Thursday, March 24, 2016

भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य दृष्टिकोण

सौरभ मालवीय
अनादिकाल से ही भारत में वैचारिक स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य को प्राप्त रही है. प्राचीनकाल से ऋषियों, मनीषियों द्वारा समग्र जीवन दांव पर लगाकर भी अप्रतिम जीवन रहस्य खोजे गए. आत्मा और परमात्मा के गूढ़तर संबंध के इस सत्य शोधकों ने कभी भी अंतिम सत्य प्राप्त कर लेने का दावा नहीं किया. अपना अंतिम अनुभव बताने के पश्चात् भी वे ऋषिगण 'नेति-नेति' कहकर अपने आगत पीढ़ियों को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराते थे. ''नेति-(न+इति, यह अन्तिम नहीं है) नेति'' कहने वालों ने यह उद्धोष ही कर दिया था कि ''आत्मा दीपो भव'' (उपनिषद वाक्य) अर्थात् स्वयं का ज्ञानदीप प्रज्जवलित करो. इसी मौलिक विचार सूत्र से अनुप्राणित होकर महात्मा बुध्द ने भी कहा था कि ''किसी सत्य को इसलिए मत मान लो कि किसी बड़ी पुस्तक में लिखा है या इसलिए भी मत मान लो कि किसी अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति ने कहा है, अपितु उस विचार को अपनी प्रज्ञा की कसौटी पर देखा और यदि सत्य लगे तो ही स्वीकार करना. उपर्युक्त श्रुति सूत्र को ही उन्होंने पालि भाषा में ''अप्प दीपो भव'' कहा था. इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य के आत्मविकास की अन्यतम सम्भावनाओं के खिलने का अवसर उपलब्ध कराना ही भारतीय संस्कृति की वैचारिक पध्दति रही है.

सनातनकाल से ही ऋषियों, द्रष्टाओं और योगियों द्वारा परीक्षित सत्य ''अद्वैत सिध्दांत'' ही रहा है. वेद, उपनिषद, पुराण, आगम, निगम, शास्त्र, श्रुति, स्मृति, ब्राह्मण, आरण्यक इत्यादि ग्रन्थ अद्वैत दर्शन को ही प्रतिपादित निरूपित करते रहे हैं एवं तदनुरूप ही सामाजिक जीवन, संचालित भी होता रहा है. ज्ञाता, ज्ञेय में इतना लीन हो जाए कि केवल ज्ञान ही बच जाए यही अद्वैत का लक्षण था. वैसे ही द्रष्टा, दृश्य और दर्शन, कर्ता, कर्म और कृत्य तथा सेवक सेव्य और सेवा आदि अवस्थाओं में द्वैधी भाव का विलोपन ही अद्वैतवाद है.
ब्रह्म सत्य जगन्मिथात्येयोरूपो विनिश्चयम्।
सोऽयं नित्यानित्यवस्तु विवेक: समुदाहत:॥
विवेक चूडामणि
(ब्रह्म ही अंतिम सत्य है और यह जग मिथ्या या झूठ का भ्रम है. इस प्रकार का अविनाशी और नश्वर का विवेक ही उत्तम (अद्वैत) है.)

जीवन शैली में अनावश्यक कुछ कर्मकांडों के जुड़ जाने पर कुछ रूढ़ियां उत्पन्न हो गईं और जन-जीवन उन्हीं रूढ़ियों में उलझकर मूल उद्देश्य से भटक गया था. इन्हीं रूढ़ियों के विरोध में कुछ शरीरवादियों ने एक लोकलुभावन विचार दिया, जिसे अल्पांश में ही सही पर जन-समर्थन भी मिला. यह चार्वाक मत था.

भाषा विज्ञानियों के अनुसार चार्वाक शब्द का मूल ''चारू+वाक्'' है, जिसका अर्थ है सुंदर वाणी. कहां भारतीय जीवन का उद्देश्य परमात्म तत्त्व की प्राप्ति था और कहां चार्वा की चिंतन It drink and be marry तक ही सीमित था. चार्वाकियों की मूल विचारधारा ही यह थी-
''यावज्जीवेत् सुखंजीवेत ऋणंकृत्वा घृतं पिवेत।
भस्मीभूतसय देहस्य पुनरागमनं कुत:॥
(जब तक जीना है सुख से जियो, यदि अर्थाभाव है तो कर्ज लेकर भी भोग विलास करो, क्योंकि इस नाशवान शरीर का आवागमन अर्थात् पुनजर्न्य कहां है ?) विशुध्द देहवादी चिंतन.

परंतु विराट हिन्दू समाज ने कभी भी चार्वाकियों के विरूध्द कोई ''फतवान्न जारी नहीं किया, अपितु दर्शन के विचार से चार्वाक मत को भी अध्ययन अध्यापन और शोध का विषय मान लिया गया.
चूंकि सत्य सनातन अद्वैत मत ही मूल था अतएव सभी अद्वैत से छिटककर ही अपना वैचारिक अभियान चला रहे थे. इन्हीं अभियानों में आज के 2500 वर्षों पूर्व महात्मा बुध्द ने एक अत्यंत सबल विचार बहाया. फलस्वरूप अद्वैत मत की जड़ें हिल गई और जन-जन शून्यवाद स्थापित हो गया. कर्मकांडों और रूढ़ियों से त्रस्त समाज बौध्द मत की खुली हवा में श्वासोच्छ्वास लेने लगा था. परंतु भारतीयों के अंतर्प्रज्ञा में अनुस्यूत वैचारिक स्वातंत्र्य, बौध्दमत को भी सामी सोच वाला (Semitic) नहीं बनने दिया. बुध्दवाद में भी धर्म, विनय, मात्तिका, अभिधम्म, निकाय (अट्ठारह प्रकार के), वैभाषिक, भैरवी चक्र, स्थविरवाद, स्वस्तिवाद, महायान (नागार्जुन का), हीनयान, सौतांत्रिक, योगाचार, माध्यमिक, वज्रयान, वज्रयानों में भी कमरीपा, पनहीपा, ओखरीपा इत्यादि अनेक भेद उत्पन्न हो गए. अपने जीवन काल के अस्सी वर्षों तक बोलते रहे. भारत के सांस्कृतिक केंद्र काशी (वाराणसी) के लगभग 400 किमी लंबे और 150 किमी चौड़े भू-भाग में उस समय चालीस हजार लोग बौध्द मत के परिव्राजक बन चुके थे. अनुमान है कि उस समय उस क्षेत्र (अंग, बंग लिच्छवी, वैशाली, पाटलिपुत्र, कुशीनारा, काशी, श्रावस्ती, कोशल आदि) की जनसंख्या लगभग दो लाख थी.

अनेकानेक राजे, महाराजों द्वारा पालित-पोषित बौध्द धर्म (जन धर्म) को समूल उखाड़ने के लिए प्रख्यात दार्शनिक आचार्य कुमारिल भट्ट ने बौध्दिक दिग्विजय का दिव्य अभियान चलाया. एक वार्ता के दौरान आचार्य कुमारिल भट्ट काशी नरेश की कन्या को वचन दिया था-
''मा रोदिर्वरारोहे भट्टाचार्योडिस्म भूतले''
(एक बार काशी नरेश की पुत्री वैदकि धर्म के उध्दार के लिए रोते हुए आचार्य श्री से अपना दु:ख कहा था. इसी पर आचार्य श्री कुमारिल भट्ट ने कहा कि मत रोओ! अभी कुमारिल भट्ट इस भूतल पर है)

आचार्य श्री कुमारिल भट्ट अद्वैत स्थापना का जो अखंडदीप प्रज्ज्वलित किया था, उसी के प्रकाश में आचार्य शंकर ने बौध्द मत के जड़ में मट्ठा डाल दिया. सुदूर दक्षिण (केरल प्रांत के कांलडी ग्राम) से चलकर उस साधनहीन विचारक ने यान्धाता क्षेत्र में पूज्य आचार्य श्री गौड़पाद से दीक्षित होकर संपूर्ण सांस्कृतिक भारत को मंथ डाला. आनंदगिरि और माध्वाचार्य प्रणीत ''शंकर दिग्विजय'' के अनुसार शंकराचार्य ने अवंतिका से द्वार का, पुरूषपुर (पेशावर), साकला (स्यालकोट, मिनांडर की राजधानी, कपिश क्षेत्र (कुभापार हिन्दुकुश भाग) खैबर दर्रा तक, अमरनाथ, शंकराचार्य पर्वत, मार्तंड, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गोमुख, नंदनवन, हरिद्वार, प्रयाग, काशी, कांठमंडपम (काठमाडू), मिथिला, परशुराम कुंड, कामरूप, उत्कल, कलिंग, पुरी, कन्याकुमारी, श्री शैलभ होकर समग्र भारतमाता की प्रदक्षिणा पूर्ण की. अपने बत्तीस वर्ष की अल्पायु में भगवत्पाद शंकर ने ''शरीरक भाष्य'' (ब्रह्मसूत्र) समेत लगभग अठहत्तर पुस्तकें गद्य और पद्य में लिखी. उनके ब्रह्मसूत्र भाष्य पर आचार्य वाचस्पति मिश्र (मिथिला, बिहार) ने अद्वितीय ग्रंथ ''भामति'' लिखा.

पूज्य शंकराचार्य ने भारत की सांस्कृतिक रक्षा हेतु देश के चारों कोनों पर चार मठ (द्वारका पश्चिममाम्नाय, बदरी उत्तरामनाथ, पुरी पूर्वान्नाय और शगेरी दक्षिणाम्राय स्थापित किए. बावन (52) मणियों की स्थापना की. दशनामी समप्रदाय बनाए. बारह छावनियों का सृजन किया. समाज में व्याप्त अनेकानेक कुरीतियों को दूर करते हुए अपने प्रचंड बौध्दिक तेज से पुन: अद्वैत मत को प्रतिष्ठित किया. उनके ही जीवन काल में भारत से बौध्दमत उखड़ गया. लुम्बिनी, गया राजगृह वैशाली, काशी (सारनाथ) और कुशीनगर में एक भी व्यक्ति (स्थानीय) बौध्द नहीं बच गया. इन सबके बावजूद शंकराचार्य ने सवयं ही महात्मा बुध्द को भगवान् विष्णु के दशावतारों में एक ''सकृपावतंश'' (नौवां अवतार) घोषित किया और कहा-
''वनजौ वनजौ खर्व: त्रिरामी सकृपोडकृप: ।
अवतारा: दशैवैते कृष्णस्तु भगवान्स्वयम्॥
(जल के दो अवतार मत्स्य और कूर्म (कच्छप), वन के दो अवतार नृसिंह और वाराह) शूकर वामानावतार, तीन राम, परशुराम, श्रीराम, बलराम, सकृपावतार (बुध्द) और कल्कि अवतार ये ही दशावतार है. श्रीकृष्ण भगवान तो साक्षात् श्री मन्नारायण परमात्मा है.

परंतु किसी भी बौध्द राजा या व्यक्ति ने उनके विपरीत कोई भी अशोभनीय टिप्पणी नहीं की, अपितु जनगण के द्वारा उन्हें जगदगुरू की उपाधि से सम्मानित किया गया. बत्तीस वर्षों में ही वे भारत के पांच हजार वर्षों का सांस्कृतिक जीवन जिये. एक-एक व्यक्ति के वे पूजनीय अर्चनीय महनीय बन गए.
जगद्गुरू शंकर का भी यह अद्वितीय अभियान कोई अंतिम बिन्दु तो था नहीं. लगभग तीन शताब्दियों पश्चात् एक अन्य दार्शनिक श्री मध्वाचार्य ने उस परम प्रतिष्ठित शंकरमत (अद्वैतवाद) का खंडन कर दिया और एक नवीन विचार द्वैतवाद की स्थापना की. आचार्य श्री मध्व के इस गहन वैचारिक तत्व द्वैतवाद का भी खंडन काशी की एक श्रेष्ठतम विभूति आचार्य श्री मधुसूदन सरस्वती ने अपनी पुस्तक ''सिध्दांत बिन्दु'' में कर दिया और पुन: अद्वैतवाद को स्थापित किया. भक्ति तत्व के प्रेमी श्री मधुसूदन सरस्वती ने ही लिखा-
वंशी विभूषित करान्नवनीरदाभात्
पीताम्बरादरूण बिम्बाफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दु सुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्
कृष्णात्परम किमपि तत्वमहं न जाने॥
हिन्दू संस्कृति के एक अन्यतम उध्दारक पूज्यवर्य श्रीमद गोस्वामी श्री तुलसीदास जी के सम्मान में उन्होंने लिखा-
''आनन्द कानने ह्यस्मिन जगमस्तुलसी तरू: ।
कविता मंजरी भांति राम भ्रमर भूषिता:॥''

ऐसे सर्वसम्मानित सिध्दांत बिन्दु के तर्कों का भी खंडन एक दार्शनिक ने अपने दिव्य ग्रंथ ''न्यायामृत'' में कर दिया और पुन: द्वैतवाद का श्रेष्ठत्व सिध्द कर दिया. खंडन, मंडन और प्रतिस्थापन की यह अद्भुत श्रृंखला अनवरत चलती रही एवं भारतीय जन-मानस उन सबको पूजनीय भाव प्रदान करता रहा.

लगभग पांच दशकों में ही द्वैतवाद के न्यायामृत का खंडन ''अद्वैत सिध्दि'' नामक एक अन्य पुस्तिक में कर दिया गया और अद्वैत मत स्थापित हो गया. भगवान की रचना में एक से बढ़कर एक सिध्द महारथी पड़े हुए हैं और अद्वैतसिध्दि के तर्कों का खंडन ''न्यायामृत तरगिंणी'' नामक ग्रन्थ में कर दिया गया. कुछ ही वर्षों बाद द्वेतमत के इस समीचीन तर्कों का भी खंडन ''गौड़ ब्रह्मनंदी'' ग्रंथ में करके अद्वैत मत का विजयध्वज लहराया गया. परंतु इस अश्वमेद्य यज्ञ का घोड़ा भी ''न्याय भास्कर'' द्वारा रोक लिया गया और द्वैतमत के इन अद्यतन तर्कों ने बौध्दिक वर्ग को चमत्कृत कर दिया. अंतत: विचारकों की अनंत श्रृंखला के एक महारथी ने ''न्यायेन्दु शेखर'' में न्यायभास्कर की अजेयता भी खंडित कर दी और अद्वैतवाद को शीर्षस्थ बना दिया. इस प्रकार द्वैत और अद्वैत के इस वैचारिक अभियान में हिन्दू समाज बौध्दिक उत्कर्ष और बहुआयामी संभावनाओं को आत्मसात करते हुए आनंदित होता रहा.

