Monday, December 5, 2016

‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श

पटना। भारत हमेशा से ही ज्ञान आराधक राष्ट्र रहा है। भारत की ज्ञान परंपरा औरों से विशेष इसलिए है क्योंकि यह केवल हमारे बाहर मौजूद लौकिक (मटेरियल) ज्ञान को ही महत्वपूर्ण नहीं मानती बल्कि आत्म-चिंतन द्वारा प्राप्त भीतर के ज्ञान को भी समान महत्व देती है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व इन दोनों ही प्रकार के ज्ञान को कड़ी साधना से अर्जित कर ग्रंथो के रूप में मानव समाज के लिए प्रस्तुत किया। आज चाहे योग की बात हो, विज्ञान की या फिर गणित की, पूरी दुनिया ने भारतीय ज्ञान से कुछ न कुछ लिया है। इस प्रकार हम एक श्रेष्ठ ज्ञान परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। यह विचार ‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले व्यक्त किए। अपने रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में इस संविमर्श का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा पटना में किया है।
श्री होसबोले ने कहा की ज्ञान केवल पुस्तकें पढ़कर सूचनाओं को एकत्र करना नहीं है। बल्कि इन सूचनाओं का मानव हित में उपयोग कर पाने की क्षमता ज्ञान है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार पुस्तकों के अलावा, आत्म-चिंतन के द्वारा और विभिन्न प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़कर भी ज्ञान हासिल कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में इस बात तक का उल्लेख किया गया है कि हजारों वर्ष पूर्व किस प्रकार नदियों के रास्तों का भी वैज्ञानिक पद्धति से निर्माण कर उनको प्रवाहित किया गया। उन्होंने भारत की ज्ञान परंपरा के पुनरोत्थान में पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा किये जाने वाले कार्यों की सराहना करते हुए कहा की आज जहाँ कुछ विश्वविद्यालय अपने मूल उद्देश्य से भटक गए हैं, वहीँ यह विश्वविद्यालय सही मायने में ज्ञान साधना कर रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में किये गए अपने महत्वपूर्ण कार्यों को विश्वविद्यालय ने देश के अलग-अलग राज्यों में पहुँचाया है।
संविमर्श की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि आज के परिदृश्य तथा भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए हमें अपने ज्ञान की समृद्ध परंपरा को उपयोग में लाने की आवश्यकता है। आज से हजारों साल पहले जिस प्रकार हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति को समझा था और उसके साथ जैसा सम्बन्ध स्थापित किया था, उसे आज लागू करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा की उस ज्ञान को प्राप्त करने का सबसे प्रभावशाली माध्यम संस्कृत भाषा है, जिसकी आज उपेक्षा हो रही है। उनका मानना है कि आज जिस स्तर पर संस्कृत स्कूल तथा महाविद्यालयों में पढाई जा रही है, वह नाकाफी है। उन्होंने कहा कि आज विश्व को भारत की प्राचीन और समृद्ध ज्ञान की आवश्यकता है, लेकिन हमारे इस ज्ञान के भण्डार को आज पश्चिम के कुछ कथित विद्वान अपनी समझ के अनुसार उसकी व्याख्या करने की चेष्टा कर रहे हैं जबकि आवश्यकता है कि हम उस ज्ञान को भारतीय परंपरा के अनुसार व्याख्या कर दुनिया तक ले जायें ताकि उसमे कोई त्रुटी न हो और उसके औचित्य को सही मायनों में दुनिया को समझा सकें। वहीँ, उद्घाटन समारोह के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शत्रुघ्न प्रसाद ने कहा कि पश्चिमी देशों ने हमेशा से ही अपने ज्ञान परंपरा को हमारे ऊपर थोपने का प्रयास किया है जबकि हमारे देश के विद्वानों ने समय-समय पर इसका विरोध किया। आज आवश्यकता है कि वर्षों से उपेक्षित अपने ज्ञान को आगे लायें।
संविमर्श में सोमवार को ‘भारत में संवाद की परंपरा’ विषय पर काठमांडू विश्वविद्यालय, नेपाल से आये डॉ. निर्मल मणि अधिकारी ने व्याख्यान दिया। उन्होंने भरत मुनि और महर्षि नारद को उल्लेखित करते हुए बताया कि भारत में सदैव लोकहित में संवाद की परंपरा रही है। दूसरे सत्र में ‘भारत में अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र की परंपरा’ विषय पर प्रख्यात साहित्यकार एवं शिक्षाविद प्रो. रामेश्वर पंकज मिश्र ने व्याख्यान दिया। जबकि ‘भारत में अध्यात्म का आधार’ विषय पर बीकानेर से आये स्वामी सुबोधगिरि और ‘आयुर्वेद और जीव विज्ञान की परंपरा’ पर भोपाल से आये वैद्य चन्द्रशेखर ने अपने व्याख्यान दिए।


      आज इन विषयों पर विमर्श : संविमर्श में मंगलवार को वैदिक गणित पर रोहतक के राकेश भाटिया, भारत में विज्ञान की परंपरा पर महाराष्ट्र के प्रो. पीपी होले, डॉ. श्रीराम ज्योतिषी, डॉ. सीएस वार्नेकर, भारत की मेगालिथ रचनाओं की वैज्ञानिकता विषय पर फ़्रांस से आये डॉ. सर्जे ली गुरियक सहित पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. संजय पासवान के व्याख्यान होंगे।

‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श का समापन

पटना। भारतीय परंपरा के अनुसार हमारे चिंतन में कई धाराएँ हैं, लेकिन पश्चिम ने केवल एक ही धारा को समझा और फैलाया। विदेशी ताकतों ने हमेशा से ही हमारी ज्ञान परंपरा को दबाकर रखने की कोशिश की है। हमारे विज्ञान और सेवा भाव को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश की गयी है, जिसके कारण हमने अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा को बहुत हद तक खो दिया है। आज फिर से हमें अपनी ज्ञान परंपरा और सामाजिक व्यवस्था को समझने और अपने तरीके से परिभाषित करने की ज़रूरत है। यह विचार पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने ‘भारतीय की ज्ञान परंपरा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श में व्यक्त किये। यह कार्यक्रम माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा पटना में आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय ने अपने रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में विमर्शों का आयोजन कर रहा है।
श्री पासवान ने कहा की आज हमें अपनी ज्ञान परंपरा, सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली को बाजारवाद से बचने की ज़रूरत है। हमें पश्चिमी सभ्यताओं और विदेशी ज्ञान-विज्ञान को दरकिनार कर अपनी परम्पराओं और मान्यताओं का पुनरोत्थान करते हुए भारतीयता में पूरी तरह रमना होगा। उन्होंने इसके लिए इस बात पर जोर दिया की हमें आज सभी विचारधाराओं के लोगों से संवाद करना होगा और उनको साथ लेकर चलना होगा। जाति व्यवस्था पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा की जातियों के मिटाने की नहीं बल्कि आज उन्हें मिलाने की आवश्यकता है। हमारी परंपरा विविधताओं का सम्मान करने की है और उनमे एकता स्थापित करने की है, जिसे आज अच्छी तरह से व्यवहार में उतारना होगा ताकि भारत पूरे विश्व में एक बड़ी ताकत के रूप में उभर सके।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा की भारतीय ज्ञान को स्थापित करने की नहीं बल्कि इस ज्ञान के व्यापक भंडार को खोजने की ज़रूरत है। प्राचीन ग्रंथों में छुपे इस ज्ञान के खजाने को खोजकर, उसे संवार कर मानव कल्याण के लिए उसको इस्तेमाल में लाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा की आज भारत के शैक्षणिक संस्थाओं को इस कार्य के लिए आगे आना होगा और समर्पित भाव से ऐसी परियोजनाओं में जुटना होगा ताकि कोई बाहरी संस्था या इंसान इस भण्डार की खोजकर उसको एक विकृत रूप में दुनिया के सामने पेश न करे। उन्होंने कहा कि यहाँ का ज्ञान-विज्ञान युगों से प्रकृति के अनुकूल रहा है और इसी कारण भारत की जीवनशैली भी औरों से हमेशा श्रेष्ठ रही है। प्रो. कुठियाला ने कहा की आज इस कार्य को करने में हम पूरी तरह सक्षम हैं आवश्यकता है तो सिर्फ संकल्प की। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग प्राचीन भारतीय ज्ञान की खोज में लगे हैं उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि वह अपने कार्यों को केवल सेमिनार, कांफ्रेंस और पठन-पाठन तक सीमित न रखकर समाज और पूरी मानवता तक लेकर जायें ताकि इससे परम वैभव की स्थिति को प्राप्त किया जा सके। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता विश्वविद्यालय इस कार्य को विद्यार्थियों तक ले जाने की भरपूर कोशिश कर रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार और पांचजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर ने अपने उद्बोधन में कहा की आज पं. दीनदयाल के विचारों को व्यवहार में लाने की आवश्यकता है जिसमें वह समाज और सृष्टि को समझने की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा के उद्द्येश्य, विषयों का चयन, पाठ्यक्रमों में प्रवेश और पात्रता, वातावरण तथा मूल्यांकन जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए ताकि शिक्षा से समाज का पूर्ण विकास हो सके।
सामाजिक कार्यकर्ता स्वांत रंजन ने शिक्षा और ज्ञान को समाज के निचले स्तर तक ले जाने की बात पर जोर दिया और कहा कि ऐसा करने से समाज के हर वर्ग में जागरूकता आयेगी। साथ ही उन्होंने भारत की प्राचीन व्यवस्थाओं और मान्यताओं को समझकर आज के सन्दर्भ में उन्हें इस्तेमाल में लाने की बात कही। श्री रंजन ने पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा किये जा रहे इस अनूठे कार्य की सराहना करते हुए कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान पद्दति को फिर से समझना और इसके लिए विभिन्न जगहों पर जाकर युवाओं और लोगों को प्रेरित करने अपने आप में बेहद प्रशंशनीय कार्य है।

  इससे पूर्व संविमर्श में वैदिक गणित पर रोहतक के राकेश भाटिया, भारत में विज्ञान की परंपरा पर महाराष्ट्र के प्रो. पीपी होले, डॉ. श्रीराम ज्योतिषी, डॉ. सीएस वार्नेकर, भारत की मेगालिथ रचनाओं की वैज्ञानिकता विषय पर फ़्रांस से आये डॉ. सर्जे ली गुरियक ने व्याख्यान दिए। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. सौरभ मालवीय और लोकेन्द्र सिंह ने किया। इस कार्यक्रम में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी, इलेक्ट्रोनिक मीडिया विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्रीकांत सिंह, जनसंपर्क एवं विज्ञापन विभाग के अध्यक्ष डॉ. पवित्र श्रीवास्तव, नॉएडा परिसर से डॉ. अरुण भगत भी शामिल हुए।

Friday, November 4, 2016

सूर्य उपासना का पर्व है छठ पूजा

डॊ. सौरभ मालवीय
छठ सूर्य की उपासना का पर्व है. यह प्रात:काल में सूर्य की प्रथम किरण और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण को अर्घ्य देकर पूर्ण किया जाता है.  सूर्य उपासना का पावन पर्व छठ कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने जाता है. इसलिए इसे छठ कहा जाता है. हिन्दू धर्म में सूर्य उपासना का बहुत महत्व है. छठ पूजा के दौरान क केवल सूर्य देव की उपासना की जाती है, अपितु सूर्य देव की पत्नी उषा और प्रत्यूषा की भी आराधना की जाती है अर्थात प्रात:काल में सूर्य की प्रथम किरण ऊषा तथा सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण प्रत्यूषा को अर्घ्य देकर उनकी उपासना की जाती है. पहले यह पर्व पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता था, लेकिन अब इसे देशभर में मनाया जाता है. पूर्वी भारत के लोग जहां भी रहते हैं, वहीं इसे पूरी आस्था से मनाते हैं.

छठ पूजा चार दिवसीय पर्व है. इसका प्रारंभ कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा कार्तिक शुक्ल सप्तमी को यह समाप्त होता है. इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का कठोर व्रत रखते हैं. इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते. पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी नहाय-खाय के रूप में मनाया जाता है. सबसे पहले घर की साफ-सफाई की जाती है. इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र विधि से बना शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत आरंभ करते हैं. घर के सभी सदस्य व्रती के भोजन करने के उपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं. भोजन के रूप में कद्दू-चने की दाल और चावल ग्रहण किया जाता है. दूसरा दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी खरना कहा जाता है. व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के पश्चात संध्या को भोजन करते हैं. खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को बुलाया जाता है. प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर, दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है. इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है. तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है. प्रसाद के रूप में ठेकुआ और चावल के लड्डू बनाए जाते हैं. चढ़ावे के रूप में लाया गया सांचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में सम्मिलित होते हैं. संध्या के समय बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं. सभी छठ व्रती नदी या तालाब के किनारे एकत्रित होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं. सूर्य देव को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है. चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. व्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं, जहां उन्होंने संध्या के समय सूर्य को अर्घ्य दिया था और सूर्य को अर्घ्य देते हैं. इसके पश्चात व्रती कच्चे दूध का शीतल पेय पीकर तथा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं. इस पूजा में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्जित है. जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां छठ के गीत गाए जाते हैं.

छठ का व्रत बहुत कठोर होता है. चार दिवसीय इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है. इस दौरान व्रती को भोजन तो छोड़ना ही पड़ता है. इसके अतिरिक्त उसे भूमि पर सोना पड़ता है. इस पर्व में सम्मिलित लोग नये वस्त्र धारण करते हैं, परंतु व्रती बिना सिलाई वाले वस्त्र पहनते हैं. महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ पूजा करते हैं. इसकी एक विशेषता यह भी है कि प्रारंभ करने के बाद छठ पर्व को उस समय तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला इसे आरंभ नहीं करती. उल्लेखनीय है कि परिवार में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है.

छठ पर्व कैसे आरंभ हुआ, इसके पीछे अनेक कथाएं हैं. एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और सीता मैया ने उपवास रखकर सूर्यदेव की पूजा की थी. सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था. एक अन्य  कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी थी. इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ, परंतु वह मृत पैदा हुआ. प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे. तभी भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई. उसने कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण वह षष्ठी है. उसने राजा से कहा कि वह उसकी उपासना करे, जिससे उसकी मनोकामना पूर्ण होगी. राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी. एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व का आरंभ महाभारत काल में हुआ था. सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की थी. वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था.  आज भी छठ में सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है.

पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाता था. भारत में वैदिक काल से ही सूर्य की उपासना की जाती रही है. देवता के रूप में सूर्य की वंदना का उल्लेख पहली बार ऋगवेद में मिलता है. विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में इसकी विस्तार से चर्चा की गई है. उत्तर वैदिक काल के अंतिम कालखंड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना की जाने लगी.  कालांतर में सूर्य की मूर्ति पूजा की जाने लगी. अनेक स्थानों पर सूर्य देव के मंदिर भी बनाए गए. कोणार्क का सूर्य मंदिर विश्व प्रसिद्ध है.

छठ महोत्सव के दौरान छठ के लोकगीत गाए जाते हैं, जिससे सारा वातावरण भक्तिमय हो जाता है.
’कईली बरतिया तोहार हे छठी मैया’ जैसे लोकगीतों पर मन झूम उठता है.

Wednesday, October 26, 2016

अंधेरे पर प्रकाश की जीत का पर्व है दीपावली

डॊ. सौरभ मालवीय
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थात्
असत्य से सत्य की ओर।
अंधकार से प्रकाश की ओर।
मृत्यु से अमरता की ओर।
ॐ शांति शांति शांति।।
अर्थात् इस प्रार्थना में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की कामना की गई है. दीपों का पावन पर्व दीपावली भी यही संदेश देता है. यह अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व है. दीपावली का अर्थ है दीपों की श्रृंखला. दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों 'दीप' एवं 'आवली' अर्थात 'श्रृंखला' के मिश्रण से हुई है. दीपावली का पर्व कार्तिक अमावस्या को मनाया जाता है. वास्तव में दीपावली एक दिवसीय पर्व नहीं है, अपितु यह कई त्यौहारों का समूह है, जिनमें धन त्रयोदशी अर्थात धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भैया दूज सम्मिलित हैं. दीपावली महोत्सव कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की दूज तक हर्षोल्लास से मनाया जाता है. धनतेरस के दिन बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है. तुलसी या घर के द्वार पर दीप जलाया जाता है. नरक चतुर्दशी के दिन यम की पूजा के लिए दीप जलाए जाते हैं.  गोवर्धन पूजा के दिन लोग गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर उसकी पूजा करते हैं. भैया दूज पर बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उसके लिए मंगल कामना करती है. इस दिन यमुना नदी में स्नान करने की भी परंपरा है.

