहेगा तो देश के मुसलमान हिन्दुओं के गुलाम बन कर रहेंगे। This was the thesis और उन्होंने कहा कि इसलिए हमको अलग राष्ट्र चाहिए, अलग राज्य चाहिए, अलग राज्य उन्होंने बना लिया और उस राज्य को इन्होंने इस्लामिक राज्य भी घोषित किया। इन बातों के बावजूद 1950 में जो संविधान स्वीकार किया, वह संविधान उस समय के हमारे नेतृत्व के लिए गर्व की बात है, सम्पूर्ण भारत के लिए गर्व की बात है। उस समय उस संविधान को स्वीकार करना, जिसको हम सैकुलर कहते हैं, जबकि उस समय सैकुलर शब्द का प्रयोग संविधान निर्माताओं ने अपने संविधान में किया भी नहीं था लेकिन सैकुलरिज्म की जो कल्पनाएं हैं वे हमने अपने संविधान के प्रावधानों में लिख दी और तब से लेकर आज तक कोई कुछ कहे हमने मज़हबी राज्य को कभी स्वीकार नहीं किया, न करेंगे और हमारे ऊपर सबसे ज्यादा आरोप लगता है इसलिए हमने कहा कि हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा, हमारे इतिहास का हिस्सा है India's polity, Indias political thinkers haveAlways rejectedA theocratic state. मज़हबी राज्य को हमने कभी स्वीकार नहीं किया, न 1950 में किया, न अब कर रहे हैं, न आगे करेंगे। इस तथ्य को समझ कर लोग चले और जो इससे सहमत नहीं वे मेरी भी आलोचना करते हैं। मैंने जो शब्द प्रयोग किया उसका मेरे ऊपर उपयोग किया गया, चाहे वह बाद में उन्होंने कहा कि हमसे गलती हो गई, हमको नहीं करना चाहिए। उसका कारण यह है कि अगर आप हिन्दू शब्द कहते ही चिढ़ जाएंगे और कहेंगे कि आप गलत बात कर रहे हो तो फिर आप सही नहीं कह रहे हैं जो व्याख्या हिन्दुत्व की सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में की है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है-
"The words Hinduism or HindutvaAre not confined only to the strict Hindu religious practices unrelated to the cultureAnd ethos of the people of India depicting the way of life of the Indian people,AndAre not confined merely to describe persons practising the Hindu religionAsA faith." इसका कोई अर्थ, यदि कोई दे तो उसे देने दीजिए, लेकिन हमारे लिए थियोक्रेटिक स्टेट स्वीकार नहीं है और न हिन्दुत्व एक ऐसा शब्द है जिसको सुनकर ही तथाकथित बुध्दिजीवी कहेंगे कि यह तो संकीर्ण है, यह तो बिगेट्री है, यह तो ऐसा है, यह तो वैसा है। नि:सन्देह उनके भय के मूल में अल्पसंख्यकवाद पर आधारित छद्म पंथनिरपेक्षता की राजनीति के कारण उत्पन्न जनक्षोभ भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इस राष्ट्रवाद की आधार हमारी संस्कृति और विरासत है। हमारे लिए ऐसे राष्ट्रवाद का कोई अर्थ नहीं है जो हमें वेदों, रामायण, महाभारत, गौतमबुध्द, भगवान महावीर, आदि शंकराचार्य, गुरूनानक, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज, रानी लक्ष्मीबाई, स्वामी दयानंद, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, जय प्रकाश नारायण और असंख्य अन्य राष्ट्रीय अधिनायकों से अलग करता हो। यह राष्ट्रवाद ही हमारा धर्म है।

इस प्रकार हिन्दुत्व एक एकात्मवादी सिध्दांत है। यह भारत की आत्मा की रक्षा और उसे पुन: ऊर्जावान बनाने का सामूहिक उद्यम है। यह एक ऐसा सकारात्मक प्रयास है जो किसी भी एक वर्ग को दूसरे की कीमत पर लाभ उठाने की शर्मनाक कोशिशों को रोकता है। हिन्दुत्व है अनुशासन और आत्मानुशासन।

केवल भारतीय राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक अवधारणाओं में निहित अनंत शक्ति को मान्य करके ही अलगाववादी ताकतें खत्म कर राष्ट्र को एकजुट किया जा सकता है। यह बात गौण है कि आप सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की इस अवधारणा को कैसे बताते हैं- हिन्दुत्व के रूप में या भारतीयता के रूप में। मूल तत्त्व तो एक ही है। केवल भारतीय राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक अवधारणाओं में निहित अनंत शक्ति को मान्य करके ही अलगाववादी ताकतें खत्म कर राष्ट्र को एकजुट किया जा सकता है। यह बात गौण है कि आप सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की इस अवधारणा को कैसे बताते हैं- हिन्दुत्व के रूप में या भारतीयता के रूप में। मूल तत्त्व तो एक ही है।
(सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पुस्तक से साभार)

हिन्दुत्व: हमारी राष्ट्रीय संस्कृति


अटल बिहारी वाजपेयी
समुद्र का दृश्य और उसकी लहरों का संगीत किसी भी व्यक्ति के मन में शाश्वत और अनन्त शक्ति के प्रति सहज ही जिज्ञासा पैदा कर सकता है। लेकिन मेरा मन भारत की ओर लौटता है। हमारी मातृभूमि के तट से इतिहास की कितनी ही लहरें टकरा गई। इसके विशाल क्षितिज पर नए वर्ष के कितने ही सूर्यों का उदय हुआ। हम अपने सांसारिक कार्यों में ही इतने खोये रहते हैं कि हम कभी-कभी यह भी भूल जाते हैं कि हमारी सभ्यता कितनी प्राचीन और महान है, उसमें कितना स्थायित्व है और उसमें अपने आपको नयेपन में ढालने की कितनी अपार क्षमता है। एक ऐसी सभ्यता जो अजेय है, सर्व समावेशक है, इतिहास की लहरों द्वारा लाये गये सभी सकारात्मक प्रभावों को अपने में समाहित करती रही है।

मुझे स्वामी विवेकानन्द के वे शब्द याद आ रहे हैं जो उन्होंने अपने निबंध '' भारत का भविष्य'' में कहे थे; '' यह वही भारत है जो सदियों से सैकड़ों विदेशी आक्रमणों के आघातों को, अनेक आचार-व्यवहारों और रीति-रिवाजों के उथल-पुथल को झेलता आया है। यह वही भारत है जो अपनी अनन्त शक्ति, अनश्वर जीवन के साथ विश्व में किसी भी चट्टान से अधिक मजबूती के साथ खड़ा है। इसके जीवन का वही स्वरूप है जो आत्मा का होता है, जिसका न तो आदि है और न अंत, जो शाश्वत है और हम ऐसे ही देश की संतानें हैं।''







मुझे स्वामी विवेकानन्द के वे शब्द याद आ रहे हैं जो उन्होंने अपने निबंध '' भारत का भविष्य'' में कहे थे; '' यह वही भारत है जो सदियों से सैकड़ों विदेशी आक्रमणों के आघातों को, अनेक आचार-व्यवहारों और रीति-रिवाजों के उथल-पुथल को झेलता आया है। यह वही भारत है जो अपनी अनन्त शक्ति, अनश्वर जीवन के साथ विश्व में किसी भी चट्टान से अधिक मजबूती के साथ खड़ा है। इसके जीवन का वही स्वरूप है जो आत्मा का होता है, जिसका न तो आदि है और न अंत, जो शाश्वत है और हम ऐसे ही देश की संतानें हैं।''

हमारी प्राचीन सभ्यता की तरह हमारी विविधता भी भारत की महानता - और इस राष्ट्र के प्रति भारतीयों में गर्व की भावना का स्रोत है। विदेशी लोग हमेशा आश्चर्य प्रकट करते हैं कि हमारे देश में धर्म, जाति, भाषा और जीवन-शैली में इतनी अधिक विविधता होते हुए भी, हम एक राष्ट्र कैसे बने हुए हैं ? जो बात वे समझ नहीं सकते और जिसे हमें भी कभी नहीं भूलना चाहिए, वह है - विविधता के साथ रहना और एक-दूसरे के साथ एकता और सामंजस्य का ताना-बाना बुनना। अनंतकाल से सम्पूर्ण भारत की एक जीवन-पद्वति रही है। यह बात गोवा के सम्बंध में भी उतनी ही सत्य है जितनी गुजरात के बारे में, जम्मू और कश्मीर के बारे में जितनी सत्य है उतनी ही केरल के बारे में और मणिपुर के सम्बंधा में जितनी सत्य है उतनी ही मधय प्रदेश के बारे में।

समय-समय पर विविधता में एकता को लेकर गंभीर बहस और यहां तक कि विवाद भी छिड़ जाते हैं। मैं यहां दो विशिष्ट विचारों पर टिप्पणी करना चाहता हूं जिन पर गुजरात चुनावों के बाद जोर-जोर से चर्चा हो रही है। एक तरफ, पंथ-निरपेक्षता को इस सोच के आधार पर हिन्दुत्व के विरूद्व खड़ा किया जा रहा है कि दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं। यह गलत और अनुचित है। पंथ-निरपेक्षता राज्य-व्यवस्था की वह अवधारणा है जिसमें सभी धार्मों का सम्मान किया जाता है तथा नागरिकों के साथ उनकी धार्मिक आस्थाओं के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। भारत शुरू से ही पंथ-निरपेक्ष रहा है। हमने पंथ-निरेपंक्षता पर प्रतिबद्व रहना तब भी स्वीकार किया जग देश का विभाजन हुआ और पाकिस्तान का द्वि-राष्ट्र सिध्दांत के साम्प्रदायिक आधार पर निर्माण हुआ। ऐसा कभी संभव नहीं हुआ होता यदि अधिकांश भारतीय पंथ-निरपेक्ष नहीं होते।

गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने इसकी बहुत अच्छे ढंग से व्याख्या की है '' भारत हमेशा से सामाजिक एकता बनाए रखने का प्रयास करता रहा है जिसमें विभिन्न मतावलम्बियों को अपना अलग अस्तित्तव बनाए रखने की पूरी आजादी भी होते हुए एकजुट रखा जा सके। यह बंधान जितना लचीला है उतना ही परिस्थितियों के अनुरूप इसमें मजबूती भी है। इस प्रक्रिया से एक एकात्मक सामाजिक संघ की उत्पत्ति हुई जिसका सामूहिक नाम ' 'हिन्दुइज्म' है।''

हिदू दर्शन द्वारा पंथों की विविधाता की स्वीकार्यता भारतीय सेक्युलरिज्म का मूल-सत्व रहा है। महर्षि अरविंद ने इसे इन शब्दों में व्यक्त किया है: ''भारतीय धर्म की अवधारणा में हमेशा यह महसूस किया गया है कि चूंकि मनुष्यों के विचारों, स्वभाव और बौद्विक ज्ञान में असीमित विविधताएं होती हैं, अत: हर व्यक्ति को अपने विचार अभिव्यक्त करने और ईश्वर की अपने ढंग से पूजा-अर्चना करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।

दूसरी तरफ, हिन्दुत्व, जो मानव जीवन का विराट दर्शन प्रस्तुत करता है, को कुछ लोगों द्वारा एक संकीर्ण, कट्टर तथा चरमपंथी रूप में पेश किया जा रहा है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण और अस्वीकार्य व्याख्या है जो इसके सही अर्थ के बिल्कुल विपरीत है। हिन्दुत्व सम्पूर्ण सृष्टि को समग्र रूप से समझने की दृष्टि है जो इस लोक तथा परलोक, दोनों के लिए रास्ता दिखाता है। यह व्यक्ति और समाज तथा मनुष्य की भौतिक तथा आधयात्मिक जरूरतों के बीच अटूट सम्बंधों पर बल देता है। हिन्दुत्व उदार है, उदात्त है, मुक्तिगामी है। यह किसी भी आधार पर विभिन्न समुदायों के बीच कोई दुर्भावना, घृणा अथवा हिंसा को बर्दाश्त नहीं करता है।

पांच हजार वर्ष पुरानी संस्कृति और सभ्यता का यह राष्ट्र है। इसलिए जब संविधान परिषद बैठी थी और सेकुलरवाद या सेकुलरवाद की भावना के प्रश्न पर चर्चा हो रही थी, उस समय भी सेकुलर का अर्थ क्या है, इसके बारे में अलग-अलग राय थी। लेकिन संविधान के निर्माताओं ने सेकुलर शब्द संविधान में नहीं रखा। संविधान की प्रस्तावना में सेकुलर शब्द उस समय आया, जब देश में इमर्जेंसी लगी थी और कई लोग जेलों में बंद थे। विचार व्यक्त करने की आजादी नहीं थी। उस समय संविधान में संशोधन किया गया। उससे पहले धारणा यह थी कि प्रस्तावना में संशोधन नहीं होना चाहिए। होगा भी नहीं, मगर प्रस्तावना में संशोधान कर दिया गया और भारत को डेमोक्रेटिक रिपब्लिक के साथ-साथ सेकुलर एंड सोशलिस्ट रिपब्लिक भी घोषित कर दिया गया।

हमारा सेकुलरिज्म पश्चिम के सेकुलरिज्म से भिन्न होगा। उन्होंने कहा था कि यह बहुधर्मों का देश है और सेकुलरिज्म का अर्थ है कि किसी भी धर्म के मानने वाले के साथ भेदभाव न हो और सब धर्मों को समान दृष्टि से देखा जाये। हम इस व्याख्या को हृदय से स्वीकार करते हैं। यह हिन्दू चिंतन का निचोड़ हैं। यह हमारी अस्मिता है क्योंकि भारत में अनेक मत हैं अनेक मतांतर हैं। केवल एक पुस्तक नहीं है, एक पैगम्बर नहीं है। यहां ईश्वर को मानने वाले भी है और ईश्वर की सत्ता को नकारने वाले भी है। यहां किसी को सूली पर नहीं चढ़ाया गया और न किसी को पत्थर मारकर दुनिया से उठाया गया। यह सहिष्णुता इस देश की मिट्टी में है '' एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति' अब तो दर्शन उससे भी आगे चला गया है। यह अनेकांतवादी देश है।
इस देश में कभी मजहबी राज्य की मांग नहीं उठी। इस देश मे कभी मजहब के आधार पर, मत भिन्नता के आधाार पर उत्पीड़न की बात नहीं उठी, न उठेगी, न उठनी चाहिए।

मुझे याद है कि देश के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू अलीगढ़ विश्वविद्यालय में भाषण करने के लिये गये थे। दीक्षांत समारोह था। उनके भाषण का एक अंश है-
''मैं कह चुका हूं कि मुझे अपनी विरासत एवं अपने पूर्वजों पर बड़ा गर्व है, जिन्होंने भारत को ज्ञान एवं सांस्कृतिक उत्कर्ष पर पहुंचाया। इस अतीत के बारे में आप कैसा महसूस करते है? क्या आप इसमें अपने आपको हिस्सेदार महसूस करते हैं और इसका वारिस महसूस करते हैं और किसी बात पर गर्व महसूस करते हैं जो उतनी ही आपसे संबधित है, जितनी मुझसे या इससे अलग महसूस करते हैं? क्या यह अजनबी सरसराहट जो यह महसूस करने से आती है कि हम इस विशाल खजाने के वारिस हैं, न्यासी हैं- या बिना समझदारी से ही? आप एक मुसलमान है और मैं एक हिन्दू। हम अलग-अलग धार्मिक विश्वास रख सकते हैं और कोई भी धार्मिक विश्वास न रखें, उससे हमारी विरासत समाप्त नहीं होती जो आपकी भी उतनी ही है, जितनी मेरी। अतीत हमें एक सूत्र में बांधाता है, जबकि वर्तमान और भविष्य हमें विभाजित करता हैं।''

अपने अंतिम दस्तावेज में नेहरू जी ने जो कुछ लिखा है और आज पाठय-पुस्तकों का विषय बन गया है, सबको फिर से पढ़ने की जरूरत है। नेहरू जी पर कोई पुरातनपंथी होने का आरोप नहीं लगा सकता, लेकिन नेहरू जी ने उस विश्वास की बात की है कि हम अपने दिमाग खुले रखते हैं, हम खिडकियां खुली रखते हैं। मगर यह भी कहा है कि हम अपने पांव पर मजबूती से खड़े रहते हैं। कामन इनहेरिटेंस इसकी स्वीकृति है? क्या जो अतीत है, उसमे अभिमान है?