अद्वैत की मुख्यधारा के इतर भी अनेक विचार आए. द्वैताद्वैतवाद, त्रेतावाद, विशिष्टाद्वैतवाद, एकेश्वरवाद बहुदेववाद, ज्ञानाश्रयी, कर्माश्रयी, प्रेमाश्रयी, शक्तवाद, सौर्यवाद, शैववाद, वैष्णववाद, रामाश्रयी, कृष्णाश्रयी, सखीवाद, श्री वैष्णवी, वल्लभी इत्यादी अनेक विचार स्रो प्रस्फुटित हुए और सबके सब हिन्दुत्व की महागाथा में मिलकर भारतीय समाज को पवित्र करते रहे. किसी भी मतावलंबी ने कभी भी अपने विपरीतवादियों को वैयक्तिक स्तर पर कुछ भी क्षुद्र टिप्पणी नहीं की. यही भारत का सर्वसमावेशक चित्त रहा है.
इसके विपरीत ईसाई मत में जिसने भी स्वतंत्र बौध्दिक प्रयास किया, तो उसे मृत्योन्मुखी ही कर दिया गया. स्वयं जीसस क्राइस्ट को भी क्रास में बड़ी-बड़ी कीलें ठोककर फांसी इसीलिए दी गई कि वे योरूसलम में तत्कालीन पुजारियों और पुरोहितों तथा रूढियों का विरोध कर रहे थे. उन्हीं पुरोहितों ने राजा पाइलेट पाण्टियस से मिलकर जीसस क्राइस्ट को क्रूरतम मृत्यु दंड दिलवाया. उसी परंपरा में कुछ ही शताब्दि बाद ''टालोमी'' नामक अत्यंत मेधावान खगोलविद को विषपान करने का आदेश दिया गया. टालोमी की केवल यही गलती थी कि उसने कह दिया था कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी उसकी प्रदक्षिणा करती है, जबकि बाइबिल में लिखा है कि धरती स्थिर है और सूर्य धरती का चक्कर लगाता है. केवल टालोमी ही नहीं अपितु ईसा के लगभग डेढ़ हजार वर्षों में गैलिली गैलिलियों तक शताधिक वैज्ञानिकों और विचारकों की ऐसी जघन्यतम हत्याएं की गई कि समग्र समाज ही जड़वत हो गया. वैचारिक प्रतिबंधों के कारण आत्म चिंतन का कोई द्वार हीं नहीं खुल सका. ईसाई मत के मानने वाले स्वयंघोषित ये सभ्य एक तो स्त्रियों को मानव मानते ही नहीं थे. क्योंकि बाइबिल में लिखा है कि स्त्रियां की उत्पत्ति पुरूष की पसली (वक्ष की अस्थि) से हुई है, वह तो केवल पुरुषों के उपभोग की वस्तु है. और तो और महिलाओं में भी विचार क्षमता है. यह बात उन आत्ममुग्ध ईसाइयों ने उन्नीसवीं शताब्दी में स्वीकार की और 1911 में उन्हंा मताधिकार दिया गया. लगभग दो सौ वर्षों तक (1094 से 1292 तक) उनका धर्मयुध्द (क्रूसेड) चलता रहा, जिसमें लाखों अबोध बालकों की भी क्रूरतम हत्याएं की गईं.

रही बात इस्लाम की, तो उसके सपने में भी वैचारिक स्वतंत्रता का सवाल ही नहीं उठता. लगभग 1400 वर्षों पुरानी मान्यता में भी युगानुकूल सोच के लिए कोई स्थान नहीं है. मिस्र के एक उपन्यासकार और नोबेल पुरस्कार विजेता ''नकीब महफूज'' को तेईस बार सजा-ए-मौत का फतवा जारी किया गया है. इस भय से उसकी जिन्दगी मौत से भी बदतर हो गई है. वे अब एक जिन्दा लाश बन गए हैं. ईरान के एक विख्यात लेखक ''रहमान हतीफी'' के हाथ की नसों को परवरदिगार अल्लाह के सिपाहियों ने चीर दिया और पैर बांधकर सड़क पर फेंक दिया. असहय पीड़ा झेलते हुए तड़प-तड़पकर अल्लाह के प्यारे हो गए. ''मेंहदी शेकरी'' को एक कविता लिखने के कारण जारी कत्ल के फतवे में उनकी दोनों आंखों में इस्लामी रहनुमाओं ने गोली मार दी.  पिछले दस वर्षों में ही केवल ईरान में 60 कवियों और लेखकों के क्रूरतम ढंग से दोजख रसीद कर दी गई. ब्रिटिश मूल के मुस्लिम लेखक ''अनवर शेख'' एक महत्वपूर्ण शोधग्रंथ लिखने के कारण अपमान और दहशतगर्दी के साये में जिन्दगी जी रहे हैं. उनकी रचना ''इटरनिटी'' पर जारी फतवे को कब कोई इस्लाम पर दीन-ओ-इमान रखने वाला जेहादी अमल में ला दे, कहा नहीं जा सकता. सैटनिक वर्सेज के लेखक सलमान रूश्दी की कहानी तो प्रसिध्द ही है. रूशदी के माफीनामे के बावजूद भी फरमान-ए-मौत के फतवे अभी वापस नहीं हुए हैं और कोई भी अल्लाह का बंदा उसे तामील कर सकता है. बंग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की लज्जा से इस्लाम इतना लज्जित हुआ कि नसरीन की आजादी ही बंधक बन गई है. अपनी पुस्तक ''द्विखंडित'' में उन्होंने इस्लामी आलिमों, फाजिलों, हाजियों, गाजियों की करतूत का जो वर्णन किया है, उसे पढ़ने पर पाठकों को ही लज्जा आती है. पाकिस्तानी लेखिका ''तहमीना दुर्रानी'' ने अपनी पुस्तक ''ब्लासफेमी'' में पाकिस्तानी जमींदारों नजूलियो और मुल्लाओं के कुकृत्य का इतना लोमहर्षक वर्णन किया है कि इस सत्य को वे पचा नहीं पाए और तहमीना सजा-ए-मौत के खौफ में निर्वासित पड़ी हुई है. एक उदारवादी कानून मंत्री ''इकबाल हैदर'' ने एक विवादास्पद कानून ''शतिम-ए-रसूल'' में आंशिक तब्दीली की राय जाहिर की, परंतु सदन ने इंकार कर दिया. लेकिन पाकी परवरदिगार के पाक बंदों ने खुदा के रसूल में अखलाक रखते हुए फरमाने-मौत सुना दिया और एक दीनी इल्हाम वाले बंदे ने उन्हें इनाम-ए-कत्ल से उनका जनाजा सजा दिया. एक अन्य पाकिस्तानी नागरिक जो तहे दिल से इस्लाम में यकीन रखता था, लेकिन उसकी तहेदिली मुल्लाओं को नागवार लगी और उसके विरुद्ध फतवा निकल गया. इखवान-उल-मुसलामीन वालों ने उनके हाथ और पैर की हड्डियों के सभी जोड़ तोड़ दिए. उसके बाद सरेआम पत्थरों से मारकर बेहाल कर दिया. इतने पर भी उन्हें सब्र नहीं हुआ और उन्हें मोटर साइकिल में बांधकर दो घंटे तक गुजरावाला की गलियों में घसीटा गया. कुरान और इस्लाम पर एहतराम रखने वाले हजारों लोग इस वाकिये के चश्मदीद थे, पर यह घटना किसी को भी नागवार नहीं लगी. अंत में ''हफीज सज्जाद तारीक'' की लाश को जानवरों की दावत के लिए अधजला ही खुले मैदान कर दिया गया. अभी कुछ ही दिनों पूर्व की बात है विश्वविख्यात चित्रकार वान गाग के पुत्र ''थिपो'' को धर्मांध जाहिलों ने गोली मार दी. वे पश्चिमी सिने जगत के सम्मानित हस्ताक्षर थे. इन जाहिल जालिमों की नजर में वे अपनी फिल्मों से शतिम-ए-रसूल कर रहे थे.

लगभग आधे से अधिक विश्व पर और पौन शताब्दी से अधिक काल तक शासन करने वाली साम्यवादी पध्दति में भी वैचारिक स्वतंत्रता का कोई अस्तित्व ही नहीं है. संसार के सबसे बड़े भवनों वाले विश्वविद्यालय मास्कों विद्यापीठ (तैंतीस तल वाले) में भी अध्ययन अध्यापन की परिसीमा साम्यवादी ही है. कोई भी विषय साम्यवादी ढांचे में ही सोचना या बोलना होता है. राजनीतिक स्तर पर केवल एक ही विचारधारा वाला संगठन रहेगा. उसके इतर सोचने वाले जार निकोलाई की गति प्राप्त करेंगे. साम्याद से अलग सोच वाले के साथ इतना क्रूरतम दुर्व्यवहार किया गया कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. उन्हें संसार के सर्वाधिक ठंडे साइबेरिया के बर्फानी क्षेत्र में ले जाकर उन्हीं बंदियों से उनकी कब्रें खुदवाकर और उनको निर्वस्त्र करके गोली मारी जाती थी. उन अभागे कैदियों के वस्त्र दूसरे अभागों के काम आते थे. उनकी कब्रों को भी अगले दल के कैदी ही भरते थे. इस प्रकार यह हत्याओं का चक्रीय क्रम चलता रहा. विश्व प्रसिध्द नोबेल पुरस्कार अस्वीकार करने वालों में सर्वाधिक रूसी नागरिक रहे हैं, क्योंकि साम्यवादी सोच उन्हें राजकीय स्तर पर ऐसा करने को बाध्य करती थी. ट्राट्सकी और बोरिस एल. पास्टरनाक जिस शरीरिक और मानसिक त्रासदी से गुजरे वह अत्यंत शर्मसार करता है. डॊ. जिवागो के लेखक के साथ अन्यतम दुर्व्यवहार हुआ. एक संगठन के तानाशाही आचरण ने समग्र समाज को कुंठित कर दिया. प्रत्येक व्यक्ति दूसरे को के.जी.बी. का एजेंट लगता था. आज की बौध्दिक रूप से सुधारवादी कहना साम्यवाद और एजिल का अपमान उतनी बड़ी गाली नहीं, जितना सुधारवादी होना. इतना ही नहीं ग्लासनोश्त और पेरेस्त्रोइका के जनक और रूसी राजनीति के शीर्ष पुरुष डॉ. मिखइल गोर्वाचोव अपनी पत्नी डॉ. रईसा समेत न्यूयार्क के विश्वविद्यालय में अध्यापन करते है. उन्हें साम्यवादी शिक्षा संस्थानों में घुटन अनुभव हो रही थी. लगभग तीन करोड़ पुस्तकों वाले संसार के सबसे बड़े ग्रंथागार में भी प्रतिगामी लेखकों के लिए स्थान नहीं है.

ये साम्यवादी विचारों वाले बुर्जुआ भी ''बाबा वाक्य प्रमाणम्'' के अनुसार मान लिए है कि घोर दरिद्रय और अहंकारी जिद्दी चित्त वाले कार्ल मार्क्स ने जो कुछ भी कहा है, वह अंतिम सत्य है. उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन परिवर्ध्दन अक्षम्य अपराध है.

जर्मनी में तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक वातावरण के कारण कार्ल मार्क्स को किसी विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य नहीं मिला, क्योंकि उनके पिता एक यहूदी पुजारी थे और उन दिनों जर्मनी में यहूदियों के विरोध में सारा देश उग्र हो गया था. कार्ल मार्क्स ने इसे धार्मिक मामला माना और घोषित कर दिया कि धर्म अफीम से भी ज्यादा खतरनाक बात है. बस मार्क्स के इसी धार्मिक समझ पर साम्यवाद टिका है.

अनवर शेख, सलमान रूश्दी और तहमीना दुर्रानी समेत अनेक लेखकों ने तो खुली चर्चा की मांग भी की थी, परंतु इस्लाम में इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है. चौदह सदी पूर्व अत्यंत तपिश और रेतीले वातावरण में जो बात लिख दी गई, उसके औचित्यानौचित्य पर चर्चा की इस्लाम और अल्लाह की तौहीन माना जाता है. जो बातें कुरान या बाइबिल में भौगोलिक, स्थानीय जीवन व्यवहार और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के बारे में भी लिखी गईं, उनमें देशकाल में परिवर्तन पर भी तदनुरूप बदलाव अधार्मिक माना जाता है. उच्चतापमान वनस्पति विहीन वातावरण औश्र अल्प जलीय क्षेत्र में जो नियम मुसिलम समाज के लिए बने थे, वे ही नियम इस्लामवादियों को हजारों नदियों वाले एवं सदाबहारी वनाच्छादित भारत में या अतीव शीतकारी दक्षिणी रूस में भी मानने होंगे, अन्यथा यह कुफ्र होगा और वे बंदे अल्लाह की नियमत के हकदार नहीं होंगे.

आखिर सामी सोच वाले लोग विचार-विमर्श या शास्त्रार्थ से घबराते क्यों है ? इसका मूलकारण यही है कि इन्हें अपने विचारों की सत्यता पर जरा भी यकीन हीं है. वे जानते है. कि शास्त्रार्थ में उन पाखंडी विचारों की चूलें हिल जाएंगी और व ताश के महल जैसे भरभरा कर बिखर जाएंगे. यदि उन्हें लगता है कि वे ठीक हैं, तो उनके अध्येता अराजकता और आतंकवादी फतवों को कूड़ेदान में फेंककर लज्जा, इटरनिटी, ब्लासफेमी, सैटनिक वर्सेज, द्विखण्डित, थियो वानगाग समेत सभी विषयों पर व्यापक प्रत्युत्तर लिखे, विभिन्न संचार माध्यमों पर खुला शास्त्रार्थ करें क्योंकि आज के इस वैज्ञानिक युग में यही कहा जा सकता है.
अब हवाएं ही करेंगी रोशनी का फैसला
जिस दिए में जान होगी वह दिया रह जाएगा

Thursday, March 17, 2016

उमंग का पर्व है होली


डॊ. सौरभ मालवीय
होली हर्षोल्लास, उमंग और रंगों का पर्व है. यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इससे एक दिन पूर्व होलिका जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहा जाता है. दूसरे दिन रंग खेला जाता है, जिसे धुलेंडी, धुरखेल तथा धूलिवंदन कहा जाता है. लोग एक-दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल लगाते हैं. रंग में भरे लोगों की टोलियां नाचती-गाती गांव-शहर में घूमती रहती हैं. ढोल बजाते और होली के गीत गाते लोग मार्ग में आते-जाते लोगों को रंग लगाते हुए होली को हर्षोल्लास से खेलते हैं.  सांध्य काल में लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और मिष्ठान बांटते हैं.

पुरातन धार्मिक पुस्तकों में होली का वर्णन अनेक मिलता है. नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख है. विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से तीन सौ वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी होली का उल्लेख किया गया है. होली के पर्व को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं. सबसे प्रसिद्ध कथा विष्णु भक्त प्रह्लाद की है. माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था. वह स्वयं को भगवान मानने लगा था.  उसने अपने राज्य में भगवान का नाम लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था. जो कोई भगवान का नाम लेता, उसे दंडित किया जाता था. हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था. प्रह्लाद की प्रभु भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने भक्ति के मार्ग का त्याग नहीं किया. हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में भस्म नहीं हो सकती. हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि कुंड में बैठे. अग्नि कुंड में बैठने पर होलिका तो जल गई, परंतु प्रह्लाद बच गया. भक्त प्रह्लाद की स्मृति में इस दिन होली जलाई जाती है. इसके अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी संबंधित है. कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था. इससे प्रसन्न होकर गोपियों और ग्वालों ने रंग खेला था.

देश में होली का पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. ब्रज की होली मुख्य आकर्षण का केंद्र है. बरसाने की लठमार होली भी प्रसिद्ध है. इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं. मथुरा का प्रसिद्ध 40 दिवसीय होली उत्सव वसंत पंचमी से ही प्रारंभ हो जाता है. श्री राधा रानी को गुलाल अर्पित कर होली उत्सव शुरू करने की अनुमति मांगी जाती है. इसी के साथ ही पूरे ब्रज पर फाग का रंग छाने लगता है. वृंदावन के शाहजी मंदिर में प्रसिद्ध वसंती कमरे में श्रीजी के दर्शन किए जाते हैं. यह कमरा वर्ष में केवल दो दिन के लिए खुलता है. मथुरा के अलावा बरसाना, नंदगांव, वृंदावन आदि सभी मंदिरों में भगवान और भक्त पीले रंग में रंग जाते हैं. ब्रह्मर्षि दुर्वासा की पूजा की जाती है. हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी वसंत पंचमी से ही लोग होली खेलना प्रारंभ कर देते हैं. कुल्लू के रघुनाथपुर मंदिर में सबसे पहले वसंत पंचमी के दिन भगवान रघुनाथ पर गुलाल चढ़ाया जाता है, फिर भक्तों की होली शुरू हो जाती है. लोगों का मानना है कि रामायण काल में हनुमान ने इसी स्थान पर भरत से भेंट की थी. कुमाऊं में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं. बिहार का फगुआ प्रसिद्ध है. हरियाणा की धुलंडी में भाभी पल्लू में ईंटें बांधकर देवरों को मारती हैं. पश्चिम बंगाल में दोल जात्रा निकाली जाती है. यह पर्व चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है. शोभायात्रा निकाली जाती है. महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेला जाता है. गोवा के शिमगो में शोभा यात्रा निकलती है और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्ख शक्ति प्रदर्शन करते हैं. तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंत का उत्सव है. मणिपुर के याओसांग में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है, जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है. दक्षिण गुजरात के आदिवासी भी धूमधाम से होली मनाते हैं. छत्तीसगढ़ में लोक गीतों के साथ होली मनाई जाती है.  मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी भगोरिया मनाते हैं. भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी होली मनाई जाती है.