प्राचीन हिंदू ग्रंथ रामायण के अनुसार दीपावली के दिन श्रीरामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटे थे. अयोध्यावासियों ने श्रीराम के स्वागत में घी के दीप जलाए थे. प्राचीन हिन्दू महाकाव्य महाभारत के अनुसार दीपावली के दिन ही 12 वर्षों के वनवास एवं एक वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी हुई थी. मान्यता यह भी है कि दीपावली का पर्व भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी से संबंधित है. दीपावली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा दूध के लौकिक सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से प्रारंभ होता है. समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में लक्ष्मी भी एक थीं, जिनका प्रादुर्भाव कार्तिक मास की अमावस्या को हुआ था. उस दिन से कार्तिक की अमावस्या लक्ष्मी-पूजन का त्यौहार बन गया. दीपावली की रात को लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे विवाह किया था. मान्यता है कि दीपावली के दिन विष्णु की बैकुंठ धाम में वापसी हुई थी.
कृष्ण भक्तों के अनुसार इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था. एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था. यह भी कहा जाता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के पश्चात धन्वंतरि प्रकट हुए. मान्यता है कि इस दिन देवी लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं. जो लोग इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं, उन पर देवी की विशेष कृपा होती है. लोग लक्ष्मी के साथ-साथ संकट विमोचक गणेश, विद्या की देवी सरस्वती और धन के देवता कुबेर की भी पूजा-अर्चना करते हैं.

अन्य हिन्दू त्यौहारों की भांति दीपावली भी देश के अन्य राज्यों में विभिन्न रूपों में मनाई जाती है. बंगाल और ओडिशा में दीपावली काली पूजा के रूप में मनाई जाती है. इस दिन यहां के हिन्दू देवी लक्ष्मी के स्थान पर काली की पूजा-अर्चना करते हैं. उत्तर प्रदेश के मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान श्री कृष्ण से जुड़ा पर्व माना जाता है. गोवर्धन पूजा या अन्नकूट पर श्रीकृष्ण के लिए 56 या 108 विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है.

दीपावली का ऐतिहासिक महत्व भी है. हिन्दू राजाओं की भांति मुगल सम्राट भी दीपावली का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया करते थे. सम्राट अकबर के शासनकाल में दीपावली के दिन दौलतखाने के सामने ऊंचे बांस पर एक बड़ा आकाशदीप लटकाया जाता था. बादशाह जहांगीर और मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर ने भी इस परंपरा को बनाए रखा. दीपावली के अवसर पर वे कई समारोह आयोजित किया करते थे. शाह आलम द्वितीय के समय में भी पूरे महल को दीपों से सुसज्जित किया जाता था. कई महापुरुषों से भी दीपावली का संबंध है. स्वामी रामतीर्थ का जन्म एवं महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ था. उन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय समाधि ले ली थी. आर्य समाज के संस्थापाक महर्षि दयानंद ने दीपावली के दिन अवसान लिया था.

जैन और सिख समुदाय के लोगों के लिए भी दीपावली महत्वपूर्ण है. जैन समाज के लोग दीपावली को महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाते हैं. जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थकर महावीर स्वामी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी.  इसी दिन संध्याकाल में उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. जैन धर्म के मतानुसार लक्ष्मी का अर्थ है निर्वाण और सरस्वती का अर्थ है ज्ञान. इसलिए प्रातःकाल जैन मंदिरों में भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण उत्सव मनाया जाता है और लड्डू का भोग लगाया जाता है. सिख समुदाय के लिए दीपावली का दिन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी दिन अमृतसर में वर्ष 1577 में स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ था. वर्ष 1619 में दीपावली के दिन ही सिखों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था.

दीपावली से पूर्व लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई करते हैं. घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य कराते हैं. दीपावली पर लोग नये वस्त्र पहनते हैं. एक-दूसरे को मिष्ठान और उपहार देकर उनकी सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. घरों में रंगोली बनाई जाती है, दीप जलाए जाते हैं. मोमबत्तियां जलाई जाती हैं. घरों व अन्य इमारतों को बिजली के रंग-बिरंगे बल्बों की झालरों से सजाया जाता है. रात में चहुंओर प्रकाश ही प्रकाश दिखाई देता है. आतिशबाज़ी भी की जाती है. अमावस की रात में आकाश में आतिशबाज़ी का प्रकाश बहुत ही मनोहारी दृश्य बनाता है.

दीपावली का धार्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व भी है. दीपावली पर खेतों में खड़ी खरीफ़ की फसल पकने लगती है, जिसे देखकर किसान फूला नहीं समाता. इस दिन व्यापारी अपना पुराना हिसाब-किताब निपटाकर नये बही-खाते तैयार करते हैं.



दीपावली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, लेकिन कुछ लोग इस दिन दुआ खेलते हैं और शराब पीते हैं. अत्यधिक आतिशबाज़ी के कारण ध्वनि और वायु प्रदूषण भी बढ़ता है. इसलिए इस बात की आवश्यकता है कि दीपों के इस पावन पर्व के संदेश को समझते हुए इसे पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाए.

Monday, October 10, 2016

सांस्कृतिक एकता की प्रतीक विजयदशमी


डॊ. सौरभ मालवीय
भारत एक विशाल देश है. इसकी भौगोलिक संरचना जितनी विशाल है, उतनी ही विशाल है इसकी संस्कृति. यह भारत की सांस्कृतिक विशेषता ही है कि कोई भी पर्व समस्त भारत में एक जैसी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है, भले ही उसे मनाने की विधि भिन्न हो. ऐसा ही एक पावन पर्व है दशहरा, जिसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है. दशहरा भारत का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है. विश्वभर में हिन्दू इसे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. यह अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन भगवान विष्णु के अवतार राम ने रावण का वध कर असत्य पर सत्य की विजय प्राप्त की थी. रावण भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण करके लंका ले गया था. भगवान राम देवी दुर्गा के भक्त थे, उन्होंने युद्ध के दौरान पहले नौ दिन तक मां दुर्गा की पूजा की और दसवें दिन रावण का वध कर अपनी पत्नी को मुक्त कराया. दशहरा वर्ष की तीन अत्यंत महत्वपूर्ण तिथियों में से एक है, जिनमें चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा भी सम्मिलित है. यह शक्ति की पूजा का पर्व है. इस दिन देवी दुर्गा की भी पूजा-अर्चना की जाती है. इस दिन लोग नया कार्य प्रारंभ करना अति शुभ माना जाता है. दशहरे के दिन नीलकंठ के दर्शन को बहुत ही शुभ माना जाता है. नवरात्रि में स्वर्ण और आभूषणों की खरीद को शुभ माना जाता है.

दशहरा नवरात्रि के बाद दसवें दिन मनाया जाता है. देशभर में दशहरे का उत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है. जगह-जगह मेले लगते हैं. दशहरे से पूर्व रामलीला का आयोजन किया जाता. इस दौरान नवरात्रि भी होती हैं. कहीं-कहीं रामलीला का मंचन होता है, तो कहीं जागरण होते हैं. दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है. इस दिन रावण, उसके भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं. कलाकार राम, सीता और लक्ष्मण के रूप धारण करते हैं और अग्नि बाण इन पुतलों को मारते हैं. पुतलों में पटाखे भरे होते हैं, जिससे वे आग लगते ही जलने लगते हैं.

समस्त भारत के विभिन्न प्रदेशों में दशहरे का यह पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. कश्मीर में नवरात्रि के नौ दिन माता रानी को समर्पित रहते हैं. इस दौरान लोग उपवास रखते हैं. एक परंपरा के अनुसार नौ दिनों तक लोग माता खीर भवानी के दर्शन करने के लिए जाते हैं. यह मंदिर एक झील के बीचोबीच स्थित है.  हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है. रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुसज्जित पहाड़ी लोग अपनी परंपरा के अनुसार अपने ग्रामीण देवता की शोभायात्रा निकालते हैं. इस दौरान वे तुरही, बिगुल, ढोल, नगाड़े आदि वाद्य बजाते हैं तथा नाचते-गाते चलते हैं. शोभायात्रा नगर के विभिन्न भागों में होती हुई मुख्य स्थान तक पहुंचती है. फिर ग्रामीण देवता रघुनाथजी की पूजा-अर्चना से दशहरे के उत्सव का शुभारंभ होता है. हिमाचल प्रदेश के साथ लगते पंजाब तथा हरियाणा में दशहरे पर नवरात्रि की धूम रहती है. लोग उपवास रखते हैं. रात में जागरण होता है. यहां भी रावण-दहन होता है और मेले लगते हैं. उत्तर प्रदेश में भी दशहरा श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है. यहां रात में रामलीला का मंचन होता है और दशहरे के दिन रावण दहन किया जाता है.

बंगाल, ओडिशा एवं असम में दशहरा दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है.  बंगाल में पांच दिवसीय उत्सव मनाया जाता है. ओडिशा और असम में यह पर्व चार दिन तक चलता है. यहां भव्य पंडाल तैयार किए जाते हैं तथा उनमें देवी दुर्गा की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है. दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है. महिलाएं देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं. इसके पश्चात देवी की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है. विसर्जन यात्रा में असंख्य लोग सम्मिलित होते हैं.

गुजरात में भी दशहरे के उत्सव के दौरान नवरात्रि की धूम रहती है. कुंआरी लड़कियां सिर पर मिट्टी के रंगीन घड़े रखकर नृत्य करती हैं, जिसे गरबा कहा जाता है. पूजा-अर्चना और आरती के बाद डांडिया रास का आयोजन किया जाता है. महाराष्ट्र में भी नवरात्रि में नौ दिन मां दुर्गा की उपासना की जाती है तथा दसवें दिन विद्या की देवी सरस्वती की स्तुति की जाती है. इस दिन बच्चे आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मां सरस्वती की पूजा करते हैं.

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरे के उत्सव के दौरान लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा की जाती है. पहले तीन दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी का पूजन होता है. दूसरे दिन कला एवं विद्या की देवी सरस्वती-की अर्चना की जाती है तथा और अंतिम दिन शक्ति की देवी दुर्गा की उपासना की जाती है. कर्नाटक के मैसूर का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है. मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को प्रकाश से ससज्जित किया जाता है और हाथियों का शृंगार कर पूरे शहर में एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है. इन द्रविड़ प्रदेशों में रावण का दहन का नहीं किया जाता.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दशहरा का बहुत ही अलग तरीके से मनाया जाता है. यहां इस दिन देवी दंतेश्वरी की आराधना की जाती है. दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैं, जो दुर्गा का ही रूप हैं. यहां यह त्यौहार 75 दिन यानी श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है. प्रथम दिन जिसे काछिन गादि कहते हैं, देवी से समारोह आरंभ करने की अनुमति ली जाती है. देवी कांटों की सेज पर विरजमान होती हैं, जिसे काछिन गादि कहा जाता है. यह कन्या एक अनुसूचित जाति की है, जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति अनुमति लेते हैं. बताया जाता है कि यह समारोह लगभग पंद्रहवीं शताब्दी में आरंभ हुआ था. काछिन गादि के बाद जोगी-बिठाई होती है, तदुपरांत भीतर रैनी (विजयदशमी) और बाहर रैनी (रथ-यात्रा) निकाली जाती है. अंत में मुरिया दरबार का आयोजन किया जाता है.इसका समापन अश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाड़ी पर्व से होता है.

दशहरे के दिन वनस्पतियों का पूजन भी किया जाता है. रावण दहन के पश्चात शमी नामक वृक्ष की पत्तियों को स्वर्ण पत्तियों के रूप में एक-दूसरे को ससम्मान प्रदान कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है.
इसके साथ ही अपराजिता (विष्णु-क्रांता) के पुष्प भगवान राम के चरणों में अर्पित किए जाते हैं. नीले रंग के पुष्प वाला यह पौधा भगवान विष्णु को प्रिय है.

दशहरे का केवल धार्मिक महत्व ही नहीं है, अपितु यह हमारी सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है.