बहुत से विदेशी यहां आये, लोगों को शरण मिली। हमने निर्दोष आने वालों को, उजड़ कर आने वालों को वापस नहीं भेजा। भारत माता की गोद में सबको जगह मिली। जो अपना देश छोड़ कर उत्पीड़न के शिकार होकर यहां आये, उन्हें जगह मिली। भारत में पहली मस्जिद हिन्दू राजा की अनुमति से केरल में बनी, भारत में पहला चर्च भी केरल में बना, वही भी अनुमति से। यह हमारे रक्त में हैं। यह जीवन की घुट्टी में है। मजहब के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। सबको छूट होनी चाहिए। सबके साथ बराबर व्यवहार होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। बराबर व्यवहार नहीं हो रहा है। इसलिये कठिनाई पैदा हो रही है। इसलिये लोगों के मन में शंकाए पैदा हो रही है।

इस देश में हिन्दू बहुत संख्या में हैं, मगर उनमें एक माइनिरिटी काम्पलेक्स जैसा विकसित हो रहा है। माइनिरिटी में अगर काम्पलेक्स हो तो मैं समझ सकता हूं कि जो संख्या में कम हैं वे संरक्षण की बात करें। संरक्षण मिलना चाहिए। यह राजधर्म है और इसलिये जहां हम राष्ट्र की सुरक्षा पर बल देते हैं, वहां इस बात पर भी बल देते हैं, कि देश के भीतर हर नागरिक की जान माल इज्जत की और धर्म की हिफाजत होनी चाहिए। (मेरी संसदीय यात्रा पृष्ठ क्र. 52,53,54, 55)

हमें हिन्दुत्व की उस सही पहचान को परिपुष्ट करके और बढ़ावा देने की जरूरत है जो भविष्योन्मुखी है, न कि पीछे का मुकाबला करने के लिये सक्षम बनाता है, न कि पुरानी लीक पर ही अटकी रहने वाली, जो सुधारवादी है न कि उस रूढ़िवाद, अन्याय की हिमायत करने वाली जिसके विरूद्व विगत में सभी समाज सुधारकों ने संघर्ष किया था। यदि इस प्रबुद्व हिंदुत्व को समझा जाये और इसका अनुकरण किया जाये, जैसा कि स्वामी विवेकानन्द और अन्य महान देशभक्तों ने प्रतिपादित किया है, तो हिन्दुत्व के बारे में वर्तमान में चल रहा विवाद पूर्णतया अनावश्यक दिखाई देगा।
ऐसे हिन्दुत्व तथा भारतीयता में कोई अंतर नहीं है क्योंकि दोनों ही एक चिंतन को अभिव्यक्त करते है। दोनों ही इस बात पर जोर देते है कि भारत सभी का है और सभी भारत के है। इसका तात्पर्य यह है कि सभी भारतीयों के समान अधिकार हैं और उनकी जिम्मेदारियां भी समान हैं। यह हमारी सामूहिक राष्ट्रीय संस्कृति जो भारत की सभी विभिन्न धार्मिक तथा गैर-धार्मिक परम्पराओं से समाविष्ट है, की पहचान को दर्शाता है। सदियों से दोनों ही समान रूप से हमारी राष्ट्रीय पहचान को परिलक्षित करते आये हैं। यहां तक कि उच्चतम न्यायालय ने ही यह माना है कि हिन्दुत्व न तो कोई धार्मिक अवधारणा है न ही राजनीतिक बल्कि यह हमें जीवन का उदात्त एवं उन्नत मार्ग दिखाता है। यही भारतीयता है जिसका हमें गुणगान करना है तथा इसे और मजबूत बनाना है।

Thursday, February 5, 2009

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : भारत के भविष्य का आधार



डॊ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी
भारतीयता का अर्थ है भारत की समग्र परम्परा, भारत-वर्ष का सामाजिक, सांस्कृतिक इतिहास, भारत-वर्ष की पुरातन, अधुनातन पृष्ठभूमि, भारत-वर्ष की संवेदना, भारत वर्ष की कला, भारत-वर्ष का साहित्य। इन सबमें एक ही भाव है जो भारत-वर्ष के प्राचीन दर्शन व भारत के अध्‍यात्म को जीवन से जोड़ता है। मेरी दृष्टि में भारतीयता पूरे इतिहास का निचोड़ है, हमारे दर्शन का निचोड़ है, हमारे जीवन के आदर्शों का प्रतीक है। भारतीयता एक ऐसी चीज है जिसे पहचाना तो जा सकता है, महसूस भी किया जा सकता है किन्तु उसे शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता।

मैंने अपनी पुस्तक 'भारत और हमारा समय' में लिखा है कि भारतवर्ष एक सनातन चिंतन, सनातन विचार, सनातन दृष्टि, सनातन आचार और सनातन यात्रा-पथ भी है। मैं मानता हूं कि भारत मात्र एक भूखंड ही नहीं, केवल भौगोलिक इकाई ही नहीं, केवल एक राजनीतिक सत्ता ही नहीं बल्कि मनुष्य की मनुष्यता का अभिषेक है। भारतीयता का अर्थ है पुरातन से अद्यतन का समतामूलक अनुभव किन्तु वर्तमान परिदृश्य में लगता है कि भारतीयता की यह परिकल्पना धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। इसकी अनुभूति मुझे तब और भी गहरी हुई, जब मैं सात वर्ष तक ब्रिटेन का उच्चायुक्त रहने के बाद भारत लौटा। जब लौटा तो मैंने एक बार परिहास में कहा था कि 'बाहर तो मैंने अप्रवासी भारतीय (नॉन रेजिडेन्ट इंडियन्स) कई देखे हैं, उनसे मिलन हुआ है और उसकी भारतीयता से मैं बहुत गहरे तक प्रभावित भी हुआ हूं, किन्तु यहां आकर एक बड़ी दु:खद और दयनीय त्रासदी मुझे दिखाई देती है कि भारत वर्ष में ही कई प्रवासी अभारतीय हैं। सच बात यह है कि आजादी से पहले भी इतनी विकृतियां नहीं थीं जितनी कि आज हैं। हमारी भाषा का, हमारे साहित्य का, हमारी राष्ट्रीयता का जो आत्म सम्मान था, जो प्रतीति थी, जो अस्मिता की अनुभूति थी उसे हम भूलते चले जा रहे हैं। यह एक बड़ी कष्टमय स्थिति है। आने वाली पीढ़ी किस सांस्कृतिक पौष्टिक आहार पर बन रही है? समझ नहीं आता। उसका सांस्कृतिक पौष्टिक बहुत कम भारतीय है। इसका कारण हमारी नीति में कमियां हैं। हमने अपनी शिक्षा नीति में बहुत सारी बातें जोड़ी हैं। हमने बच्चों पर काफी बोझा भी बढ़ा दिया है किन्तु उन सबमें भारतीयता की कमी है। संस्कृत भाषा को ही लें, मेरी संस्कृत में बहुत निष्ठा है और मान्यता है कि संस्कृत भाषा के बिना भारत की सम्पूर्ण अनुभूति जरा मुश्किल से होती है।

आज से लगभग डेढ़ दशक पहले जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने अपनी भाषा नीति प्रकाशित की तो मुझे बहुत कष्ट हुआ था कि इस नीति के चलते तो यहां से संस्कृत लुप्त हो जाएगी क्योंकि उस नीति में संस्कृत वैकल्पिक विषय भी नहीं रखा गया, जिसमें कि अंक दिए जा सकें। जब अंक नहीं दिये जाएंगे तो कोई व्यक्ति इसे पढ़ेगा भी नहीं और विषय के रूप में लेगा भी नहीं। तब मैंने राजीव गांधी से कहा था कि यह नीति देश के लिए सबसे बड़ी दुर्घटना है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया और कहा था कि आपकी बात मेरी समझ में आती है किन्तु अब मैं क्या कर सकता हूं। तब मैंने उनसे कहा था कि अगर आप कुछ नहीं कर सकते तो मैं अदालत में जाऊंगा। मैं इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में ले गया क्योंकि उस समय संस्कृत के कई अध्‍यापकों को बर्खास्त किया जा रहा था। सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगनादेश भी दिया था और अब हमारे पक्ष में निर्णय भी हो गया है किन्तु यह प्रकरण मेरे जीवन की बहुत कष्टपूर्ण घटना रही हैं।

भारतीयता जिसके नाम पर वोट मांगे जाएं, जिसके नाम पर राज्य करे, जिसके नाम पर बड़ी-बड़ी बातें कही जाएं, वह अगर हमारे पूरे कार्य व्यवहार में कहीं न हो, उस लक्ष्य को हम भूल जाएं तो फिर क्या होगा? सच पूछें तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जिसे भारतीयता का पता ही नहीं है आर इसके लिए वह पीढ़ी दोषी नहीं है, दोषी हम हैं, क्योंकि हम उन्हें ऐसे ही संस्कार, ऐसी ही शिक्षा दे रहे हैं, जो नकल को प्रधाानता देती है। हम आधुनिकता के नाम पर दूसरे देशों और उनकी सभ्यता की नकल करने लगे हैं और अपनी जड़ों से, अपनी जमीन से, अपनी संस्कृति से अलग होने लगे हैं, जो समाज, जो देश अपनी जड़ों, अपनी जमीन और संस्कृति से अलग हो जाएगा, वह धीरे-धीरे क्षरित होने लगेगा। यही भय मेरे मन मस्तिष्क पर आतंक बनकर छाया रहता है। मुझे लगता है कि यह स्थिति लेने के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। इस तरह हम अपने आप को दुनिया का द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना रहे हैं। पहले तो यह अंग्रेजों की गुलामी के कारण हुआ किन्तु आज यह गुलामी हम अपने आप पर थोप रहे हैं। इस कारण हम भ्रमित हो गए हैं। हम भारतीयता को हिन्दुत्व को सम्प्रदायों में बांटकर धर्मनिरपेक्षता की बात करने लगे हैं। मेरे विचार में साम्प्रदायिकता बहुत अच्छी चीज है और बहुत बुरी चीज भी है। हमारे यहां सम्प्रदाय का अर्थ यह है कि अलग-अलग प्रकार हैं, अलग-अलग पंथ है, जिनको भारत स्वीकार करता है। अलग-अलग पंथों को स्वीकार करना या न करना ठीक है किन्तु राज्य किसी भी पंथ का नहीं है। इसी संदर्भ में यह कहना होगा कि हमने पंथनिरपेक्ष कहने की बजाय 'धर्मनिरपेक्ष' कहना शुरू कर दिया है और जो राज्य, जो समाज, धर्म से निरपेक्ष हो जाता है उसका तो कोई भविष्य ही नहीं है। धर्म का अर्थ है कर्तव्य, धर्म का अर्थ है सौहार्द्र। अब यदि हम अपने कर्तव्य से निरपेक्ष हो गए तो समाज का क्या होगा।



यदि किसी एक शब्द को देश निकाला दिया जाए तो मैं इस 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द को देश निकाला देना चाहूंगा। मुझे तो इस शब्द के लिए लड़ना पड़ा है। मैंने श्रीमती गांधी से कहा भी था कि संविधान में धर्मनिरपेक्ष का अनुवाद 'सेकुलर' किया गया है, जो स्वीकार करने योग्य नहीं है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया। अब हमारे संविधान का जो अधिकृत अनुवाद है उसमें 'सेकुलर' के लिए पंथनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग किया गया है।

यदि किसी एक शब्द को देश निकाला दिया जाए तो मैं इस 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द को देश निकाला देना चाहूंगा। मुझे तो इस शब्द के लिए लड़ना पड़ा है। मैंने श्रीमती गांधी से कहा भी था कि संविधान में धर्मनिरपेक्ष का अनुवाद 'सेकुलर' किया गया है, जो स्वीकार करने योग्य नहीं है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया। अब हमारे संविधान का जो अधिकृत अनुवाद है उसमें 'सेकुलर' के लिए पंथनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग किया गया है।