होली सदैव ही साहित्यकारों का प्रिय पर्व रहा है. प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली का उल्लेख मिलता है. श्रीमद्भागवत महापुराण में रास का वर्णन है. अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है. इनमें हर्ष की प्रियदर्शिका एवं रत्नावली और कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् सम्मिलित हैं. भारवि एवं माघ सहित अन्य कई संस्कृत कवियों ने अपनी रचनाओं में वसंत एवं रंगों का वर्णन किया है. चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का उल्लेख है. भक्तिकाल तथा रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली विशिष्ट उल्लेख मिलता है. आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि कवियों ने होली को विशेष मह्त्व दिया है. प्रसिद्ध कृष्ण भक्त महाकवि सूरदास ने वसंत एवं होली पर अनेक पद रचे हैं. भारतीय सिनेमा ने भी होली को मनोहारी रूप में पेश किया है. अनेक फिल्मों में होली के कर्णप्रिय गीत हैं.



होली आपसी ईर्ष्या-द्वेष भावना को बुलाकर संबंधों को मधुर बनाने का पर्व है, परंतु देखने में आता है कि इस दिन बहुत से लोग शराब पीते हैं, जुआ खेलते हैं, लड़ाई-झगड़े करते हैं. रंगों की जगह एक-दूसरे में कीचड़ डालते हैं. काले-नीले पक्के रंग एक-दूसरे पर फेंकते हैं. ये रंग कई दिन तक नहीं उतरते. रसायन युक्त इन रंगों के कारण अकसर लोगों को त्वचा संबंधी रोग भी हो जाते हैं. इससे आपसी कटुता बढ़ती है. होली प्रेम का पर्व है, इसे इस प्रेमभाव के साथ ही मनाना चाहिए. पर्व का अर्थ रंग लगाना या हुड़दंग करना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ आपसी द्वेषभाव को भुलाकर भाईचारे को बढ़ावा देना है.

Sunday, March 13, 2016

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया

डॊ. सौरभ मालवीय
हिंदी समाचार पत्रों के आलोक में भारतीय पत्रकारिता विशेषकर हिंदी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति को लेकर किए गए अध्ययन में अनेक महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर सामने आए हैं. सामान्यतः राष्ट्र, राष्ट्रवाद, संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे अस्थुल व गुढ़ विषय के बारे में लोगों की अवधारणाएं काफी गड़मड़ है. आधुनिक षिक्षा पद्धति यानि षिक्षा के मौजूदा सरोकार और तौर-तरीके तथा अध्ययन सामाग्री और विधि इसमें दिखाई दे रहे हैं. मीडिया के प्रचलन और इसके विकास के बाद जो आस जागी थी कि यह भारतीय जनमानस में विषयों को भारतीय दृष्टि से एक समग्र दृष्टिकोण (भारतीय दृष्टिकोण) विकसित करने में उपयोगी भूमिका निभाएगी. दुर्भाग्य से जनमाध्यम भी इस संदर्भ में विभ्रम की स्थिति में है. चूंकि इन माध्यमों पर धारा विशेष के लोगों में से अधिकांष की शिक्षा पद्धति और सोच के सरोकार पश्चिमी है या भारतीय होते हुए भी इनकी सोच पर पश्चिम की श्रेष्ठता का आधिपत्य है. ऐसी स्थिति में इनसे वृहद परिवर्तन कामी दृष्टिकोण की दिशा-दशा में आमूल-चूक परिवर्तन की उम्मीद करना ही बेमानी है.

अध्ययन में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संबंध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह प्रकाश आया है कि राष्ट्र के संबंध में कथित बौद्धिक सभ्रांत लोगों की अवधारणा ही भ्रामक और अस्पष्ट है. प्राकारान्तर से हम यूं कहें कि इनकी सोच पर पश्चिमी शिक्षा का या शिक्षा के यूरोपीकरण का प्रभुत्व है. अतिरेक न होगा. अधिकांश बुद्धिजीवी राष्ट्र का अर्थ सांस्कृतिक सरोकारों से युक्त नहीं मानते. उनकी सोच के भ्रामक स्थिति के चलते राष्ट्रवाद जैसे व्यापक और वृहद अर्थ ग्रहण वाले शब्द का अर्थ संकुचित अर्थों में आकार पाता है. इन लोगों का मनना है कि राष्ट्र का अभिप्राय क्षेत्र विशेष में रहने वाली विशेष या कुछ जातियों से है. प्रायः जिनमें सांस्कृतिक तौर पर सभ्यता पाई जाती है.

राष्ट्र की इनकी परिभाषा को स्वीकार करने पर भारत बहु-सांस्कृतियों वाला राष्ट्र न होकर एक ऐसा क्षेत्र विशेष होगा, जिनको बहुराष्ट्रीय संस्कृति वाला देश कहेंगे. जो देश की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विरासत की दृष्टि से ठीक नहीं होगा. इसको स्वीकार करने का अर्थ होगा कि हम यूरोप और अमेरिका के भारत को खंड-खंड करने वाले दृष्टि के पक्ष में खड़े होंगो जिनका एक मात्र ध्येय भारत को एक राष्ट्र नहीं, राष्ट्रों के समूह के (उप महाद्वीप) रूप में अधिस्थापित करना है. वे भारत को एक राष्ट्र न मानकर भारतीय उप महाद्वीप जैसे नामों से संबोधित करते हैं, जो इनकी अखण्ड भारती की एकता के प्रति संकुचित दृष्टिकोण को परिलक्षित करता है.

’आधुनिक बुद्धिजीवी’ राष्ट्र और देश को प्रायः समानार्थी रूप में न सिर्फ प्रयोग करते हैं, बल्कि स्वीकार भी करते हैं. कुछ कथित बुद्धिजीवी देश को राष्ट्र से व्यापक इकाई के रूप में परिभाषित करते हैं. राष्ट्र के ऊपर देश के व्यापकता स्वीकार करने का अर्थ होगा कि राष्ट्र को सिर्फ भू-स्थैतिक व्यापकत्व को स्वीकार करना. ये राष्ट्र और राज्य और देश किसी भी रूप में एक नहीं है. दुनिया के अधिकांश विद्वान वेद को प्राचीनतम ज्ञान कोश मानते हैं ऋषि परंपरा के अनुसार राष्ट्र शब्द का प्रयोग भारत में राष्ट्रवाद का इतिहास चार सौ वर्ष से ज्यादा पुराना नहीं है. यह अलग विषय है कि छिट-पुट रूप की अवधारणा प्रचलन में थी. राष्ट्र राज्य के संबंध में आधुनिक, राजनीतिक विदों का मानना है कि यह परिस्थितिजन्य प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं है, बल्कि वस्तु स्थिति यह है कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में प्रभुत्व में अभी राष्ट्रवादी चेतना का केंद्रीय स्रोत भारत ही था.

भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूल उसकी संस्कृति में है, जो कि शेष दुनिया में प्रचलित राष्ट्र राज्य की अवधारणा में सर्वथा अनुपस्थित है. संस्कृतिमूलक राष्ट्र भाव का जिक्र वेदों में कई जगह आया है. यजुर्वेद में एक राष्ट्रीय गीत का उल्लेख भी मिलता है जिसमें ऋषि ने राष्ट्र में तेजस्वी विद्वानों, पराक्रमी योद्धाओं, दुधारू पशुओं, तीव्रगामी अश्वों, गुणवती नारीयों, विजय कामी सभ्य जनों, समयानुकूल वर्षा और हरी-भरी कृषि की कामना की है, साथ ही इस गीत में राष्ट्र के योग क्षेम की कामना चाही गई है. प्राकारान्तर से आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को इसके शिशु के रूप में उल्लेखित किया जा सकता है.

अध्ययन से एक ओर जो महत्वपूर्ण तथ्य उजागर हुआ है -राजनीतिक सत्ता के अतिरिक्त भी राष्ट्र का अपना कुछ अलग अस्तित्व होता है जो इसकी संस्कृति और जीवन पद्धति से न सिर्फ पुष्ट होता है, बल्कि अघोषित तौर पर सत्ता जनीत शक्ति का केंद्र होता है. यह दुनिया के प्रत्येक देश में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि अन्यान्य दबाव समूहों के रूप में मौजूद रहता है. कल्पना करें अगर सांस्कृतिक टकराव नहीं होता, तो क्या भारत-पाकिस्तान दो देश बनते और भारत का विभाजन होता ? यह राष्ट्रों के इसी सत्य की ओर इंगित करता है.

कोई माने या न माने दुनिया के प्रत्येक देश की सत्ता उसके सांस्कृतिक सरोकारों से प्रभावित व आप्लावित होती है. अंतर सिर्फ इतना है दुनिया के राष्ट्रों के सांस्कृतिक सरोकार आपस में कई बार चुनौति या प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़े नजर आते हैं. वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भारतीय अवधारणा सिर्फ स्वहित पोषण या संरक्षण की बात नहीं करते, बल्कि दुनिया के हितों में ही खुद के हितों को संरक्षित मानते हैं. यहां बनस्पतियैं शांति की अवधारणा न सिर्फ अभिसिंचित बल्कि जीवंत है.

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की धारणा राष्ट्रीय हितों को सिर्फ आर्थिक सरोकारों से समतुल्य करके नहीं देखती. अपेक्षात्मक तौर पर मानवीय सरोकार और हित इसके लिए अधिक मायने रखते हैं. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद राष्ट्र के लिए सिर्फ राजनीतिक व भू स्थैतिक एकता और संप्रभुता को आधार नहीं मानती, बल्कि सांस्कृतिक एकता को उसका प्रमुख आधार मानती है. इसके अनुसार सांस्कृतिक भिन्नता राष्ट्र के अस्तित्व के लिए कोई खतरा नहीं है, जबकि भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक मूल्यों के बीच अस्तित्व की भावना के आधार पर यह राष्ट्र मूल्य की बात करता है. बहुत सारे विद्वान भारत को एक राष्ट्र के रूप में मौजूदा अस्तित्व के पीछे उसकी द्धैवि शक्ति को मानते हैं- यह दैवीय शक्ति कुछ और नहीं, बल्कि इसके सांस्कृतिक मूल्य ही हैं, जो इसे अखंड राष्ट्र के तौर पर पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक बनाए हुए हैं.

हिंदी पत्रों के प्रकाश में भारतीय पत्रकारिता विशेषकर हिंदी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मीडिया के परिपेक्ष्य में जो अध्ययन किया गया, उसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य प्रथम दृष्टया यह उजागर हुआ कि मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बीच अन्योन्याश्रीत संबंध रहे हैं अभिप्रायतः स्वतंत्रता पूर्ण भारतीय पत्रकारिता के पत्रकारिय सरोकार मूलतः राष्ट्रवादी हैं, इसे हम यू भी कह सकते हैं कि भारती की मूल्य परख राष्ट्रवादी पत्रकारिता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों में कोई विशेष विभेद नहीं है. दोनों समग्र राष्ट्रीय और सांस्कृतिक हितों की वकालत करते हैं. समप्रति नेहरू युगीन पत्रकारिता के सरोकार भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों से उद्देष्यगत विभेद नहीं रखते. इनके विभेद तौर-तरीकों और अपनाए गए संसाधनों को लेकर हैं.

इस अध्याय में निर्णायक निष्कर्ष यह उभर कर आया कि राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिय मूल्यों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों में बिभेद उस काल में विषेष तौर पर उभर कर आया. जब भारतीय सकारात्मक अधिष्ठान में वामपंथी हस्तक्षेप शक्तिवत वढ़ गया यह दौर राष्ट्रीय परिदृष्य में स्वतंत्रता के बाद प्रभावी हुआ.

वस्तु स्थिति यह है कि जैसे-जैसे केंद्र और राज्य स्तर पर समाजवादी और वामपंथी विचारधारा सत्ता के करीब आती गई या इनका सीधे या परोक्ष हस्तक्षेप बढ़ने लगा उसी अनुपात में सिर्फ सत्तात्मक अधिष्ठान से बल्कि पत्रकारिय जगत से भी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी विचारधारा का लोप होना या उनका नकारात्मक प्रचार बढ़ गया.

अध्ययन के अनुसार मीडिया जगत में सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े पत्रकारों का कभी कोई अभाव नहीं रहा है, लेकिन सौभाग्य या दुर्भाग्य से इनका नेतृत्व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद विरोधी विचारधारा के लोगों के हाथों में रहा है. इसके पीछे सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण सत्ता में इस विचारधारा के लोगों का अधिक मुखर और शक्तिशाली होना रहा है. निष्कर्षतः सांस्कृतिक राष्ट्रवादी विचारधारा से संबंधित समाचारों का कवरेज नकारात्मक तौर पर अधिक किया जाता है और इसी रूप में वे पत्रों में स्थान भी पा रहे हैं. इसे संबंधित नकरात्मक तथ्यों और मूल्यों को सर्वाधिक तौर पर उभारा जाता है.

अध्ययन के अनुसार जो सर्वाधिक तथ्य यह उभर कर सामने आया कि मांग या रुचि आधारित न होकर अधिरोपित अधिक है. जो इस बात के गवाह है कि मीडिया सत्ता में किन लोगों का आधिपत्य है, जबकि सामाजिक अभिरूचि इस मामले में मीडिया से मेल नहीं खाते शोध में किए गए सर्वेयात्मक अध्ययन के अनुसार 80 प्रतिशत पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में रुचि रखते हैं और वे इसके बारे में वस्तुनिष्ठ जानकारी चाहते हैं.

उपरोक्त सर्वेक्षण से कई भ्रांतियां समाप्त हो जाती हैं. पहली भ्रांति तो यह निर्मूल होती है कि आज का पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ना व जानना नहीं चाहता है. सर्वेक्षण के परिणामों से स्पष्ट होता है कि 80 प्रतिशत पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ने में रुचि रखते हैं (सारणी 39) और 60 प्रतिशत पाठकों का मानना है कि मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उचित महत्व नहीं दिया जाता है. यह आंकड़ा उन संपादकों और मीडिया घरानों के लिए चैंकाने वाला हो सकता है, जो अभी तक यह मानते रहे हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक कालबाह्य विचार है और आज का पाठक उसमें रूची नहीं रखता.

यह आंकड़ा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम यह देखते हैं कि सर्वेक्षण के प्रतिभागियों में सबसे अधिक संख्या युवाओं (40 प्रतिशत; सारणी 21) और स्नातक या उससे अधिक शिक्षितों (44 प्रतिशत; सारणी 26) की है. यानी शिक्षित युवा भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ने और जानकारी रखने में पर्याप्त रुचि रखते हैं. सर्वेक्षण से यह भी स्पष्ट होता है कि पाठक मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दिए जाने वाले महत्व व स्थान से संतुष्ट नहीं हैं और 60 प्रतिशत पाठकों का मानना है कि मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उचित महत्व नहीं दिया जा रहा है.
रोचक बात यह भी है कि 41 प्रतिशत प्रतिभागियों ने इसका कारण मीडिया का अपना पूर्वाग्रह बताया, जबकि 23 प्रतिशत पाठकों का मानना था कि देश में ऐसी गतिविधियों के कम होने के कारण मीडिया में इसे कम स्थान मिलता है.

बहरहाल इस सर्वेक्षण से यह स्पष्ट हो जाता है कि देश का पाठक वर्ग मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दिए जा रहे महत्व व स्थान से असंतुष्ट है और वह इस पर और सामग्री पढ़ना चाहता है.