Wednesday, July 6, 2016

भारत की पहचान है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद


डॊ. सौरभ मालवीय
''सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'' प्राचीन अवधारणा है. राष्ट्र वही होगा, जहां संस्कृति होगी. जहां संस्कृति विहीन स्थिति होगी, वहां राष्ट्र की कल्पना भी बेमानी है. भारत में आजादी के बाद शब्दों की विलासिता का जबरदस्त दौर कुछ तथाकथित बुध्दिजीवियों ने चलाया. इन्होंने देश में तत्कालीन सत्ताधारियों को छल-कपट से अपने घेरे में ले लिया. परिणामस्वरूप राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत जीवनशैली का मार्ग निरंतर अवरुद्ध होता गया. अब अवरुद्ध मार्ग खुलने लगा है. संस्कृति से उपजा संस्कार बोलने लगा है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है, जो सदियों से चली आ रही है. यह सांस्कृतिक एकता है, जो किसी भी बंधन से अधिक मजबूत और टिकाऊ है, जो किसी देश में लोगों को एकजुट करने में सक्षम है और जिसमें इस देश को एक राष्ट्र के सूत्र में बांध रखा है. भारत की संस्कृति भारत की धरती की उपज है. उसकी चेतना की देन है. साधना की पूंजी है. उसकी एकता, एकात्मता, विशालता, समन्वय धरती से निकला है. भारत में आसेतु-हिमालय एक संस्कृति है. उससे भारतीय राष्ट्र जीवन प्रेरित हुआ है. अनादिकाल से यहां का समाज अनेक संप्रदायों को उत्पन्न करके भी एक ही मूल से जीवन रस ग्रहण करता आया है. भारतीय संस्कृति की नींव गंगा, गायत्री, गौ, गीता पर खड़ी है. ज्ञान-कर्म-शील-सातत्य इसकी सुदृढ़ दीवारें हों. धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की छत का जिसे संरक्षण मिला है तथा इसमें विराजती है, उस विराट की प्रतिमा जो सत्य, सुन्दर, शिव है. कर्म यहां का जीवन है, पूजा है. यहां अधिकार की आराधना नहीं, कर्म की ही उपासना होती है. हमने इसे पूजा है, कभी राम के रूप में, कभी कृष्ण के रूप में. भारतीय संस्कृति, संश्लेषण की संस्कृति है, विश्लेषण का विज्ञान नहीं. समन्वय इसका स्वभाव है. टूटना इसका चरित्र नहीं. आस्था इसकी डगर है और विश्वास इसका पड़ाव. न कोई भटकाव है और न कोई विभ्रम.
प्रचलित राष्ट्रवाद की परिभाषा भूगोल पर आधारित है, देश व राष्ट्र समुद्रों, पर्वतों, नदियों, रेगिस्तानों की सीमाओं से बंधे हो. यूरोपीय विद्वानों के मतानुसार राष्ट्रीयता की भावना सर्वप्रथम 1789 में हुई फ्रेंच जाति के बाद उभरकर सामने आई. पेंग्विन डिक्श्नरी ऑफ सोशियॉलाजी में राष्ट्रीयता की भावना अट्ठारहवीं शताब्दी में सर्वप्रथम यूरोपीय देशों में न्याय राज्य निर्माण होकर वहीं के मानव समूहों को राष्ट्र का स्वरूप प्राप्त हो गया. यूरोप के मानचित्रों पर जर्मन राष्ट्र का प्रादुर्भाव 1871 में हुआ. फिर इटली का एकीकरण हुआ और धीरे-धीरे राष्ट्रीयता की अवधारणा यूरोप के अन्य देशों में भी फैल गई. यूरोपीय देशों के साम्राज्यवादी एवं बौध्दिक विस्तार के फलस्वरूप राजनीतिक राष्ट्रीयता के विचार का प्रसार अन्य देशों में भी फैल गया. चूंकि वे शासक थे, इसलिए उनकी बात को यूरोपीय विद्वानों के साथ-साथ गैर यूरोपीय विद्वानों ने भी स्वीकार्य कर लिया. प्रभुसत्ता ने जिस-जिस भूमि पर अधिकार (कब्जा) किया, वो उनका राष्ट्र बनता गया. तिब्बत की राष्ट्रीयता को समाप्त करके चीन ने अपनी प्रभुसत्ता बनाई. इजराइल और फिलिस्तीन ने कब्जे के आधार पर देश या राष्ट्र को परिभाषित किया. राजनीतिक विचारधारा आधारित राष्ट्र साम्यवाद, पूंजीवाद इत्यादि, जाति आधारित यूरोप को अंग्रेजों हब्शियों (नीग्रो) पूजा पध्दति आधारित सभी राष्ट्र जिसमें इस्लाम का राजसत्ता का संरक्षण प्राप्त है. इसी प्रकार राष्ट्रपति बुश का ईसाइयों और मुस्लिमों में भी पूजा पध्दति का मतभेद होने के कारण ये राष्ट्र क्रियात्मक नहीं हो पाते. हिन्दू धर्म में भी अनेक विश्वास और पूजा पध्दतियां हैं, जिसके कारण जैनियों का राष्ट्र या सिक्खों का राष्ट्र जैसी कल्पनाएं अव्यवहारिक/संस्कृति आधारित राष्ट्र व पूरे या यूरोप की समान संस्कृति यूरोपियन संघ बना हुआ है. अमेरिका में विभिन्न जातियों के एक साथ रहने का कारण भी सांस्कृतिक हो सकता है, क्योंकि पिछले चार सौ वर्षों की एक विशेष संस्कृति वहां पर उत्पन्न हुई है, हिन्दू जीवन दर्शन पर आधारित संस्कृति जहां-जहां है, उनको भारतीय या हिन्दू राष्ट्र की कल्पना में सम्मिलित किया जा सकता है, इसमें भौगोलिक सीमाओं का महत्व कम हो जाता, नागरिकता और राष्ट्रीयता में अंतर कम हो जाता है. भारत एक प्राचीन राष्ट्र है और इसकी राष्ट्रीयता का आधार है संस्कृति - उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्, वर्ष तद् भारतं नाम भारती यत्र संतति: पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित तथाकथित एक ऐसा वर्ग है जो इसे राष्ट्र नहीं मानता. ''काफिले आते रहे, कारवां बनता रहा'' या Nation is making. राष्ट्र, राज्य एवं देश को एक ही मानने या इनके अंतर को न समझने के कारण ये तथाकथित प्रगतिशील लोग भ्रमजाल फैलाते रहते हैं. प्रादेशिक राष्ट्रवाद की संकल्पना यूरोप में राज्यों के अभ्युदय के साथ प्रमुखता से उभरी. एक निश्चित भूखंड, उसमें रहने वाला जन, एक शासन एवं उसकी संप्रभुता को राष्ट्र कहा गया. कालांतर में राजनीतिक स्वरूप के कारण राष्ट्र एवं राज्य को समान अर्थों में प्रयोग में लाया जाने लगा. संयुक्त राष्ट्र संघ राष्ट्र शब्द को प्रयोग में लाया. राज्य एवं देश बनते-बिगड़ते रहे एवं संयुक्त राष्ट्र संघ उन्हें मान्यता देता रहा फलत: राष्ट्र एवं राज्य का अंतर समझने में भूल होती रही. मगर पश्चिमी परिभाषा की कसौटी पर भारत एक राष्ट्र नहीं, क्योंकि एक शासन नहीं. अंग्रेजों एक शासन के अंदर इसे लाए. अत: उसे राष्ट्र बनाने का श्रेय दिया गया. इजराइल भी एक राष्ट्र नहीं, क्योंकि वहां जन (इजराइली) था ही नहीं. द्वितीय विश्व युध्द के बाद अनेक राष्ट्रों को षडयंत्रपूर्वक तोड़ा गया. जर्मन-पूर्वी एवं पश्चिमी जर्मनी, वियतनाम उत्तरी एवं दक्षिणी वियतनाम, कोरिया-उत्तरी एवं दक्षिणी कोरिया, लेबनान उत्तरी एवं दक्षिणी लेबनान आदि. भारत का विभाजन भी 1947 में द्विराष्ट्रीयता के आधार पर हुआ. हिन्दू एवं मुस्लिम दो राष्ट्रीयता हैं अत: दो राष्ट्र होने चाहिए. जर्मनी, वियतनाम, कोरिया, लेबनान आदि टूटे अवश्य पर उन्होंने अपनी राष्ट्रीयता को नहीं छोड़ा, पर दुर्भाग्यवश भारत का जो विभाजन हुआ वह एक अलग स्वरूप में हुआ. पूर्वी हिन्दुस्तान, पश्चिमी हिन्दुस्तान एवं मध्य हिन्दुस्तान- अगर इस रूप में रहता तो हिन्दुस्तानी राष्ट्रीयता जिंदा रहती. पंथ राष्ट्रीयता है, तो फिर इस्लाम एवं ईसाई मत वालों का एक ही राष्ट्र होना चाहिए था- यह प्रश्न नहीं उठाया गया. पंथ को राष्ट्रीयता मानने के कारण ही नागालैंड एवं मिजोरम में अलगाववाद ने हिंसक रूप धारण किया. इसी धारणा के कारण पंजाब में भी अलगाववाद उभारने का असफल प्रयास हुआ. सिक्खों ने सवाल किया कि हिन्दू, मुस्लिम सिख, ईसाई-आपस में हैं भाई-भाई. अगर दो भाइयों का बंटवारा 1947 में हो गया तो हमें भी अलग करो. इसी तरह पाकिस्तान भाषा (बंगला-उर्दू) को राष्ट्रीयता मानकर दो भागों में टूट गया. अगर भाषा राष्ट्रीयता है तो फिर सभी अंग्रेजी बोलने वालों का एक राष्ट्र क्यों नहीं? इंग्लैण्ड एवं आयरलैंड आपस में क्यों लड़ते हैं? भारत में भी एक ऐसा वर्ग है, जो भाषा को राष्ट्रीयता मानकर इस देश को बहुराष्ट्रीयता (Multi Nationality, Mix Culture) बहु सांस्कृतिक राज्य कहता है. गुजराती संस्कृति, पंजाबी संस्कृति, उड़िया संस्कृति, तेलुगु संस्कृति, कन्नड़ संस्कृति, मराठी संस्कृति, तमिल संस्कृति आदि शब्दों का प्रयोग करता है और लोग भी अपनी ''संस्कृति की पहचान'' के नाम पर अलगाववाद के नारे लगाने लगते हैं. यह संस्कृति नहीं बोली (भाषा) है. 1989 में विश्व पटल पर कुछ घटनाएं घटीं, जिसके कारण राष्ट्रीयता पर एक बहस उभर कर सामने आई सोवियत संघ विभाजित होकर 15 भागों में टूट गया. राष्ट्रीयता को नकार कर राज्य को सर्वोपरि मानने वाले वामपंथी राष्ट्रीय एकता की बात करने लगे. ''भारत में अनेक राष्ट्रीयता हैं'' इसकी वकालत करने वाले सोवियत संघ का उदाहरण देकर यह दावा करते थे कि राष्ट्रीयता से ऊपर राज्य है. साम्यवाद के विस्तार में वे राष्ट्रीयता को बाधक मानते थे. पंथ, भाषा से ऊपर उठकर यहां का जन एक है. अतीत के सुख-दुख की उसे समान अनुभूति है- इसी अनुभूति के कारण वह इस भूमि को मातृभूमि-मोक्ष भूमि मानता है. उसकी नागरिकता भले कुछ भी हो जाये पर इस राष्ट्र से बाहर जाकर भी इस मिट्टी से वह जुड़ा हुआ है. केरल के शंकराचार्य ने चार-पीठ की स्थापना की ज्योतिपीठ (उत्तरांचल), श्रृगेरीपीठ (कर्नाटक), गोवर्धन पीठ (उड़ीसा), शारदापीठ (गुजरात). उन्होंने एक भी पीठ केरल में स्थापित नहीं की- मलयालम संस्कृति या मलयालम को राष्ट्रीयता मानने वालों को इसका उत्तर देना होगा. चार धाम, चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, नासिक, उज्जैन) पर लगने वाले कुंभ, द्वादश ज्योर्तिलिंग - 52 शक्तिपीठ हमारी राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रीय एकात्मता के प्रतीक हैं. गंगा को मोक्ष दायिनी सभी मानते हैं. आत्मवत सर्व भूतेषु एक सद् विप्रा बहुधा वदन्ति, पुनर्जन्म में विश्वास - हमारी संस्कृति के ये मूल तत्व हैं. हमारी विविधता हमारी संस्कृति की महानता को प्रकट करता है. इस विविधता को राष्ट्रीयता का नाम देकर अलगाववाद की वकालत करने वालों को पराजित करना होगा.
''न मे वाछास्ति यशोस विद्वत्व न च वा सुखे
प्रभुत्वे नैव वा स्वेग्र मोखेप्यानंददयके
परन्तु भारते जन्म मानवस्य च वा पशो:
विहंगस्य च वा जन्तों: वृक्षपाषाणयोरपि''
अर्थात् मुझे यश, विद्वता, किसी अन्य सुख या राजनीतिक प्रभुता की इच्छा नहीं है और न मैं स्वर्ग या मोक्ष की ही कामना करता हूं. परंतु मैं चाहता हूं कि भारत में ही मेरा पुनर्जन्म हो भले ही वह मानव, पशु, जंतु, वृक्ष या पाषाण के रूप में क्यों न हो.

Sunday, May 15, 2016

विचार कुंभ : परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास


डॊ. सौरभ मालवीय
मध्यप्रदेश के उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ कुंभ के दौरान 12 से 14 मई तक निनौरा में तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ का आयोजन किया गया. इस दौरान धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर भी खुलकर चर्चा की गई. वक्ताओं ने कृषि, पर्यावरण, शिक्षा, संस्कृति, भाषा, चिकित्सा, स्वच्छता, महिला सशक्तिकरण आदि विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए देश और समाज के उत्थान पर बल दिया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विचार कुंभ को संबोधित करते हुए संत-महात्माओं से आग्रह किया कि वे धरती की समस्याओं पर प्रतिवर्ष सात दिन का विचार कुंभ आयोजित करें. उन्होंने कहा कि आदिकाल से चले आ रहे कुंभ के समय और कालखंड को लेकर अलग-अलग मत है, लेकिन इतना निश्चित है कि यह मानव की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्था में से एक है. इस विशाल भारत को अपने में समेटने का प्रयास कुंभ मेले के माध्यम से ही होता है. उन्होंने कहा कि समाज की चिंता करने वाले ऋषि-मुनि 12 वर्ष में एक बार प्रयाग में कुंभ में एकत्रित होते थे, जिसमें वे विचार विमर्श करते हुए विगत वर्ष की सामाजिक स्थिति का अध्ययन करते थे, उसका विश्लेषण करते थे. इसके साथ ही समाज के लिए आगामी 12 वर्षों की दिशा तय करके योजना बनाते थे. उन्होंने कहा कि प्रयाग से अपने-अपने स्थान पर जाकर संत महात्मा योजना पर कार्य करने लगते थे. इतना ही नहीं तीन वर्ष में उज्जैन, नासिक, इलाहाबाद में होने वाले कुंभ में जब वे एकत्रित होते थे, तब विमर्श करते थे कि प्रयाग में जो योजना बनाई गई थी, उस पर क्या कार्य हुआ और क्या नहीं हुआ. तत्पश्चात आगामी तीन वर्ष की योजना बनाई जाती थी. यह एक अद्भुत सामाजिक संरचना थी,  परंतु समय के साथ इसके रूप में परिवर्तन आया. अब कुंभ केवल डुबकी लगाने, पाप धोने और पुण्य कमाने तक ही सीमित होकर रह गया है.   उन्होंने कहा कि विचार कुंभ के माध्यम से उज्जैन में एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ है. यह प्रयास शताब्दियों पुरानी परंपरा का आधुनिक रूप है. इस आयोजन में वैश्विक चुनौतियों और मानव कल्याण के क्या प्रयास हो सकते हैं, इस पर विचार हुआ है. इस मंथन से जो 51 अमृत बिंदु निकले है, अब उन पर कार्य होना चाहिए. उन्होंने उपस्थित साधु-संतों और अखाड़ों के प्रमुख से आह्वान किया कि वे इन 51 अमृत बिंदुओं पर प्रतिवर्ष एक सप्ताह का विचार कुंभ अपने भक्तों के बीच करने पर विचार अवश्य करें, ताकि विचारों को मूर्त रूप दिया जा सके.

विचार कुंभ को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि विकास करते समय प्रत्येक देश की प्रकृति का विचार करना चाहिए. ऐसा ही परिवर्तन दुनिया की वैचारिकता में दिखाई दे रहा है. विविधता को स्वीकार किया जा रहा है और दुनिया कहने लगी है कि विविधता को अलंकार के रूप में देखना चाहिए, दोष के रूप में नहीं. अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि विविधता को स्वीकार कर सम्मानित करना चाहिए, केवल सहिष्णुता नहीं, उससे भी आगे जाना है. उन्होंने कहा कि अस्तित्व के लिए संघर्ष करने के बजाय अब समन्वय की ओर जाना पड़ेगा, धीरे-धीरे सभी लोग यह मानने लगे हैं. व्यवस्था समतायुक्त और शोषणमुक्त होनी चाहिए. जब तक सभी को सुख प्राप्त नहीं होता, तब तक शाश्वत सुख दिवास्वप्न है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत में जन्म लेने वाले लोगों की दो माताएं हैं, एक जन्म देने वाली और दूसरी भारत माता. जन्म देने वाली माता के कारण शरीर मिला, मातृभूमि के कारण संस्कार मिला, पोषण मिला. उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा के अनुसार सारे जीव सृष्टि की संतानें हैं. मनुष्यता का संस्कार देने वाली सृष्टि है. मध्य प्रदेश में कुंभ की वैचारिक परंपरा को पुनर्जीवित किया जा रहा है. आज विश्वभर के चिंतक, विचारक एक हो गए हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से कहा गया है कि सनातन परंपरा में इन सत्यों की बहुत पूर्व से जानकारी है. आज के परिपेक्ष्य में हमें सनातन मूल्यों के प्रकाश में विज्ञान के साथ जाना होगा. यह करके विश्व की नई रचना कैसी हो, इसका मॉडल अपने देश के जीवन में देना होगा.

जूना पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि अगली सदी भारत की सदी है, क्योंकि जब पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति थक जाएगी, तब भारत के आध्यात्मिक नेतृत्व की आवश्यकता होगी. भारत की भूमि से ही आध्यात्मिक मार्ग निकलेगा, जो विश्व का मार्गदर्शन करेगा. उन्होंने कहा कि मनुष्य की दो विशेषता प्रधान हैं कर्म की स्वायत्तता और चिंतन की स्वतंत्रता. मनुष्य का संकल्प जैसा होगा उसकी सिद्धि भी वैसी ही होगी. संकल्प की पवित्रता से सकारात्मकता आती है. उन्होंने कहा कि विश्व में गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिए अच्छा वातावरण उत्पन्न करने की आवश्यकता है. अधिकारों के प्रति जाग्रति तो बढ़ी है, परंतु कर्त्तव्यों के प्रति विस्मृति भी बढ़ी है. वर्तमान समय में परोपकार की प्रवृत्ति पैदा करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि यह विचार-कुंभ विश्व को अधिक से से अधिक वृक्ष लगाने और पृथ्वी को हरा-भरा बनाने का संदेश देगा. उन्होंने क्षिप्रा नदी के किनारे वृहद वृक्षारोपण का आह्वान किया,  ताकि हरित क्षेत्र बढ़ सके. श्री चिदानंद स्वामी ने कहा कि नदियों के किनारे इतना पेड़ लगाएं कि हरित क्षेत्र बन जाए. जन्मदिन पर पेड़ लगाएं और पेड़ लगाने का बहाना तलाशें.

योगगुरु और पतंजलि आयुर्वेद के प्रमुख बाबा रामदेव ने कृषि एवं कुटीर उद्योग पर चर्चा करते हुए कहा कि देश की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए कुटीर उद्योग की वस्तुओं को अपनाना होगा. कुटीर उद्योग का बहुत बड़ा क्षेत्र है और यह आवश्यक है कि इसे आम जनता प्रोत्साहित करे. उन्होंने कहा कि अगर हम हाथ से बने सामान का ही उपयोग करने लगें, तो इसका लाभ कर्मकारों के साथ देश को भी होगा, क्योंकि तब देश की मुद्रा बाहर नहीं जाएगी.  हमें सूती कपड़े पहनने चाहिए, जिससे भारतीय बुनकरों, कामगारों को काम मिल सके. उन्होंने कहा कि स्वदेशी को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां बनाई जानी चाहिए. उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे भी कुटीर उद्योग की ओर बढ़ें और जो लोग प्रशिक्षण हासिल करके शैम्पू, साबुन आदि बनाना चाहते हैं, उन्हें वह प्रशिक्षण देंगे.

इस अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राम माधव ने कहा कि जीवन को सुलभ और सरल बनाने के लिए भारतीय पुरातन शास्त्रों का परायण करना चाहिए. सर्वे भवन्तु सुखिनः की अवधारणा का पालन का करना चाहिए. अच्छे के साथ अच्छा और बुरे का साथ भी अच्छा करना चाहिए.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विचार महाकुंभ के उद्देश्य की चर्चा करते हुए कहा कि कुंभ का संबंध ही विचार-मंथन से है. उन्होंने कहा कि संतों की विचार प्रक्रिया से कल्याणकारी राज्य का कल्याण हो, यही उददेश्य है. भारत में सभी तरह के विचारों, विचार-पक्रियाओं और दर्शन का आदर किया गया है. सभी को पर्याप्त आदर और सम्मान है. आज के समय में सबसे बडी चिंता यह है कि मानव जीवन गुणवत्तापूर्ण कैसे हो. कौन से तरीके और व्यवहार हैं, जिनसे मानव जीवन सुखी और अर्थपूर्ण बन सकता है. विज्ञान और आध्यात्मिकता या दोनों के परस्पर मेल से यह संभव है. इसलिए इस पर विचार करना आवश्यक है. विज्ञान और अध्यात्म दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग, परंपरागत खेती, मूल्य आधारित जीवन, धर्म और आध्यात्म जैसे विषयों का वैश्विक महत्व है. उन्होंने महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने पर बल दिया. इसके साथ ही उन्होंने राज्य सरकार की योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्ता के सूत्र शक्ति रूपा महिलाओं हाथ में सौंपेंगे. पुलिस सहित अन्य विभागों की भर्ती में 33 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण मिलेगा. अगले शैक्षणिक सत्र से शिक्षा के पाठ्यक्रम में महिला सशक्तिकरण, आत्म निर्भरता, स्वाभिमान, संवेदनशीलता के पाठ शामिल किए जाएंगें. किसी भी विज्ञापन में नारी देह के प्रदर्शन को प्रतिबंधित किया जाएगा और इसके लिए हम कानून भी बनाएंगे. महिला मजदूरों को समान कार्य का समान वेतन दिया जाएगा. मध्यप्रदेश में शराब की कोई भी नई दुकान नहीं खोली जाएगी और नशामुक्ति अभियान चलाया जाएगा. राज्य को शक्ति प्रदेश बनाएंगे, जिसमें महिलाओं को संपूर्ण अधिकार दिए जाएंगे. बेटा-बेटी बराबर हैं, यह जनअभियान चलाया जाएगा.