हिन्दू होना सम्प्रदायवादी होना कतई नहीं है। मुसलमान होना संप्रदायवादी होना नहीं है। किसी भी मत-पंथ का होना संप्रदायवादी होना नहीं है किन्तु अगर हम उसमें कट्टर होकर अन्यों के प्रति विद्वेषी हो जाएं तो वह गलत है। भारत वर्ष की सभ्यता कट्टरपन नहीं सिखाती। हिन्दू धार्म की परम्परा का आधार सहिष्णुता है। कट्टर होना सम्प्रदायवाद हो सकता है किन्तु अगर हम अपनी अस्मिता को मानते हैं और अलग-अलग उन पंथों को जानते हैं, जो हमारे देश को बनाते है तो वह इन्द्रधनुषी छटा है। हमारा देश एक इन्द्रधनुष है, उस इन्द्रधनुष की संभावना इसीलिए हुई कि भारत वर्ष में सदैव सहिष्णुता का साम्राज्य रहा। भौगोलिक अखंडता हमारा नागरिक कर्तव्य है और वह हमारी संस्कृति और राजनीति से अलग नहीं है किन्तु उससे भी कहीं परे, उससे भी कहीं अधिक एक अपेक्षित है राष्ट्रीयता से ओतप्रोत एक दृष्टि! राष्ट्रीयता से ओतप्रोत दृष्टि का अर्थ है भारत के लाखों-करोड़ों लोगों में अंतर्निहित, अंतर्भूत सम्बंध, उनके प्रति प्रतिबद्वता, उनके प्रति सेवा की भावना-सम्पर्क, सहयोग और संस्कार ये चारों हमारी संस्कृति के मूल मंत्र हैं। इस मूल मंत्र को मानते हुए अगर हम राष्ट्रीय जीवन का निर्माण करें और राष्ट्र के प्रति भक्ति, राष्ट्र के प्रति निष्ठा, श्रद्वा को लेकर चलें, तो हमारे राष्ट्रीय जीवन में एक नया अध्‍याय निश्चित रूप से शुरू हो सकता है। मुझे आशा है कि यह होगा। लेकिन यह तभी होगा जब हम इसके लिये प्रयत्न करें।

आज कई तरह के खतरे हमारे ऊपर मंडरा रहे हैं। ये खतरे बौध्दिक भी हैं और सांस्कृतिक भी। सांस्कृतिक खतरा कोई भौगोलिक खतरे से कम नहीं होता। भाषा का लुप्त हो जाना कोई कम खतरा नहीं है। अपने पंथों अथवा संप्रदायों की जानकारी न होना भी एक खतरा है। अपनी मान्यताओं के लिये निष्ठा न होना और भी बड़ा खतरा है। ये सब खतरे भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जिस देश को नष्ट करना हो, उसकी संस्कृति नष्ट कर दीजिये, उसकी भाषा नष्ट कर दीजिये, अपने आप वह समाज और जाति नष्ट हो जायेगी। हममें इतनी सामर्थ्य तो है कि हम इन खतरों का सामना कर सकें किन्तु इसके लिये इच्छाशक्ति होनी चाहिए, संकल्प होना चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने भी यही कहा था कि हमारे यहां सामर्थ्य की कमी नहीं है। संभावनाओं की हमारे यहां कमी नहीं है। कमी है संकल्प की, कमी है समर्पण की। ये सब भावनाएं जगाने के लिये हमें अभियान चलाना होगा। इसके लिये लोगों को तैयार करना होगा। हममें से बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो इस बात को जानते हैं और तरीके से इसे आगे बढ़ा भी रहे हैं। एक-एक दीप से हजारों-लाखों दीप जल जाते हैं और ऐसे दीप जलेंगे इसे कोई रोक नहीं सकता।

भारतवर्ष का भविष्य अभी बनना है और वह भविष्य सांस्कृतिक दृष्टि पर आधारित होगा, भारतीयता पर आधारित होगा। वह सच्चे अर्थों में भारत होगा। संस्कृत में भारत का अर्थ है वह जो ''प्रवाह'' में रत है-प्रवाह के प्रति प्रतिबद्व है, वही भारत है। तो उस दृष्टि से भी हमको भारतवर्ष में अध्‍यात्म और विज्ञान को एक-दूसरे के साथ बांधना होगा, उसे समन्वित करना होगा। हम विज्ञान से अलग नहीं रह सकते। जीवन में जो शक्तियां हैं, उन्हें संकलित करना बहुत आवश्यक है किन्तु संभव नहीं हो रहा है। ऐसा नहीं है कि हममें प्रतिभा नहीं हैं अथवा सामर्थ्य नहीं है। व्यक्तिगत रूप से भारत वर्ष के लोग बहुत प्रतिभाशाली हैं और बहुत कुछ हासिल करते हैं किन्तु संयुक्त रूप से समुदाय और समूह की दृष्टि से अभी तक भारत के प्रति भक्ति और निष्ठा की भावना न होने के कारण हम कुछ हासिल नहीं कर पा रहे हैं, वहां नहीं पहुंच पा रहे हैं जहां पहुंचना चाहिए। इन्हें पाने के लिये हमें भारत को पाने का लक्ष्य अपने सामने रखना होगा। इस लक्ष्य को पाने के लिये रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं चाहे वामपंथ हो अथवा दक्षिणपंथ, चाहे मध्‍यपंथ हो, इन सबको अपना केन्द्र भारत ही बनाना होगा। मेरे विचार से तो सबसे पहले इनका भारतीयकरण होना जरूरी है। उनका भारतीयकरण न होने के कारण हमारी अस्मिताएं क्षीण हो रही हैं, हमारा संकल्प क्षीण हो रहा है, हमारी शक्तियां क्षीण हो रही हैं, हमारा आत्मविश्वास कम होता जा रहा है और जहां आत्मविश्वास खत्म हो जाता है, वहां भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है। पंथ चाहे कोई भी हो, उनमें मतभेद हो सकते हैं, किन्तु राष्ट्र की दृष्टि से कहीं मतभेद नहीं होना चाहिए।
(लेखक प्रसिध्द चिंतक एवं प्रख्यात संविधानविद् थे)

Wednesday, February 4, 2009

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से ही देश अक्षुण्ण रहेगा


विष्णुकान्त शास्त्री
मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं यह नहीं मानता कि 15 अगस्त, 1947 को भारत एक नया राष्ट्र बन गया। सच तो यह है कि ऐसा मानने वाले बहुत विरले हैं।

प्राचीन भारतवर्ष के इतिहास में मनु, रघु, श्रीराम, युधिष्ठिर, अशोक, विक्रमादित्य आदि कुछ ही ऐसे चक्रवर्ती राजा थे जिन्होंने पूरे भारतवर्ष पर शासन किया था। अन्यथा भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग स्वाधीन राज्य थे। हमारा इतिहास साक्षी है कि राजनीतिक दृष्टि से विभिन्न राज्यों में विभक्त होते हुए भी सांस्कृतिक दृष्टि से पूरा भारतवर्ष एक देश माना जाता था। देश के किसी भी कोने में बैठ कर पुण्य कार्य करने वाला व्यक्ति जल को शुध्द करने के लिए देश के विभिन्न भागों में बहने वाली सात पवित्र नदियों का आह्वान करता था, जो परंपरा आज तक चली आ रही है।कांग्रेस के बड़े नेताओं ने भी कभी ऐसा नहीं कहा कि 15 अगस्त 1947 को भारत एक नया राष्ट्र बन गया। स्वाधीनता के लिए जिन वीरों ने संघर्ष किया था उनकी आंखों में स्वदेश का एक चित्र था। लोकमान्य तिलक ने जब सिंह गर्जना की थी कि 'स्वराज्य मेरा जन्मसिध्द अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' तो वे केवल राजनीतिक स्वाधीनता की ही बात नहीं कर रहे थे। अपने 'स्व' का स्पष्टीकरण करने के लिए ही उन्होंने गीता रहस्य की रचना की थी। महात्मा गांधी ने भारतीय स्वराज्य की संज्ञा दी थी 'रामराज्य'।

पंडित जवाहर लाल नेहरू ने स्वाधीनता के बाद 24 जनवरी 1948 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा था ''हमें अपनी उस विरासत और अपने उन पूर्वजों पर गर्व है जिन्होंने भारत को बौध्दिक एवं सांस्कृतिक श्रेष्ठता प्रदान की। आप इस अतीत के बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपको भी यह महसूस होता है कि आप भी इसके साझीदार और उत्तराधिकारी हैं? क्या आप भी उस पर गौरवान्वित होते हैं, जो आपका भी उतना ही है जितना मेरा अथवा आप उसे अपना ही समझते हैं?'' उनको स्पष्ट अपेक्षा थी कि उन सब विद्यार्थियों को भी प्राचीन भारत की उपलब्धियों के लिए गौरव का अनुभव करना चाहिए। इस निरूपण से यह साफ हो जाता है कि स्वाधीन भारत प्राचीन भारत का ही विकसित आधुनिक रूप है।

मैं समझता हूं कि अपने राष्ट्रवाद को परिभाषित करने के पहले हमें अपने पारम्परिक स्वरूप को पहचानना चाहिए। हमें उस स्वरूप को हृदयंगम करना चाहिए जो परिस्थितियों के दबाव में रूपत: बाहर से तो बदलता रहता है किन्तु भीतर से अपरिवर्तित रहा है। हम परम्परा के आधारभूत चिंतन मनन और जीवन में उसके प्रतिफलन को समझने की चेष्टा करें।

राजधर्म और राजनीति
महाभारत में कहा गया है कि धारण करने की शक्ति के कारण धर्म, धर्म होता है। धर्म वही है जो प्रजा धारण करे। अत: निश्चित सिध्दांत यही है कि जो धारण शक्ति से संयुक्त है वही धर्म है। यहीं कुछ चर्चा संस्कृति की भी कर ली जाये। संस्कृति अर्थात् 'सम्यक कृति'। इससे यह ध्‍वनि निकलती है कि जो कृति को सम्यक रूप से सुधार दे वह संस्कृति है। कुछ लोग कहते हैं कि संस्कृति शब्द कल्चर का अनुवाद है। यह ठीक नहीं है। हम जो कुछ करते हैं, जिस प्रकार का वैयक्तिक, पारिवारिक या सामाजिक जीवन जीते हैं, उसको निरन्तर सुधारते रहने की प्रक्रिया ही संस्कृति है।

अपनी संस्कृति की एक आधारभूत विशेषता की ओर आप लोगों का ध्‍यान आकृष्ट करना चाहता हूं। सभी जानते हैं कि अपने अपने उपास्य की उत्कृष्टता सिध्द करने के हठाग्रह के कारण धार्मिक विद्वेष उत्पन्न होता है। भारतीय संस्कृति ने इस विकृति के निराकरण के लिए एक अद्भुत स्थापना की है। ऋग्वेद में कहा गया है कि 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' अर्थात परमसत्ता एक ही है जिसे विद्वान विविधा नामों से पुकारते हैं। अत: इनके लिए विवाद करना व्यर्थ है।

इस मान्यता के कारण भारत में बड़ी हद तक साम्प्रदायिक समरसता बनी रही। सम्राट हर्षवर्धन, शिव, सूर्य और बुध्द तीनों की उपासना करते थे। एक ही परिवार के भिन्न-भिन्न व्यक्ति भिन्न-भिन्न इष्ट देवों की पूजा करते हुए प्रेमपूर्वक साथ-साथ रहते हैं। आचार्य विनोबा भावे ने इसे भारतीय संस्कृति का भेदक लक्षण घोषित करते हुए इसको 'भी वाद' की संज्ञा दी हैं। इसका अर्थ हुआ कि यदि हम सब श्रध्दापूर्वक चल रहे हैं तो भगवान तक मेरा रास्ता भी पहुंचेगा और तुम्हारा तथा उसका रास्ता भी पहुंचेगा। यह 'भी वाद' यदि सभी धर्मावलंबियों द्वारा स्वीकार कर लिया जाए तो धार्मिक संघर्ष का मूलोच्छेद हो जाए। परन्तु अभी इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि विनोबा भावे के अनुसार यहूदी, ईसाई और इस्लाम 'ही वाद' धर्म हैं। यह भी यहां जोड़ दूं कि बाबा विनोबा भावे के अनुसार मार्क्‍सवादी भी 'ही वादी' ही हैं। वे भी सबों पर अपना सिध्दांत थोपने के हठाग्रही हैं।

समग्र मानव जीवन के मंगल का विधान करने वाली हमारी सांस्कृतिक चेतना ने जिस भारतीय समाज और राष्ट्र का निर्माण किया उनमें राजनीति की भूमिका को महत्वपूर्ण तो माना गया है किन्तु उसे सर्वोपरि नहीं माना गया है। धर्मधिष्ठित राजनीति का ही हमारे देश में सम्मान था। भारतीय चेतना ने आदर्श शासक के रूप में श्रीराम को ही स्वीकार किया है, जिनकी प्रशस्ति में कहा गया है, 'रामो विग्रहवान धर्म:' राम तो मूर्तिमान धर्म ही है।

राजनीति कभी सत्यमयी, कभी मिथ्यामयी, कभी कठोर, कभी प्रियभाषिणी, कभी हिंसामयी, कभी दयालु, कभी लोभी, कभी उदार, कभी अत्यंत खर्चीली, कभी अत्याधिक अर्जनशील होती है। राजनीति वस्तुत: कल्याणकारी तभी होती है जब वह सच्चे राजधर्म पर आधारित होती है, जिसका एक प्रधान लक्षण यह है कि राजा पार्थिव व्रत का निर्वाह करे अर्थात् उसी प्रकार बिना किसी भेदभाव के सारी प्रजा का समानभाव से पालन करे जिस प्रकार पृथ्वी सब प्राणियों को समान भाव से धारण करती है। इससे यह स्पष्ट है कि भारतीय धर्म व राज्य को मजहबी राज्य या थियोक्रेटिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसमें जाति, भाषा, उपासना पध्दति आदि के आधार पर जनता में भेदभाव नहीं किया जाता था।

संस्कृतिपरक भारतीय राष्ट्रवाद
यह तथ्य भी उल्लेख्य है कि प्राचीन भारतवर्ष के इतिहास में मनु, रघु, श्रीराम, युधिष्ठिर, अशोक, विक्रमादित्य आदि कुछ ही ऐसे चक्रवर्ती राजा थे जिन्होंने पूरे भारतवर्ष पर शासन किया था। अन्यथा भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग स्वाधीन राज्य थे। हमारा इतिहास साक्षी है कि राजनीतिक दृष्टि से विभिन्न राज्यों में विभक्त होते हुए भी सांस्कृतिक दृष्टि से पूरा भारतवर्ष एक देश माना जाता था। देश के किसी भी कोने में बैठ कर पुण्य कार्य करने वाला व्यक्ति जल को शुध्द करने के लिए देश के विभिन्न भागों में बहने वाली सात पवित्र नदियों का आह्वान करता था, जो परंपरा आज तक चली आ रही है।

यह ठीक है कि राजनीति को कम महत्व देने का दंड भी हम लोगों को भोगना पड़ा है। जब विदेशी शक्तियां राज्यों पर आक्रमण करती थीं तो देश भर के सभी राज्य मिल कर उनका प्रतिरोध नहीं करते थे। फलत: एक-एक करके वे राज्य विपन्न होते रहे और हमें पराधीनता का अभिशाप भोगना पड़ा। अब हम इस ओर भी सावधान रह कर अपने को राजनीतिक दृष्टि से भी अजेय बनायें, यही अभीष्ट है। जो हो, अपने विचारक्रम को ऐतिहासिक दृष्टि से आगे बढ़ाने पर यह लक्षित किया जा सकता है कि जब तुर्क आये, पठान आये, मुगल आये और केन्द्रीय राज्य क्षमता छिन गयी, तब भी हमारी संस्कृति ने ही सारे देश को एक मानने की दृष्टि को अक्षुण्ण रखा।