संस्कार

डॉ. सौरभ मालवीय
किसी भी समाज को चिरस्थायी प्रगत और उन्नत बनाने के लिए कोई न कोई व्यवस्था देनी ही पड़ती है और संसार के किसी भी मानवीय समाज में इस विषय पर भारत से ज्यादा चिंतन नहीं हुआ है. कोई भी समाज तभी महान बनता है, जब उसके अवयव श्रेष्ठ हों. उन घटकों को श्रेष्ठ बनाने के लिए यह अत्यावश्यक है कि उनमें दया, करुणा, आर्जव, मार्दव, सरलता, शील, प्रतिभा, न्याय, ज्ञान, परोपकार, सहिष्णुता, प्रीति, रचनाधर्मिता, सहकार, प्रकृति प्रेम, राष्ट्रप्रेम एवं अपने महापुरुषों आदि तत्वों के प्रति अगाध श्रद्धा हो. मनुष्य में इन्हीं सारे सद्गुणों के आधार पर जो समाज बनता है, वह चिरस्थायी होता है. यह एक महत्वपूर्ण चिंतनीय विषय हजारों साल पहले से मानव के सम्मुख था कि आखिर किस विधि से सारे उत्तम गुणों का आह्वान एक-एक व्यक्ति में किया जाए कि यह समाज राष्ट्र और विश्व महान बन सके. भारतीय ऋषियों ने इस पर गहन चिंतन-मनन किया. आयुर्वेद के वंदनीय पुरुष आचार्य चरक कहते हैं-
संस्कारोहि गुणान्तरा धानमुच्चते

अर्थात् यह असर अलग है. मनुष्य के दुर्गुणों को निकाल कर उसमें सद्गुण आरोपित करने की प्रक्रिया का नाम संस्कार है. वास्तव में संस्कार मानव जीवन को परिष्कृत करने वाली एक आध्यात्मिक विधा है. संस्कारों से संपन्न होने वाला मानव सुसंस्कृत, चरित्रवान, सदाचारी और प्रभुपरायण हो सकता है अन्यथा कुसंस्कार जन्य चारित्रिक पतन ही मनुष्य और समाज को विनाश की ओर ले जाता है. वही संस्कार युक्त होने पर सबका लौकिक और पारलौकिक अभ्युदय सहज सिद्ध हो जाता है. संस्कार सदाचरण और शास्त्रीय आचार के घटक होते हैं. संस्कार, सद्विचार और सदाचार के नियामक होते हैं. इन्हीं तीनों की सुसंपन्नता से मानव जीवन को अभिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति होती है. भारतीय संस्कृति में संस्कारों का महत्व सर्वोपरि माना गया है, इसी कारण गर्भाधान से मृत्यु पर्यंत मनुष्य पर सांस्कारिक प्रयोग चलते ही रहते हैं. इसलिए भारतीय संस्कृति सदाचार से अनुप्रमाणित रही है. प्राकृतिक पदार्थ भी जब बिना सुसंस्कृत किए प्रयोग के योग्य नहीं बन पाते हैं, तो मानव के लिए संस्कार कितना आवश्यक है यह समझ लेना चाहिए. जब तक मानव बीज रूप में है तभी से उसके दोषों का अहरण नहीं कर लिया जाता, तब तक वह व्यक्ति आर्षेय नहीं बन पाता है और वह मानव जीवन से राष्ट्रीय जीवन में कहीं भी हव्य कव्य देने का अधिकारी भी नहीं बन पाता. मानव जीवन को पवित्र चमत्कारपूर्ण एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए संस्कार अत्यावश्यक हैं. गहरे अर्थों में संस्कार धर्म और नीति समवेत हो जाती है. इसीलिए संस्कार की ठीक-ठाक परिभाषा कर पाना सम्भव ही नहीं है. संस्कार शब्दातीत हो जाते हैं, क्योंकि वहां व्यक्ति क्रिया और परिणाम में केवल परिणाम ही बच जाता है. व्यक्ति के अहंकारों का क्रिया में लोप हो जाता है. एक तरह से व्यक्ति मिट ही जाता है तो जब व्यक्ति मिट ही जाता है, तो परिभाषा कौन करेगा अब वह व्यक्ति समष्टि बन जाता है. वह निज के सुख-दुख हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश के बारे में काम चलाऊ से ज्यादा विचार ही नहीं करता. उसका तो आनंद परहित परोपकार और समाज एवं सृष्टि को संवारने में ही निहित हो जाता है और संस्कारों की उपर्युक्त क्रिया ही चरित्र, सदाचार, शील, संयम, नियम, ईश्वर प्रणिधान स्वाध्याय, तप, तितिक्षा, उपरति इत्यादि के रूप में फलित होते हैं.

संस्कारों से अनुप्राणित व्यक्ति की सत्य की खोज एक सनातन यात्रा बन जाती है. और वह प्राप्त सत्य केवल एक भीतरी आनंद देता है, जिसकी ऊर्जा से आपलावित होकर व्यक्ति समाज और मानवता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है. उस सत्य की व्याख्या नहीं की जा सकती. उसे केवल अनुभव किया जा सकता है, क्योंकि वो शब्द छोटे पड़ जाते और जो अनुभूति है वो इतनी विराट है कि अनादि, अनंत. इस अनंत को सात मानव शब्दों में कैसे पकड़ स़कता है, वहां तो हर कुछ अद्वैत हो जाता है. ‘नारद भक्ति सूत्र’ में आता है कि सत्य एक है वह अद्वैत है. साधारण ढंग से देखने पर दर्शक, दृश्य और द्रष्टा या ज्ञाता ज्ञेय और ज्ञान तीन दिखाई देते हैं. थोड़ी और गहराई में दो ही बच जाते हैं, लेकिन सच तो यह है कि वह केवल अद्वैत है. वहां ज्ञाता और ज्ञेय दोनों मिट जाते हैं केवल ज्ञान बच जाता है.
तस्या ज्ञान मेव साधनमृत्यके
(नारद भक्ति सूत्र 28)
यह संस्कार वही ज्ञान है, इस त्रिभंग से मुक्त होना ही संस्कार का परिणाम है. ऊपरी तौर पर भी हिन्दू संस्कृति ने इसकी बड़ी सुंदर व्यवस्था रखी ही है. कुंभ मेले में अमृत रसपान हेतु लाखों-लाखों लोग लाखों वर्षों से एकत्र होते रहते हैं. वहां भी वे दृश्य गंगा और जमुना में स्नान करते हैं, लेकिन अनुभूति तो अदृश्य सरस्वती की होती है. यह सरस्वती ही ज्ञान है यही संस्कार का सुफल है यह सरस्वती दृश्यमान नहीं है. अनुभूति जन्य है इस सरस्वती को व्याख्यायित करना संभव ही नहीं है, केवल कुछ लक्षणों को पकड़ा जा सकता है. यह अद्भुत प्रेम है, जिसमें प्रेमी और प्रेयसी दोनों डूब जाते हैं. केवल प्रेम बच जाता है. यह प्रेम केवल करने से समझ में आता है. शब्दों से इसका स्वाद नहीं मिल पाएगा.
प्रेमैव कार्यम् प्रेमैव कार्यम्..
religion यही संस्कार है. यूं तो प्रत्येक समाज अपने घटकों को सुसंस्कारित करने का प्रयास करता है. उसके लिए आदर्श भी रखता है. संस्कार की परिधि इतनी व्यापक है कि उसमें श्वास प्रश्वास से लेकर प्रत्येक कर्म समाविष्ट है.
ब्राह्सस्कारसंसकृतः ऋषीणां समानतां सामान्यतां
समानलोकतां सामयोज्यतां गच्छति
दैवेनोत्तरेण संस्कारेणानुसंस्कृतो देवानां समानतां
समानलोकतां सायोज्यतां च गच्छति
(हारित संहिता)
संस्कारों से संस्कृत व्यक्ति ऋषियों के समान पूज्य तथा ऋषि तुल्य हो जाता है. वह ऋषि लोक में निवास करता है तथा ऋषियों के समान शरीर प्राप्त करता है और पुनः अग्निष्टोमादि दैवसंस्कारों से अनुसंस्कृत होकर वह देवताओं के समान पूज्य एवं देव तुल्य हो जाता है. वह देवलोक में निवास करता है और देवताओं के समान शरीर को प्राप्त करता है.
अव्याकृत किंतु अनुभव गम्य संस्कारों के फूल जिसके हृदय में खिले हैं और जिसकी पवित्र सुगंध वातावरण को मुग्धकारी बना देती है उन ऋषियों ने लोक कल्याण हेतु संस्कारों के लक्षण कहने का प्रयास किया है. यद्यपि वे अनुभोक्ता अपने आनन्द को शब्दों में परिभाषित तो नहीं कर सकते फिर भी कुछ संकेत उन्होंने उसी दिशा में दिए हैं, जिससे प्राणी मात्र उसी का अनुसरण कर अपना लौकिक और पारलौकिक उन्नयन कर सके.

संस्कृतस्य हि दान्तस्य नियतस्य यतात्मनः
प्राज्ञस्यानन्तरा सिद्धिरिहलोके परत च..
(महाभारत)
sanskarजिसके वैदिक संस्कार विधिवत् सम्पन्न हुए हैं, जो नियमपूर्वक रहकर मन औैर इन्द्रियों पर विजय पा चुका है, उस विज्ञ पुरुष को इहलोक और परलोक में कहीं भी सिद्धि प्राप्त होते देर नहीं लगती.
अंगिरा ऋषि कहते हैं कि-
चित्रकर्म यथाडेनेकैरंगैसन्मील्यते शनैः.।
ब्राह्ण्यमपि तद्वास्थात्संस्कारैर्विधिपूर्व कैः।।
जिसके प्रकार किसी चित्र में विविध रंगों के योग से धीरे-धीरे निखार लाया जाता है, उसी प्रकार विधिपूर्वक संस्कारों के संपादन से ब्रह्ण्यता प्राप्त होती है.
मानवीय संस्कारों के महत्वपूर्ण तत्वों की ओर इंगित करते हुए भगवान वेद व्यास कहते हैं-
न चात्मानं प्रशंसेद्वा परनिन्दां च वर्जयेत्।
वेदनिन्दां देवनिन्दां प्रयत्तेन विवर्जयेत्।।
(पुराण)
अपनी प्रशंसा न करे तथा दूसरे की निन्दा का त्याग कर दे. वेदनिंदा और देवनिंदा का यत्नपूर्वक त्याग करे.
संस्कारों से ही आचरण पवित्र होते हैं।
आचारः परमो धर्मः सर्वेषामिति निश्चयः
हीनाचारी पवित्रात्मा प्रेत्य चेह विनश्यति।।
सभी शास्त्रों का यह निश्चित मत है कि आचार ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है. आचारहीन पुरुष यदि पवित्रात्मा भी हो तो उसका परलोक और इहलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं.
राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की एक पुस्तक की प्रस्तावना में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 30 सितंबर 1955 को एक बडे़ लेखक के हवाले संस्कृति के बारे में लिखा था-
‘‘संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गई हैं उनसे अपने आप को परिचित कराना संस्कृति है.’’
बकौल एक अन्य लेखक श्री नेहरू जी कहते हैं-
‘‘संस्कृति शारीरिक या मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण, दृढी़करण या विकास अथवा उससे उत्पन्न अवस्था है.’’ यह ‘‘मन, आचार अथवा रूचियों की परिष्कृति या शुद्धि’’ है. यह सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना है. इस अर्थ में संस्कृति कुछ ऐसी चीज का नाम हो जाता है, जो बुनियादी और अन्तर्राष्ट्रीय है. फिर, संस्कृति के कुछ राष्ट्रीय पहलू भी होते हैं. और इसमें संदेह नहीं कि अनेक राष्ट्रों ने अपना कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व तथा अपने भीतर कुछ खास ढंग के मौलिक गुण विकसित कर लिए हैं.
संस्कारों के प्रयोजन पर विचार करने से यह स्पष्ट होता है कि यही एक माध्यम है जब हम परम सत्य की अनुभूति को कल्याणकारी और लोकरंजक बना सकते हैं.
उपायः सोडवताराय
(मांडूक्यकारीका)
सत्यं शिवं सुंदरम् में मनोयोग ही सृष्टि का प्रयोजन है और इस परम प्राप्ति का एकमेव कारण संस्कार है.

भारत की राष्ट्रीयता हिन्दुत्व है


डॉ. सौरभ मालवीय
हिन्दू शब्द का प्रयोग कब प्रारंभ हुआ, यह बताना कठिन है. परंतु यह सत्य है कि हिन्दू शब्द अत्यंत प्राचीन वैदिक वाङ्मय के ग्रंथों में साक्षात् नहीं पाया जाता है. परंतु यह भी निर्विवाद है कि हिन्दू शब्द का मूल निश्चित रूप से वेदादि प्राचीन ग्रंथों में विद्यमान है.
भारत में हिन्दू नाम की उपासना पद्धति है ही नहीं, यहां तो कोई वैष्णव है या शैव अथवा शक्य है, कबीरपंथी है, सिख है, आर्यसमाजी है, जैन और बौद्ध है. वैष्णवों में भी उपासना के अनेक भेद हैं. अर्थात् जितने व्यक्ति उपासना और आस्था की उतनी ही विधियां हर विधि को समाज से स्वीकारोक्ति प्राप्त है. पश्चिम के राजनीतिज्ञ व समाजशात्री भारतीय संस्कृति और समाज के इस पक्ष को या तो समझ ही नहीं सके या उन्होंने पश्चिमी अवधारणाओं के बने सांचों में ही भारत को ढालने का प्रयास किया.
अनेक सज्जनों द्वारा विभिन्न प्रकार की व्याख्याओं से यह शब्द भी विवादित हो गया है. यद्यपि यह शब्द भारत का ही पर्याय है और यह जीवन पद्धति की ओर इंगित करता है. विख्यात स्तंभकार पद्म श्री मुजफ्फर हुसैन कहते हैं-
‘‘भारतीयता तो भारत की नागरिकता है, भारत की राष्ट्रीयता हिन्दुत्व है.’’
ऐसा भी प्रचारित किया गया है कि हिन्दू नाम अपमानजनक है जैसा कि भारतीय फारसी के शब्दकोशों में मिलता है. इनमें हिन्दू का अर्थ द्वेषवश, काला, चोर आदि किया गया है, जो कि पूर्णतया असत्य है. अरबी व फारसी भाषा में ‘हिन्द’ का अर्थ है ‘सुंदर’ एवं ‘भारत का रहने वाला’ आदि. हिन्दू चिंतक श्री कृष्णवल्लभ पालीवाल बताते हैं कि जब 1980-82 में, मैं बगदाद में ईराक सरकार का वैज्ञानिक सलाहकार था, तो मुझे वहां यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अनेक युवक व युवतियों के नाम ‘अलहिन्द’ व ‘विनत हिन्द’ थे. तो मैंने आश्चर्यवश उनसे पूछा कि ये नाम तो हिन्दुओं जैसे लगते है, जिसका अर्थ है ‘सुंदर’ और इसी भाव में हमारे ये नाम है.
कुछ लोगों ने अपने को ‘हिन्दू’ न कहकर ‘आर्य‘ कहना ज्यादा उचित समझा है, किंतु रामकोश में सुस्पष्ट लिखा है-
हिन्दूर्दुष्टो न भवति नानार्या न विदूषकः।
सद्धर्म पालको विद्वान् श्रौत धर्म परायणः।।
यानी ‘‘हिन्दू दुष्ट, दुर्जन व निंदक नहीं होता है. वह तो सद्धर्म का पालक, सदाचारी, विद्वान, वैदिक धर्म में निष्ठावान और आर्य होता है. अतः हिन्दू ही आर्य है और आर्य ही हिन्दू है. समय की मांग है कि हम इस विवाद को भूलकर मिल जुलकर हिन्दू धर्म व हिन्दू संस्कृति को उन्नत करने और हिन्दू राज्य स्थापित करने प्रयास करें.
स्वामी विज्ञानानंद ने हिन्दू नाम की उत्पति के विषय में कहा कि हमारा हिन्दू नाम हजारों वर्षों से चला आ रहा है, जिसके वेदों संस्कृत व लौकिक साहित्य में व्यापक प्रमाण मिलते हैं. अतः हिन्दू नाम पूर्णतया वैदिक, भारतीय और गर्व करने योग्य है. वस्तुतः यह नाम हमें विदेशियों ने नहीं दिया है, बल्कि उन्होंने अपने अरबी व फारसी भाषा के साहित्य में उच्च भाव में प्रयोग किया है.
शताब्दियों से संपूर्ण भारतीय समाज ‘‘हिन्दू" नाम को अपने धार्मिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय एवं जातिय समुदाय के संबोधन के लिए गर्व से प्रयोग करता रहा है. आज भारत ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में बसे करोड़ों हिन्दू अपने को हिन्दू कहने में गर्व अनुभव करते हैं. वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने धर्म एवं संस्कृति से प्रेरणा पाकर असीम सफलता प्राप्त कर रहे हैं. वे हिन्दू जीवन मूल्यों से स्फूर्ति पाकर समता और कर्मठता के आधार पर, भारत में ही नहीं, विदेशों में भी, अपनी श्रेष्ठता का परिचय दे रहे हैं. वे श्रेष्ठ मानवीय जीवन मूल्यों के आधार पर समाज में प्रतिष्ठित भी हो रहे है.