साध्वी ऋतम्भरा ने कहा कि नारी निकेतन किसी समस्या का हल नहीं है. नारी को आंतरिक और बाहरी रूप से सशक्त बनाने के लिए नीति बनाने की आवश्यकता है. महिलाओं को रोटी कमाने लायक बनाए.

श्रीमती मृदुला सिंन्हा ने कहा कि महिलाओं के लिए विशेष योजनाओं की महती आवश्यकता है. शिक्षा पाठ्यक्रमों में नारी उत्थान के पाठ शामिल किए जाने चाहिए. बच्चों को चाहिए कि वे माता-पिता को वृद्धाश्रम नहीं भेजें. उन्होंने कहा कि विवाह करना अनिवार्य नहीं, बल्कि आवश्यक है. इस संबंध को निभाना चाहिए.
सुश्री साध्वी भगवती ने कहा कि बड़ा होना जरूरी नहीं, बल्कि बढ़िया होना जरूरी है, यह भाव भारतीय जनमानस में पैदा करने हेतु अभियान चलाया जाना चाहिए. नारी के अंदर विद्यमान अच्छे संस्कारों को प्रोत्साहित करने हेतु शुभ शक्ति नामक योजना संचालित की जानी चाहिए.

शिव भरत गुप्त ने कहा कि स्त्री के चरित्र को लांक्षित करने वाले लोगों और कथनों को रोकने के लिए एक विशेष कानून होना चाहिए. स्त्री की प्रकृति के अनुरूप रॊल मॊडल तैयार करना चाहिए, जो उनके अनुकूल हो. स्त्रियों के सशक्तिकरण के लिए केवल आरक्षण एक मात्र समाधान नहीं है, उसके लिए एक सोशल रॊल मॊडल तैयार करना होगा, ऐसी सामाजिक और नई संस्थाएं बनानी होंगी, जिससे परिवार और बच्चों के साथ-साथ महिलाओं के अकेलेपन को दूर किया जा सके, इसके लिए भी महिलाओं को ही जिम्मेदारी सौंपनी होंगी.
यूएन वीमेन की सदस्य अंजू पांडे ने कहा कि कार्यशील महिलाओं के कार्य या गृह कार्य का भी मूल्यांकन होना चाहिए. महिलाओं के अनपेड वर्क पर ध्यान केन्द्रित कर उस पर भी विमर्श होना चाहिए. पुरुषों की मानसिक स्थिति बदलने के लिए भी सरकारी प्रयास किए जाने चाहिए.

सुश्री निवेदिता बिड़े ने कहा कि समाज में महिलाओं के प्रति सोच बदलने एवं उनका आदर करने के लिए जनजाग्रति हेतु योजनाएं बनाई जाएं. स्त्री-पुरूष में समानता एवं भ्रूण हत्या रोकने से समाज में एकात्मता एवं आत्मीयता का भाव उत्पन्न होगा.
सुश्री गीता बलवंत गुण्डे ने कहा कि समाज में लिंग भेद के प्रति सामाजिक संवेदना पैदा करने की आवश्यकता है. भारतीय विकास की अवधारणा के आधार पर बाल विकास को मॊडल बनाया जाना चाहिए. शिक्षा के द्वारा महिलाओं में आत्मविश्वास को बढ़ाए जाने की नीति बनाने की आवश्यकता है.
स्वामिनी विमला नंदनी ने कहा कि बच्चों में बाल्यकाल की आयु में संपूर्ण विकास की कार्ययोजना बने. मां के गर्व से ही कन्या के प्रोत्साहन को बढ़ावा दिया जाए.

विचार कुंभ में 45 देशों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया. विभिन्न मुद्दों पर विदेशी वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे. श्रीलंका के वरिष्ठ सलाहकार सतत विकास एवं वन मंत्रालय मिस्टर उच्चिता डि जोयसा ने पर्यावरण परिवर्तन और सतत विकास पर चर्चा करते हुए कहा कि हमें विकास के साथ संरक्षण पर बल देना चाहिए. सतत स्थाई विकास पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए. भविष्य की पीढ़ी और पर्यावरण को ध्यान में रखकर ही विकास करना चाहिए. विश्व के 193 देशों के द्वारा न्यूयार्क में किए गए पर्यावरणीय विमर्श और उसके निष्कर्षों को संपूर्ण विश्व में लागू किए जाने के प्रयास किए जाने चाहिए. पृथ्वी के भविष्य पर चिंतन करना अनिवार्य है. पर्यावरणीय स्तर पर नवीन विश्व नीति को तैयार करना चाहिए. गरीबी के लिए भोजन, स्वास्थ्य, स्वच्छ जल, प्रदान करने हेतु प्रयास किए जाने चाहिए.

अमेरिका के न्यूयार्क स्थित सिटी यूनिवर्सिटी की प्रो. रेबेक्का ब्रेट्सपीस ने कहा कि भोजन के मानकीकरण और फूड सिक्योरिटी को बढ़ावा देने के साथ ही भोजन की बर्बादी को राकने हेतु विशेष प्रयास किए जाने चाहिए.
अमेरिका की ओक्लाहामा यूनिवर्सिटी के डॊ. सुभाष ने कहा कि प्राचीन धंधों या प्राचीन व्यवसाय पद्धतियों को लुप्त होने से बचाने का प्रयास करना चाहिए. भारतीय संस्कृति के पर्यावरणीय पक्षों को उजागर करने पर बल देना चाहिए. आत्म विद्या और प्राचीन भारतीय विज्ञान को प्रसारित करना चाहिए. जड़-चेतनमय विज्ञान के विकास पर बल देना चाहिए.
संयुक्त राज्य अमेरिका से आए वैदिक शिक्षाविद डेविड फ्राले (पंडित वामदेव शास्त्री) ने कहा कि आयुर्वेद और योग वेदांत का आधुनिकीकरण करना चाहिए, ताकि वह अत्यधिक प्रभावी बन सके. एलोपैथिक की अपेक्षा आयुर्वेद पर विशेष बल दिया जाना चाहिए. आयुर्वेद और योग की शिक्षा प्रत्येक बच्चे को बाल्यावस्था से दिया जाना अनिवार्य होना चाहिए. संयुक्त राज्य अमेरिका के ही वैदिकवेत्ता माइकल ए. क्रीमो (धु्रपद कर्मा) ने कहा कि वैदिक ज्ञान और संस्कृति के अध्ययन को बढ़ावा देना चाहिए. शांति और सद्भाव के गुरुकुल शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

अमेरिका से आई योगिनी साम्भवी ने कहा कि समझ हमारी मूल प्रकृति है, सबसे पहले हमें अपने आप को ही समझने की आवश्यकता है.
दक्षिण कोरिया के प्रो. गी लोंग ली ने कहा कि दर्द से हमें भागना नहीं चाहिए, हम इसी के माध्यम से विवेक, मुक्ति और निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं.
जापान से आए यसुआ कामाता ने कहा कि हर किसी को पूर्णतावादी सोच की ओर बढ़ना चाहिए. संकीर्ण मानसिक स्थिति से बचना चाहिए.
थाइलैंड से आए पर्यावरणविद् बिक्कुनी धर्मनंदा ने कहा कि महिलाओं पहले से ही सशक्त हैं, बस उनकी शक्ति को छीना न जाए, उन्हें आगे बढ़ने का भरपूर मौका दिया जाना चाहिए. उन्हें आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर प्रदान करने चाहिए.
कम्बोडिया के गेसी सम्पटेन ने कहा कि योग मनुष्य का अंतिम सत्य है, और किसी किताब से आप इसे नहीं सीख सकते, इसे केवल अभ्यास से ही सीखा जा सकता है. अतः योग और ध्यान के व्यावहारिक पहलू पर ध्यान देना चाहिए.
कम्बोडिया के ही सॊन सुबर्ट ने कहा कि किसान जो हमारा पेट भरते हैं, उनके आत्म सम्मान और गरिमा का सरकार विशेष ध्यान रखना चाहिए.

बांग्लादेश के मुख्य सूचना आयुक्त मोहम्मद ग़ुलाम रहमान ने कहा कि मीडिया को महिलाओं के सकारात्मक स्वरूप और उनके लिए अनुकूल वातावारण को तैयार करने हेतु भरसक प्रयास करने चाहिए.
डॊ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि मीडिया की स्वतंत्रता के साथ उसकी विश्वसनीयता बनी रहे, इसके लिए भारतीय प्रेस परिषद की तरह एथिकल रेगुलेटरी अथॊरिटी बनाने की आवश्यकता है. बार काउंसिल ऒ इंडिया की तरह ही पत्रकारों का भी पंजीकरण जरूरी होना चाहिए. पत्रकार बनने के लिए न्यूनतम मानदंड स्थापित करने की आवश्यकता है.
श्री सक्रांत सानु ने कहा कि पारम्परिक शिक्षा पद्धति को पुनर्जीवित करना होगा. मीडिया की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए पत्रकारों को प्राप्त सुविधाओं का पत्रकारों द्वारा खुलासा किया जाना चाहिए. कोई भी देश अपनी भाषा के बिना विकसित नहीं हो सकता, लिहाजा मातृभाषा में शिक्षण तंत्र को विकसित करने की आवश्कता है.
प्रो. टीएन सिंह ने कहा कि शिक्षात्मक उपलब्धियों को जनमाध्यमों द्वारा सही माध्यम से सही लोगों तक पहुंचाना चाहिए. मीडिया को खबरें उन्हीं संदर्भों में दिखानी चाहिए, जो समाज के लिए उपयोगी हैं. शिक्षा के क्षेत्र में जो अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें मीडिया द्वारा महत्व दिया जाना चाहिए.
डॊ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने स्वच्छता पर चर्चा करते हुए कहा कि जिस ग्रामीण परिवार के पास अपना शौचालय नहीं होगा, उसे चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि किसी भी कीमत पर पानी को खुला न छोड़ा जाए.
पांडिचेरी स्थित अरविन्दो आश्रम के श्रद्धालु रनाडे ने कहा कि हर किसी को चाहिए कि वह अपने में सातत्य भाव, एकत्व भाव, अनन्तता बोध और भारतीय बोध का विस्तार करता करे.

विचार कुंभ आयोजन समिति के अध्यक्ष अनिल माधव दवे ने जैविक खेती को प्रोत्साहित करने पर बल देते हुए कहा कि किसानों को शून्य बजट खेती के लिए (सुभाष पालेकर मॊडल) प्रेरित किया जाए. देशी गायों को प्रत्येक परिवार में पाल कर कृषि को संबल दिया जा सकता है.

अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ के आयोजन के माध्यम से भारत की गौरवशाली परंपरा को जीवित रखने का प्रयास किया गया. जिस प्रकार वक्ताओं ने देश और समाज से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया और जनहित में कार्य करने का आह्वान किया, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि विचार महाकुंभ अपने उद्देश्य में सफ़ल रहा है.

Friday, May 6, 2016

साहित्य और समाज


डॊ. सौरभ मालवीय
साहित्य समाज का दर्पण है, समाज का प्रतिबिम्ब है, समाज का मार्गदर्शक है तथा समाज का लेखा-जोखा है. किसी भी राष्ट्र या सभ्यता की जानकारी उसके साहित्य से प्राप्त होती है. साहित्य लोकजीवन का अभिन्न अंग है.  किसी भी काल के साहित्य से उस समय की परिस्थितियों, जनमानस के रहन-सहन, खान-पान व अन्य गतिविधियों का पता चलता है. समाज साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य समाज पर प्रभाव डालता है. दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं. साहित्य का समाज से वही संबंध है, जो संबंध आत्मा का शरीर से होता है. साहित्य समाज रूपी शरीर की आत्मा है. साहित्य अजर-अमर है. महान विद्वान योननागोची के अनुसार समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं हो सकता.

साहित्य संस्कृत के ’सहित’ शब्द से बना है. संस्कृत के विद्वानों के अनुसार साहित्य का अर्थ है- "हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात कल्याणकारी भाव.  कहा जा सकता है कि साहित्य लोककल्याण के लिए ही सृजित किया जाता है. साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन करना मात्र नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य समाज का मार्गदर्शन करना भी है. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में-
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए
महान साहित्यकारों ने साहित्य को लेकर अपने विचार व्यक्त किए हैं. बीसवीं शताब्दी के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य को ‘जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब’ माना है. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ कहा है. पंडित बाल कृष्ण भट्ट साहित्य को ‘जन समूह के हृदय का विकास’ मानते हैं.

प्राचीन काल में भारतीय सभ्यता अति समृद्ध थी. हमारी सभ्यता इतनी उन्नत थी कि हम आज भी उस पर गर्व करते हैं. किसी भाषा के वाचिक और लिखित सामग्री को साहित्य कह सकते हैं. विश्व में प्राचीन वाचिक साहित्य आदिवासी भाषाओं में प्राप्त होता है. भारतीय संस्कृत साहित्य ऋग्वेद से प्रारंभ होता है. व्यास, वाल्मीकि जैसे पौराणिक ऋषियों ने महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों की रचना की. भास, कालिदास एवं अन्य कवियों ने संस्कृत में नाटक लिखे, साहित्य की अमूल्य धरोहर है. भक्त साहित्य में अवधी में गोस्वामी तुलसीदास, बृज भाषा में सूरदास, मारवाड़ी में मीरा बाई, खड़ीबोली में कबीर, रसखान, मैथिली में विद्यापति आदि प्रमुख हैं. जिस राष्ट्र और समाज का साहित्य जितना अधिक समृद्ध होगा, वह राष्ट्र और समाज भी उतना ही समृद्ध होगा. किसी राष्ट्र और समाज की स्थिति जाननी हो, तो उसका साहित्य देखना चाहिए.

मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधारा को गतिशीलता प्रदान की, उसे सभ्य बनाने का कार्य किया. मानव की विचारधारा में परिवर्तन लाने का कार्य साहित्य द्वारा ही किया जाता है. इतिहास साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी परिवर्तन आए, वे सब साहित्य के माध्यम से ही आए. साहित्यकार समाज में फैली कुरीतियों, विसंगतियों, विकॄतियों, अभावों, विसमताओं, असमानताओं आदि के बारे में लिखता है, इनके प्रति जनमानस को जागरूक करने का कार्य करता है. साहित्य जनहित के लिए होता है. जब सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन होने लगता है, तो साहित्य जनमानस मार्गदर्शन करता है.
मानव को जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के हर क्षेत्र में समाज की आवश्यकता पड़ती है. मानव समाज का एक अभिन्न अंग है. जीवन में मानव के साथ क्या घटित होता है, उसे साहित्यकार शब्दों में रचकर साहित्य की रचना करता है, अर्थात साहित्यकार जो देखता है, अनुभव करता है, चिंतन करता है, विश्लेषण करता है, उसे लिख देता है. साहित्य सृजन के लिए विषयवस्तु समाज के ही विभिन्न पक्षों से ली जाती है. साहित्यकार साहित्य की रचना करते समय अपने विचारों और कल्पना को भी सम्मिलित करता है.

वर्तमान में मीडिया समाज के लिए मज़बूत कड़ी साबित हो रहा है. समाचार-पत्रों की प्रासंगिकता सदैव रही है और भविष्य में भी रहेगी. मीडिया में परिवर्तन युगानुकूल है, जो स्वाभाविक है, लेकिन भाषा की दृष्टि से समाचार-पत्रों में गिरावट देखने को मिल रही है. इसका बड़ा कारण यही लगता है कि आज के परिवेश में समाचार-पत्रों से साहित्य लुप्त हो रहा है, जबकि साहित्य को समृद्ध करने में समाचार-पत्रों की महती भूमिका रही है, परंतु आज समाचार-पत्रों ने ही स्वयं को साहित्य से दूर कर लिया है, जो अच्छा संकेत नहीं है. आज आवश्यकता है कि समाचार-पत्रों में साहित्य का समावेश हो और वे अपनी परंपरा को समृद्ध बनाएं. वास्तव में पहले के संपादक समाचार-पत्र को साहित्य से दूर नहीं मानते थे, बल्कि त्वरित साहित्य का दर्जा देते थे. अब न उस तरह के संपादक रहे, न समाचार-पत्रों में साहित्य के लिए स्थान. साहित्य मात्र साप्ताहिक छपने वाले सप्लीमेंट्‌स में सिमट गया है. समाचार-पत्रों से साहित्य के लुप्त होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि अब समाचार-पत्रों में संपादक का दायित्व ऐसे लोग निभा रहे हैं, जिनका साहित्य से कभी कोई सरोकार नहीं रहा. समाचार-पत्रों के मालिकों को ऐसे संपादक चाहिएं, जो उन्हें मोटी धनराशि कमाकर दे सकें. समाचार-पत्रों को अधिक से अधिक विज्ञापन दिला सकें, राजनीतिक गलियारे में उनकी पहुंच बढ़ सके.