यह दिवालोक की भांति स्पष्ट है कि धार्मिक कट्टरता को लांघ कर साधाना और साहित्य के क्षेत्र में पठान-मुगल काल में ही भारतीय संस्कृति की उदारता को मुसलमान भाई अपना रहे थे। दाराशिकोह द्वारा उपनिषदों का फारसी अनुवाद करवाना भी इसी धारा की कड़ी है। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि औरंगजेब की मजहबी कट्टरता ने इस धारा को अवरूध्द करना चाहा पर फिर भी मंदगति से ही सही वह धारा प्रवाहित होती रही। संत प्राणनाथजी ने समन्वय की दृष्टि से औरंगजेब को पत्र भी लिखा और अपने सम्प्रदाय में श्रीकृष्ण के निराकार रूप की उपासना का प्रवर्तन किया। संगीत, चित्रकला एवं नृत्य के क्षेत्र में भी आदान प्रदान चलता रहा। यह उदार समन्वयी धारा निश्चय ही भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की गौरवपूर्ण उपलब्धि है।

1857 में अंग्रेजों के विरूध्द छेड़े गये प्रथम स्वाधीनता संग्राम के पूर्व जनसंघर्ष की चेतना जगाने के लिए रोटी के साथ-साथ कमल को प्रतीक के रूप में चुनना, हमारी सांस्कृतिक चेतना के कारण ही संभव हो सका था। इस संग्राम में कंधे से कंधा मिलाकर हिन्दू और मुसलमान अंग्रेजी राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए लड़े थे। दुर्भाग्य से इस स्वातंत्र्य समर के विफल होने के बाद जनता में व्यापक हताशा फैल गयी। राष्ट्र को इस हताशा से उबारने के लिए पुन: एक बार हमारी सांस्कृतिक चेतना ही सक्रिय हुई। राजा राम मोहन राय, श्री रामकृष्ण परमहंस देव, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि दयानन्द सरस्वती, श्री अरविन्द, स्वामी रामतीर्थ आदि महापुरूषों ने भारतीय संस्कृति के उज्ज्वल पक्षों को उभार कर और विकृतियों को नकार कर पुन: देश में नवजीवन का संचार किया। इस सांस्कृतिक जागरण का एक सुफल यह भी हुआ कि पाश्चात्य ज्ञान-विभान और जीवन मूल्यों के अंधानुकरण के अतिरेकों से मुक्त होकर भारतीय प्रबुध्द चित्र ने भारतीय और पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान आदि के स्वस्थ समन्वय पर बल दिया। इस सांस्कृतिक जागरण की फलश्रुति ही थे भारतीय स्वाधीनता के सहिंस और अहिंसा आन्दोलन। आरंभ में इन आन्दोलनों को सभी भारतीयों का समर्थन प्राप्त था। किन्तु कालान्तर में अंग्रेजों की कूटनीति के कारण कट्टरपंथी मुसलमान इनसे कटते गये। दुर्भाग्य की बात है कि ''सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा'' लिखने वाले अल्लामा इकबाल ने पाकिस्तान का बीजारोपण किया और एक समय के हिन्दू मुस्लिम एकता के समर्थक, नरमपंथी नेता कायदे आजम जिन्ना अंग्रेजों की कूटनीति को सफल करते हुए पाकिस्तान के जनक बने। मजहब के आधार पर जिस पाकिस्तान की सृष्टि हुई थी वह 1971 में टूट गया। स्वाधीन बांग्लादेश इस बात का प्रमाण है कि मजहब के नाम पर बने पाकिस्तान की नींव कितनी खोखली थी। बचे-खुचे पाकिस्तान में भी पंजाबी, सिंधी, बलूची, पख्तून, मुहाजिर के भेद उग्र होते जा रहे हैं। मुहाजिरों के नेता अल्ताफ हुसैन ने तो साफ-साफ कह दिया है कि पाकिस्तान का निर्माण ऐतिहासिक भूल थी। इसलिए उसने ''सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा'' फिर से गाना शुरू कर दिया है।

इससे यही शिक्षा लेनी चाहिए कि उपासना पध्दति एवं सामाजिक रीति-नीति की भिन्नताओं के बावजूद साझी भारतीय सांस्कृतिक चेतना को हम लोग और दृढ़ करें।

भारत में बड़ी हद तक साम्प्रदायिक समरसता बनी रही। सम्राट हर्षवर्धन, शिव, सूर्य और बुध्द तीनों की उपासना करते थे। एक ही परिवार के भिन्न-भिन्न व्यक्ति भिन्न-भिन्न इष्ट देवों की पूजा करते हुए प्रेमपूर्वक साथ-साथ रहते हैं। आचार्य विनोबा भावे ने इसे भारतीय संस्कृति का भेदक लक्षण घोषित करते हुए इसको 'भी वाद' की संज्ञा दी हैं। इसका अर्थ हुआ कि यदि हम सब श्रध्दापूर्वक चल रहे हैं तो भगवान तक मेरा रास्ता भी पहुंचेगा और तुम्हारा तथा उसका रास्ता भी पहुंचेगा। यह 'भी वाद' यदि सभी धर्मावलंबियों द्वारा स्वीकार कर लिया जाए तो धार्मिक संघर्ष का मूलोच्छेद हो जाए। परन्तु अभी इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि विनोबा भावे के अनुसार यहूदी, ईसाई और इस्लाम 'ही वाद' धर्म हैं। यह भी यहां जोड़ दूं कि बाबा विनोबा भावे के अनुसार मार्क्‍सवादी भी 'ही वादी' ही हैं। वे भी सबों पर अपना सिध्दांत थोपने के हठाग्रही हैं।मध्‍ययुग में राजनीति की उपेक्षा करने का भरपूर दण्ड हम लोग भोग चुके हैं अत: अब राजनीतिक आवश्यकताओं के प्रति भी पूर्णत: सजग रहना होगा। खासकर इस बात का ध्‍यान रखना होगा कि देश में बलिष्ठ राज्यों के साथ-साथ केन्द्र भी भरपूर बलिष्ठ हो जिससे हमारी सीमाओं पर कारगिल के सदृश अनुप्रवेश करने का दुस्साहस करने वालों को उचित सबक सिखाया ज

एकात्म भारतीय संस्कृति
संसार का कोई भी देश ऐसा नहीं है जिसकी संस्कृति ने दूसरे देशों की संस्कृतियों से आदान-प्रदान न किया हो। आधुनिक युग में यह प्रक्रिया और भी तेज हो गयी है। फिर भी दुनिया का कोई दूसरा देश ऐसा नहीं है जो अपनी संस्कृति को सामासिक संस्कृति कहता हो। अत: हमें अकुंठ चित्त से अपने देश की संस्कृति को सीधे भारतीय संस्कृति ही कहना चाहिए।

(एकात्म मानववाद अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान, नई दिल्ली द्वारा आयोजित सेमिनार में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री द्वारा दिए गए भाषण से संकलित है।)

Tuesday, February 3, 2009

राष्ट्र को जोड़ने का मंत्र है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद


राजनाथ सिंह
इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता कि भारत एक राष्ट्र के रूप में सदियों पहले विकसित हुआ था। प्राचीन काल में भारत की एक राष्ट्र के रूप में मान्यता थी। 'राष्ट्र' और 'राज्य' शब्द के अन्तर को पहचानने में भारी भूल हो गयी। अंग्रेजी के शब्द 'नेशन' का अनुवाद हिन्दी में राष्ट्र कर दिया गया जबकि 'राष्ट्र' एक विशुध्द सांस्कृतिक अवधारणा है। 'राज्य की सीमाओं को लांघ कर उत्तर के हिमालय से लेकर दक्षिण के सागर तट तक 'राष्ट्र' की भावना सदियों पहले विकसित हुई। हमारा वैचारिक दृष्टिकोण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत हैं। इस देश की एकता विद्रोहियों के बार-बार अतिक्रमण के बावजूद कभी केन्द्रित नहीं हुई। वह इस कारण संभव हो सका, क्योंकि इस देश में राजनीतिक एकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एकता थी। भारत पूरे संसार में एक मात्र भू-सांस्कृतिक राष्ट्र है। जिन देशों की एकता राजनैतिक कारणों से थी, वे बिखर कर अलग-अलग हो गये।मध्‍यकाल में भी भारत की एक राष्ट्र के रूप में पहचान बनी रही। परन्तु अंग्रेजों ने यहां आने के बाद भारत की एक राष्ट्र के रूप में पहचान को धुंधला करने का प्रयास किया। उनके इतिहासकारों ने कहा ''भारत एक राष्ट्र कभी नहीं था। अंग्रेजों के आने के पश्चात् वह एक राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है। अंग्रेजों द्वारा दी गयी शिक्षा के प्रभाव में आकर कुछ भारतीयों ने भी यह कहना शुरू किया कि ''भारत देश एक राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है।''

यहां पर उनसे 'राष्ट्र' और 'राज्य' शब्द के अन्तर को पहचानने में भारी भूल हो गयी। अंग्रेजी के शब्द 'नेशन' का अनुवाद हिन्दी में राष्ट्र कर दिया गया जबकि 'राष्ट्र' एक विशुध्द सांस्कृतिक अवधारणा है। 'राज्य की सीमाओं को लांघ कर उत्तर के हिमालय से लेकर दक्षिण के सागर तट तक 'राष्ट्र' की भावना सदियों पहले विकसित हुई। हमारा वैचारिक दृष्टिकोण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत हैं। इस देश की एकता विद्रोहियों के बार-बार अतिक्रमण के बावजूद कभी केन्द्रित नहीं हुई। वह इस कारण संभव हो सका, क्योंकि इस देश में राजनीतिक एकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एकता थी। भारत पूरे संसार में एक मात्र भू-सांस्कृतिक राष्ट्र है। जिन देशों की एकता राजनैतिक कारणों से थी, वे बिखर कर अलग-अलग हो गये।

इस राष्ट्रीय भावना का हजारों वर्ष पहले भारत की धरती पर अंकुरण हुआ। भारतीय राजनीति की भावी दिशा तय करने में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो चली है। भारतीय अस्मिता उसकी संस्कृति से जुड़ी है और इस तथ्य को आत्मसात किये बिना विश्व बिरादरी में भारत की अपनी पहचान नहीं हो सकती। आयातित मूल्य, आयातित विचार इन सबसे भारत का कल्याण नहीं हो सकता क्योंकि विकास का मजबूत ढांचा देश की भूमि से जुड़ने पर ही खड़ा हो सकता है। यह जुड़ाव वहां की संस्कृति ही दे सकती है। तब बनेगा गांधीजी और दीनदयालजी के सपनों का भारत और तभी आयेगा 'राम राज्य'। यही कारण था जब भगवान राम को चौदह वर्ष का वनवास मिला तो उन्होंने अयोध्‍या के आसपास के जंगलों में वास करने की अपेक्षा उत्तर से सूदूर दक्षिण तक की यात्रा करके भारत की एकता का संदेश दिया। इसी तरह भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ। उन्होंने अपना राज्य गुजरात में द्वारका में स्थापित किया और महाभारत के युध्द में कुरूक्षेत्र की समरभूमि पर गीता का उपदेश दिया। ऐसे भगवान कृष्ण की रथ यात्रा पूर्व में जगन्नाथ पुरी में होती है और दक्षिण में तिरूमाला की पहाड़ियों पर भगवान व्यंकटेश के रूप में पूजा जाता है।

भगवान राम और कृष्ण इस देश के प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में निवास करते हैं और वे हमारी 'राष्ट्रीय' चेतना के दो प्रतीक हैं। इसी तरह भगवान शिव की आराधना दक्षिण में रामेश्वरम् से लेकर उत्तर में काशी तक होती है। पूरे भारत में बनी राष्ट्रीय चेतना की पहचान कर केरल में जन्में जगद्गुरु शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों पर चार धामों की स्थापना कर भारतीय राष्ट्रीय चेतना को आकार देने का प्रयास किया। कहने का आशय यह है कि मात्र भगवान श्री श्रीकृष्ण का स्मरण करने से हम अपने आप में पूरे भारत के साथ जुड़ जाते हैं। इसी तरह मर्यादा पुरुषोत्ताम श्री राम का जीवन चरित्र प्रमुखता से उनका 14 वर्षों का वनवास क्षेत्र हमारी सांस्कृतिक एकता का परिचायक है।

कश्मीर घाटी में श्रीनगर के पास एक मंदिर है जिसे 'शंकराचार्य' के नाम से वहां के लोग जानते हैं। यदि भारत एक सांस्कृतिक इकाई नहीं थी तो शंकराचार्य को केरल से आगे निकल कर कश्मीर घाटी तक जाने की क्या आवश्यकता थी? कारण स्पष्ट है कि उत्तर से लेकर दक्षिण तक उन्हें एक ही चेतना दिखाई पड़ी जिसे हम भारतीयता, राष्ट्रीयता या हिन्दुत्व कोई भी नाम दे सकते हैं।

भारत की धमनियों में एक अदृश्य चेतना बहती है और वह चेतना इतनी प्रेरक है कि जहां बड़े से बड़ा व्यक्ति भी लाख प्रयत्नों और बड़ी विनतियों के बाद कुछ हजारों या अधिक से अधिक कुछ लाख व्यक्तियों को एकत्रित कर पाता है। वहीं दूसरी ओर बिना किसी प्रयास के कुम्भ मेले में करोड़ों लोग भारत के कोन-कोने से पहुंचते थे। कहीं कोई निमंत्रण-पत्र नहीं छपा, कहीं किसी ने हाथ नहीं जोड़े। फिर भी करोड़ों व्यक्तियों का एकत्रीकरण हो गया। यही है भारत के राष्ट्र होने की पहचान और उनकी चेतना। आशय यह है कि भारत ही अकेला राष्ट्र है जो अपनी अमूल्य सनातन सांस्कृतिक परम्पराओं के कारण ही एकसूत्र में बंधा हुआ है।