हिन्दू पुनर्जागरण के पुरोधा महर्षि दयानंद सरस्वती, युवा हिन्दू सम्राट स्वामी विवेकानंद, स्वामी श्रद्धानंद, योगी श्री अरविंद, भाई परमानंद, स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर आदि महापुरुषों ने ‘हिन्दू’ नाम को गर्व के साथ स्वीकार कर आदर प्रदान किया है. स्वामी विवेकानंद एवं स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने हिन्दू नाम के विरुद्ध चलाए जा रहे मिथ्या कुप्रचार का पूर्ण सामर्थ्य से विरोध किया. सावरकर जी ने प्राचीन भारतीय शास्त्रों के आधार पर इस नाम की मौलिकता को बड़ी प्रामाणिता के साथ पुनः स्थापित किया तथा बल देकर सिद्ध किया कि ‘‘हिन्दू" नाम पूर्णतया भारतीय है जिसका मूल वेदों का प्रसिद्ध ‘सिन्धु’ शब्द है.’
हिन्दू शब्द का प्रयोग कब प्रारंभ हुआ, इसकी निश्चित तिथि बताना कठिन अथवा विवादास्पद होगा. परंतु यह सत्य है कि हिन्दू शब्द अत्यंत प्राचीन वैदिक वाङ्मय के ग्रंथों में साक्षात् नहीं पाया जाता है. परंतु यह भी निर्विवाद है कि हिन्दू शब्द का मूल निश्चित रूप से वेदादि प्राचीन ग्रंथों में विद्यमान है. औपनिषदिकों काल के प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत एवं मध्यकालीन साहित्य में हिन्दू शब्द पर्याप्त मात्रा में मिलता है. अनेक विद्वानों का मत है कि हिन्दू शब्द प्राचीन काल से सामान्य जनों की व्यावहारिक भाषा में प्रयुक्त होता रहा है. जब प्राकृत एवं अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग साहित्यिक भाषा के रूप में होने लगा, उस समय सर्वत्र प्रचलित हिन्दू शब्द का प्रयोग संस्कृत ग्रंथों में होने लगा. ब्राहिस्र्पत्य कालिका पुराण, कवि कोश, राम कोश, कोश, मेदिनी कोश, शब्द कल्पद्रुम, मेरूतंत्र, पारिजात हरण नाटक, भविष्य पुराण, अग्निपुराण और वायु पुराणादि संस्कृत ग्रंथों में हिन्दू शब्द जाति अर्थ में सुस्पष्ट मिलता है.
इससे यह स्पष्ट होता है कि इन संस्कृत ग्रंथों के रचना काल से पहले भी हिन्दू शब्द का जन समुदाय में प्रयोग होता था.
संस्कृत साहित्य में ‘हिन्दू’ शब्द
संस्कृत साहित्य में पाए गए हिन्दू शब्द प्रस्तुत है-
हिंसया दूयते यश्च सदाचरण तत्परः।
वेद… हिन्दू मुख शब्दभाक्।।
(वृद्ध स्मृति)
‘‘जो सदाचारी वैदिक मार्ग पर पर चलने वाला, हिंसा से दुःख मानने वाला है, वह हिन्दू है."
बलिना कलिनाच्छन्ने धर्मे कवलिते कलौ।
यावनैर वनीक्रान्ता, हिन्दवो विन्ध्यमाविशन्।।
(कालिका पुराण)
‘जब बलवान कलिकाल ने सबको प्रच्च्छन्न कर दिया और धर्म उसका ग्रास बन गया तथा पृथ्वी यवनों से आक्रांत हो गई, तब हिन्दू खिसककर विंध्याचल की ओर चले गए.’’
इसी प्रकार का भाव यह श्लोक भी प्रकट करता हैः
यवनैरवनी क्रान्ता, हिन्दवो विन्ध्यमाविशन्।
बलिना वेदमार्र्गायं कलिना कवलीकृतः।।
(शार्ङ्धर पद्धति)
‘यवनों के आक्रमण से हिन्दू विन्ध्याचल पर्वत की ओर चले गए.’
हिन्दूः हिन्दूश्च प्रसिद्धौ दुष्टानां च विघर्षणे.
(अ˜ुत कोश)
‘हिन्दू’ और ‘हिन्दू’ दोनों शब्द दुष्टों को विघर्षित करने वाले अर्थ में प्रसिद्ध हैं.’
‘‘हिन्दू सद्धर्म पालको विद्वान् श्रौत धर्म परायणः।
(राम कोश)
हिन्दूः हिन्दूश्च हिन्दवः।
(मेदिनी कोश)
’हिन्दू, हिन्दू और हिन्दुत्व तीनों एकार्थक है.’
हिन्दू धर्म प्रलोप्तारौ जायन्ते चक्रवर्तिनः।
हीनश्च दूषयप्येव स हिन्दूरित्युच्यते प्रिये।।
(मेरु तंत्र)
‘‘हे प्रिये! हिन्दू धर्म को प्रलुप्त करने वाले चक्रवर्ती राजा उत्पन्न हो रहे हैं. जो हीन कर्म व हीनता का त्याग करता है, वह हिन्दू कहा जाता है.’’
हिनस्ति तपसा पापान् दैहिकान् दुष्टमानसान्।
हेतिभिः शत्रुवर्गः च स हिन्दूः अभिधीयते।।
(परिजातहरण नाटक)
‘जो अपनी तपस्या से दैहिक पापों को दूषित करने वाले दोषों का नाश करता है, तथा अपने शत्रु समुदाय का भी संहार करता है, वह हिन्दू है.’
हीनं दूषयति इति हिन्दू जाति विशेषः
(शब्द कल्पद्रुमः)
‘हीन कर्म का त्याग करने वाले को हिन्दू कहते हैं.’
इन प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि प्राचीन एवं अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में हिन्दू शब्द का पर्याप्त उल्लेख के साथ-साथ हिन्दू के लक्षणों को भी दर्शाया गया है.

भारतीय संस्कृति


डॉ. सौरभ मालवीय
संस्कृति का उद्देश्य मानव जीवन को सुंदर बनाना है. मानव की जीवन पद्धति और धर्माधिष्ठित उस जीवन पद्धति का विकास भी उस संस्कृति शब्द से प्रकट होने वाला अर्थ है. इस अर्थ में राष्ट्र उसकी संतति रूप समाज, उस समाज का धर्म इतिहास एवं परंपरा आदि सभी बातों का आधार संस्कृति है. संपर्क सूत्र दृष्टि से देखा जाए, तो इस संस्कृति का मूल वेदों में है. भाषा की उच्चता से समृद्ध, विचारों से परिपक्व, मानवीय मूल्यों का संरक्षक, समाज रचना एवं जीवन पद्धति का समुचित मार्गदर्शन कराने वाला यह वैदिक वाङ्मय गुरु शिष्य परंपरा की असाधारण प्रणाली से उसके मूल स्वरूप में आज तक यथावत् चला आ रहा है. ऐतिहासिक रूप में संसार के सभी विद्वान इस बात पर एकमत हैं कि वेद ही इस धरती की प्राचीनतम पुस्तक है और वे वेद जिस संस्कृति के मूल हैं वह संस्कृति भी इस पृथ्वी पर सर्वप्रथम ही उदित हुई. उसका निश्चित काल बताना सम्भव ही नहीं हो रहा है. लाख प्रयत्नों के बावजूद विद्वान इसे ईसा पूर्व 6000 वर्ष के इधर नहीं खींच पा रहे हैं.
भारतीय ऋषियों ने लोकमंगल की कामना से द्रवित होकर मानवीय गुणों को दैवीय उच्चता से विभूषित करने के लिए संस्कारों की अत्यंत वैज्ञानिक एवं सार्वकालिक सार्वभौमिक व्यवस्था दी है. ऐसा नहीं है कि यह केवल भारतीयों के लिए ही उचित है, अपितु किसी भी भू-भाग के मानवीय गुणों के उत्थान हेतु ये संस्कार समीचीन है. इसमें किसी भी प्रकार का बंधन जातीय, वर्णीय, आर्थिक, सामाजिक देशकालीय लागू नहीं होता.

उत्तम से उत्तम कोटि का हीरा खान से निकलता है. उस समय वह मिट्टी आदि अनेक दोषों से दूषित रहता है. पहले इसे सारे दोषों से मुक्त किया जाता है. फिर तराशा जाता है, तराशने के बाद कटिंग की जाती है. यह क्रिया गुणाधान संस्कार है. तब वह हार पहनने लायक होता है. जैसे-जैसे उसका गुणाधान-संस्कार बढत़ा चला जाता है, वैसे ही मूल्य भी बढत़ा चला जाता है. संस्कारों द्वारा ही उसकी कीमत बढी़. संस्कार के बिना कीमत कुछ भी नहीं. इसी प्रकार संस्कारों से विभूषित होने पर ही व्यक्ति का मूल्य और सम्मान बढत़ा है. इसीलिए हमारे यहां संस्कार का महात्म्य है.

संस्कार और संस्कृति में जरा-सा भी भेद नहीं है. भेद केवल प्रत्यय का है. इसीलिए संस्कार और संस्कृति दोनों शब्दों का अर्थ है-धर्म. धर्म का पालन करने से ही मनुष्य, मनुष्य है, अन्यथा खाना, पीना, सोना, रोना, धोना, डरना, मरना, संतान पैदा करना ये सभी काम पशु भी करते हैं. पशु और मनुष्य में भेद यह है कि मनुष्य उक्त सभी कार्य संस्कार के रूप में करता है. गाय, भैंस, घोड़ा, बछडा़ आदि जैसा खेत में अनाज खड़ा रहता है वैसा ही खा जाते हैं. लेकिन कोई मनुष्य खडे़ अनाज को खेतों में खाने को तैयार नहीं होता. खायेगा तो लोग कहेंगे पशुस्वरूप है. इसीलिए संस्कार, संस्कृति और धर्म के द्वारा मानव में मानवता आती है. बिना संस्कृति और संस्कार के मानव में मानवता नहीं आ सकती.

हमारे यहां प्रत्येक कर्म का संस्कृति के साथ संबंध है. जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत और प्रातःकाल शैया त्यागकर पुनः शैया ग्रहणपर्यंत हम जितने कार्य करें, वे सभी वैसे हो, जिससे हमारे जीवन का विकास ही नहीं हो, बल्कि वे अलंकृत, सुशोभित और विभूषित भी करें. ऐसे कर्म कौन से हैं, उनका ज्ञान मनुष्य को अपनी बुद्धि से नहीं हो सकता. सामान्यतया बुद्धिमान व्यक्ति सोचता है कि वह वही कार्य करेगा जिससे उसे लाभ हो. लेकिन मनुष्य अपनी बुद्धि से अपने लाभ और हानि का ज्ञान कर ही नहीं सकता. अन्यथा कोई मनुष्य निर्धन और दुखी नहीं होता. अपने प्रयत्नों से ही उसे हानि भी उठानी पड़ती है. इसलिए कहा जाता है कि हमने अपने हाथों से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली. अतः मनुष्य को कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान शास्त्रों द्वारा हो सकता है. शास्त्रों द्वारा बताये गये अपने-अपने अधिकारानुसार कर्तव्य कर्म और निषिद्ध कर्म को जानकर आचरण करना ही संस्कृति है.
जैसे संस्कार और संस्कृति में कोई अंतर नहीं होता है केवल प्रत्यय भेद है वैसे ही संस्कृति और सभ्यता भी समान अर्थों में प्रयोग होती है. धर्म और संस्कृति भी एक ही अर्थ में प्रयोग होता है लेकिन अंत में एक सूक्ष्म भेद हो जाता है जिसको मोटे तौर पर कह सकते हैं कि धर्म केवल शस्त्रेयीकसमधिगम्य है, अर्थात् शास्त्र के आदेशानुरूप कृत्य धर्म है जब कि संस्कार में शास्त्र से अविरुद्ध लौकिक कर्म भी परिगणित होता है.
अनादि सृष्टि परंपरा के रक्षण हेतु परब्रह्म परमात्मा ने अखिल धर्म मूल वेदों को प्रदान किया. हमारी मान्यता है कि वेद औपौरुषेय है उसे ही श्रुति कहा जाता है. उन्हीं श्रुतियों पर आधारित है धर्म शास्त्र जिसे स्मृति कहते हैं. शृंगेरी शारदा पीठ के प्रमुख जगत गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री भारती तीर्थ जी महाराज के अनुसार-
श्रुति स्मृति पुराणादि के आलय सर्वज्ञ भगवत्पाद श्री जगत गुरु श्री शंकराचार्य जी ने श्रीमदभागवतगीता के शाकर भाष्य के प्रारंभ में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि परमपिता परमात्मा ने जगत की सृष्टि कर उसकी स्थिति के लिए मरीच आदि की सृष्टिकर प्रवृति लक्षण धर्म का प्रबोध किया और सनक सनन्दनादि को उत्पन्न कर के ज्ञान वैराग्य प्रधान निवृति लक्षण धर्म का मार्ग प्रशस्त किया. ये ही दो वैदिक धर्म मार्ग है.
स भगवान सृष्टा इदं जगत् तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः मरीच्यादीन् अग्रे सृष्टा प्रजापतीन् प्रवृति -लक्षणं धर्म ग्राध्यामास वेदोक्तम्. ततः अन्यान् च सनकसनन्दनादीन् उत्पाद्य निवृति -लक्षणं धर्म ज्ञान वैराग्यलक्षणं ग्राध्यामान. द्विविधो हि वेदोक्तो धर्मः प्रवृति लक्षणो निवृति लक्षणच्य. जगतः स्थिति कारणम्..
(जगत गुरु आदि शंकराचार्य, श्रीमदभागवतगीता के शाकर भाष्य में)

इस प्रकार धर्म सम्राट श्री करपात्री जी के अनुसार-
युद्ध भोजनादि में लौकिकता-अलौकिकता दोनों ही है. जितना अंश लोक प्रसिद्ध है उतना लौकिक है और जितना शास्त्रेयीकसमधिगम्य है उतना अलौकिक है. लौकिक अंश धर्म है एवं धर्माविरुद्ध लौकिक अंश धम्र्य है. संस्कृति में दोनों का अंतर भाव है. अनादि अपौरुषेय ग्रन्थ वेद एवं वेदानुसारी आर्ष धर्म ग्रंथों के अनुकूल लौकिक पारलौकिक अभ्युदय एवं निश्श्रेयशोपयोगी व्यापार ही मुख्य संस्कृति है और वही हिन्दू संस्कृति वैदिक संस्कृति अथवा भारतीय संस्कृति है. सनातन परमात्मा ने अपने अंशभूत जीवात्माओं को सनातन अभ्युदय एवं निःश्रेयश परम् पद प्राप्त करने के लिए जिस सनातन मार्ग का निर्देश किया है तदनकूल संस्कृति ही सनातन वैदिक संस्कृति है और वह वैदिक सनातन हिन्दू संस्कृति ही सम्पूर्ण संस्कृतियों की जननी है.
(संस्कार संस्कृति एवं धर्म)