इस सबके बीच कुछ समाचार-पत्र ऐसे भी हैं, जो साहित्य को संजोए हुए हैं. साहित्य की अनेक पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, परंतु उनके पास पर्याप्त संसाधन न होने के कारण उन्हें आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. साहित्य ने सदैव राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का कार्य किया है. साहित्य जनमानस को सकारात्मक सोच तथा लोककल्याण के कार्यों के लिए प्रेरणा देने का कार्य करता है.  साहित्य के विकास की कहानी मानव सभ्यता के विकास की गाथा है, इसलिए यह अति आवश्यक है कि साहित्य लेखन निरंतर जारी रहना चाहिए, अन्यथा सभ्यता का विकास अवरुद्ध हो जाएगा.

Sunday, April 24, 2016

पाणिग्रहण संस्कार पर मुग्ध हुए विदेशी


फ़िरदौस ख़ान
भारत विभिन्न संस्कृतियों का देश है. हर संस्कृति की अपनी-अपनी परंपराएं और अपने रीति-रिवाज हैं. यहां अमूमन सभी त्योहारों और मांगलिक कार्यों में पूरी आस्था के साथ परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है. यहां जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक संस्कार होते हैं. इन्हीं में से एक संस्कार है पाणिग्रहण. हिंदू धर्म में इसे सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना जाता है. पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से हिंदू विवाह के नाम से जाना जाता है. हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच सात जन्मों का रिश्ता माना जाता है. मंत्रोच्चारण के बीच अग्नि के सात फेरे लेकर और ध्रुव तारे को साक्षी मानकर स्त्री-पुरुष तन और मन से एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं. भारतीय विवाह ख़ास होते हैं, क्योंकि इनमें ढेर सारे रीति-रिवाज होते हैं. ये रस्में विवाह से पहले शुरू हो जाती हैं और विवाह के बाद तक चलती हैं. ये परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं और इनके बिना विवाह पूर्ण नहीं होते, वह चाहे सगाई की रस्म हो, हल्दी- मेहंदी की रस्म हो या फिर दुल्हन की मुंह दिखाई की रस्म. हर परंपरा का अपना अलग महत्व है, अपनी अलग गरिमा और पहचान है. ये रस्में ही तो हैं, जो विवाह को और भी ज़्यादा यादगार बना देती हैं. छोटी-छोटी रस्में यादों में हमेशा के लिए बस जाती हैं.

विवाह से जुड़ी एक अहम रस्म है हल्दी लगाना. विवाह से पहले दुल्हन और दूल्हा हो सुहागिनें हल्दी यानी उबटन लगाती हैं. दुल्हन को उबटन लगाने के लिए दूल्हा के घर से महिलाएं आती हैं. इस उबटन में बेसन, हल्दी, चंदन, केसर और खु़शबू वाला तेल मिलाया जाता है. आजकल तो बाज़ार में तैयार उबटन मिलते हैं. बस उसमें तेल मिलाना होता है. उबटन से दूल्हा और दुल्हन की त्वचा कोमल हो जाती है और रंग भी निखर जाता है. इस रस्म के वक़्त दुल्हन को पीले कपड़े पहनाये जाते हैं और उसे फूलों के गहनों से सजाया जाता है. इसी तरह दुल्हन के घर की महिलाएं दूल्हे को हल्दी लगाने के लिए उसके घर जाती हैं. इस रस्म के बाद दूल्हा और दुल्हन के एक-दूसरे से मिलने पर रोक लग जाती है और यह पाबंदी विवाह तक रहती बनी है. विवाह से एक दिन पहले दूल्हा और दुल्हन को मेहंदी लगाई जाती है. दुल्हन को दूल्हा के घर से आई हुई मेहंदी लगती है. महिलाएं रतजगा करती हैं. रातभर संगीत की महफ़िल सजती है, जिसमें नाच-गाना शामिल होता है. इस दौरान सजी-धजी महिलाएं अपने-अपने हुनर का प्रदर्शन करती हैं. इसी तरह दूल्हा के हाथ पर भी शगुन के तौर पर मेहंदी लगाई जाती है. इस दौरान दूल्हे के घर भी जश्न का माहौल होता है. दूल्हे के दोस्त ख़ूब नाच-गाना करते हैं. अगले दिन शुभ मुहूर्त में मंत्रोच्चारण के बीच स्त्री-पुरुष विवाह के पवित्र बंधन में बंध जाते हैं. वर-वधू अपने बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं. वर-वधू के नाते-रिश्तेदार और मित्र विवाह में शामिल होते हैं. विवाह समारोह के दौरान अनेक छोटी-छोटी रस्में होती हैं. लड़की हमेशा के लिए अपने मायके से जा रही होती है, इसलिए माहौल थोड़ा गंभीर होता है, लेकिन जीजा-सालियों की हंसी-ठिठोली माहौल को ख़ुशनुमा बना देती हैं. वर-वधू का द्वार सालियां व बहनें रोकती हैं. फिर दूल्हे द्वारा उन्हें नेग दिया जाता है. विवाह के बाद दुल्हन की मुंह दिखाई की रस्म होती है, जिसमें ससुराल की महिलाएं दुल्हन का घूंघट खोलकर उसका चेहरा देखती हैं और उसे नेग देती हैं.

ख़ास बात यह भी है कि विवाह की रस्मों में जिन चीज़ों का इस्तेमाल किया जाता है, उनका भी विशेष महत्व होता है, जैसे हल्दी, बेसन, केसर, घी, नारियल, पान, दूध, दही, पानी आदि. विवाह में चावल का भी ख़ूब काम आता है. चावल को शुद्ध और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद देने के लिए उनके ऊपर चावल छिड़का जाता है. मान्यता है कि चावल शुद्ध होने की वजह से नकारात्मक चीज़ों को दूर भगाता है, इसलिए विवाह के दौरान दूल्हा प्रज्जवलित अग्नि में चावल भी डालता है. कुलदेवी को भी चावल अर्पित किया जाता है. विवाह के बाद विदाई के वक़्त दुल्हन अपने हाथों में चावल भरकर सिर के पीछे की ओर फेंकती है. फिर दुल्हन ससुराल पहुंचकर चावल से भरे कलश को अपने पैरों से गिराकर घर में दाख़िल होती है. इन दोनों रस्मों के ज़रिये दुल्हन यह दुआ करती है कि उसके मायके और ससुराल दोनों में ख़ुशहाली हमेशा बनी रहे. इसी तरह धार्मिक रीति-रिवाजों में पान और सुपारी का भी इस्तेमाल किया जाता है. सुपारी को देवी का प्रतीक माना जाता है, जबकि पान ताज़गी और समृद्धि का प्रतीक है. पान को दूल्हा और दुल्हन के सिर पर लगाया जाता है. दूल्हे के परिवार का स्वागत भी पान से किया जाता है. विवाह की कई रस्मों में पान काम आता है. नारियल भी समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. मेहमानों को धन्यवाद के प्रतीक के रूप में पान के साथ नारियल भी दिया जाता है. विवाह के विभिन्न रीति-रिवाजों में पानी का भी ख़ूब इस्तेमाल होता है. पानी शुद्ध नदियों का प्रतीक है. यह जीवन का आधार है. इसके अलावा आम, केला, नीम और तुलसी के पत्तों का इस्तेमाल भी विवाह के विभिन्न रीति-रिवाजों में किया जाता है. इनके पत्ते शुद्धता के प्रतीक हैं. जब दुल्हन गृह-प्रवेश करती है, तो उस वक़्त गुड़ खिलाकर उसका स्वागत किया जाता है, ताकि रिश्तों में हमेशा मिठास बनी रहे. घी को पवित्र माना जाता है और विवाह की रस्मों के दौरान इसका भी ख़ूब इस्तेमाल होता है. विवाह के बाद की कई रस्मों में दही का इस्तेमाल भी होता है. कई रस्मों में दूध भी उपयोग में आता है.

 दरअसल, इन परंपराओं और रीति-रिवाजों के बिना विवाह की खु़शी अधूरी है. ये रस्में माहौल में ख़ुशियों के रंग भर देती हैं. विदेशी भी इन रस्मों के आकर्षण में बंधे यहां विवाह करने के लिए चले आते हैं. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं. 23 अक्टूबर, 2010 को ब्रिटिश हास्य अभिनेता रसेल ब्रांड और गायिका कैटी पेरी ने रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान के नज़दीक वैदिक रीति-रिवाज से विवाह किया था. इससे पहले मार्च 2007 में अभिनेत्री लिज हर्ले और व्यापारी अरुण नायर ने जोधपुर में पारंपरिक भारतीय पद्धति से विवाह किया था. हाल में 31 दिसंबर, 2013 को आगरा में फ्रांसीसी जोड़े ने वैदिक रीति से विवाह किया. फ्रांस के रहने वाले जेन क्लाउड और उनकी महिला मित्र नथालिया भारत भ्रमण पर आए थे. दोनों 30 दिसंबर को आगरा पहुंचे. वह ताजमहल देखने गए और शहंशाह शाहजहां और उनकी बेगम मुमताज़ की मोहब्बत की दास्तान सुनकर मुग्ध हो गए. इस प्रेमकथा से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भारतीय रीति-रिवाज से विवाह करने का फ़ैसला कर लिया. जेन क्लाउड और नथालिया दूल्हा, दुल्हन के लिबास में सज-संवर कर कैलादेवी मंदिर में पहुंचे. जेन क्लाउड ने नथालिया को मंगलसूत्र पहनाया और अग्नि के सात फेरे लिए. विवाहित जोड़े का कहना है कि वे भारत की संस्कृति से बहुत प्रभावित हैं. यहां आकर उन्हें पता चला कि भारत में वैदिक रीति से विवाह को सात जन्मों का बंधन माना जाता है. यहां रिश्तों की मिठास और रीति-रिवाजों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया, इसीलिए उन्होंने वैदिक रीति से विवाह किया. इससे पहले 25 दिसंबर, 2013 को मध्य प्रदेश के इंदौर में तीन विदेशी जोड़ों ने हिंदू रीति-रिवाजों के साथ विवाह किया. सभी वर-वधू भारतीय परिधानों में सजे-धजे थे. दूल्हों ने शेरवानी पहनी और साफ़ा बांधा. दुल्हनों ने लाल साड़ी पहनी और खु़द को पारंपरिक गहनों से सजाया. मंडप भी सजा और मंत्रोच्चारण के बीच सात फेरे लेकर वे विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए. मैक्सिको की मारिया फ्लांडेज कैस्टिलो ने मैक्सिको के ही डेमियन उगाल्डे को वरमाला पहनाई. इंग्लैंड की लूसी हॉवेल ने आयरलैंड के डर्मोट ग्रीन को वरमाला पहनाई और स्पेन की मेंचू हर्नाडेज ने इंग्लैंड के ओलिवर एलिस को वरमाला पहनाकर हमेशा के लिए अपना बना लिया. इससे क़रीब एक माह पहले 19 नवंबर, 2013 को रूस के सेंट पीर्ट्सबर्ग से आए तीन जोड़ों ने उत्तराखंड के कनखल में वैदिक रीति से विवाह किया. ततियाना शूबेएकोव अपने मंगेतर ऑटोमोबाइल इंजीनियर सरनोव के साथ सात फेरे लिए. उनका कहना है कि उनकी दादी का विवाह धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने कराया था और मां का विवाह प्रख्यात योगाचार्य बीकेएस आयंगर ने संपन्न कराया था. वह भी अपनी दादी और मां की तरह वैदिक रीति-रिवाज के साथ विवाह करना चाहती थीं, इसलिए भारत आईं. प्रोफेसर मैक्सीम ने अपनी मंगेतर येकटरीना से विवाह किया. मैक्सीम और येकटरीना का मानना है कि उनकी शादीशुदा ज़िंदगी ख़ुशहाल रहेगी. उनका कहना है कि भारत ऐसा अद्भुत देश है, जहां एक बार पाणिग्रहण संस्कार हो जाने के बाद जोड़ो को मौत ही जुदा करती है. आना कालीनीना का विवाह उनके मंगेतर व्यापारी अलेक्जेंडर के साथ संपन्न हुआ. आना कालीनीना और उनके मंगेतर अलेक्जेंडर भी वैदिक रीति-रिवाज के साथ विवाह करके बहुत ख़ुश हैं. तीन जोड़ों के विवाह को संपन्न कराने में चार भाषाएं इस्तेमाल की गई थीं. मंत्र संस्कृत में पढ़े गए और उनका अर्थ पंडितजी ने हिंदी में बताया. बाद में इसका अंग्रेजी अनुवाद किया गया, जबकि एक रूसी दुभाषिये ने जोड़ों को रूसी भाषा में मंत्रों का अर्थ समझाया. ये तीनों जोड़े वास्तु सीखने के लिए हरिद्वार आते रहे हैं, इसलिए इस इलाक़े उन्हें लगाव हो गया है. वे कहते हैं कि विवाह के बाद इस जगह से उनका रिश्ता अब और भी गहरा हो गया है.

 इसी तरह 11 मार्च, 2012 को वाराणसी में एक विदेशी जोड़े ने वैदिक रीति से विवाह किया. वाराणसी के कबीरचौरा स्थित एक लॊन में यह विवाह संपन्न हुआ. पेशे से पत्रकार अमेरिका (वाशिंगटन प्रांत) के सिएटल शहर निवासी डोरिक जानसन घोड़ी पर सवार होकर विवाह स्थल पर पहुंचे, जहां सिएटल की एक कंपनी में सीईओ शैरी डांटोनियो लाल जोड़े में सजी उनका का इंतजार कर रही थी. इस मंडप में सरोद वादक विकास महाराज के पुत्र बालम महाराज और वधू सुहाना मिश्रा का विवाह हुआ था. इसी विवाह मंडप में विदेशी युगल ने भी फेरे लिए. विदेशी युगल ने विकास महाराज से हिंदू रीति से विवाह की इच्छा जताई थी. डोरिक के माता-पिता के रूप में भी रस्में विकास महाराज और उनकी पत्नी ने ही निभाईं. 7 मार्च, 2009 में राजस्थान के पुष्कर में स्विट्जरलैंड के पहले से ही शादीशुदा जोड़े ने अपने रिश्ते को और भी मज़बूत करने के लिए वैदिक रीति से विवाह किया. स्विट्जरलैंड निवासी विनसेंट और उसकी पत्नी किकि ने पुष्कर के रावणा राजपूत समाज के चारभुजा मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच अग्नि के समक्ष सात फेरे लगाए और एक दूसरे को वरमाला पहनाई. दोनों से आठ साल पहले प्रेम विवाह किया था. उनका कहना थी कि यह दिन उनके लिए यादगार रहेगा. जून 2004 में जयपुर में स्विटज़लैंड के मारकोस और अलम्सा ने वैदिक रीति से विवाह किया था.  स्विटज़रलैंड के एक ऐसे ही प्रेमी जोड़े ने जयपुर में स्थानीय रीति रिवाज़ से विवाह किया. अलाम्सा का मानना था कि भारत में विवाह ज़्यादा कामयाब हैं, क्योंकि विवाह का अपना पारंपरिक तरीक़ा है. मारकोस का कहना था कि भारतीय विवाह में रौनक़ बहुत होती है, जो उन्हें बहुत पसंद आई. क़ाबिले-ग़ौर है कि सभी विदेशी दुल्हनें भारतीय दुल्हनों की तरह सजती-संवरती हैं. लाल लिबास, मांग में सिंदूर, मेहंदी से सजे हाथों में चूड़ियां, पारंपरिक गहने और फूलों के गजरे लगाए ये दुल्हनें किसी अप्सरा से कम नहीं लगतीं. दूल्हे भी पारंपरिक शेरवानी और साफ़ों में नज़र आते हैं.

इसे विडंबना ही कहेंगे कि आज जब भारतीय युवा अपनी संस्कृति से विमुख होकर पश्चिम की लहर में बह रहे हैं, वहीं विदेशियों में भारतीय संस्कृति और परंपराओं में आस्था बढ़ रही है. हर सल सैकड़ों विदेशी जोड़े भारत आते हैं और वैदिक रीति से विवाह करते हैं. भारतीय प्राच्य विद्या सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. प्रतीक मिश्रपुरी के मुताबिक़ वह खु़द साठ विदेशी जोड़ों का वैदिक रीति से विवाह करा चुके हैं. उनका कहना है कि विदेशियों के मन में तलाक़ का डर रहता है. इसलिए वे ऐसी पद्धतियों की तलाश में रहते हैं, जिनसे उनका विवाह लंबे वक़्त तक चल सके. एक अनुमान के मुताबिक़ अकेले राजस्थान में हर साल तक़रीबन तीन सौ विदेशी जोड़े विवाह करते हैं.