इस चेतना को कोई कैसे भुला सकता है, और अपनी जड़ों को काट कर भला कोई समाज कैसे जीवित रह सकता है? भारत की संस्कृति जिन मूल्यों और आदर्शों की वकालत करती है वे दुनिया के ऊंचे मानदण्ड है। पश्चिमी उदाहरण, पश्चिमी सोच और पश्चिमी ढांचे से भारत की भलाई नहीं हो सकती। किसी भी देश के विकास के पीछे जरूरी है वहां की धारती से निकले विचारों पर खड़ा हुआ एक मजबूत ढांचे का अस्तित्तव।

हम भारतीय विचारों और अवधारणाओं के अनुरूप राजनीति करने का प्रयास करते हैं। स्वतंत्र भारत में भाजपा को छोड़कर भारतीय मूल्यों और आदर्शों के उच्च मानदण्डों की राजनीति करने वाला और कोई राजनीतिक दल नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है कि भाजपा भारत की मिट्टी से उपजा, भारतीय लोगों द्वारा स्थापित और भारतीय मान्यताओं को मानने वाला दल है।

जबकि प्रमुख विरोधी दल कांग्रेस का जन्म ही एक विदेशी ए.ओ. ह्यूम के हाथों हुआ था और उसका नेतृत्व फिर विदेशी मूल के हाथों में हैं। रही बात वामपंथी दलों की तो उनके विचार और प्रेरणास्रोत सब आयातित हैं। रूस में बारिश होने पर भारत में छतरी तानने वाले वामपंथी ही यह कहने का दुस्साहस कर सकते हैं कि 'धर्म एक अफीम है।'

दुनिया के बाकी देशों की स्थिति पर विचार करने के बजाय यदि भारत का ही विचार किया जाये तो हम पायेंगे कि 'धर्म गुरु' कहलाने वाले भारत की नस-नस में ही धर्म है। धर्म 'रिलीजन' जैसा संकुचित नहीं है जैसा वामपंथी या अन्य पश्चिमी विचारक समझते हैं। अब भारतीय धर्म और संस्कृति को गाली देने वाले रूस और चीन में तो सुने जा सकते हैं मगर भारत में उनकी दाल नहीं गलने वाली। वामपंथ का सिकुड़ता जनाधार इसी बात का परिचायक है। कांग्रेस के साथ भी सबसे बड़ी समस्या यही है कि पश्चिमी विचारों को ही वह अपना समझती है और उसी रंग ढंग से ढली है, जबकि भारतीय जनता पार्टी हमेशा से कहती चली आई है कि हम इस देश के राष्ट्रीय सांस्कृतिक मूल्यों के वाहक हैं। हमारे प्रत्येक नेता और कार्यकर्ता की यही अन्त:प्रेरणा है।

राष्ट्र एक भावात्मक 'स्वरूप' है। रूप नहीं। रूप बाहर-बाहर होता है। स्वरूप आन्तरिक चेतना है। बाहर-बाहर यह देश भूमि, जनता और राज्य व्यवस्था का योग है। लेकिन आन्तरिक रूप में यह एक दिव्य चेतना है। चेतना का यह साक्षात्कार युगों-युगों से सामूहिक चिन्तन का फल है। इसे ही हम भारत में अपनी संस्कृति कहते हैं। यहां जीव, आत्मा, चिति और विराट का साक्षात हुआ है। धर्म यहां बंधनकारी नहीं है। सारे पंथ अनुशासन देते हैं। भारत का धर्म आत्म अनुशासन देता है। यह बांधता नहीं मुक्त करता है। ऋग्वेद से उपनिषद, महाभारत और रामायण तक यही धारा चली। गौतम बुध्द और आदि शंकराचार्य ने अपनी-अपनी बोली सत्य तत्तव ही बताया। पं. दीनदयाल उपाध्‍यायजी ने राजनीति में पहली बार कोई सर्वांगपूर्ण दर्शन को राजनीति का अधिष्ठान बनाया जिसे आगे चलकर उन्होंने एकात्मवाद के रूप में सभी के समक्ष रखा। 'एकात्म मानववाद' पूरी तौर पर भारतीय संस्कृति पर आधारित है। अब हमें यहां संस्कृति को समझना होगा।

संस्कृति का अर्थ होता है सम्यक कृति। सम्पूर्ण जीवन कर्म का सत्य, शिव और सौंदर्य ही हमारी संस्कृति है। प्राचीन परम्परा का 'संस्कार' शब्द ही सामूहिक कर्म के रूप में भारतीय संस्कृति है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारतीय राष्ट्रीय जीवन मूल्यों का समुच्चय है। सम्पूर्ण सत्य, सम्पूर्ण शिव और सम्पूर्ण सुन्दर इसमें खिलता हैं। यह वोट की राजनीति का खेल नहीं है। इसमें गांधीवादी समाजवाद शामिल है। इसमें भारत के आदर्श रामराज्य की अवधारणा है। यह मजहबी राज्य की कल्पना से पृथक स्वाभाविक लोकतांत्रिक अवधारणा है। यह किसी के विरूध्द नहीं है। सबके साथ है। सब इसमें समाहित हैं।

कभी-कभी देश और राज्य को राष्ट्र के स्थान पर व्यवहार करते देखा गया है परन्तु यह उचित व्यवहार नहीं है। देश दिशा से आकृत है। वह भौगोलिक सीमाओं से निर्दिष्ट है। राष्ट्र एक भावनात्मक शक्ति है। वो प्रेरणा का स्रोत है और युग-युग से मानव के मर्मस्थल में टिका हुआ है। वह सुप्त होकर भी जागृत हैं। इसका एक ही कारण है कि एक राष्ट्र के हृदय में संस्कृति की अमर आत्मा का निवास है। देश की सीमा घटती-बढ़ती है परन्तु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का कभी क्षरण नहीं होता। वह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर है और विराट से विराटतर है और जन-जन के जीवन में श्रध्दा और निष्ठा के रूप में सदा सर्वदा वर्तमान है। काल और देश को सीमाएं तो प्रभावित नहीं कर सकती है।

राष्ट्र की पहचान तभी होती है जब इतिहास में कोई सुखदायी या दुखदायी घटना होती है। हल्दीघाटी की लड़ाई हो या प्लासी का युध्द। राष्ट्र को क्या पीड़ा थी और पीड़ा को किसने झेला, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। हल्दीघाटी में आज भी जाने से हम क्या अनुभव करते हैं वह तो वही राष्ट्रभक्त कह सकता है जो इस ऐतिहासिक आघात की सहन पीड़ा को स्वयं पी गया है। घास की रोटियां खानी पड़ी, बच्चे बिलखते रहें, परन्तु उन रोटियों का इतिहास स्वर्ण अक्षरों में लिखा है, उसे मिटाने की शक्ति प्रचण्ड महाकाल में नहीं है। ठीक उसके विपरीत मानसिंह का भी महल है जिसके अपवित्र और अभिशप्त दीवारों की सिसकियों से सारा वातावरण विवादमय बना हुआ है। आप स्वयं समझ सकते हैं कि कौन कार्य राष्ट्रीय है और कौन अराष्ट्रीय है।

भारतीय संस्कृति के सर्वोच्च आदर्शों में से एक है ''एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति'' यानि सत्य तो एक ही परन्तु विद्वान उसे भिन्न-भिन्न तरह से कहते हैं। इसलिए भारतीय विचारों में कभी दुराग्रह नहीं रहा है कि हम ही सही हैं। इस देश में सदियों से माना जाता है कि ''यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे'' अर्थात् जो पिण्ड में है वहीं ब्रह्माण्ड में है, जो आत्मा में है वही परमात्मा में है और जो तेरे में है वहीं मेरे में है। ऐसी है भारत की उदात्त संस्कृति। यही भारतीय संस्कृति आगे बढ़ कर कहती है ''वसुधैव कुटुम्बकम्'' यानि पूरा विश्व एक परिवार सरीखा है। इसलिए भारत ने कभी भी देशों को जीतने के प्रयास नहीं किये क्योंकि हमारा संदेश विश्व बन्धुत्व का रहा है।

ऐसे उदात्त और ऊंचे आदर्शों से ओत-प्रोत भारतीय संस्कृति पर गर्व करने के बजाय उसे 'संकुचित दृष्टिकोण' कहने का कार्य विरोधी राजनीतिज्ञ करते रहे हैं। इसके पीछे उनके निहित स्वार्थों के साथ उनका संकुचित दृष्टिकोण और तोड़ने वाली राजनीतिक विचारधारा है। यही कारण है जब हम राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विचारधाारा की बात करते हैं तो उन्हें लगता है कि हम जोड़ने के बजाय तोड़ने की बात करते हैं। उन्हें सम्भवत: इसका ज्ञान नहीं है कि संस्कृति का स्वरूप ही 'सम्यक' हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने सच ही लिखा है कि 'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी'। इसलिए भारतीय संस्कृति और राष्ट्र की बात करने पर वामपंथी को विभाजन दिखाई पड़े तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

राजनीति का स्वरूप जल की भांति होता है जो व्यक्ति या संगठन के अनुरूप ही आकार लेती है। जब भगवान राम ने राजनीति का सहारा लिया तो वह 'भक्ति' हो गयी जब श्रीकृष्ण ने उसे अपनाया तो वह 'युक्ति' हो गयी और जब सुभाष बोस ने उसे अपनाया तो वह 'शक्ति' बन गयी। भारतीय जनता पार्टी पंडित दीन दयाल उपाधयाय के 'एकात्म मानववाद' और भारत की राष्ट्र एवं संस्कृति से ओत-प्रोत विचारों पर आधारित राजनीति का सहारा लेकर उसे 'मुक्ति' का स्वरूप देना चाहती है। जबकि कांग्रेस और वामपंथियों की राजनीति का स्वरूप 'विपत्ति' और 'सम्पत्ति' से जुड़ा हुआ है।

भारतीय राजनीति की भावी दिशा तय करने में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो चली है। भारतीय अस्मिता उसकी संस्कृति से जुड़ी है और इस तथ्य को आत्मसात किये बिना विश्व बिरादरी में भारत की अपनी पहचान नहीं हो सकती। आयातित मूल्य, आयातित विचार इन सबसे भारत का कल्याण नहीं हो सकता क्योंकि विकास का मजबूत ढांचा देश की भूमि से जुड़ने पर ही खड़ा हो सकता है। यह जुड़ाव वहां की संस्कृति ही दे सकती है। तब बनेगा गांधीजी और दीनदयालजी के सपनों का भारत और तभी आयेगा 'राम राज्य'।
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय अध्‍यक्ष है और भारत सरकार के कृषि मंत्री रहे हैं)

Monday, February 2, 2009

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद


डॉ. दयाकृष्ण विजयवर्गीय 'विजय'
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम समुन्नत संस्कृतियों में से एक है। इसकी सुदीर्घ परंपरा में अनेक मनीषी विद्वानों, मंत्र द्रष्टा ऋषियों तथा तत्ववेत्ता मुनियों के जीवनानुभवों के शाश्वत निष्कर्षों की संचित निधि जुड़ी है। इसकी वरेण्यता आप्त ऋषियों ने 'सा संस्कृति विश्ववारा' कहकर रेखांकित की है। इसी संस्कृति के आचरित चरित्र ने सर्व मानवों को प्रशिक्षित कर संस्कारित किया है। प्रमाण में यह श्लोक उध्दृत कर सकते हैं-

एतद्येश प्रसूतस्य सकाशादग्र जन्मना,
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।

संस्कृति सभ्यता नहीं है। सभ्यता जहां आचरण का बाह्य पक्ष है, वहां संस्कृति जीवन का आंतरिक सौन्दर्य है। जीवन जीने की दृष्टि है। शाश्वत मूल्यों की मंजूषा है। औदात्य की प्रतिष्ठा है। पवित्रता की लेखनी से लिखा जागतिक कर्मों का पावन संविधान है। उच्चासन पर विराजमान सारस्वत मूर्ति संतों का संभाषण है। अभ्युदय का विज्ञान तथा नि:श्रेयस का ज्ञान है। नैर्ष्कम्य का उपनिषद तथा जीवन मुक्ति का आरण्यक है। माधुर्य की भागवत ही नहीं, कर्म की गीता भी है। जीवन का सत ही नहीं, सृष्टि का ऋण भी है। सुख का श्वास ही नहीं, सिध्दि का विन्यास भी है। नवजागरण का शंखनाद ही नहीं, प्रगति एवं समृध्दि का पांचजन्य भी है। अत: गुणात्मक है। सर्व श्रध्देय है। इसके विपरीत सभ्यता सभाओं में बैठने की शिष्टता का मानदंड भर है। सृष्टि व्यवहार का औचित्य है। संस्कृति जहां आध्यात्मिक मूल्य है, वहां सभ्यता विज्ञानात्मक संचेतना है। संस्कृति जहां शाश्वत सत्यों को सहेजे है, वहां सभ्यता यांत्रिक परिणामात्मक उपयोगी सत्यों को सहेजे है। दोनों के वैभिन्य के बीच अंतर्बाह्यता की तथा आध्यात्मिक एवं भौतिकता की अति सूक्ष्म झीनी-सी पारदर्शी पट्टिका है, जिसे सरलता से पृथक करना कठिन है।

जब हम राष्ट्र के आगे सांस्कृतिक शब्द का प्रयोग करते हैं, तब तत्काल हमारा ध्यान, राष्ट्र जनों के उन जीवन-मूल्यों की ओर जाता है जो शाश्वत ही नहीं, राष्ट्र जीवन को अहम् से वयम् की ओर तथा सयम् से ओम तत्सत् की ओर ले जाने वाले हैं। राष्ट्र जीवन को पूर्ण एवं सार्थक बनाने वाले हैं। राष्ट्रजनों की अंतश्चेतना को विकसित एवं सृदृढ़ बनानेवाले हैं। इन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति आस्था जनित निष्ठा ही राष्ट्रजनों को राष्ट्रीय बनाती है। इस तरह राष्ट्रीयता का मूल स्वरूप राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक है। निश्चित भू भाग तथा निश्चित निष्ठावान जन तो भौतिक उपकरण हैं। संस्कृति ही आध्यात्मिक, गुणात्मक तथा शाश्वत जीवन-मूल्य है, जिनका अनुसरण करती प्रजा उसे राष्ट्र का रूप प्रदान करती है। मातृभूमि के प्रति भक्ति तथा जन के प्रति आत्मीयता का भाव सांस्कृतिक मूल्य हैं। यही तीनों मिलकर राष्ट्र को राष्ट्र बनाती हैं। राष्ट्र किन्हीं संप्रदायों तथा जन-समूहों का समुच्चय न होकर, एक जीवमान इकाई है। ऐसे राष्ट्र पुरूष का सजीव व्यक्तित्व है, जिसमें भूमि, जन एवं संस्कृति की जीवंत एकता का सतत निवास वर्तमान रहता है। दशम मंडल में ऋग्वेद के ऋषि से शिष्य पूछता है कि राष्ट्र पुरूष के जो विविध रूप दिए गए हैं वे कितने प्रकार से व्यकल्पित किए जा सकते हैं? मंत्र है-