सनातन संस्कृति के कारण इस पावन धरा पर एक अत्यंत दिव्य विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित हुआ. प्राकृतिक पर्यावरण कठिन तप, ज्ञान, योग, ध्यान, सत्संग, यज्ञ, भजन, कीर्तन, कुम्भ तीर्थ, देवालय और विश्व मंगल के शुभ मानवीय कर्म एवं भावों से निर्मित इस दिव्य इलेक्ट्रो-मैगनेटिक फील्ड से अत्यंत प्रभावकारी विद्युत चुम्बकीय तरंगों का विकिरण जारी है, इसी से समग्र भू-मंडल भारत की ओर आकर्षित होता रहा है और होता रहेगा. भारतीय संस्कृति की यही विकिरण ऊर्जा ही हमारी चिरंतन परम्परा की थाती है. भूगोल, इतिहास और राज्य व्यवस्थाओं की क्षुद्र संकीर्णताओं के इतर प्रत्येक मानव का अभ्युदय और निःश्रेयस ही भारत का अभीष्ट है. साम्राज्य भारत का साध्य नहीं वरन् साधन है. परिणामतः हिन्दू साम्राज्य किसी समाज, देश और पूजा पद्धति को त्रस्त करने में कभी उत्सुक नहीं रहे. यहां तो सृष्टि का कण-कण अपनी पूर्णता और दिव्यता के साथ खिले, इसका सतत् प्रयत्न किया जाता है. आवश्यकतानुरूप त्यागमय भोग ही अभीष्ट है तभी तो दातुन हेतु भी वृक्ष की एक टहनी तोड़ने के पूर्व हम वृक्ष की प्रार्थना करते हैं और कहते हैं-
आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजा पशु वसूनिच।
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्ंवनो देहि वनस्पति।।
(वाधूलस्मृति 35, कात्यायन स्मृति 10-4,
विश्वामित्र स्मृति 1-58, नारद पुराण 27-25,
देवी भागवत 11-2-38, पद्म पुराण 92-12)

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : भारतीयता की अभिव्यक्ति


पं. दीनदयाल उपाध्‍याय
भारत में एक ही संस्कृति रह सकती है; एक से अधिक संस्कृतियों का नारा देश के टुकड़े-टुकड़े कर हमारे जीवन का विनाश कर देगा।

संस्कृति ही भारत की आत्मा होने के कारण वे भारतीयता की रक्षा एवं विकास कर सकते हैं। शेष सब तो पश्चिम का अनुकरण करके या तो पूंजीवाद अथवा रूस की तरह आर्थिक प्रजातन्त्र तथा राजनैतिक पूंजीवाद का निर्माण करना चाहते हैं। अत: उनमें सब प्रकार की सद्भावना होते हुए भी इस बात की सम्भावना कम नहीं है कि उसके द्वारा भी भारतीय आत्मा का तथा भारतीयत्व का विनाश हो जाय। अत: आज की प्रमुख आवश्यकता तो यह है कि एक-संस्कृतिवादियों के साथ पूर्ण सहयोग किया जाय। तभी हम गौरव और वैभव से खड़े हो सकेंगे तथा राष्ट्र-विघटन जैसी भावी दुर्घटनाओं को रोक सकेंगे। अत: मुस्लिम लीग का द्वि-संस्कृतिवाद, कांग्रेस का प्रच्छन्न द्वि-संस्कृतिवाद तथा साम्यवादियों का बहु-संस्कृतिवाद नहीं चल सकता। आज तक एक-संस्कृतिवाद को सम्प्रदायवाद कहकर ठुकराया गया किन्तु अब कांग्रेस के विद्वान भी अपनी गलती समझकर एक-संस्कृतिवाद को अपना रहे हैं। इसी भावना और विचार से भारत की एकता तथा अखण्डता बनी रह सकती है, तभी हम अपनी सम्पूर्ण समस्याओं को सुलझा सकते हैं।


मनुष्य अनेक जन्मजात प्रवृत्तियों के समान, देशभक्ति की भावना भी स्वभाव से ही प्राप्त करता है। केवल परिस्थितियों एवं वातावरण के दवाब से किसी व्यक्ति में ये प्रवृत्ति सुप्त होकर विलीनप्राय हो जाती है। इस प्रकार विकसित देश-प्रेम के व्यक्ति, अपनी कार्य-कलापों की प्रेरणा अस्पष्ट एवं क्षीण भावना से नहीं वरन् अपने स्वप्नों के अनुसार अपने देश का निर्माण करने की प्रबल ध्‍येयवादिता से पाते हैं। भारत में भी प्रत्येक देशभक्त के सम्मुख इस प्रकार का ध्‍येय-पथ है तथा वह समझता है कि अपने पथ पर चलकर ही वह देश को समुन्नत बना सकेगा। यह धयेय-पथ यदि एक ही होता तथा सब देश-भक्तों के लिये आदर्श भारत का स्वरूप भी एक ही होता तब तो किसी भी प्रकार के विवाद या संघर्ष का प्रश्न नहीं था, किन्तु वस्तुस्थिति यह है कि आज भिन्न-भिन्न मार्गों से लोग देश को आगे ले जाना चाहते हैं तथा प्रत्येक का विश्वास है कि उसी का मार्ग सही मार्ग है। अत: हमको इन मार्गों का विश्लेषण करना होगा और तब ही हम प्रत्येक की वास्तविकता को भी समझ सकेंगे।
चार प्रमुख मार्ग
इन मार्गों को देखते हुए हमें चार प्रधान वर्ग दिखाई देते हैं, अर्थवादी, राजनीतिवादी, मतवादी तथा संस्कृतिवादी।
अर्थवादी
प्रथम वर्ग अर्थवादी, सम्पत्ति को ही सर्वस्व समझता है तथा उसके स्वामित्व एवं वितरण दोषों को सब प्रकार की दुर्व्यवस्था को जड़ मान कर उसमें सुधार करना ही अपना एकमेव कर्तव्य समझता है। उसका एकमेव लक्ष्य 'अर्थ' है। साम्यवादी एवं समाजवादी इसी वर्ग के लोग हैं। इनके अनुसार भारत की राजनीति का निधार्रण अर्थ-नीति के आधार पर होना चाहिये तथा संस्कृति एवं मत (Religion) को वे गौण समझकर अधिक महत्व देने को तैयार नहीं हैं।

राजनीतिवादी
राजनीतिवादी दूसरा वर्ग है। यह जीवन का सम्पूर्ण महत्व राजनीतिक प्रभुत्व प्राप्त करने में ही समझता है तथा राजनीतिक दृष्टि से ही संस्कृति, मज़हब तथा अर्थनीति की व्याख्या करता है। अर्थवादी यदि एकदम उद्योगों का राष्ट्रीयकरण अथवा बिना मुआविजा दिये जमींदारी-उन्मूलन चाहता है तो राजनीतिवादी अपने राजनीतिक कारणों से ऐसा करने में असमर्थ है। इस प्रकार उसके लिए संस्कृति एवं मज़हब का भी मूल्य अपनी राजनीति के लिए ही है, अन्यथा नहीं। इस वर्ग के अधिकांश लोग कांग्रेस में हैं जो आज भारत की राजनीतिक बागडोर संभाले हुए है।

मतवादी
तीसरा वर्ग मज़हब-परस्त या मतवादी है। इसे धर्मनिष्ठ कहना ठीक न होगा; क्योंकि धर्म; मज़हब या मत से बड़ा तथा विशाल है। यह वर्ग अपने-अपनी मज़हब के सिध्दान्तों के अनुसार ही देश की राजनीति अथवा अर्थनीति को चलाना चाहता है। इस प्रकार का वर्ग मुल्ला-मौलवियों तथा रूढ़िवादी कट्टरपंथियों के रूप में अब भी विद्यमान है, यद्यपि आजकल उसका बहुत प्रभाव नहीं रह गया है।

संस्कृतिवादी
चौथा वर्ग संस्कृतिवादी है। इसका विश्वास है कि भारत की आत्मा का स्वरूप प्रमुखतया संस्कृति ही है। अत: अपनी संस्कृति की रक्षा एवं विकास ही हमारा कर्तव्य होना चाहिये। यदि हमारा सांस्कृतिक ह्रास हो गया तथा हमने पश्चिम के अर्थ-प्रधान अथवा भोग-प्रधान जीवन को अपना लिया तो हम निश्चित ही समाप्त हो जायेंगे। यह वर्ग भारत में बहुत बड़ा है। इसके लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में तथा कुछ अंशों में कांग्रेस में भी हैं। कांग्रेस के ऐसे लोग राजनीति को केवल संस्कृति का पोषक मात्र ही मानते हैं, संस्कृति का निर्णायक नहीं। हिन्दीवादी सब लोग इसी वर्ग के हैं।

मार्गों की प्राचीनता
उपर्युक्त चार वर्गों की विवेचना में यद्यपि हमने आधुनिक शब्दों का प्रयोग किया है किन्तु प्राचीन काल में भी ये चार प्रवृत्तियां उपस्थित थीं तथा इनमें एक एक प्रवृत्ति को ही अपनाकर हमने अपने जीवन के आदर्श का मानदण्ड बनाया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही चार प्रवृत्तियां हैं। धर्म संस्कृति का, अर्थ नैतिक वैभव का, काम राजनैतिक आकांक्षाओं का तथा मोक्ष पारलौकिक उन्नति का द्योतक था। इनमें से हमने धार्म को ही अपनी जीवन का आधार बनाया है, क्योंकि उसके द्वारा ही हमने शेष सबको सधाते हुए देखा है। इसीलिये जब महाभारत काल में धार्म की अवहेलना होनी प्रारम्भ हुई, तब महर्षि व्यास ने कहा :-
''उधर्वबाहुर्विरोम्पयेष न च कश्चिच्छृणेति मे।
धर्मादर्थश्य कामख्य स धर्म: किं न सेव्येत॥''

अर्थ और काम की ही नहीं, मोक्ष की भी प्राप्ति धार्म से होती है; इसलिये धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि ''यतोऽभ्युदय नि:श्रेयस् सिध्दि: स धर्म:।'' जिससे ऐहिक और पारलौकिक उन्नति प्राप्त हो वही धर्म है। यह धर्म निश्चित ही अंग्रेजी का रिलीजन नहीं है। रिलीजन के लिये तो हमने मत शब्द का प्रयोग किया है, जो प्रत्येक के लिये भिन्न होता था तथा मोक्ष-निर्वाण अथवा परमानन्द-प्राप्ति का साधान होता था, जबकि धर्म के द्वारा सम्पूर्ण समाज की धारणा तथा उसके अंगों का पालन होता था। इसलिये धर्म की भी व्याख्या की गई है :-
''धारणाध्दर्मभित्याहु धर्मो धारयते प्रजा:।''

धर्मप्रधान भारतीय जीवन
भारतीय जीवन को धर्म-प्रधान बनाने का प्रमुख कारण यह था कि इसी में जीवन का विकास सबसे अधिक निश्चित है। आर्थिक दृष्टिकोण वाले लोग यद्यपि आर्थिक समानता के पक्षपाती हैं, किन्तु वे व्यक्ति की राजनीतिक एवं आत्मिक सत्ता को पूर्णत: समाप्त कर देते हैं। राजनीतिवादी प्रत्येक व्यक्ति को मतदान का अधिकार देकर उसके राजनैतिक व्यक्तित्व की रक्षा तो अवश्य करते हैं किन्तु आर्थिक एवं आत्मिक दृष्टि से वे भी अधिक विचार नहीं करते। अर्थवादी यदि जीवन को भोग-प्रधान बनाते हैं तो राजनीतिवादी उसको अधिकार-प्रधान बना देते हैं। मतवादी बहुत कुछ अव्यावहारिक, गतिहीन एवं संकुचित हो जाते हैं। किसी-किसी व्यक्ति विशेष अथवा पुस्तक विशेष के विचारों के वे इतने गुलाम हो जाते हैं कि समय के साथ वे अपने आपको नहीं रख पाते तथा इस प्रकार पूर्णत: नष्ट हो जाते हैं। इन सबके विपरीत संस्कृति-प्रधान जीवन की यह विशेषता है कि इसमें जीवन के केवल मौलिक तत्तवों पर तो जोर दिया जाता है पर शेष बाह्य बातों के संबंधा में प्रत्येक को स्वतंत्रता रहती है। इसके अनुसार व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रत्येक क्षेत्र में विकास होता है। संस्कृति किसी काल विशेष अथवा व्यक्ति विशेष के बन्धन से जकड़ी हुई नहीं है, अपितु यह तो स्वतंत्र एवं विकासशील जीवन की मौलिक प्रवृत्ति है। इस संस्कृति को ही हमने धर्म कहा है। अत: जब कहा जाता है कि भारतवर्ष धर्म-प्रधान देश है तो इसका अर्थ मज़हब, मत या रिलीजन नहीं, किन्तु यह संस्कृति ही होता है।

भारत की विश्व को देन
हमने देखा है कि भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा। भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी। विश्व को भी यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्त्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं, राजनीति अथवा अर्थनीति की नहीं। उसमें तो शायद हमको उनसे ही उल्टे कुछ सीखना पड़े। अर्थ, काम और मोक्ष के विपरीत धर्म की प्रमुख भावना ने भोग के स्थान पर त्याग, अधिकार के स्थान पर कर्त्तव्य तथा संकुचित असहिष्णुता के स्थान पर विशाल एकात्मता प्रकट की है। इनके साथ ही हम विश्व में गौरव के साथ खड़े हो सकते हैं।

संघर्ष का आधार
भारतीय जीवन का प्रमुख तत्व उसकी संस्कृति अथवा धर्म होने के कारण उसके इतिहास में भी जो संघर्ष हुये हैं, वे अपनी संस्कृति की सुरक्षा के लिए ही हुए हैं। तथा इसी के द्वारा हमने विश्व में ख्याति भी प्राप्त की है। हमने बड़े-बड़े साम्राज्यों के निर्माण को महत्व न देकर अपने सांस्कृतिक जीवन को पराभूत नहीं होने दिया। यदि हम अपने मध्ययुग का इतिहास देखें तो हमारा वास्तविक युध्द अपनी संस्कृति के रक्षार्थ ही हुआ है। उसका राजनीतिक स्वरूप यदि कभी प्रकट भी हुआ तो उस संस्कृति की रक्षा के निमित्त ही।

राणा प्रताप तथा राजपूतों का युध्द केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नहीं था किन्तु धार्मिक स्वतंत्रता के लिए ही था। छत्रपति शिवाजी ने अपनी स्वतंत्र राज्य की स्थापना गौ-ब्राह्मण प्रतिपालन के लिए ही की। सिक्ख-गुरुओं ने समस्त युध्द-कर्म धर्म की रक्षा के लिए ही किए। इन सबका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि राजनीति का कोई महत्व नहीं था और राजनीतिक गुलामी हमने सहर्ष स्वीकार कर ली; किन्तु तात्पर्य यह है कि राजनीति को हमने जीवन में केवल सुख का कारण-मात्र माना है, जब कि संस्कृति जीवन ही है।

संस्कृतियों का संघर्ष
आज भी भारत में प्रमुख समस्या सांस्कृतिक ही है वह भी आज दो प्रकार से उपस्थित है, प्रथम तो संस्कृति को ही भारतीय जीवन का प्रथम तत्त्व मानना तथा दूसरा इसे मान लेने पर उस संस्कृति का रूप कौन सा हो? विचार के लिए यद्यपि यह समस्या दो प्रकार की मालूम होती है, किन्तु वास्तव में है एक ही। क्योंकि एक बार संस्कृति को जीवन का प्रमुख एवं आवश्यक तत्त्व मान लेने पर उसके स्वरूप के सम्बन्धा में झगड़ा नहीं रहता, न उसके सम्बन्ध में किसी प्रकार का मतभेद ही उत्पन्न होता है। यह मतभेद तो तब उत्पन्न होता है जब अन्य तत्वों को प्रधानता देकर संस्कृति को उसके अनुरूप उन ढांचों में ढंकने का प्रयत्न किया जाता है।

इस दृष्टि से देखें तो आज भारत में एक-संस्कृतिवाद, द्वि-संस्कृतिवाद तथा बहु-संस्कृतिवाद के नाम से तीन वर्ग दिखाई देते हैं। एक-संस्कृतिवाद के पुरस्कर्ता भारत में विकसित एक ही भारतीय संस्कृति का अस्तित्तव मानते हैं तथा अन्य संस्कृतियों के लिए, जो विदेशों से भारत में आयी हैं, आवश्यक समझते हैं कि वह भारतीय संस्कृति में विलीन हो जाएं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी एक-संस्कृतिवाद के पोषक तथा कांग्रेस में श्री पुरुषोत्तमदास टण्डन जैसे व्यक्ति इसी वाद के पोषक रहे हैं।