यह भारतीय परंपराओं और रीति-रिवाजों का आकर्षण ही है, जो विदेशियों को भी भारत आकर वैदिक रीति से विवाह रचाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. बेशक, यही परंपराएं और रीति-रिवाज हमारी गौरवशाली संस्कृति का प्रतीक हैं.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में समूह संपादक हैं)

Tuesday, April 12, 2016

आया बैसाखी का पावन पर्व


डॊं सौरभ मालवीय
बैसाखी ऋतु आधारित पर्व है. बैसाखी को वैसाखी भी कहा जाता है. पंजाबी में इसे विसाखी कहते हैं. बैसाखी कृषि आधारित पर्व है. जब फ़सल पक कर तैयार हो जाती है और उसकी कटाई का काम शुरू हो जाता है, तब यह पर्व मनाया जाता है. यह पूरी देश में मनाया जाता है, परंतु पंजाब और हरियाणा में इसकी धूम अधिक होती है. बैसाखी प्रायः प्रति वर्ष 13 अप्रैल को मनाई जाती है, किन्तु कभी-कभी यह पर्व 14 अप्रैल को भी मनाया जाता है.

यह सिखों का प्रसिद्ध पर्व है. जब मुगल शासक औरंगजेब ने अन्याय एवं अत्याचार की सभी सीमाएं तोड़कर  श्री गुरु तेग बहादुरजी को दिल्ली में चांदनी चौक पर शहीद किया था, तब इस तरह 13 अप्रैल,1699 को श्री केसगढ़ साहिब आनंदपुर में दसवें गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने अनुयायियों को संगठित कर खालसा पंथ की स्थापना की थी. सिखो के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव का जन्म इसी महीने में हुआ था. सिख इसे सामूहिक जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं. गोविंद सिंह जी ने निम्न जाति के समझे जाने वाले लोगों को एक ही पात्र से अमृत छकाकर पांच प्यारे सजाए, जिन्हें पंज प्यारे भी कहा जाता है. ये पांच प्यारे किसी एक जाति या स्थान के नहीं थे. सब अलग-अलग जाति, कुल एवं अलग स्थानों के थे. अमृत छकाने के बाद इनके नाम के साथ सिंह शब्द लगा दिया गया.
इस दिन श्रद्धालु अरदास के लिए गुरुद्वारों में जाते हैं. आनंदपुर साहिब में मुख्य समारोह का आयोजन किया जाता है. प्रात: चार बजे गुरु ग्रंथ साहिब को समारोहपूर्वक कक्ष से बाहर लाया जाता है. फिर दूध और जल से प्रतीकात्मक स्नान करवाया जाता है. इसके पश्चात गुरु ग्रंथ साहिब को तख्त पर बिठाया जाता है. इस अवसर पर पंज प्यारे पंजबानी गाते हैं. दिन में अरदास के बाद गुरु को कड़ा प्रसाद का भोग लगाया जाता है. प्रसाद लेने के बाद श्रद्धालु गुरु के लंगर में सम्मिलत होते हैं. इस दिन श्रद्धालु कारसेवा करते हैं. दिनभर गुरु गोविंदसिंह और पंज प्यारों के सम्मान में शबद और कीर्तन गाए जाते हैं.
शाम को आग के आसपास इकट्ठे होकर लोग नई फ़सल की की खुशियां मनाते हैं और पंजाब का परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है.

बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है. हिन्दुओं के लिए भी बैसाखी का बहुत महत्व है. पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना इसी दिन की थी.  इसी दिन अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था. राजा विक्रमादित्य ने विक्रमी संवत का प्रारंभ इसी दिन से किया था, इसलिए इसे विक्रमी संवत कहा जाता है. बैसाखी के पावन पर्व पर पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है. महादेव और दुर्गा देवी की पूजा की जाती है. इस दिन लोग नये कपड़े पहनते हैं. वे घर में मिष्ठान बनाते हैं. बैसाखी के पर्व पर लगने वाला बैसाखी मेला बहुत प्रसिद्ध है. जगह-जगह विशेषकर नदी किनारे बैसाखी के दिन मेले लगते हैं. हिंदुओं के लिए यह पर्व नववर्ष की शुरुआत है. हिन्दू इसे स्नान, भोग लगाकर और पूजा करके मनाते हैं.

Thursday, March 24, 2016

भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य दृष्टिकोण

सौरभ मालवीय
अनादिकाल से ही भारत में वैचारिक स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य को प्राप्त रही है. प्राचीनकाल से ऋषियों, मनीषियों द्वारा समग्र जीवन दांव पर लगाकर भी अप्रतिम जीवन रहस्य खोजे गए. आत्मा और परमात्मा के गूढ़तर संबंध के इस सत्य शोधकों ने कभी भी अंतिम सत्य प्राप्त कर लेने का दावा नहीं किया. अपना अंतिम अनुभव बताने के पश्चात् भी वे ऋषिगण 'नेति-नेति' कहकर अपने आगत पीढ़ियों को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराते थे. ''नेति-(न+इति, यह अन्तिम नहीं है) नेति'' कहने वालों ने यह उद्धोष ही कर दिया था कि ''आत्मा दीपो भव'' (उपनिषद वाक्य) अर्थात् स्वयं का ज्ञानदीप प्रज्जवलित करो. इसी मौलिक विचार सूत्र से अनुप्राणित होकर महात्मा बुध्द ने भी कहा था कि ''किसी सत्य को इसलिए मत मान लो कि किसी बड़ी पुस्तक में लिखा है या इसलिए भी मत मान लो कि किसी अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति ने कहा है, अपितु उस विचार को अपनी प्रज्ञा की कसौटी पर देखा और यदि सत्य लगे तो ही स्वीकार करना. उपर्युक्त श्रुति सूत्र को ही उन्होंने पालि भाषा में ''अप्प दीपो भव'' कहा था. इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य के आत्मविकास की अन्यतम सम्भावनाओं के खिलने का अवसर उपलब्ध कराना ही भारतीय संस्कृति की वैचारिक पध्दति रही है.

सनातनकाल से ही ऋषियों, द्रष्टाओं और योगियों द्वारा परीक्षित सत्य ''अद्वैत सिध्दांत'' ही रहा है. वेद, उपनिषद, पुराण, आगम, निगम, शास्त्र, श्रुति, स्मृति, ब्राह्मण, आरण्यक इत्यादि ग्रन्थ अद्वैत दर्शन को ही प्रतिपादित निरूपित करते रहे हैं एवं तदनुरूप ही सामाजिक जीवन, संचालित भी होता रहा है. ज्ञाता, ज्ञेय में इतना लीन हो जाए कि केवल ज्ञान ही बच जाए यही अद्वैत का लक्षण था. वैसे ही द्रष्टा, दृश्य और दर्शन, कर्ता, कर्म और कृत्य तथा सेवक सेव्य और सेवा आदि अवस्थाओं में द्वैधी भाव का विलोपन ही अद्वैतवाद है.
ब्रह्म सत्य जगन्मिथात्येयोरूपो विनिश्चयम्।
सोऽयं नित्यानित्यवस्तु विवेक: समुदाहत:॥
विवेक चूडामणि
(ब्रह्म ही अंतिम सत्य है और यह जग मिथ्या या झूठ का भ्रम है. इस प्रकार का अविनाशी और नश्वर का विवेक ही उत्तम (अद्वैत) है.)

जीवन शैली में अनावश्यक कुछ कर्मकांडों के जुड़ जाने पर कुछ रूढ़ियां उत्पन्न हो गईं और जन-जीवन उन्हीं रूढ़ियों में उलझकर मूल उद्देश्य से भटक गया था. इन्हीं रूढ़ियों के विरोध में कुछ शरीरवादियों ने एक लोकलुभावन विचार दिया, जिसे अल्पांश में ही सही पर जन-समर्थन भी मिला. यह चार्वाक मत था.

भाषा विज्ञानियों के अनुसार चार्वाक शब्द का मूल ''चारू+वाक्'' है, जिसका अर्थ है सुंदर वाणी. कहां भारतीय जीवन का उद्देश्य परमात्म तत्त्व की प्राप्ति था और कहां चार्वा की चिंतन It drink and be marry तक ही सीमित था. चार्वाकियों की मूल विचारधारा ही यह थी-
''यावज्जीवेत् सुखंजीवेत ऋणंकृत्वा घृतं पिवेत।
भस्मीभूतसय देहस्य पुनरागमनं कुत:॥
(जब तक जीना है सुख से जियो, यदि अर्थाभाव है तो कर्ज लेकर भी भोग विलास करो, क्योंकि इस नाशवान शरीर का आवागमन अर्थात् पुनजर्न्य कहां है ?) विशुध्द देहवादी चिंतन.

परंतु विराट हिन्दू समाज ने कभी भी चार्वाकियों के विरूध्द कोई ''फतवान्न जारी नहीं किया, अपितु दर्शन के विचार से चार्वाक मत को भी अध्ययन अध्यापन और शोध का विषय मान लिया गया.
चूंकि सत्य सनातन अद्वैत मत ही मूल था अतएव सभी अद्वैत से छिटककर ही अपना वैचारिक अभियान चला रहे थे. इन्हीं अभियानों में आज के 2500 वर्षों पूर्व महात्मा बुध्द ने एक अत्यंत सबल विचार बहाया. फलस्वरूप अद्वैत मत की जड़ें हिल गई और जन-जन शून्यवाद स्थापित हो गया. कर्मकांडों और रूढ़ियों से त्रस्त समाज बौध्द मत की खुली हवा में श्वासोच्छ्वास लेने लगा था. परंतु भारतीयों के अंतर्प्रज्ञा में अनुस्यूत वैचारिक स्वातंत्र्य, बौध्दमत को भी सामी सोच वाला (Semitic) नहीं बनने दिया. बुध्दवाद में भी धर्म, विनय, मात्तिका, अभिधम्म, निकाय (अट्ठारह प्रकार के), वैभाषिक, भैरवी चक्र, स्थविरवाद, स्वस्तिवाद, महायान (नागार्जुन का), हीनयान, सौतांत्रिक, योगाचार, माध्यमिक, वज्रयान, वज्रयानों में भी कमरीपा, पनहीपा, ओखरीपा इत्यादि अनेक भेद उत्पन्न हो गए. अपने जीवन काल के अस्सी वर्षों तक बोलते रहे. भारत के सांस्कृतिक केंद्र काशी (वाराणसी) के लगभग 400 किमी लंबे और 150 किमी चौड़े भू-भाग में उस समय चालीस हजार लोग बौध्द मत के परिव्राजक बन चुके थे. अनुमान है कि उस समय उस क्षेत्र (अंग, बंग लिच्छवी, वैशाली, पाटलिपुत्र, कुशीनारा, काशी, श्रावस्ती, कोशल आदि) की जनसंख्या लगभग दो लाख थी.

अनेकानेक राजे, महाराजों द्वारा पालित-पोषित बौध्द धर्म (जन धर्म) को समूल उखाड़ने के लिए प्रख्यात दार्शनिक आचार्य कुमारिल भट्ट ने बौध्दिक दिग्विजय का दिव्य अभियान चलाया. एक वार्ता के दौरान आचार्य कुमारिल भट्ट काशी नरेश की कन्या को वचन दिया था-
''मा रोदिर्वरारोहे भट्टाचार्योडिस्म भूतले''
(एक बार काशी नरेश की पुत्री वैदकि धर्म के उध्दार के लिए रोते हुए आचार्य श्री से अपना दु:ख कहा था. इसी पर आचार्य श्री कुमारिल भट्ट ने कहा कि मत रोओ! अभी कुमारिल भट्ट इस भूतल पर है)

आचार्य श्री कुमारिल भट्ट अद्वैत स्थापना का जो अखंडदीप प्रज्ज्वलित किया था, उसी के प्रकाश में आचार्य शंकर ने बौध्द मत के जड़ में मट्ठा डाल दिया. सुदूर दक्षिण (केरल प्रांत के कांलडी ग्राम) से चलकर उस साधनहीन विचारक ने यान्धाता क्षेत्र में पूज्य आचार्य श्री गौड़पाद से दीक्षित होकर संपूर्ण सांस्कृतिक भारत को मंथ डाला. आनंदगिरि और माध्वाचार्य प्रणीत ''शंकर दिग्विजय'' के अनुसार शंकराचार्य ने अवंतिका से द्वार का, पुरूषपुर (पेशावर), साकला (स्यालकोट, मिनांडर की राजधानी, कपिश क्षेत्र (कुभापार हिन्दुकुश भाग) खैबर दर्रा तक, अमरनाथ, शंकराचार्य पर्वत, मार्तंड, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गोमुख, नंदनवन, हरिद्वार, प्रयाग, काशी, कांठमंडपम (काठमाडू), मिथिला, परशुराम कुंड, कामरूप, उत्कल, कलिंग, पुरी, कन्याकुमारी, श्री शैलभ होकर समग्र भारतमाता की प्रदक्षिणा पूर्ण की. अपने बत्तीस वर्ष की अल्पायु में भगवत्पाद शंकर ने ''शरीरक भाष्य'' (ब्रह्मसूत्र) समेत लगभग अठहत्तर पुस्तकें गद्य और पद्य में लिखी. उनके ब्रह्मसूत्र भाष्य पर आचार्य वाचस्पति मिश्र (मिथिला, बिहार) ने अद्वितीय ग्रंथ ''भामति'' लिखा.

पूज्य शंकराचार्य ने भारत की सांस्कृतिक रक्षा हेतु देश के चारों कोनों पर चार मठ (द्वारका पश्चिममाम्नाय, बदरी उत्तरामनाथ, पुरी पूर्वान्नाय और शगेरी दक्षिणाम्राय स्थापित किए. बावन (52) मणियों की स्थापना की. दशनामी समप्रदाय बनाए. बारह छावनियों का सृजन किया. समाज में व्याप्त अनेकानेक कुरीतियों को दूर करते हुए अपने प्रचंड बौध्दिक तेज से पुन: अद्वैत मत को प्रतिष्ठित किया. उनके ही जीवन काल में भारत से बौध्दमत उखड़ गया. लुम्बिनी, गया राजगृह वैशाली, काशी (सारनाथ) और कुशीनगर में एक भी व्यक्ति (स्थानीय) बौध्द नहीं बच गया. इन सबके बावजूद शंकराचार्य ने सवयं ही महात्मा बुध्द को भगवान् विष्णु के दशावतारों में एक ''सकृपावतंश'' (नौवां अवतार) घोषित किया और कहा-
''वनजौ वनजौ खर्व: त्रिरामी सकृपोडकृप: ।
अवतारा: दशैवैते कृष्णस्तु भगवान्स्वयम्॥
(जल के दो अवतार मत्स्य और कूर्म (कच्छप), वन के दो अवतार नृसिंह और वाराह) शूकर वामानावतार, तीन राम, परशुराम, श्रीराम, बलराम, सकृपावतार (बुध्द) और कल्कि अवतार ये ही दशावतार है. श्रीकृष्ण भगवान तो साक्षात् श्री मन्नारायण परमात्मा है.

परंतु किसी भी बौध्द राजा या व्यक्ति ने उनके विपरीत कोई भी अशोभनीय टिप्पणी नहीं की, अपितु जनगण के द्वारा उन्हें जगदगुरू की उपाधि से सम्मानित किया गया. बत्तीस वर्षों में ही वे भारत के पांच हजार वर्षों का सांस्कृतिक जीवन जिये. एक-एक व्यक्ति के वे पूजनीय अर्चनीय महनीय बन गए.
जगद्गुरू शंकर का भी यह अद्वितीय अभियान कोई अंतिम बिन्दु तो था नहीं. लगभग तीन शताब्दियों पश्चात् एक अन्य दार्शनिक श्री मध्वाचार्य ने उस परम प्रतिष्ठित शंकरमत (अद्वैतवाद) का खंडन कर दिया और एक नवीन विचार द्वैतवाद की स्थापना की. आचार्य श्री मध्व के इस गहन वैचारिक तत्व द्वैतवाद का भी खंडन काशी की एक श्रेष्ठतम विभूति आचार्य श्री मधुसूदन सरस्वती ने अपनी पुस्तक ''सिध्दांत बिन्दु'' में कर दिया और पुन: अद्वैतवाद को स्थापित किया. भक्ति तत्व के प्रेमी श्री मधुसूदन सरस्वती ने ही लिखा-
वंशी विभूषित करान्नवनीरदाभात्
पीताम्बरादरूण बिम्बाफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दु सुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्
कृष्णात्परम किमपि तत्वमहं न जाने॥
हिन्दू संस्कृति के एक अन्यतम उध्दारक पूज्यवर्य श्रीमद गोस्वामी श्री तुलसीदास जी के सम्मान में उन्होंने लिखा-
''आनन्द कानने ह्यस्मिन जगमस्तुलसी तरू: ।
कविता मंजरी भांति राम भ्रमर भूषिता:॥''

ऐसे सर्वसम्मानित सिध्दांत बिन्दु के तर्कों का भी खंडन एक दार्शनिक ने अपने दिव्य ग्रंथ ''न्यायामृत'' में कर दिया और पुन: द्वैतवाद का श्रेष्ठत्व सिध्द कर दिया. खंडन, मंडन और प्रतिस्थापन की यह अद्भुत श्रृंखला अनवरत चलती रही एवं भारतीय जन-मानस उन सबको पूजनीय भाव प्रदान करता रहा.