यत् पुरूषं व्यवर्धु: कति धा व्यकल्पन्
मुखं किमस्य कौ बाहु का ऊरू पादा उच्यते? 10-8-11
तब ऋग्वेद का ऋषि उत्तार देता है-
ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत:
उरू तदस्य यद्वैश्य पद्मयां शूद्रो अजायत्। (10-9-92)

अर्थात् राष्ट्र पुरूष का मुख ब्राह्मण, बाहु राजन्य, उरू वैश्य तथा पादशूद्र है। चारों वर्णों के संघात से ही राष्ट्र प्रमुख का निर्माण होता है। इनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह कहना अपराध ही होगा। कर्म निष्ठा ही चारों के लिए मुक्ति प्रदाता बनती है। इस मंत्र के आशय को इस प्रकार भी व्याख्यायित कर सकते हैं कि समाज जीवन में चार प्रकार की मनुष्य प्रवृत्तिायां कार्यरत हैं, बुध्दि, सूक्ति, अर्थ तथा श्रम शक्ति। बुध्दि ज्ञान का पथ प्रशस्त करती है। शक्ति सीमाओं की रक्षा करती है आंतरिक अराजकता का शमन करती है। अर्थ औद्यौगिक एवं व्यापारिक विकास का हेतु है तथा श्रम विकास की योजनाओं की सम्पूर्ति का एकमेव साधन है।

स्वीकृत सांस्कृतिक जीवन दृष्टि ही एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र से पृथक करती है। प्रत्येक राष्ट्र उसकी स्वीकृत जीवन दृष्टि से ही पहिचाना जाता है। पृथकता की यह स्वीकृति तथा इसका सैध्दांतिक पक्ष ही राष्ट्रवाद को जन्म देता है। कोई भी विचार तभी वाद का रूप लेता है जब उसके आचरण कर्ता उस विचार को जीवन का एक अंग बना लेते हैं। राष्ट्र को सामने रखकर जब कोई सिध्दांत या चिंतन निरूपित होता है, तब वह विचार राष्ट्रवाद के नाम से अभिहित किया जाता है। राष्ट्रवादी हर कार्य को राष्ट्र की तात्कालिक परिस्थितियों तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निर्धारित एवं व्यवहारित करता है। फिर चाहे वह प्रश्न राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा का हो या जन के मौलिक अधिकारों की संरक्षा का या संस्कृति की गरिमापूर्ण मर्यादा को सुरक्षित रखने का। राष्ट्रवादी पहले अपने राष्ट्र का हित देखता है। उसके पश्चात् ही नीति निर्धारित करता है तथा आवश्यक संरक्षात्मक कदम उठाता है।

यहां यह प्रश्न उपस्थित हो आना स्वाभाविक है। जब राष्ट्र की परिभाषा में संस्कृति शब्द समाहित है तब राष्ट्रवाद के आगे अतिरिक्त सांस्कृतिक शब्द लगाने की क्यों आवश्यकता पड़ी। सच में यह एक गंभीर प्रश्न है तथा गहराई से विवेचन की अपेक्षा रखता है। संस्कृत शब्द में 'ठक्' प्रत्यय लगकर 'कितिच' सूत्रानुसार सांस्कृतिक शब्द बनता है। इसे हम संस्कृति का भाववाचीकरण कह सकते हैं। सांस्कृतिक शब्द अपनी परिधि की व्यापकता में संस्कृति के सभी उपादानों एवं उपकरणों को समेटे होता है। हम जानते हैं संस्कृति शब्द 'कृ' धातु से 'सम' उपसर्ग पूर्वक 'सुट्' आगम करके 'क्तिन' प्रत्यय के योग से निष्पन्न है। 'सम' उपसर्ग जहां भी जुड़ता है वह वहां संस्कारित अथवा सुन्दरीकृत का अर्थ देता है। 'सम' के सभी अर्थ पश्चात्वर्ती शब्द को विशेषित करते हैं। विद्वान उसके दो ही अर्थ मुख्य रूप से ग्रहण करते हैं। एक तो संस्कारित सम्यक कृति और दूसरा संभूय कृति के रूप में। संघश: कृति सम्भूय कृति कहलाती है। इस तरह संस्कृति संस्कार युक्त सम्भूय कृति है। संस्कार, सामाजिक विद्रूपताओं के साथ मनीषियों के बौध्दिक संघर्ष का सुपरिणाम है। मनुष्य उन पर विजय के पश्चात जिन तात्विक एवं सात्विक निष्कर्षों पर पहुंचता है, वे निष्कर्ष ही शनै:-शनै: संस्कृति बनते चलते हैं। मानवीय जीवन मूल्य बन जाते हैं। कह सकते हैं मानव के जीवनानुभवों का नवनीत ही संस्कृति है। समाज से संघर्ष का क्रम निरंतर बना ही रहता है। इस कारण संस्कृति में नैरंतर्य बना रहता है। यहां यह स्पष्ट कर देना उचित रहेगा कि संस्कृति की स्वीकृत जीवन-दृष्टि में कहीं कोई बदलाव नहीं आता। ऐसे निष्कर्ष संस्कृति के आचरण पक्ष के उपादानों एवं उपकरणों में अभिवृध्दि ही करते हैं। प्रत्येक राष्ट्र अपनी सांसकृतिक परंपरा के शाश्वत मूल्यों से जब तक जुड़ा चलता है, तब तक वह जीवंत एवं समुन्नत बना रहता है। स्खलन उसकी गरिमा तथा प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाता है। मर्यादाओं को नष्ट ही नहीं करता, उपेक्षा तथा तिरस्कार का भाव जगा, परिणामगत दुर्बलताओं को स्वीकारने में भी संकोच नहीं करता। हम जानते हैं सांस्कृतिक स्खलन के कारण ही विश्व के अनेक राष्ट्र मिट गये। इकबाल ने कहा भी है-

यूनान मिश्र रोमां सब मिट गये जहां से
अब तक मगर है बाकी नामोनिशा हमारा।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।

यह जो 'कुछ बात है' यह हमारी सांस्कृतिक निष्ठा ही है। अपनी सनातन संस्कृति के साथ अटूट जुड़ाव ही है। इसी से अनेकों झंझावातों के बीच भारत-तरणी विपत्तिा समुद्र को पार करने में सक्षम एवं समर्थ सिध्द हुई है। इसकी पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय जीवन का अपनी मूल्यवान आध्यात्मिक संस्कृति को जड़ से दृढ़ता से पकड़े रहना ही है। इसी सत्य को बार-बार उजागर करने के हेतु से मनीषियों को राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द जोड़ने की आवश्यकता अनुभव हुई है। एक और भी कारण हो सकता है। जब राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द जुड़ जाता है तब वह सोच का एकमेव सांस्कृतिक अधिष्ठान भी निर्धारित कर देता है। तब मनीषि, जीवन के समस्त व्यवहारों में संस्कृति को सामने रखकर ही नीति निर्धारित नही ंकरते, आचरण तक भी सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में ही तय करते हैं। तब लक्ष्य का ही नहीं, साधनों की पवित्रता का भाव भी सामने रहता है। इसी कारण तो महाभारत में धर्मराज का यह कथन 'अश्वत्थामा हतौ नरो वा कुंजरौ' कभी अभिशंसित नहीं हुआ। यह किसी अपवाद को सहन नहीं करता। तीसरा कारण यह भी हो सकता है राष्ट्र के उपादान तत्व भू और जन के साथ संस्कृति अपनी पृथक सत्ताा के साथ अलग विचार की अपेक्षा रखती है। जब सांस्कृतिक शब्द राष्ट्रवाद के आगे जुड़ जाता है तब किसी अवमूल्यन, किसी गिरावट अथवा किसी अपवाद के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहता। तब राष्ट्र हित चिंतन की एकमात्र कसौटी सांस्कृतिक बोध ही रह जाती है। राष्ट्रवाद की अवधारणा का एक मात्र निकष सांस्कृतिक अधिष्ठान पर अवस्थित विचार ही रह जाता है। इस तरह यह जोड़ निरर्थक नहीं सार्थक ही कहा जाएगा। इसका परिणामात्मक लाभ भी राष्ट्र को मिला है। इसी बल पर आज भारत विपत्तियों की भारी चट्टानों के बोझ को शीश से उतार फेंकने में, पराधीनता की बेड़ियों को काटने में, धर्मांधता की आंधी को रोकने में तथा मतांतरण के षडयंत्रों को उध्वस्त करने में पूरी तरह सफल हो, विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आने का व्यग्र खड़ा है।

इसी संदर्भ में एक और प्रश्न अंतर्राष्ट्रीयतावादियों ने उठा, राष्ट्रवाद के आगे प्रश्नवाचक लगाने का दुस्साहस किया है। अंतर्राष्ट्रीयतावादी तथा छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी राष्ट्रवाद का नाम सुनते ही नाक भौंह सिकोड़ते हुए कानों में अंगुलियां नहीं, शीशा डाल लेते हैं। मानों राष्ट्रवाद का शब्द प्रयोग, कोई एक बड़ा अपराध हो। ऐसा सोचने वाले स्वयं वर्गवादी हैं। 'दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ' यह कहने वाले स्वयं द्वैतवादी हैं। जो श्रमिक नहीं हैं उन्हें वे शोषक की संज्ञा देते हुए शत्रुवत मान, उनके विनाश तक की भयंकर कामना लिए होते हैं। समाज तक से उनका बहिष्कार तथा तिरस्कार का भाव लिए होते हैं। जबकि राष्ट्रवादी सोच वाला मानव मात्र के हित को अपने राष्ट्र हित से पृथक नहीं मानता। वे भूल जाते हैं, राष्ट्रवादी भारत के मंत्र द्रष्टा ऋषियों ने ही गाया है 'माता भूमि पुत्रोहम् पृथिव्या:। इन्होंने ही 'वसुधैव कुटुम्बकम्' तथा 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' जैसे विश्वात्मक वैश्विक मंत्र दिए हैं। इन मंत्रों की पृष्ठभूमि में वही भारतीय सांस्कृतिक अवधारणा कार्यरत है जिसका अधिष्ठान अध्यात्म है। सारी सृष्टि एक ही चेतन सत्ताा का विस्तार है। कहीं कोई भेद नहीं है। कोई द्वैत नहीं है। यह अभेदात्मक अद्वैत दृष्टि ही उपर्युक्त वैश्विक सोच की नींव में है। दुनिया के मजदूरों को एक करने का नारा देने वाले रूस और चीन आज भी अलग-अलग राष्ट्र हैं। ये बहुत समय तक सीमा संघर्ष में उलझे भी रहे हैं। इनने अपनी प्रादेशिकता का त्याग कब किया है। संयुक्त राष्ट्र संघ को ही लें। यह राष्ट्रों का संघ है। राष्ट्रों की सापेक्षता स्वीकार कर चला है। अपने को अंतर्राष्ट्रीय कहने वाले भूल जाते हैं कि इस शब्द प्रयोग में ही राष्ट्रों की उपस्थिति अनिवार्य है। सारा विश्व राष्ट्रों में बंटा है। हर राष्ट्र की अपनी संस्कृति है। हर राष्ट्र की अपनी भाषा है। जिन राष्ट्रों ने परकीय भाषा एवं संस्कृति अपना रखी है, वे पूर्व में उस राष्ट्र के प्रमुख में पराधीन रह चुके हैं वे राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र होकर भी सांस्कृतिक एवं भाषाई दृष्टि से आज भी पराधीन ही हैं। जिन राष्ट्रों की अपनी भाषा संस्कृति नहीं होती निश्चय ही वे राष्ट्र कहलाने के योग्य पात्र नहीं है।

कई राष्ट्रों की संस्कृति को संप्रदायों ने संकुचित कर कट्टरतावादी रूप दे दिया है। कट्टरता ने गर्हित हिंसा तक के सामने अपना घृणित एवं गर्हित चेहरा उजागर कर दिया है। इससे उनका घृणा भरा आत्मघाती रूप सामने आया है। इससे मानवता का उदारचरित प्रभावित हुआ है। आज सांप्रदायिक कट्टरता ने आतंकवाद का स्वरूप ग्रहण कर, जन जीवन को भयाक्रांत कर दिया है। सांप्रदायिकता तब और भयावह हो जाती है जब वह अपने चिंतन को ही अंतिम मान कर चलती है। तब वह दूसरों के प्रति कहर ढाने लगती है। विष विमन करती हुई दूसरे राष्ट्रों को खंडित तक करने को तुल जाती है। आज इस सांप्रदायिक कट्टरता की आग से विश्व का कोई भी राष्ट्र अछूता नहीं बचा है। सांप्रदायिक कट्टरता धर्म के उदार चरित्र को भूल आज रक्त से सड़कें रंगने में लगी है। यह संस्कृति नहीं, विकृति है अपकृति है। भारत के ऋषियों ने इस कट्टरता का विरोध करते हुए यही कहा है-

अयं निज: परोवेति गणना लघु चेहसाम्
उदार चरितानाम् तु वसुधैव कुटुंबकम्।

उपर्युक्त श्लोक के संदर्भित परिप्रेक्ष्य में तो राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द प्रयोग और भी आवश्यक हो जाता है। यह शब्द प्रयोग राष्ट्रवाद के विरूध्द उद्धोषित लघु चेतस घोषणाओं को जड़ से निर्मूल कर, चिंतन को उदार सहिष्णु मान-संपदा से परिपुष्ट कर देता है। प्रकाश का नंदादीप बन मानवता का पथ प्रशस्त करता है। तब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मानवता का पर्याय, औदात्य का कल्पतरू तथा सर्व हित की चिंतामणि बन जाता है।