द्वि-संस्कृतिवादी
द्वि-संस्कृतिवादी दो प्रकार के हैं। एक तो स्पष्ट तथा दूसरे प्रच्छन्न। एक वर्ग भारत में स्पष्टतया दो संस्कृतियों का अस्तित्तव मानता है तथा उनको बनाये रखने की मांग करता है। मुस्लिम लीगी इसी मत के हैं। वे हिन्दू और मुस्लिम दो संस्कृतियों को मानते हैं तथा उनका आग्रह है कि मुसलमान अपनी संस्कृति की रक्षा अवश्य करेगा। दो संस्कृतियों के आधार पर ही उन्होंने दो राष्ट्रों का सिद्वान्त सामने रखा, जिसके परिणाम को हम पिछले वर्षों में भली-भांति अनुभव कर चुके हैं। प्रच्छन्न द्वि-संस्कृतिवादी वे लोग हैं जो स्पष्टतया तो दो संस्कृतियों का अस्तित्व नहीं मानते, मूल से एक संस्कृति एवं एक राष्ट्र का ही राग अलापते हैं, किन्तु व्यवहार में दो संस्कृतियों को मानकर उनका समन्वय करने का असफल प्रयत्न करते हैं। वे यह तो मान लेते हैं कि हिंदू और मुसलमान दो संस्कृतियां हैं, किन्तु उनको मिलाकर एक नवीन हिन्दुस्तानी संस्कृति बनाना चाहते हैं। अत: हिन्दी-उर्दू का प्रश्न वे हिन्दुतानी बनाकर हल करना चाहते हैं तथा अकबर को राष्ट्र-पुरुष मानकर अपने राष्ट्र के महापुरुषों के प्रश्न को हल करना चाहते हैं। 'नमस्ते' और 'सलामालेकुल' का काम ये 'आदाब-अर्ज' से चला लेना चाहते हैं। यह वर्ग कांग्रेस में बहुमत में है। दो संस्कृतियों के मिलाने के अब तक असफल प्रयत्न हुए हैं किन्तु परिणाम विघातक ही रहा है। मुख्य कारण यह है कि जिसको मुस्लिम संस्कृति के नाम से पुकारा जाता है वह किसी मजहब की संस्कृति न होकर अनेक अभारतीय संस्कृतियों का समुच्चय मात्र है। फलत: उसमें विदेशीपन है, जिसका मेल भारतीयत्व से बैठना कठिन ही नहीं, असम्भव भी है। इसलिए यदि भारत में एक संस्कृति एवं एक राष्ट्र को मानना है तो वह भारतीय संस्कृति एवं भारतीय हिन्दू राष्ट्र, जिसके अन्तर्गत मुसलमान भी आ जाते हैं, के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकता।

बहु-संस्कृतिवादी
बहु-संस्कृतिवादी वे लोग हैं जो प्रान्त को निजी संस्कृति मानते हैं तथा उस प्रान्त को उस आधार पर आत्म-निर्णय का अधिकार देकर बहुत कुछ अंशों में स्वतंत्र ही मान लेते हैं। साम्यवादी एवं भाषानुसार प्रान्तवादी लोग इस वर्ग के हैं। वे भारत में सभी प्रान्तों में भारतीय संस्कृति की अखण्ड धारा का दर्शन नहीं कर पाते।

संस्कृति से भिन्न जीवन का आधार
उपरोक्त तीनों प्रकार के वर्गों का प्रमुख कारण यह है कि उनके सम्मुख संस्कृति-प्रधान जीवन न होकर मज़हब, राजनीति अथवा अर्थनीति-प्रधान जीवन ही है। मुस्लिम लीग ने अपनी अमूर्त तत्तव का आधार मुस्लिम मज़हब समझकर ही भिन्न मुस्लिम संस्कृति एवं राष्ट्र का नारा लगाया तथा उसके आधार पर ही अपनी सब नीति निधार्रित कीं। कांग्रेस का जीवन एवं लक्ष्य राजनीति-प्रधान होने के कारण उसने अंग्रेजों को मुकाबला करने के लिए तथा शासन चलाने के लिए सब वर्गों को मिलाकर खड़ा करने का विचार किया, जिसके कारण अप्रत्यक्ष रूप से यह भी द्वि-संस्कृतिवाद का शिकार बन गई। बहु-संस्कृतिवादी जीवन को अर्थ-प्रधान मानते हैं, अत: वे आर्थिक एकता की चिन्ता करते हुए सांस्कृतिक एकता की ओर से उदासीन रह सकते हैं।

एक राष्ट्र और एक संस्कृति
केवल एक-संस्कृतिवादी लोग ही ऐसे हैं जिनके समक्ष और कोई ध्‍येय नहीं है तथा जैसा कि हमने देखा, संस्कृति ही भारत की आत्मा होने के कारण वे भारतीयता की रक्षा एवं विकास कर सकते हैं। शेष सब तो पश्चिम का अनुकरण करके या तो पूंजीवाद अथवा रूस की तरह आर्थिक प्रजातन्त्र तथा राजनैतिक पूंजीवाद का निर्माण करना चाहते हैं। अत: उनमें सब प्रकार की सद्भावना होते हुए भी इस बात की सम्भावना कम नहीं है कि उसके द्वारा भी भारतीय आत्मा का तथा भारतीयत्व का विनाश हो जाय। अत: आज की प्रमुख आवश्यकता तो यह है कि एक-संस्कृतिवादियों के साथ पूर्ण सहयोग किया जाय। तभी हम गौरव और वैभव से खड़े हो सकेंगे तथा राष्ट्र-विघटन जैसी भावी दुर्घटनाओं को रोक सकेंगे।
(भारतीय जनसंघ के अध्‍यक्ष रह चुके दीनदयाल जी मौलिक चिंतक थे)

श्रीगुरुजी और राष्ट्र-अवधारणा

संस्कृति: राष्ट्र संकल्पना का हृदय
राष्ट्र यानी लोग या समाज होता है। उसकी विशेषता उस समाज की संस्कृति होती है।
संस्कृति यानी उस समाज के जीवनमूल्य, संस्कृति यानी उस समाज के अच्छे और बुरे नापने के मापदण्ड। संक्षेप में संस्कृति यानी राष्ट्र और राष्ट्रीयता का प्राण। श्री गुरुजी कहते है:-

``हिन्दू राष्ट्र की हमारी कल्पना राजनीतिक एवं आर्थिक अिधकारों का एक गट्ठर मात्र नहीं है। वह तत्त्वत: सांस्कृतिक है। हमारे प्राचीन एवं उदात्त सांस्कृतिक जीवनमूल्यों से उसके प्राणों की रचना हुई है। और हमारी संस्कृति की भावना का उत्कट नवतारुण्य (तमरनअमदंजपवदद्ध ही हमारे राष्ट्रीय जीवन की सही दृष्टि हमें प्रदान कर सकता है तथा आज हमारे राष्ट्र के सम्मुख खड़ी हुई अगणित समस्याओं के समाधान में हमारे सभी प्रयत्नों को सफल दिशानिर्देश भी कर सकता है। ``किन्तु इन दिनों संस्कृति के नवतारुण्य को प्राय: `पुनरुज्जीवनवाद´ और प्रतिक्रियावाद होने की उपािध दी जाती है। प्राचीन पूर्वाग्रहों, मूढ़ विश्वासों, अथवा समाजविरोधी रीतियों का पुनरुज्जीवन प्रतिक्रियात्मक कहा जा सकता है, कारण इसका परिणाम समाज का पाशाणीकरण (विेेपसपेंजपवदद्ध में हो सकता है। किन्तु शाश्वत एवं उत्कर्षकारी जीवनमूल्यों का नवतारुण्य कभी प्रतिक्रियात्मक नहीं हो सकता। इसे केवल प्राचीन होने के कारण प्रतिक्रियात्मक´ नाम देना, बौद्धिक दिवालियापन प्रकट करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। अपनी संस्कृति के नवतारुण्य से हमारा आशय उन शाश्वत जीवनादशोZं को पुन: जीवन में उतारने से है, जिन्होंने इन सहस्रों वषो± तक हमारे राष्ट्रजीवन को पोषित किया और अमरता प्रदान की।´´

अपनी संस्कृति की विशेषताओं का विवेचन करते हुए श्री गुरुजी कहते हैं -``प्रथम एवं सर्वािधक मूलभूत पहलू है उस परम सत्य की अनुभूति की आकांक्षा, जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है, चाहे उसे कुछ भी नाम दिया गया हो। अथवा सरल ‘ाब्दों में कहा जाय तो ``ईश्वर का साक्षात्कार करना। किन्तु ईश्वर है कहाँ? हम उसे कैसे जान सकते हैं? उसका स्वरूप कैसा है? उसके रूप, गुण क्या हैं? कि हम उसका ध्यान कर सकें और उसको पावें? उसका यह वर्णन कि वह निर्गुण और निराकार है इत्यादि, हमारी समस्याओं को सुलझाता नहीं। पूजा के विविध पंथ भी विकसित हुए हैं। लोग मंदिरों में जाते हैं और सर्वशक्तिमान् का प्रतीक मानकर मूर्तियों पर ध्यान केिन्द्रत करने का प्रयत्न करते हैं। किन्तु जो कि कर्मशक्ति से पूर्ण है उनको यह सब सन्तुष्ट नहीं करता।

``अतएव हमारे पूर्वजों ने कहा है ``हमारा समाज ही हमारा ईश्वर है। ``जनता जनार्दन´´ है। भगवान् रामकृष्ण परमहंस ने कहा है -`मनुष्य की सेवा करो´। जनता में जनार्दन देखने की यह अतिश्रेष्ठ दृष्टि ही हमारे राष्ट्रकल्पना का हृदय है। उसने हमारे चिन्तन को परिव्याप्त कर लिया है तथा हमारे सांस्कृतिक दाय की विविध अनुपम कल्पनाओं को जन्म दिया है।´´


ईश्वर की सेवा यानी समाज की सेवा। ईश्वर की पूजा यानी जनता जनार्दन की पूजा। इस भाव को यदि हमने हृदयंगम किया तो फिर मनुष्य अपने अिधकारों की बात नहीं करेगा। अपने कर्तव्यों का ध्यान रखेगा। श्री गुरुजी कहते हैं ``आज हम सभी जगह अिधकारों के लिए मचा हुआ कोलाहल सुनते हैं। हमारे सभी राजनैतिक दल समान अिधकारों की बात बोलते हुए लोगों में अहंभाव जागृत कर रहे हैं। कहीं भी कर्तव्य और नि:स्वार्थ भाव की सेवा पर कोई बल नहीं दिया जाता। स्व-केिन्द्रत अिधकार-ज्ञान के वायुमण्डल में सहयोग की भावना, जो समाज की आत्मा होती है, जीवित नहीं रह सकती। इसी कारण आज हम अपने राष्ट्रजीवन में विविध घटकों के बीच संघर्ष देख रहे हैं। केवल हमारी सांस्कृतिक दृष्टि के आत्मसात् करने से ही हमारे राष्ट्रजीवन में सहयोग की सच्ची भावना एवं कर्तव्य की चेतना पुनर्जीवित हो सकती है।´´

अपनी संस्कृति की और एक विशेषता, श्री गुरुजी बताते हैं। ``हिमाचल के समान उन्नत
हमारी संस्कृति का एक और शिखर है जिसपर पहुँचने की महत्वाकांक्षा अभी तक संसार में अन्य किसी ने नहीं की है। `एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति´´ वाक्यद्वारा जिस भाव की अभिव्यक्ति की गई है- अथाZत् सत्य एक है, ऋषि उसे विविध प्रकार से बताते हैं - इस प्रकार भाव को व्यक्त करने के लिए अंग्रेजी में कोई ‘ाब्दरचना नहीं है। `सहिष्णुता´ शब्द, जो इस भाव को व्यक्त करने के लिए प्रयोग में आता है, बहुत नीचा है। वह तो सहन करने मात्र का भाव व्यक्त करने के लिए एक अन्य शब्द है। इसमें एक अहं का भाव है, जो केवल दूसरों के दृष्टिकोण को मात्र सहन करता है, उसके लिए कोई प्रेम या सम्मान नहीं रखता। परन्तु, हमारी शिक्षा अन्य विश्वासों एवं दृष्टिकोणों को इस रूप में सम्मान करने तथा स्वीकार करने की भी रही है कि वे सब एकही सत्य तक पहुँचने के लिए अनेक मार्ग हैं।´´

श्री गुरुजी आगे बताते हैं ``जब हम अपने उदात्त सांस्कृतिक मूल्यों की बात करते हें तो
आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता में पले हुए लोग सोचते हैं कि यह कोई रहस्यात्मक चीज है, कुछ पारलौकिक वस्तु है। किन्तु यह केवल हमारे मानसिक दास्य की वर्तमान गहराई को ही प्रकट करता है, जिसने हमें उन सिद्धान्तों को समझने के सामथ्र्य से भी वंचित कर दिया है, जो कभी हमारे राष्ट्रजीवन का गौरव थे।´´

नाच, गाना, नाटक, चलचित्र को ही सांस्कृतिक कार्य मानना श्री गुरुजी को मान्य होना
सम्भव ही नहीं था। वे कहते हैं ``आज हम एक दूसरी पराकाष्ठा देखते हैं। नाच, गाना,
चलचित्र तथा नाटकों को ही हम संस्कृति मानने लगे हैं। हम इस प्रकार के `संास्कृतिक कार्यक्रम´ अपने देश में सभी जगह चलते हुए देखते हैं। निस्संशयरूपेण हल्के मनोरंजन का एक दूसरा नाम संस्कृति हो गया है। यह इतनी हास्यासपद और अपमानकारी सीमातक पहुँच गया है कि नैतिक दुश्चरित्रता के कीचड़ में फँसे हुए चलचित्र के कुख्यात नट-नटी हमारे सांस्कृतिक प्रतिनििधमण्डलों में सिम्मलित किये जाते हैं। जिस देश में राम और सीता जैसे आदशZ चरित्र हुए, जिसने भूतकाल में श्रेष्ठतम दार्शनिक एवं ऋषियों और वर्तमान काल में विश्व में सहज सम्मान तथा प्रेमादर प्राप्त करनेवाले रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद जैसे व्यक्तियों को अपने सांस्कृतिक प्रतिनििध के नाते भेजा है, वहाँ से ऐसे व्यक्तियों का हमारे देश के सांस्कृतिक प्रतिनििध के नाते जाना हमारे पतन का एक भयावह दृश्य उपस्थित करता है।´´

हमारी इस उन्नत संस्कृति की आवश्यकता केवल अपने देश तक सीमित नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में भी उसकी उपयोगिता है, इस तथ्य का प्रतिपादन करते हुए श्री गुरुजी बोलते है, ``हमारी सांस्कृतिक दृष्टि को ही, जो मनुष्य-मनुष्य के बीच प्रेम और सामंजस्य के लिए सच्चा आधार प्रदान करती है, और जीवन के सम्पूर्ण दर्शन को पूर्त करती है, आज के इस युद्ध से ध्वस्त हुए विश्व के सामने प्रभावी ढंग से रखने की आवश्यकता है। यदि इस महान् जागतिक लक्ष्य में हम सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें प्रथम अपना उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। हमें विदेशी वादों (पेउे) की मानसिक Üाृंखलाओं और आधुनिक जीवन के विदेशी व्यवहारों तथा अस्थिर ``फैशनों´´ से अपनी मुक्ति कर लेनी होगा। परानुकरण से बढ़कर राष्ट्र की अन्य कोई अवमानना नहीं हो सकती है। हम स्मरण रखें कि अन्धानुकरण प्रगति नहीं है।´´ (विचार नवनीत-पृष्ठ. 23 से 32)
संकलनकर्ता - मा.गो.वैद्य