लगभग पांच दशकों में ही द्वैतवाद के न्यायामृत का खंडन ''अद्वैत सिध्दि'' नामक एक अन्य पुस्तिक में कर दिया गया और अद्वैत मत स्थापित हो गया. भगवान की रचना में एक से बढ़कर एक सिध्द महारथी पड़े हुए हैं और अद्वैतसिध्दि के तर्कों का खंडन ''न्यायामृत तरगिंणी'' नामक ग्रन्थ में कर दिया गया. कुछ ही वर्षों बाद द्वेतमत के इस समीचीन तर्कों का भी खंडन ''गौड़ ब्रह्मनंदी'' ग्रंथ में करके अद्वैत मत का विजयध्वज लहराया गया. परंतु इस अश्वमेद्य यज्ञ का घोड़ा भी ''न्याय भास्कर'' द्वारा रोक लिया गया और द्वैतमत के इन अद्यतन तर्कों ने बौध्दिक वर्ग को चमत्कृत कर दिया. अंतत: विचारकों की अनंत श्रृंखला के एक महारथी ने ''न्यायेन्दु शेखर'' में न्यायभास्कर की अजेयता भी खंडित कर दी और अद्वैतवाद को शीर्षस्थ बना दिया. इस प्रकार द्वैत और अद्वैत के इस वैचारिक अभियान में हिन्दू समाज बौध्दिक उत्कर्ष और बहुआयामी संभावनाओं को आत्मसात करते हुए आनंदित होता रहा.

अद्वैत की मुख्यधारा के इतर भी अनेक विचार आए. द्वैताद्वैतवाद, त्रेतावाद, विशिष्टाद्वैतवाद, एकेश्वरवाद बहुदेववाद, ज्ञानाश्रयी, कर्माश्रयी, प्रेमाश्रयी, शक्तवाद, सौर्यवाद, शैववाद, वैष्णववाद, रामाश्रयी, कृष्णाश्रयी, सखीवाद, श्री वैष्णवी, वल्लभी इत्यादी अनेक विचार स्रो प्रस्फुटित हुए और सबके सब हिन्दुत्व की महागाथा में मिलकर भारतीय समाज को पवित्र करते रहे. किसी भी मतावलंबी ने कभी भी अपने विपरीतवादियों को वैयक्तिक स्तर पर कुछ भी क्षुद्र टिप्पणी नहीं की. यही भारत का सर्वसमावेशक चित्त रहा है.
इसके विपरीत ईसाई मत में जिसने भी स्वतंत्र बौध्दिक प्रयास किया, तो उसे मृत्योन्मुखी ही कर दिया गया. स्वयं जीसस क्राइस्ट को भी क्रास में बड़ी-बड़ी कीलें ठोककर फांसी इसीलिए दी गई कि वे योरूसलम में तत्कालीन पुजारियों और पुरोहितों तथा रूढियों का विरोध कर रहे थे. उन्हीं पुरोहितों ने राजा पाइलेट पाण्टियस से मिलकर जीसस क्राइस्ट को क्रूरतम मृत्यु दंड दिलवाया. उसी परंपरा में कुछ ही शताब्दि बाद ''टालोमी'' नामक अत्यंत मेधावान खगोलविद को विषपान करने का आदेश दिया गया. टालोमी की केवल यही गलती थी कि उसने कह दिया था कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी उसकी प्रदक्षिणा करती है, जबकि बाइबिल में लिखा है कि धरती स्थिर है और सूर्य धरती का चक्कर लगाता है. केवल टालोमी ही नहीं अपितु ईसा के लगभग डेढ़ हजार वर्षों में गैलिली गैलिलियों तक शताधिक वैज्ञानिकों और विचारकों की ऐसी जघन्यतम हत्याएं की गई कि समग्र समाज ही जड़वत हो गया. वैचारिक प्रतिबंधों के कारण आत्म चिंतन का कोई द्वार हीं नहीं खुल सका. ईसाई मत के मानने वाले स्वयंघोषित ये सभ्य एक तो स्त्रियों को मानव मानते ही नहीं थे. क्योंकि बाइबिल में लिखा है कि स्त्रियां की उत्पत्ति पुरूष की पसली (वक्ष की अस्थि) से हुई है, वह तो केवल पुरुषों के उपभोग की वस्तु है. और तो और महिलाओं में भी विचार क्षमता है. यह बात उन आत्ममुग्ध ईसाइयों ने उन्नीसवीं शताब्दी में स्वीकार की और 1911 में उन्हंा मताधिकार दिया गया. लगभग दो सौ वर्षों तक (1094 से 1292 तक) उनका धर्मयुध्द (क्रूसेड) चलता रहा, जिसमें लाखों अबोध बालकों की भी क्रूरतम हत्याएं की गईं.

रही बात इस्लाम की, तो उसके सपने में भी वैचारिक स्वतंत्रता का सवाल ही नहीं उठता. लगभग 1400 वर्षों पुरानी मान्यता में भी युगानुकूल सोच के लिए कोई स्थान नहीं है. मिस्र के एक उपन्यासकार और नोबेल पुरस्कार विजेता ''नकीब महफूज'' को तेईस बार सजा-ए-मौत का फतवा जारी किया गया है. इस भय से उसकी जिन्दगी मौत से भी बदतर हो गई है. वे अब एक जिन्दा लाश बन गए हैं. ईरान के एक विख्यात लेखक ''रहमान हतीफी'' के हाथ की नसों को परवरदिगार अल्लाह के सिपाहियों ने चीर दिया और पैर बांधकर सड़क पर फेंक दिया. असहय पीड़ा झेलते हुए तड़प-तड़पकर अल्लाह के प्यारे हो गए. ''मेंहदी शेकरी'' को एक कविता लिखने के कारण जारी कत्ल के फतवे में उनकी दोनों आंखों में इस्लामी रहनुमाओं ने गोली मार दी.  पिछले दस वर्षों में ही केवल ईरान में 60 कवियों और लेखकों के क्रूरतम ढंग से दोजख रसीद कर दी गई. ब्रिटिश मूल के मुस्लिम लेखक ''अनवर शेख'' एक महत्वपूर्ण शोधग्रंथ लिखने के कारण अपमान और दहशतगर्दी के साये में जिन्दगी जी रहे हैं. उनकी रचना ''इटरनिटी'' पर जारी फतवे को कब कोई इस्लाम पर दीन-ओ-इमान रखने वाला जेहादी अमल में ला दे, कहा नहीं जा सकता. सैटनिक वर्सेज के लेखक सलमान रूश्दी की कहानी तो प्रसिध्द ही है. रूशदी के माफीनामे के बावजूद भी फरमान-ए-मौत के फतवे अभी वापस नहीं हुए हैं और कोई भी अल्लाह का बंदा उसे तामील कर सकता है. बंग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की लज्जा से इस्लाम इतना लज्जित हुआ कि नसरीन की आजादी ही बंधक बन गई है. अपनी पुस्तक ''द्विखंडित'' में उन्होंने इस्लामी आलिमों, फाजिलों, हाजियों, गाजियों की करतूत का जो वर्णन किया है, उसे पढ़ने पर पाठकों को ही लज्जा आती है. पाकिस्तानी लेखिका ''तहमीना दुर्रानी'' ने अपनी पुस्तक ''ब्लासफेमी'' में पाकिस्तानी जमींदारों नजूलियो और मुल्लाओं के कुकृत्य का इतना लोमहर्षक वर्णन किया है कि इस सत्य को वे पचा नहीं पाए और तहमीना सजा-ए-मौत के खौफ में निर्वासित पड़ी हुई है. एक उदारवादी कानून मंत्री ''इकबाल हैदर'' ने एक विवादास्पद कानून ''शतिम-ए-रसूल'' में आंशिक तब्दीली की राय जाहिर की, परंतु सदन ने इंकार कर दिया. लेकिन पाकी परवरदिगार के पाक बंदों ने खुदा के रसूल में अखलाक रखते हुए फरमाने-मौत सुना दिया और एक दीनी इल्हाम वाले बंदे ने उन्हें इनाम-ए-कत्ल से उनका जनाजा सजा दिया. एक अन्य पाकिस्तानी नागरिक जो तहे दिल से इस्लाम में यकीन रखता था, लेकिन उसकी तहेदिली मुल्लाओं को नागवार लगी और उसके विरुद्ध फतवा निकल गया. इखवान-उल-मुसलामीन वालों ने उनके हाथ और पैर की हड्डियों के सभी जोड़ तोड़ दिए. उसके बाद सरेआम पत्थरों से मारकर बेहाल कर दिया. इतने पर भी उन्हें सब्र नहीं हुआ और उन्हें मोटर साइकिल में बांधकर दो घंटे तक गुजरावाला की गलियों में घसीटा गया. कुरान और इस्लाम पर एहतराम रखने वाले हजारों लोग इस वाकिये के चश्मदीद थे, पर यह घटना किसी को भी नागवार नहीं लगी. अंत में ''हफीज सज्जाद तारीक'' की लाश को जानवरों की दावत के लिए अधजला ही खुले मैदान कर दिया गया. अभी कुछ ही दिनों पूर्व की बात है विश्वविख्यात चित्रकार वान गाग के पुत्र ''थिपो'' को धर्मांध जाहिलों ने गोली मार दी. वे पश्चिमी सिने जगत के सम्मानित हस्ताक्षर थे. इन जाहिल जालिमों की नजर में वे अपनी फिल्मों से शतिम-ए-रसूल कर रहे थे.

लगभग आधे से अधिक विश्व पर और पौन शताब्दी से अधिक काल तक शासन करने वाली साम्यवादी पध्दति में भी वैचारिक स्वतंत्रता का कोई अस्तित्व ही नहीं है. संसार के सबसे बड़े भवनों वाले विश्वविद्यालय मास्कों विद्यापीठ (तैंतीस तल वाले) में भी अध्ययन अध्यापन की परिसीमा साम्यवादी ही है. कोई भी विषय साम्यवादी ढांचे में ही सोचना या बोलना होता है. राजनीतिक स्तर पर केवल एक ही विचारधारा वाला संगठन रहेगा. उसके इतर सोचने वाले जार निकोलाई की गति प्राप्त करेंगे. साम्याद से अलग सोच वाले के साथ इतना क्रूरतम दुर्व्यवहार किया गया कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. उन्हें संसार के सर्वाधिक ठंडे साइबेरिया के बर्फानी क्षेत्र में ले जाकर उन्हीं बंदियों से उनकी कब्रें खुदवाकर और उनको निर्वस्त्र करके गोली मारी जाती थी. उन अभागे कैदियों के वस्त्र दूसरे अभागों के काम आते थे. उनकी कब्रों को भी अगले दल के कैदी ही भरते थे. इस प्रकार यह हत्याओं का चक्रीय क्रम चलता रहा. विश्व प्रसिध्द नोबेल पुरस्कार अस्वीकार करने वालों में सर्वाधिक रूसी नागरिक रहे हैं, क्योंकि साम्यवादी सोच उन्हें राजकीय स्तर पर ऐसा करने को बाध्य करती थी. ट्राट्सकी और बोरिस एल. पास्टरनाक जिस शरीरिक और मानसिक त्रासदी से गुजरे वह अत्यंत शर्मसार करता है. डॊ. जिवागो के लेखक के साथ अन्यतम दुर्व्यवहार हुआ. एक संगठन के तानाशाही आचरण ने समग्र समाज को कुंठित कर दिया. प्रत्येक व्यक्ति दूसरे को के.जी.बी. का एजेंट लगता था. आज की बौध्दिक रूप से सुधारवादी कहना साम्यवाद और एजिल का अपमान उतनी बड़ी गाली नहीं, जितना सुधारवादी होना. इतना ही नहीं ग्लासनोश्त और पेरेस्त्रोइका के जनक और रूसी राजनीति के शीर्ष पुरुष डॉ. मिखइल गोर्वाचोव अपनी पत्नी डॉ. रईसा समेत न्यूयार्क के विश्वविद्यालय में अध्यापन करते है. उन्हें साम्यवादी शिक्षा संस्थानों में घुटन अनुभव हो रही थी. लगभग तीन करोड़ पुस्तकों वाले संसार के सबसे बड़े ग्रंथागार में भी प्रतिगामी लेखकों के लिए स्थान नहीं है.

ये साम्यवादी विचारों वाले बुर्जुआ भी ''बाबा वाक्य प्रमाणम्'' के अनुसार मान लिए है कि घोर दरिद्रय और अहंकारी जिद्दी चित्त वाले कार्ल मार्क्स ने जो कुछ भी कहा है, वह अंतिम सत्य है. उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन परिवर्ध्दन अक्षम्य अपराध है.

जर्मनी में तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक वातावरण के कारण कार्ल मार्क्स को किसी विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य नहीं मिला, क्योंकि उनके पिता एक यहूदी पुजारी थे और उन दिनों जर्मनी में यहूदियों के विरोध में सारा देश उग्र हो गया था. कार्ल मार्क्स ने इसे धार्मिक मामला माना और घोषित कर दिया कि धर्म अफीम से भी ज्यादा खतरनाक बात है. बस मार्क्स के इसी धार्मिक समझ पर साम्यवाद टिका है.

अनवर शेख, सलमान रूश्दी और तहमीना दुर्रानी समेत अनेक लेखकों ने तो खुली चर्चा की मांग भी की थी, परंतु इस्लाम में इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है. चौदह सदी पूर्व अत्यंत तपिश और रेतीले वातावरण में जो बात लिख दी गई, उसके औचित्यानौचित्य पर चर्चा की इस्लाम और अल्लाह की तौहीन माना जाता है. जो बातें कुरान या बाइबिल में भौगोलिक, स्थानीय जीवन व्यवहार और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के बारे में भी लिखी गईं, उनमें देशकाल में परिवर्तन पर भी तदनुरूप बदलाव अधार्मिक माना जाता है. उच्चतापमान वनस्पति विहीन वातावरण औश्र अल्प जलीय क्षेत्र में जो नियम मुसिलम समाज के लिए बने थे, वे ही नियम इस्लामवादियों को हजारों नदियों वाले एवं सदाबहारी वनाच्छादित भारत में या अतीव शीतकारी दक्षिणी रूस में भी मानने होंगे, अन्यथा यह कुफ्र होगा और वे बंदे अल्लाह की नियमत के हकदार नहीं होंगे.

आखिर सामी सोच वाले लोग विचार-विमर्श या शास्त्रार्थ से घबराते क्यों है ? इसका मूलकारण यही है कि इन्हें अपने विचारों की सत्यता पर जरा भी यकीन हीं है. वे जानते है. कि शास्त्रार्थ में उन पाखंडी विचारों की चूलें हिल जाएंगी और व ताश के महल जैसे भरभरा कर बिखर जाएंगे. यदि उन्हें लगता है कि वे ठीक हैं, तो उनके अध्येता अराजकता और आतंकवादी फतवों को कूड़ेदान में फेंककर लज्जा, इटरनिटी, ब्लासफेमी, सैटनिक वर्सेज, द्विखण्डित, थियो वानगाग समेत सभी विषयों पर व्यापक प्रत्युत्तर लिखे, विभिन्न संचार माध्यमों पर खुला शास्त्रार्थ करें क्योंकि आज के इस वैज्ञानिक युग में यही कहा जा सकता है.
अब हवाएं ही करेंगी रोशनी का फैसला
जिस दिए में जान होगी वह दिया रह जाएगा

Thursday, March 17, 2016

उमंग का पर्व है होली


डॊ. सौरभ मालवीय
होली हर्षोल्लास, उमंग और रंगों का पर्व है. यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इससे एक दिन पूर्व होलिका जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहा जाता है. दूसरे दिन रंग खेला जाता है, जिसे धुलेंडी, धुरखेल तथा धूलिवंदन कहा जाता है. लोग एक-दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल लगाते हैं. रंग में भरे लोगों की टोलियां नाचती-गाती गांव-शहर में घूमती रहती हैं. ढोल बजाते और होली के गीत गाते लोग मार्ग में आते-जाते लोगों को रंग लगाते हुए होली को हर्षोल्लास से खेलते हैं.  सांध्य काल में लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और मिष्ठान बांटते हैं.

पुरातन धार्मिक पुस्तकों में होली का वर्णन अनेक मिलता है. नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख है. विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से तीन सौ वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी होली का उल्लेख किया गया है. होली के पर्व को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं. सबसे प्रसिद्ध कथा विष्णु भक्त प्रह्लाद की है. माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था. वह स्वयं को भगवान मानने लगा था.  उसने अपने राज्य में भगवान का नाम लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था. जो कोई भगवान का नाम लेता, उसे दंडित किया जाता था. हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था. प्रह्लाद की प्रभु भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने भक्ति के मार्ग का त्याग नहीं किया. हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में भस्म नहीं हो सकती. हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि कुंड में बैठे. अग्नि कुंड में बैठने पर होलिका तो जल गई, परंतु प्रह्लाद बच गया. भक्त प्रह्लाद की स्मृति में इस दिन होली जलाई जाती है. इसके अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी संबंधित है. कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था. इससे प्रसन्न होकर गोपियों और ग्वालों ने रंग खेला था.