भारतीय साहित्य के अवलोकन से हमें इस सत्य के दर्शन होते हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही सदा सर्वदा साहित्य का आदर्श रहा है। क्या संस्कृत साहित्य, प्राकृत साहित्य, पाली साहित्य, अपभ्रंश साहित्य और क्या लोकभाषा साहित्य, सभी ने संस्कृति और राष्ट्रीयता को ही अपना कथ्य बनाया है। प्रगतिवाद जनवाद के नाम से जो अभारतीय चिंतन भारतीय साहित्य में साम्य का नारा लेकर अनुप्रविष्ट हुआ, ऐसे समाज ने कुछ काल के भ्रम के बाद ही नकार दिया। समाज को वह नग्न यथार्थ कहे, या भोगा हुआ यथार्थ कभी स्वीकार नहीं हुआ। सामाजिक सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों पर साहित्य के माध्यम से कभी स्वीकार नहीं हुआ। सामाजिक सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों पर साहित्य के माध्यम से किया जाता यह सीधा आक्रमण भारतीय समाज को भी गले नहीं उतरा। उस साहित्य के लेखकों को पाठकों की खोज के उपाय अपनी बैठकों में सोचने पड़ रहे हैं। इसी तरह से भारतीय समाज ने अस्तित्ववादी, क्षणवादी आधे-अधूरे पाश्चात्य दर्शन को भी कभी स्वीकार नहीं किया है। भले ही इन्होंने प्रयोगवाद, नई कविता आदि के नाम लेकर कितने ही बड़े नाटक क्यों न हों। इनके समकालीन प्रयास समय की कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं।

इसका कारण भी है। साहित्य और संस्कृति का अन्योन्याश्रित संबंध रहा है। साहित्य संस्कृति का संवाहक है और संस्कृति साहित्य की आशा है। संस्कृति साहित्य में लिपटी रहती है। कभी कथानक के रूप में, तो कभी शिल्प के रूप में। वही साहित्य श्रेष्ठता अर्जित करता है जो संस्कृति को अधिकाधिक आत्मसात् किये होते हैं। संस्कृति विहीन साहित्य की कल्पना शशक श्रृंगवत है। संस्कृति भी वही जीवित रहती है जिसका विपुल परिमाण में साहित्य उपलब्ध होता है। जिस संस्कृति का साहित्य नहीं होता, वह संस्कृति कालांतर में अकाल काल कवलित हो जाती है।

मानवता को उजागर करनेवाला साहित्य ही है। साहित्य मनुष्य और समाज की मनोभावनाओं को शब्द के स्तर पर प्रभासित करता हुआ, मानवीय आदर्श की प्रतिष्ठापना करता है। साहित्य के शब्द-शब्द में भावोद्रेक की अप्रतिम शक्ति होती है। यह व्यक्ति को उसकी वास्तविक स्थिति से परिचित करा, उन उदात्ता विश्वासों से जोड़ता है जो उसे महामानव बनाते हैं। सामाजिक धरातल पर मानव का यह उदात्ता की ओर आरोहण है। व्यक्ति के धरातल पर जीवन प्रवृत्तियों का उन्नयत भी साहित्य ही करता है। साहित्य मानवीय संवेदना जगा, मानव संबंधों में सघनता उपजाता है। यह मनुष्य के भीतर चल रहे आंतरिक संघर्ष को तीव्र कर स्वस्थ एवं सही पथ पर अग्रसर करता है। साहित्य की परिधि में जहां सामाजिक संबंधों का नैकटय आता है वहीं सांस्कृतिक परंपरा की पहचान को नवीनतम रूपों से ग्रहण करने की प्रेरणा भी आती है।

साहित्य सृजन इस तरह एक सांस्कृतिक कर्म है। यह संस्कृति को अक्षुण्ण रखता है। संस्कृति साहित्य को अनुप्राणित करती है। साहित्य की जीवनीशक्ति के मूल में उसकी गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा ही होती है। साहित्य, संस्कृति का संवाहक होकर भी सदैव संस्कृत्योन्मुख रहता है। संस्कृति विमुख साहित्य की स्थिति उस रोगी की तरह होती है जिसे मृत्यु-मुख में जाने से कोई उपचार नहीं रोक पाता। जब भी साहित्य संस्कृति विमुख हुआ है, वह या तो दिग्भ्रम की स्थिति जीने लगता है अथवा मृत्यु का ग्रास बना है।

संस्कृति की प्रभविष्णुता अति सूक्ष्म किंतु अति तीव्र होती है। ऐसे समय में वह साहित्य को ही नहीं समय को भी नियंत्रित करती है। संस्कृति की यह प्रभविष्णुता कभी प्रत्यक्ष दिखती है तो कभी नहीं। प्रत्यक्षता की स्थिति में इसे सांस्कृतिक शक्तियां बलशाली हुई समय-रथ की वल्गा थामें दिखाई देती है। आज समय साहित्य के सम्मुख चुनौती बनकर खड़ा है। ऐसी स्थिति में तो साहित्य को समय से आगे निकलने का सामर्थ्य अर्जित करना ही चाहिए। इस हेतु उसे अपने सांस्कृतिक अधिष्ठान पर अंगद चरण जमा खड़ा होना है। तभी वह प्रतिगामी शक्तियों के चेहरों पर चढ़े मुखौटों को हटाने की शक्ति स्वयं में जगा सकेगा। इन दिनों प्रतिभागी शक्तियों ने विश्व-अराजकता के कर्णणारों के साथ दुरभि संधि कर रखी है। ऐसे प्रयासों को कुंठित कर विश्वमंच पर साहित्य को सत्यं शिवं सुंदरम् से अभिमंडित अपनी श्रेष्ठ सांस्कृतिक छवि उपस्थित करनी है। इस सांस्कृतिक समर में भारत को साहित्य के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को भी ध्येय े रूप में अंगीकार कर आलोक की नवीनतम दीपशिखा के साथ विश्वमंच पर खड़ा होना है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अपनाव आज राजनीति के लिए जितना आवश्यक है उससे कम साहित्य के लिए नहीं है। साहित्य का इतिहास अथ से आज तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ही इतिहास है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को ध्येय वाक्य के रूप में जब तक अंगीकार नहीं करेंगे, भारत वैभव के उन्नतम शिखरों का स्पर्श कदापि नहीं कर सकेगा। कालजयी साहित्य नहीं लिखा जा सकेगा। वर्तमान के संकटापन्न इस काल में यदि प्रतिगामी शक्जियों को दुर्बल समझ, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दुर्लक्ष्य किया तो निश्चय ही यह स्थिति भारत को महंगी पड़ सकती है। इसलिए राजनीति और साहित्य दोनों को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को दृष्टि-पथ में रख, औपनिषदिक मंत्र 'चरैवेति चरैवेति' का घोष गुंजाते हुए त्वर गति से आगे बढ़, भारत को विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा करना है।
(लेखक सुप्रसिध्द साहित्यकार हैं।)

Friday, January 30, 2009

साहित्य और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद


प्रो. चमनलाल गुप्त
हिंदी साहित्य चिंतन की परंपरा भारतीय चिंतन परंपरा का ही अंश है जो अत्यधिक समृध्द और प्राचीन है। भारत जैसी अविच्छिन्न साहित्यिक परंपरा कम ही राष्ट्रों के पास है। भारत के सांस्कृतिक प्रवाह से निरंतर पुष्ट होती हुई साहित्यधारा कभी विरल तो कभी विशाल नदी का रूप धारण कर भारतीय जनमानस को आप्लावित करती रही है। भारतीय संस्कृति प्राचीन, निरंतर प्रवाहशील, नित-नवीन और फिर भी सनातन रूप से विद्यमान रहनेवाली अद्भुत संस्कृति है। इस संस्कृति का बाह्य रूप स्थान समय और युगीन संदर्भों में बदलता रहा है, अपने को युगानुकूल एवं ग्राह्य बनाता रहा है। यही कारण है कि प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक प्रवाह ऊपर से बदलता रहा परंतु भीतर से वह शांत सुस्थिर रहा, अपने स्वरूप को बनाए रहा।
साहित्य और संस्कृति के विकास की दिशा और खोज का विषय एक ही है। साहित्य एक स्तर पर मनुष्य के ऐन्द्रिय बोध को संस्कारित एवं परिष्कृत करता है। उसे शब्द के भीतर छुपे सूक्ष्म भाव और अर्थ से ही परिचित नहीं करवाता, उसकी नाद शक्ति से आंदोलित भी करता है। साहित्य, भाषापरक अभिव्यक्ति है परंतु वह भाषेतर सूक्ष्म भावों और विचारों को व्यंजित करता है। संस्कृत साहित्य के महान विद्वान प्रोफेसर सिलवां लेवी ने भारत वर्ष की संपूर्ण चिंतन धारा को एक शब्द में समेटते हुए कहा है कि संपूर्ण साहित्य साधना का लक्ष्य है 'रस' की प्राप्ति। 'रस' जो शब्द और अर्थ के 'साहित्य' अर्थात् साथ-साथ रहने के भाव से जुड़ा है परंतु जिसे कहा नहीं जा सकता, अनुमित नहीं किया जा सकता, जो लक्षित भी नहीं होता बल्कि व्यंग्य होता है और समान हृदय वाले, अनुभवी सहृदय द्वारा ही ग्रहीत होता है। धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में जिसे सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म कहा गया उसे ही साहित्य में रस कहकर उसकी प्रकृति 'ब्रह्मानंद सहोदर' स्वीकार की गई। मैक्समूलर ने भारतीय अध्यात्म साधना का लक्ष्य सच्चिदानंद स्वरूप परब्रह्म की प्राप्ति मानते हुए उसे सांसारिकता से परे अतीत अथवा वियाण्ड (Beyond) की खोज माना है। साहित्य और संस्कृति दोनों ही मनुष्य को जड़ से मुक्त कर चेतन की ओर ले जाते हैं, उसकी सुप्त चेतना को जागृत कर परम तत्व की ओर अग्रसर करते हैं। साहित्य और संस्कृति मनुष्य को बेहतर मनुष्य और बेहतर मनुष्य को देवत्व प्रदान करने का साधन है।

साहित्य और संस्कृति दोनों का संबंध किसी एक समाज से रहता है जो किसी भूखंड विशेष पर स्थिर रहता है। देश, देश में रहने वाले जन और उस जन के सामाजिक, आर्थिक जीवन से संस्कृति का स्वरूप निर्मित होता है। देश एक भौगोलिक इकाई है जिसका निर्माण प्राकृतिक तत्वों से होता है। पर्वत, नदियां, मरुस्थल अथवा घने वन आदि इसके निर्णायक होते हैं। राज्य एक प्रशासनिक इकाई है। एक देश में अनेक राज्यों का निर्माण्ा हो सकता है, होता है। देश के लिए भौगोलिक एकता और राज्य के लिए राजनीतिक, प्रशासनिक एकता अनिवार्य तत्व है। राष्ट्र इन दोनों की अपेक्षा अधिक व्यापक और सूक्ष्म इकाई है जिसका आधार सांस्कृतिक अथवा भू-सांस्कृतिक हुआ करता है। किसी विशेष भूखंड पर रहने वाले लोग अपने लौकिक और परलौकिक सुख और समृध्दि के लिए, जीवन यापन और मुक्ति साधना के लिए जो जीवन पध्दति, मूल्य चेतना, सौंदर्य बोध और चिंतन-मनन की प्रणालियां विकसित करते हैं वे ही उसकी संस्कृति के वाहक और परिचायक कहे जा सकते हैं। देश एक स्थूल एवं दृश्य इकाई है, राज्य एक प्रशासनिक परिकल्पना है, परंतु फिर भी उसकी निश्चित सीमाएं रहती हैं। राज्य, देश की अपेक्षा सूक्ष्म इकाई है। राष्ट्र, देश और राज्य की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म एवं भावात्मक इकाई है। जिसका आधार मूलत: जन की सौंदर्य बोधात्म, भावात्म एवं वैचारिक एकता है जिसे संक्षेप में सांस्कृतिक एकता कह सकते हैं।

आज भी सुनने को मिल जाता है कि भारत राष्ट्र का निर्माण 1947 में हुआ था फिर हम राष्ट्र नहीं हैं बल्कि राष्ट्र बनने जा रहे हैं। (we are a nation in the making) यदि हम आजादी से पहले राष्ट्र नहीं थे तो क्या थे?

पश्चिम में राष्ट्र राज्य की कल्पना की गई और राजनीतिक इकाई राज्य को ही राष्ट्र का पर्याय मान लिया गया। 'संयुक्त राष्ट्र संघ' मूलत: 'संयुक्त राज्य संघ' है जिसमें संप्रभुता संपन्न अथवा स्वायत्ताशासी राज्य, सदस्यता ग्रहण कर सकते हैं। एक सोवियत रूस, राष्ट्र के रूप में उसका सदस्य था। सोवियत रूस के अनेक टुकड़े होकर स्वतंत्र राज्य बन गए और आज उनमें से अधिकतर संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बनकर राष्ट्र कहलाते हैं। इंडोनेशिया से तैमूर टूट कर नया राष्ट्र बन गया है। राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं हो सकता। भारत सदा से ही राजनीतिक रूप से बंटा रहा परंतु सांस्कृतिक दृष्टि से इसमें एकता रही है। सांस्कृतिक एकता ही युगों से हमारी एकता का आधार रही है। भारत एक राजनीतिक इकाई के रूप में मनु, रघु, राम, युधिष्ठिर, अशोक अथवा विक्रमादित्य जैसे कुछ एक चक्रवर्ती शासकों के काल में भले ही एक रहा हो परंतु अधिकांश समय अनेक गणों, राज्यों अथवा सियासतों में बंटा रहा जो आपस में प्राय: लड़ते-भिड़ते भी रहते थे। इस देश का साधारण जन सदा ही राजनीतिक सीमाओं के पार सोचता था क्योंकि उसके लिए संस्कृति ही राष्ट्र का आधार थी। किसी भी पुण्य कार्य के लिए शुध्द जल की प्राप्ति देश की सातों प्रमुख नदियों के जल को मिलाकर ही होती थी और वह गाता था -

'गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती
नर्मदे सिंधु कावेरि जलेस्मिन सन्निधिं कुरू'॥