देश में होली का पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. ब्रज की होली मुख्य आकर्षण का केंद्र है. बरसाने की लठमार होली भी प्रसिद्ध है. इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं. मथुरा का प्रसिद्ध 40 दिवसीय होली उत्सव वसंत पंचमी से ही प्रारंभ हो जाता है. श्री राधा रानी को गुलाल अर्पित कर होली उत्सव शुरू करने की अनुमति मांगी जाती है. इसी के साथ ही पूरे ब्रज पर फाग का रंग छाने लगता है. वृंदावन के शाहजी मंदिर में प्रसिद्ध वसंती कमरे में श्रीजी के दर्शन किए जाते हैं. यह कमरा वर्ष में केवल दो दिन के लिए खुलता है. मथुरा के अलावा बरसाना, नंदगांव, वृंदावन आदि सभी मंदिरों में भगवान और भक्त पीले रंग में रंग जाते हैं. ब्रह्मर्षि दुर्वासा की पूजा की जाती है. हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी वसंत पंचमी से ही लोग होली खेलना प्रारंभ कर देते हैं. कुल्लू के रघुनाथपुर मंदिर में सबसे पहले वसंत पंचमी के दिन भगवान रघुनाथ पर गुलाल चढ़ाया जाता है, फिर भक्तों की होली शुरू हो जाती है. लोगों का मानना है कि रामायण काल में हनुमान ने इसी स्थान पर भरत से भेंट की थी. कुमाऊं में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं. बिहार का फगुआ प्रसिद्ध है. हरियाणा की धुलंडी में भाभी पल्लू में ईंटें बांधकर देवरों को मारती हैं. पश्चिम बंगाल में दोल जात्रा निकाली जाती है. यह पर्व चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है. शोभायात्रा निकाली जाती है. महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेला जाता है. गोवा के शिमगो में शोभा यात्रा निकलती है और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्ख शक्ति प्रदर्शन करते हैं. तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंत का उत्सव है. मणिपुर के याओसांग में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है, जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है. दक्षिण गुजरात के आदिवासी भी धूमधाम से होली मनाते हैं. छत्तीसगढ़ में लोक गीतों के साथ होली मनाई जाती है.  मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी भगोरिया मनाते हैं. भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी होली मनाई जाती है.

होली सदैव ही साहित्यकारों का प्रिय पर्व रहा है. प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली का उल्लेख मिलता है. श्रीमद्भागवत महापुराण में रास का वर्णन है. अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है. इनमें हर्ष की प्रियदर्शिका एवं रत्नावली और कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् सम्मिलित हैं. भारवि एवं माघ सहित अन्य कई संस्कृत कवियों ने अपनी रचनाओं में वसंत एवं रंगों का वर्णन किया है. चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का उल्लेख है. भक्तिकाल तथा रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली विशिष्ट उल्लेख मिलता है. आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि कवियों ने होली को विशेष मह्त्व दिया है. प्रसिद्ध कृष्ण भक्त महाकवि सूरदास ने वसंत एवं होली पर अनेक पद रचे हैं. भारतीय सिनेमा ने भी होली को मनोहारी रूप में पेश किया है. अनेक फिल्मों में होली के कर्णप्रिय गीत हैं.



होली आपसी ईर्ष्या-द्वेष भावना को बुलाकर संबंधों को मधुर बनाने का पर्व है, परंतु देखने में आता है कि इस दिन बहुत से लोग शराब पीते हैं, जुआ खेलते हैं, लड़ाई-झगड़े करते हैं. रंगों की जगह एक-दूसरे में कीचड़ डालते हैं. काले-नीले पक्के रंग एक-दूसरे पर फेंकते हैं. ये रंग कई दिन तक नहीं उतरते. रसायन युक्त इन रंगों के कारण अकसर लोगों को त्वचा संबंधी रोग भी हो जाते हैं. इससे आपसी कटुता बढ़ती है. होली प्रेम का पर्व है, इसे इस प्रेमभाव के साथ ही मनाना चाहिए. पर्व का अर्थ रंग लगाना या हुड़दंग करना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ आपसी द्वेषभाव को भुलाकर भाईचारे को बढ़ावा देना है.

Sunday, March 13, 2016

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया

डॊ. सौरभ मालवीय
हिंदी समाचार पत्रों के आलोक में भारतीय पत्रकारिता विशेषकर हिंदी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति को लेकर किए गए अध्ययन में अनेक महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर सामने आए हैं. सामान्यतः राष्ट्र, राष्ट्रवाद, संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे अस्थुल व गुढ़ विषय के बारे में लोगों की अवधारणाएं काफी गड़मड़ है. आधुनिक षिक्षा पद्धति यानि षिक्षा के मौजूदा सरोकार और तौर-तरीके तथा अध्ययन सामाग्री और विधि इसमें दिखाई दे रहे हैं. मीडिया के प्रचलन और इसके विकास के बाद जो आस जागी थी कि यह भारतीय जनमानस में विषयों को भारतीय दृष्टि से एक समग्र दृष्टिकोण (भारतीय दृष्टिकोण) विकसित करने में उपयोगी भूमिका निभाएगी. दुर्भाग्य से जनमाध्यम भी इस संदर्भ में विभ्रम की स्थिति में है. चूंकि इन माध्यमों पर धारा विशेष के लोगों में से अधिकांष की शिक्षा पद्धति और सोच के सरोकार पश्चिमी है या भारतीय होते हुए भी इनकी सोच पर पश्चिम की श्रेष्ठता का आधिपत्य है. ऐसी स्थिति में इनसे वृहद परिवर्तन कामी दृष्टिकोण की दिशा-दशा में आमूल-चूक परिवर्तन की उम्मीद करना ही बेमानी है.

अध्ययन में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संबंध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह प्रकाश आया है कि राष्ट्र के संबंध में कथित बौद्धिक सभ्रांत लोगों की अवधारणा ही भ्रामक और अस्पष्ट है. प्राकारान्तर से हम यूं कहें कि इनकी सोच पर पश्चिमी शिक्षा का या शिक्षा के यूरोपीकरण का प्रभुत्व है. अतिरेक न होगा. अधिकांश बुद्धिजीवी राष्ट्र का अर्थ सांस्कृतिक सरोकारों से युक्त नहीं मानते. उनकी सोच के भ्रामक स्थिति के चलते राष्ट्रवाद जैसे व्यापक और वृहद अर्थ ग्रहण वाले शब्द का अर्थ संकुचित अर्थों में आकार पाता है. इन लोगों का मनना है कि राष्ट्र का अभिप्राय क्षेत्र विशेष में रहने वाली विशेष या कुछ जातियों से है. प्रायः जिनमें सांस्कृतिक तौर पर सभ्यता पाई जाती है.

राष्ट्र की इनकी परिभाषा को स्वीकार करने पर भारत बहु-सांस्कृतियों वाला राष्ट्र न होकर एक ऐसा क्षेत्र विशेष होगा, जिनको बहुराष्ट्रीय संस्कृति वाला देश कहेंगे. जो देश की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विरासत की दृष्टि से ठीक नहीं होगा. इसको स्वीकार करने का अर्थ होगा कि हम यूरोप और अमेरिका के भारत को खंड-खंड करने वाले दृष्टि के पक्ष में खड़े होंगो जिनका एक मात्र ध्येय भारत को एक राष्ट्र नहीं, राष्ट्रों के समूह के (उप महाद्वीप) रूप में अधिस्थापित करना है. वे भारत को एक राष्ट्र न मानकर भारतीय उप महाद्वीप जैसे नामों से संबोधित करते हैं, जो इनकी अखण्ड भारती की एकता के प्रति संकुचित दृष्टिकोण को परिलक्षित करता है.

’आधुनिक बुद्धिजीवी’ राष्ट्र और देश को प्रायः समानार्थी रूप में न सिर्फ प्रयोग करते हैं, बल्कि स्वीकार भी करते हैं. कुछ कथित बुद्धिजीवी देश को राष्ट्र से व्यापक इकाई के रूप में परिभाषित करते हैं. राष्ट्र के ऊपर देश के व्यापकता स्वीकार करने का अर्थ होगा कि राष्ट्र को सिर्फ भू-स्थैतिक व्यापकत्व को स्वीकार करना. ये राष्ट्र और राज्य और देश किसी भी रूप में एक नहीं है. दुनिया के अधिकांश विद्वान वेद को प्राचीनतम ज्ञान कोश मानते हैं ऋषि परंपरा के अनुसार राष्ट्र शब्द का प्रयोग भारत में राष्ट्रवाद का इतिहास चार सौ वर्ष से ज्यादा पुराना नहीं है. यह अलग विषय है कि छिट-पुट रूप की अवधारणा प्रचलन में थी. राष्ट्र राज्य के संबंध में आधुनिक, राजनीतिक विदों का मानना है कि यह परिस्थितिजन्य प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं है, बल्कि वस्तु स्थिति यह है कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में प्रभुत्व में अभी राष्ट्रवादी चेतना का केंद्रीय स्रोत भारत ही था.

भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूल उसकी संस्कृति में है, जो कि शेष दुनिया में प्रचलित राष्ट्र राज्य की अवधारणा में सर्वथा अनुपस्थित है. संस्कृतिमूलक राष्ट्र भाव का जिक्र वेदों में कई जगह आया है. यजुर्वेद में एक राष्ट्रीय गीत का उल्लेख भी मिलता है जिसमें ऋषि ने राष्ट्र में तेजस्वी विद्वानों, पराक्रमी योद्धाओं, दुधारू पशुओं, तीव्रगामी अश्वों, गुणवती नारीयों, विजय कामी सभ्य जनों, समयानुकूल वर्षा और हरी-भरी कृषि की कामना की है, साथ ही इस गीत में राष्ट्र के योग क्षेम की कामना चाही गई है. प्राकारान्तर से आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को इसके शिशु के रूप में उल्लेखित किया जा सकता है.

अध्ययन से एक ओर जो महत्वपूर्ण तथ्य उजागर हुआ है -राजनीतिक सत्ता के अतिरिक्त भी राष्ट्र का अपना कुछ अलग अस्तित्व होता है जो इसकी संस्कृति और जीवन पद्धति से न सिर्फ पुष्ट होता है, बल्कि अघोषित तौर पर सत्ता जनीत शक्ति का केंद्र होता है. यह दुनिया के प्रत्येक देश में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि अन्यान्य दबाव समूहों के रूप में मौजूद रहता है. कल्पना करें अगर सांस्कृतिक टकराव नहीं होता, तो क्या भारत-पाकिस्तान दो देश बनते और भारत का विभाजन होता ? यह राष्ट्रों के इसी सत्य की ओर इंगित करता है.

कोई माने या न माने दुनिया के प्रत्येक देश की सत्ता उसके सांस्कृतिक सरोकारों से प्रभावित व आप्लावित होती है. अंतर सिर्फ इतना है दुनिया के राष्ट्रों के सांस्कृतिक सरोकार आपस में कई बार चुनौति या प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़े नजर आते हैं. वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भारतीय अवधारणा सिर्फ स्वहित पोषण या संरक्षण की बात नहीं करते, बल्कि दुनिया के हितों में ही खुद के हितों को संरक्षित मानते हैं. यहां बनस्पतियैं शांति की अवधारणा न सिर्फ अभिसिंचित बल्कि जीवंत है.

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की धारणा राष्ट्रीय हितों को सिर्फ आर्थिक सरोकारों से समतुल्य करके नहीं देखती. अपेक्षात्मक तौर पर मानवीय सरोकार और हित इसके लिए अधिक मायने रखते हैं. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद राष्ट्र के लिए सिर्फ राजनीतिक व भू स्थैतिक एकता और संप्रभुता को आधार नहीं मानती, बल्कि सांस्कृतिक एकता को उसका प्रमुख आधार मानती है. इसके अनुसार सांस्कृतिक भिन्नता राष्ट्र के अस्तित्व के लिए कोई खतरा नहीं है, जबकि भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक मूल्यों के बीच अस्तित्व की भावना के आधार पर यह राष्ट्र मूल्य की बात करता है. बहुत सारे विद्वान भारत को एक राष्ट्र के रूप में मौजूदा अस्तित्व के पीछे उसकी द्धैवि शक्ति को मानते हैं- यह दैवीय शक्ति कुछ और नहीं, बल्कि इसके सांस्कृतिक मूल्य ही हैं, जो इसे अखंड राष्ट्र के तौर पर पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक बनाए हुए हैं.

हिंदी पत्रों के प्रकाश में भारतीय पत्रकारिता विशेषकर हिंदी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मीडिया के परिपेक्ष्य में जो अध्ययन किया गया, उसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य प्रथम दृष्टया यह उजागर हुआ कि मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बीच अन्योन्याश्रीत संबंध रहे हैं अभिप्रायतः स्वतंत्रता पूर्ण भारतीय पत्रकारिता के पत्रकारिय सरोकार मूलतः राष्ट्रवादी हैं, इसे हम यू भी कह सकते हैं कि भारती की मूल्य परख राष्ट्रवादी पत्रकारिता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों में कोई विशेष विभेद नहीं है. दोनों समग्र राष्ट्रीय और सांस्कृतिक हितों की वकालत करते हैं. समप्रति नेहरू युगीन पत्रकारिता के सरोकार भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों से उद्देष्यगत विभेद नहीं रखते. इनके विभेद तौर-तरीकों और अपनाए गए संसाधनों को लेकर हैं.

इस अध्याय में निर्णायक निष्कर्ष यह उभर कर आया कि राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिय मूल्यों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों में बिभेद उस काल में विषेष तौर पर उभर कर आया. जब भारतीय सकारात्मक अधिष्ठान में वामपंथी हस्तक्षेप शक्तिवत वढ़ गया यह दौर राष्ट्रीय परिदृष्य में स्वतंत्रता के बाद प्रभावी हुआ.

वस्तु स्थिति यह है कि जैसे-जैसे केंद्र और राज्य स्तर पर समाजवादी और वामपंथी विचारधारा सत्ता के करीब आती गई या इनका सीधे या परोक्ष हस्तक्षेप बढ़ने लगा उसी अनुपात में सिर्फ सत्तात्मक अधिष्ठान से बल्कि पत्रकारिय जगत से भी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी विचारधारा का लोप होना या उनका नकारात्मक प्रचार बढ़ गया.

अध्ययन के अनुसार मीडिया जगत में सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े पत्रकारों का कभी कोई अभाव नहीं रहा है, लेकिन सौभाग्य या दुर्भाग्य से इनका नेतृत्व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद विरोधी विचारधारा के लोगों के हाथों में रहा है. इसके पीछे सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण सत्ता में इस विचारधारा के लोगों का अधिक मुखर और शक्तिशाली होना रहा है. निष्कर्षतः सांस्कृतिक राष्ट्रवादी विचारधारा से संबंधित समाचारों का कवरेज नकारात्मक तौर पर अधिक किया जाता है और इसी रूप में वे पत्रों में स्थान भी पा रहे हैं. इसे संबंधित नकरात्मक तथ्यों और मूल्यों को सर्वाधिक तौर पर उभारा जाता है.

अध्ययन के अनुसार जो सर्वाधिक तथ्य यह उभर कर सामने आया कि मांग या रुचि आधारित न होकर अधिरोपित अधिक है. जो इस बात के गवाह है कि मीडिया सत्ता में किन लोगों का आधिपत्य है, जबकि सामाजिक अभिरूचि इस मामले में मीडिया से मेल नहीं खाते शोध में किए गए सर्वेयात्मक अध्ययन के अनुसार 80 प्रतिशत पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में रुचि रखते हैं और वे इसके बारे में वस्तुनिष्ठ जानकारी चाहते हैं.

उपरोक्त सर्वेक्षण से कई भ्रांतियां समाप्त हो जाती हैं. पहली भ्रांति तो यह निर्मूल होती है कि आज का पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ना व जानना नहीं चाहता है. सर्वेक्षण के परिणामों से स्पष्ट होता है कि 80 प्रतिशत पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ने में रुचि रखते हैं (सारणी 39) और 60 प्रतिशत पाठकों का मानना है कि मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उचित महत्व नहीं दिया जाता है. यह आंकड़ा उन संपादकों और मीडिया घरानों के लिए चैंकाने वाला हो सकता है, जो अभी तक यह मानते रहे हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक कालबाह्य विचार है और आज का पाठक उसमें रूची नहीं रखता.

यह आंकड़ा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम यह देखते हैं कि सर्वेक्षण के प्रतिभागियों में सबसे अधिक संख्या युवाओं (40 प्रतिशत; सारणी 21) और स्नातक या उससे अधिक शिक्षितों (44 प्रतिशत; सारणी 26) की है. यानी शिक्षित युवा भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ने और जानकारी रखने में पर्याप्त रुचि रखते हैं. सर्वेक्षण से यह भी स्पष्ट होता है कि पाठक मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दिए जाने वाले महत्व व स्थान से संतुष्ट नहीं हैं और 60 प्रतिशत पाठकों का मानना है कि मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उचित महत्व नहीं दिया जा रहा है.
रोचक बात यह भी है कि 41 प्रतिशत प्रतिभागियों ने इसका कारण मीडिया का अपना पूर्वाग्रह बताया, जबकि 23 प्रतिशत पाठकों का मानना था कि देश में ऐसी गतिविधियों के कम होने के कारण मीडिया में इसे कम स्थान मिलता है.

बहरहाल इस सर्वेक्षण से यह स्पष्ट हो जाता है कि देश का पाठक वर्ग मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दिए जा रहे महत्व व स्थान से असंतुष्ट है और वह इस पर और सामग्री पढ़ना चाहता है.