इसी प्रकार सात मोक्षदायक पुरियां, द्वादश ज्योतिर्लिंग, बावन शक्ति पीठ, चारधाम, चार महाकुंभ क्षेत्र, रामायण, महाभारत, श्रीमदभगवत जैसे ग्रंथ आदि हमारी एकता के मूलाधार थे। भारत की एकता और अखंडता का आधार सांस्कृतिक एकता रही है इसलिए यह स्वाभाविक है कि भारतीय राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संज्ञा दी जाए। हिंदुओं के लिए चारों धामों की यात्रा अर्थात् भारत भूमि की भारत माता की परिक्रमा पुण्यदायी और मोक्ष देने वाली मानी गई। यही हमारी राष्ट्रभक्ति है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विरोध छद्म धर्म निपरेक्षवादी और भौतिकवादी-साम्यवादी अपने-अपने कारणों अथवा स्वार्थों से करते हैं। भारत के सांस्कृतिक स्वरूप को समझने के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय संस्कृति निरंतर विकसनशील, बहुलवादी, उदार, विभिन्न मतों, पंथों, धर्मों, पूजा-पध्दतियों, जीवन-शैलियों, विचारधाराओं और आस्थाओं और विश्वासों को अपने में समेट कर चलने में समर्थ रही है। ऋग्वेद में कहा गया 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' अर्थात् परमसत्ता एक ही है जिसे विद्वान विभिन्न नामों से पुकारते हैं। यही एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो विभिन्न धर्मों को एक ही सत्य तक पहुंचने का मार्ग घोषित करती रही है। इसी संस्कृति में कहा गया 'अपनी भिन्न-भिन्न रूचि के अनुसार सीधे या टेढ़े मार्ग पर श्रध्दापूर्वक चले हुए सभी साधक, हे प्रभु, तुम तक उसी प्रकार पहुंचेंगे, जिस प्रकार उत्तार, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम किसी भी दिशा की ओर बहने वाली नदियां समुद्र तक पहुंच जाती हैं।' (शिवमहिम्नस्तोत्र) संत विनोबा भावे ने इसीलिए भारतीय संस्कृति को 'भी वाद' कहा था क्योंकि इसमें अपने मत के साथ दूसरों के मतों को भी स्वीकृति है। सभी धर्म और संस्कृतियां उनकी नजर में 'ही वाद' से ग्रस्त हैं अर्थात् वे अपने मार्ग के सिवा अन्य सभी मार्गों को व्यर्थ और गलत मानती हैं। जब कुछ धर्मनिरपेक्षवादी भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विकास से अन्य पंथों, धर्मों अथवा संस्कृतियों के विनाश की आशंका जताते हैं तो वे भूल जाते हैं कि भारतीय संस्कृति के साथ-साथ इन सबका अस्तित्व इसी धरती पर सदियों से बना रहा है, बना रहेगा। भारतीय संस्कृति सहिष्णु भी है और गुणों को स्वीकारने वाली सारग्राही भी यही इसकी दीर्घजीविता का रहस्य भी है। साम्यवादी विचारक अपने भौतिकवादी दुराग्रहों के कारण संस्कृति के आदर्शपरक, आध्यात्मिक मूल्यों को अस्वीकार करते हुए भारतीय सांस्कृतिक चेतना को संकीर्ण सांप्रदायिक कहकर नकार देते हैं। भारत को वे राष्ट्र ही नहीं मानते। उनकी दृष्टि में संस्कृति सामाजिक-आर्थिक मूल से उपजी बाह्य रचना है जिसका जीवन मूलभूत भौतिक ढांचे अर्थात् उत्पादन के साधन और उत्पादन के संबंधों पर निर्भर करता है। भारतीय धर्म साधना उनके लिए आदिम युग की अज्ञता है और भारतीय सांस्कृतिक चिंतन का आध्यात्मिक अंश उन्हें निरर्थक प्रतीत होता है। जिस समाजवादी, भौतिकवादी संस्कृति पर वे गर्व करते थे उसके खंडहर पूरे पूर्वी युरोप और टूटे-बिखरे सोवियत गणराज्य में वे देख कर भी नहीं देख पा रहे। उनकी शुध्द भौतिकतावादी तथा कथित विज्ञान परक संस्कृति दो सौ वर्ष में ही भरभरा कर गिर पड़ी जबकि भारतीय संस्कृति सदियों से अपने स्वरूप को अक्षुण्ण रखते हुए और अपने बाहरी रूप को समय, स्थान और परिस्थिति के अनुरूप बदलते हुए आगे बढ़ती रही है। परम तत्व की खोज और उस सच्चिदानंद स्वरूप तक पहुंचने की ललक भारतीय संस्कृति के ऐन्द्रिय बोध को सूक्ष्म सौंदर्यबोध में बदलती रही, भावबोध को उदार विश्व-बंधुत्व का गीत सुनाती रही और बौध्दिक चिंतन-मनन को षडदर्शन और ज्ञान-विज्ञान की ऊंचाइयों से भी आगे ब्रह्मांड की सूक्ष्म एकता में बांधती रही। भारतीय धर्म-साधना मानववाद की साधना है जो मनुष्य को श्रेष्ठ मनुष्य बनाकर परम तत्व तक पहुंचाने का साधन बनती है, भारतीय सांस्कृतिक चिंतन, मनुष्य मात्र के उत्थान का चिंतन है। इसमें सांप्रदायिकता के लिए कोई स्थान हो ही नहीं सकता। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का विरोधी एक तीसरा वर्ग भी है जो पश्चिम की चिंतन परंपरा से अभिभूत है। पश्चिमी राजनीतिक चिंतन में राष्ट्र-राज्य' की परिकल्पना फलीभूत हुई इसलिए राष्ट्र एक राजनीतिक इकाई ही माना गया। हिटलर, मुसोलिनी जैसे राष्ट्रवादी नायकों के उभरने से राजनीतिक राष्ट्रवाद का विस्तारवादी, फासीवादी चेहरा सामने आया। पश्चिम में राष्ट्रवाद युध्द और हिंसा के साथ-साथ कट्टरवाद का पर्याय बन गया। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' में ये लोग सांस्कृतिक कट्टरवाद अथवा आधिपत्य जमाने की लालसा देखते हैं और इसका विरोध करते हैं। भारतीय सांस्कृतिक चेतना जिन उदार मानवीय और सार्वभौम तत्वों से निर्मित हुई है उसमें सार्वभौमिक आकर्षण मौजूद है परंतु भारतीय संस्कृति का अतीत साक्षी है कि इसका प्रचार कही भी, कभी भी आग और तलवार के बल पर नहीं किया गया।

भारतीय साहित्य अपने सांस्कृतिक मूलाधार का ऋणी रहा है। 'हिंदी साहित्य की भूमिका' पुस्तक में पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य पर प्राचीन संस्कृत साहित्य के प्रभाव को रेखांकित करते हुए महाभारत और रामायण को असंख्य महाकाव्यों, उपन्यासों, नाटकों, कहानियों का प्रेरक सिध्द किया है। रामायण और महाभारत तो निश्चय ही संपूर्ण भरतीय वांगमय के उपजीव्य ग्रंथ रहे हैं। बौध्द, जैन साहित्य जो पालि, प्राकृत, अपभ्रंश अथवा अन्य देशज् भाषाओं में रचा गया हमारी सांस्कृतिक चेतना का अंग है। हम जाने अनजाने में बुध्द के मध्यम मार्ग के अनुयायी हैं और उसकी करुणा हमारे रक्त में प्रवाहित है। जैनों की अहिंसा संस्कार बन हमारे जीवन को पोषित करती है। साहित्य में जैन और बौध्द साहित्य विद्रोह और विरोध का साहित्य है, परंतु उसे भी भारतीय संस्कृति ने आदर पूर्वक स्वीकार किया है। भगवान बुध्द और वृषभ हमारे यहां विष्णु के अवतार स्वीकार कर लिए गए। सांस्कृतिक दृष्टि से भारत की विशिष्टता यही है कि भारतीय संस्कृति ने यहां पर विजेता बनकर आई जातियों को भी आत्मसात कर लिया और उनकी संस्कृति के सकारात्मक, जीवंत तत्वों को अपने में समेट लिया।

भारत में इस्लाम का प्रवेश एक महत्वपूर्ण घटना है। इससे पूर्व जो आक्रांता आए वे इतने संगठित और सुसंस्कृत न थे कि भारत की समृध्द परंपराओं को चुनौती दे सकते। इस्लाम नवीन चिंतन और समाज-दृष्टि से संपन्न सांस्कृतिक दृष्टि लेकर आया। इस्लाम के आने पर भारतीय संस्कृति को एक नए प्रकार की चुनौती का सामना करना पड़ा। हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में 'संक्षेप में चुनौती का स्वरूप सामाजिक अधिक था, धार्मिक और दार्शनिक कम।' कई कारणों से भारतीय संस्कृति में पतनशीलता आ चुकी थी और उसकी पाचन शक्ति क्षीण हो चुकी थी। पहले धक्के से एक बार लड़खड़ाने के पश्चात फिर एकाएक भक्ति आंदोलन के रूप में भारतीय संस्कृति के प्रवाह ने इस्लामी संस्कृति को भीतर तक भिगो दिया और अपनी भीतरी गंदगी को उठा कर तटों पर फेंक दिया। इस साहित्यिक सांस्कृतिक आंदोलन में से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पुन: स्थापित हुआ। इस महान सांस्कृतिक क्रांति में संपूर्ण भारतवर्ष ने भाग लिया। शिवकुमार मिश्र के शब्दों में -

'इस आंदोलन में पहली बार राष्ट्र के एक विशेष भूभाग के निवासी तथा कोटि-कोटि साधारण जन ही शिरकत नहीं करते, समग्र राष्ट्र की शिराओं में इस आंदोलन की ऊर्जा स्पंदित होती है, एक ऐसा जबर्दस्त ज्वार उफनाता है कि उत्तार, दक्षिण, पूर्व-पश्चिम सब मिलकर एक हो जाते हैं और सब एक दूसरे को प्रेरणा देते हैं, एक दूसरे से प्रेरणा लेते हैं और मिलजुलकर भक्ति के एक ऐसे विराट नद की सृष्टि करते हैं उसे प्रवाहमान बनाते हैं, जिसमें अवगाहन कर राष्ट्र के कोटि-कोटि जनसाधारण जन सदियों से तप्त अपनी छाती शीतल करते हैं, अपनी आध्यात्मिक तृषा बुझाते हैं, एक नया आत्मविश्वास, जिंदा रहने की, आत्मसम्मान के साथ जिंदा रहने की, एक शक्ति पाते हैं।' भक्ति काव्य भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूर्तरूप था। हिंदी साहत्य ने इससे कबीर का सिंहनाद प्राप्त किया जिसने निर्गुण साधना और समतावादी जीवनदृष्टि को अपने काव्य में स्थापित किया। तुलसी का रामचरित मानस आदर्श राम राज्य की परिकल्पना लेकर आया। तुलसी ने क्रूर मुस्लिम राज को राक्षस राज के मिथक में बदल दिया। सूर की रागात्मक आशावादी दृष्टि जीवन में प्यार जगाने लगी और जायसी ने पद्मावत के माध्यम से भारतीय संस्कृति की गरिमा को स्वीकार किया। यह अद्भुत तथ्य है कि भयंकर संघर्षों के बीच रचा गया भक्ति साहित्य पूरी तरह असांप्रदायिक या धर्म निरपेक्ष है। यह भारतीय सांस्कृतिक चिंतन का प्रभाव है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विस्फोट पुन: पुनर्जागरण काल में देखा जा सकता है। राजा राममोहन राय जिस औपनिषदिक ज्ञान को लेकर समाज सेवा की ओर अग्रसर हुए वह शुध्द भारतीय था। स्वामी विवेकानंद ने जिस वेदांत और अद्वैतवाद के आगे पश्चिम को झुकने के लिए विवश किया वह शुध्द भारतीय-सांस्कृतिक चिंतन था। विवेकानंद 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के प्रखरतम विचारक और अजेय योध्दा थे। उनकी धर्म साधना, उनका प्रचार, उनकी दार्शनिकता, उनकी तपस्या, उनके जीवन के सारे क्रिया-कलाप जिस स्रोत से जीवन शक्ति पाते थे वह था राष्ट्रवाद। भारत में रहकर भारतीय शिष्यों के बीच उन्होंने अपने समाज की कमियों को रेखांकित किया, रूढियों पर प्रहार किया, विवशताओं पर आंसू बहाए परंतु पश्चिम में खड़े होकर उन्होंने भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता का सिंहनाद किया और भारत को धर्म-आध्यात्म के क्षेत्र में विश्व गुरु के रूप में स्थापित किया। कभी भूलकर भी भारत की बुराई विदेश में नहीं की और ऐसा करने वालों को मुहतोड़ जवाब दिया। यह कार्य किसी विरक्त संन्यासी का नहीं, कर्मठ देशभिमानी योध्दा का था जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की मजबूत धरती पर स्वतंत्र भारत की नींव रखना चाहता था। महर्षि अरविन्द हो या स्वामी दयानन्द या फिर शरच्चंद्र जैसा साहित्यकार सभी राष्ट्रवाद से प्रेरित थे। भारत का संपूर्ण स्वाधीनता संग्राम अमर बलिदानियों का सुलगता हुआ इतिहास और अहिंसावादियों की आंसुओं में डूबी कहानियां सभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रत्यक्ष रूप है। भारत माता का चित्र, वंदेमातरम् का नारा और तिरंगे की आन के लिए प्राणोत्सर्ग, राष्ट्रीयता के परिचायक हैं। संपूर्ण भारतीय साहित्य में असंख्य साहित्यकारों ने अनेकानेक भाषाओं में भारतीय संस्कृति का यशोगान किया। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पुनर्जागरण अथवा नवजागरण के युग का सत्य था, स्वाधीनता संग्राम का सत्य था इसलिए ब्रिटिश साम्राज्य पराजित हुआ, हमें आजादी मिली।

स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात,् स्वाधीन भारत ने अपनी सांस्कृतिक पहचान संवारने की जगह भुलाने की कोशिश की। भारतीय संस्कृति को सामूहिक या सामाजिक संस्कृति कहकर उसे कोई विशिष्ट पहचान देने से परहेज किया। 'वोट बैंक' की राजनीति हावी हुई और भारत की सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक स्वार्थ का अजगर निगलने लगा। साहित्यकार सत्ताा से आतंकित हुए या आकर्षित या फिर आजादी के पश्चात् दिग्भ्रमित, धीरे-धीरे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राह छोड़ तात्कालिक यथार्थ, कंकड़-पत्थर बटोरने लगे। साहित्य क्रमश: समाज से दूर जा रहा है, उसकी प्रेरणा का स्रोत नहीं बन पा रहा। आज के साहित्यकार जातीय अस्मिता के प्रतीक न बन कर तुच्छ स्वार्थों की पहरेदारी कर रहे हैं।

इस संक्रांति बेला में राष्ट्रवादी संगठनों का चाहे वे किसी भी क्षेत्र में क्रियाशील क्यों न हों यह दायित्व बनता है कि वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का झंडा उठायें, भारतीय संस्कृति के सर्व-समवेशी, सामाजिक रूप की रक्षा करते हुए भी उसकी मूल पहचान को न मिटने दें क्योंकि इससे अलग भारत की कोई पहचान न थी, न है और न हो सकती। वैश्वीकरण के दौर में जहां अस्मिता का संघर्ष और तेज होगा वहां पुन: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के माध्यम से सशक्त भारत, अपराजेय भारत को गढ़ने का काम भारतीय साहित्यकार करते हैं तो साहित्य लेखन को सार्थक करेंगे।
(लेखक हि.प्र. विश्वविद्यालय, शिमला में प्राध्यापक है)