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अर्थ


नरेन्द्र मोहन
हिन्दुत्व एक ऐसी भू-सांस्कृतिक अवधारणा है, जिसमें सभी के लिए आदर है, स्थान है और सह-अस्तित्व का भाव भी। इस सह-अस्तित्व प्रधान सांस्कृतिक चेतना ने उसे अत्यंत उदार, सहिष्णु और लचीला भी बनाया। बात तब बिगड़ी जब विदेशी आक्रमणकारियों की संस्कृतियों ने इस अति सहिष्णु संस्कृति की उदारता का लाभ उठा कर इसकी जड़ें ही काटनी प्रारंभ कर दीं। हिन्दुत्व की इस अति-सहिष्णुता को उसकी कायरता माना गया तथा उसके जो भी मूल तत्व थे उन्हें नष्ट-भ्रष्ट करने की हर संभव चेष्टा की गई। अभी भी इस हेतु तरह-तरह के षडयंत्र रचे जा रहे हैं।आक्रमणकारियों के समक्ष पलायन करने की नीति का सह-अस्तित्व, सहिष्णुता के दर्शन और सिध्दांत से कुछ भी लेना देना नहीं है। सह-अस्तित्व व सहिष्णुता और 'आत्मवत्' दर्शन के जो भी शत्रु हैं उनसे मोर्चा लेने, युध्द करने तथा उन्हें पराजित करने का कर्त्तव्य-कर्म तो हिन्दुत्व का आधारस्तंभ अनादि काल से रहा है और रहेगा। जब-जब आक्रमणकारी शत्रुओं से युध्द करने में हिन्दुत्व से चूक हुई तब-तब न केवल अपमान सहना पड़ा है, बल्कि पराधीनता में भी रहना पड़ा है।आज हिन्दुत्व को राजनीति से जोड़ा जा रहा है। उसे एक राजनीतिक अथवा साम्प्रदायिक अवधारणा कह कर लांछित और अपमानित किया जा रहा है। दुख की बात यह है कि यह लांछन अभारतीय तो लगा ही रहे हैं, पर हम भारतवासी भी स्वयं लगा रहे हैं। स्वाधीनता के पहले हिन्दुत्व के प्रति अपमानजनक भाव रखने वालों की संख्या कम थी और केवल दुराग्रही व आक्रमणकारी संस्कृतियों के प्रति तुष्टिकरण का भाव रखने वाले ही 'हिन्दू' शब्द को साम्प्रदायिक बताते थे पर स्वाधीनता के बाद तो 'हिन्दुत्व' को गाली देना और उसका अपमान करना एक बौध्दिक फैशन बन गया और विडंबना यह है कि अपमान, लांछन व तिरस्कार के इस विष को बिना किसी प्रतिकार के 'प्रगतिवाद' के नाम पर सहन किया जा रहा है।लगभग दो हजार वर्षों की दासता ने यही सिखाया है कि विदेशी संस्कृतियां हमारा सहयोग नहीं करना चाहतीं, वे हमें तोड़ कर तथा धवस्त करके हम पर शासन करना चाहती है। विदेशी संस्कृतियां चाहती हैं कि भारत अपनी अस्मिता भुला दे, उसे छोड़ दें, अत: हमें विदेशी प्रचार के उनके प्रलोभनों के प्रति सावधान रहना होगा।भारत की मूर्छा धीरे-धीरे टूट रही है और यह एक शुभ लक्षण है। 'हिन्दुत्व' के प्रति जो भ्रम उत्पन्न किए गए हैं उन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक ने नकार दिया है।
भारत के कुछ राजनीतिक दल अज्ञानवश आज भी हिन्दुत्व के प्रति शंकालु हैं। उन्हें हिन्दुत्व की ऊर्जा, उसका तप और उसका सर्वकल्याणकारी भाव ही नहीं दिखाई देता। ऐसे राजनीतिज्ञों से न तो डरने की आवश्यकता होती है और न ही चिन्तित होने की। हाल के वर्षों में वोट बैंक की राजनीति के दुष्प्रभाव में आकर हिन्दुत्व पर जितने अपमानजनक प्रहार किए गए हैं, वे चिंताजनक हैं। इन प्रहारों से भारत का आत्मविश्वास तो टूट ही रहा है, साथ ही नई पीढ़ी के भ्रमित होने की संभावनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। नई पीढ़ी को भ्रमित करने में पश्चिम से आये सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का भी बहुत बड़ा हाथ है। यद्यपि पहले की तरह आज का विश्व राजनीति उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद से पीड़ित नहीं है, पर आने वाली शताब्दी में आर्थिक, सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की समस्याओं से मानवता को जूझना ही होगा। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की तीन धाराएं इस समय विश्व में प्रबलता से चल रही हैं-पहली धारा ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित, पोषित और समर्थित, दूसरी, इस्लामी रूढ़िवादिता से संचालित, पोषित और समर्थित। इस्लाम के अनेक पक्षधार अत्यधिक आक्रामक व दुराग्रही हो चुके हैं। वे इतने अधिक असहिष्णुता-प्रधान हैं कि समस्त विश्व का इस्लामीकरण करने के लिए प्रतिबध्द हैं। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की तीसरी धारा 'साम्यवादी विचारधारा' अर्थात् वामपंथी विचारधारा है। यह चुनौती प्रत्यक्ष कम प्रच्छन्न अधिक है।राष्ट्रीय अज्ञान व विभ्रम की यह स्थिति आज हर स्तर पर है और सर्वाधिक उस वर्ग में है जो राजनीति से जुड़ा हुआ है। राजनीति से जुड़ा यह वर्ग भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्तवों से न केवल अनभिज्ञ है वरन वह भारत के सांस्कृतिक व्यक्तित्व को पश्चिमी विचारकों की ही दृष्टि से देखना चाहता है।
निस्संदेह भारतीय संस्कृति के संदर्भ में सर्वाधिक विभ्रम अंग्रेज इतिहासकारों ने फैलाया है। ऐसा इसलिए किया गया जिससे भारतीय जनमानस हमेशा-हमेशा के लिए अंग्रेजियत की दासता स्वीकार कर ले तथा भारत पर अंग्रेजी सत्ता का प्रभुत्व बना रह सके। भारतीय एकता और अखंडता को सबसे बड़ा खतरा उस अंग्रेजियत से है जिसका एकमात्र लक्ष्य भारतीय संस्कृति को लांछित करना और भारत को मानसिक स्तर पर विभाजित रखना रहा। यद्यपि रानाडे, लोकमान्य तिलक, मदन मोहन मालवीय, महर्षि अरविंद, डा0 केशवराम बलिराम हेडगेवार और महात्मा गांधी सरीखे नेताओं ने अंग्रेजों की कुटिलता की कड़ी से कड़ी भर्त्सना की पर कुल मिलाकर भारतीय राजनीति का मन संशयग्रस्त ही रहा और रह-रह कर यह विचार ज्वार-भाटे की तरह उठता और गिरता रहा कि भारत की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति है भी या नहीं। भारत की अपनी एक संस्कृति है, इसका सबसे प्रबल विरोध उस समय प्रारंभ हुआ जब मुस्लिम लीग की स्थापना की गयी। उन्नीसवीं व बीसवीं शताब्दी के भारतीय राजनीतिज्ञों से सबसे बड़ी भूल यह हुई कि उन्होंने 'हिन्दू' के संदर्भ में उस परिभाषा को ग्रहण कर लिया जो अंग्रेजों द्वारा बनाई गई थी। 'हिन्दू' शब्द एक भू-सांस्कृतिक अवधारणा की उपज है, यह यथार्थ पता नहीं कैसे भारत में निरन्तर उपेक्षित होता चला गया और यह मान्यता प्रगाढ़ता से भारतीय मन पर छा गई कि 'हिन्दू' एक वैसा ही मजहब है जैसे कि इस्लाम या ईसाइयत।आश्चर्य की बात यह है कि जो भूल इस्लामी आक्रमणकारियों ने भ्रमवश की थी और जिस भूल को अपनी निहित स्वार्थों के कारण अंग्रेजों ने सैध्दांतिक व वैचारिक जामा पहना दिया उसे हम भारतीयों ने भी धीरे-धीरे बिना प्रतिरोध के स्वीकार कर लिया और परिणामत: सांस्कृतिक स्तर पर नए विभ्रम को जन्म दिया।अंग्रेजी दासता के दौरान भारतीय संस्कृति की इतनी अधिक दुर्दशा कर दी गई कि उसकी सांस्कृतिक व आध्‍यात्मिक शब्दावली तक को भ्रष्ट किया गया और इस शब्दावली के राजनीतिक अर्थ निकाले गए। उदाहरणस्वरूप 'धर्म' शब्द का जैसा मनमाना अर्थ अंग्रेजों ने किया उसके पीछे उनके स्वयं के निहित स्वार्थ थे। उन दिनों यह भी स्थापित करने का प्रयास किया गया कि भारत कभी एक राष्ट्र था ही नहीं, वह तो अंग्रेजों ने आकर इसे राजनीतिक एकता प्रदान कर दी।
प्राचीन भारत की साहित्यिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक उपलब्धियों को पश्चिम का उच्छिष्ट सिध्द करने के प्रयत्न किए गए और समूचे भारतीय जीवन को आत्मगौरव शून्य एवं आत्मविस्मृत बनाने की दुरभिसंधि रची गयी। एक राष्ट्र के नाते हमारे पहचान के जितने तत्व हो सकते थे अंग्रेज उन्हें पूर्णत: नष्ट या विकृत करने का प्रयत्न करते रहे।मजेदार मामला यह है कि जब भारत का संविधान रचा गया तब न तो भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्वों की ओर ही गंभीरता से निहारा गया और न भारतीय मूल्यों, आदर्शों व श्रेष्ठ परंपराओं तथा भारतीय मन की अभिलाषाओं को ही समझने का प्रयास किया गया। भारतीय संविधान को बनाया गया तो भारत की जनता के लिए, लेकिन भारत की जनता के मन में क्या है, कहां बसती है, उसकी आस्थाएं किस पर हैं, उसका विश्वास क्या रहा है, किन मूल्यों की रक्षा के लिए लगभग डेढ़ हजार वर्षों तक उसने विदेशी आक्रमणकारियों से संघर्ष किया, यह सब जानने की चेष्टा ही नहीं की गई।ब्रिटिश साम्राज्यवाद को स्थायित्व प्रदान करने के निमित्त मैकाले ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के सहयोग से संस्कृति पर प्रहार करने में जो सफलता प्राप्त कर ली उस आघात से भारत आज भी नहीं उबर पा रहा है। जीवन की विश्वात्म धारणा को प्रतिपादित करने वाला भारत, जिसका कभी विश्वास रहा, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' पर वह दुष्प्रचार का शिकार होकर स्वयं ही अपने मूल्य छोड़ बैठा और सांस्कृतिक रूप से बिखर गया। यह सांस्कृतिक बिखराव आज भी राजनीति में हर स्तर पर हमें दिखाई दे रहा है।ऐसा नहीं है कि भारत की संविधान सभा में भारतीय संस्कृति एकात्म भाव तथा राष्ट्रीयता के पक्षधार नहीं थे, पर वे कुल मिला कर मौन ही रहे। जब 7 और 8 दिसम्बर, 1948 को संस्कृति से जुड़े अनुच्छेद पर संविधान सभा में चर्चा हो रही थी तब केवल लोकनाथ मिश्र ने भारत की सांस्कृतिक धरोहर को मान्यता देने का सुझाव दिया था पर उसका उग्र विरोध मुस्लिम सदस्यों द्वारा हुआ और अंतत: 'भारत एक सांस्कृतिक इकाई है तथा उसे अपनी सांस्कृतिक धारोहर की रक्षा करनी है', यह भाव इस विरोधा के कारण भारतीय संविधान का अंग न बन सका।प्राकृतिक अनेकता में मानसिक एकता के जो सूत्र विद्यमान रहते हैं उनसे ही राष्ट्र का और उसकी संस्कृति का निर्माण होता है। इस मानसिक एकता से ही अंतत: राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण भी होता है और इस राष्ट्रीय चरित्र में विभिन्न मूलवंशों के लोग सहभागी और सहयोगी होते हैं। इस सामूहिक अस्मिता के अभाव में राष्ट्र की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती। इस सामूहिक अस्मिता का जन्म भारत में कहां से हुआ? यह अस्मिता किन प्रतीकों व आदर्शों से जुड़ी है? कौन हैं इस सामूहिक अस्मिता के प्रेरणास्रोत आज इस प्रश्नों पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। यह आवश्यकता इसलिए और भी महत्वपूर्ण तथा तात्कालिक हो चुकी है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद उन्तीस में यह प्रतिपादित करके कि हर व्यक्ति को अपनी एक पृथक वैयक्तिक संस्कृति है-एक प्रकार से बिखराव व बिखंडन के बीज बो दिए गए हैं। सिध्दांतत: किसी भी व्यक्ति का कोई भी अधिकार राष्ट्र से ऊपर नहीं हो सकता। हर नागरिक को अंतत: राष्ट्रीय हितों को ही सर्वोच्चता प्रदान करनी होगी।अपने राष्ट्र की संस्कृति के रहस्य को भारत के राजनीतिज्ञ इसलिए नहीं समझ सके, क्योंकि वैयक्तिक स्तर पर वे न तो अज्ञात में छलांग लगाने के लिए तैयार थे और न अपने उन राजनीतिक स्वार्थों व पूर्वाग्रहों को छोड़ने के लिए तैयार थे जो उन्होंने यूरोपीय प्रभाव के कारण प्राप्त किए थे।
स्वतंत्रता के उपरांत भी स्थिति में कोई बड़ा बदलाव आया हो, यह नहीं कहा जा सकता। जब भारत स्वतंत्र हुआ तो उस समय यदि पं। नेहरू चाहते तो भारतीय संस्कृति को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर सकते थे और भारत की जो गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा है उसकी रक्षा भी कर सकते थे, पर वे स्वयं के राजनीतिक स्वार्थों और यूरोपीय प्रभाव से इतने अधिक जुड़े रहे कि अगर यह कहा जाए कि इसके दुष्प्रभाव से भटक गए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।यह बात एक बात बहुत स्पष्ट रूप से समझ ली जानी चाहिए कि भारत एक राष्ट्र है और इस राष्ट्र की अपनी एक संस्कृति है। अगर भारत के राजनीतिज्ञ इस सत्य का साक्षात्कार करने से इंकार करेंगे तो राष्ट्र की प्रभुसत्ता और अखंडता संकट में पड़ सकती है। संकट में इसलिए पड़ सकती है क्योंकि फिर वे समस्त तत्वहीन और श्रीहीन हो जाएंगे जिन पर इस राष्ट्र का एकत्व आश्रित होता है। राजनीति का पहला कर्त्तव्य यह है कि वह राष्ट्रीय एकत्व के प्रति समर्पित हो। यदि राजनीति राष्ट्रीय एकत्व के प्रति समर्पित नहीं है और उसे राष्ट्र की प्रभुसत्ता और अखंडता की चिंता नहीं है तब फिर ऐसी राजनीति कलह को ही जन्म देगी। भारत की सांस्कृतिक एकता का अर्थ यह नहीं है कि भारत में अनेक संस्कृतियां हैं बल्कि इसका अर्थ यह है कि इस राष्ट्र की अपनी एक संस्कृति है और यह एक ऐसी संस्कृति है जो अनेकता को प्रश्रय देती है।अंग्रेजों ने इस झूठ को सौ बार दोहराया कि मजहब के आधार पर देश को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक बनाया जा सकता है, लेकिन अंग्रेजों ने अपने देश में ऐसा नहीं किया। इंग्लैण्ड में तो ईसाइयों के अनेक पंथ है, लेकिन विभिन्न पंथों को मानने वाले अंग्रजों को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के बीच विभाजित नहीं किया गया। सच बात तो यह है कि राष्ट्रीयता का संबंध उपासना पध्दति की विभिन्नता से नहीं होना चाहिए। राष्ट्रीयता उपासना पध्दति से कहीं अधिक विशाल, उदात्त और श्रेष्ठ है। हिन्दुत्व पंथ नहीं है, मजहब नहीं है, वह पंथ या मजहब हो ही नहीं सकता।
मजहब या पंथ के उसमें कोई गुण ही नहीं हैं। जिसमें अनंत जीवन दर्शन, अनंत पंथ, अनंत जीवन-शैलियां, अनंत उपासना-पध्दतियां समाहित हो, उसे कोई किसी एक परिभाषा से कैसे बांधोगा? हिन्दुत्व का सारा प्रयास सामंजस्य एवं एकरसता प्राप्त करना है, सभी सुखी हों, सभी का कल्याण हो, सभी की समृध्दि हो, सभी में मित्रता हो, सभी एक दूसरे के सहयोगी बनें, कोई किसी से द्वेष न करे। ये सारे प्रयास हमें वर्तमान में ही करने होंगे।हिन्दुत्व वर्तमान मेंसत्य का साक्षात्कार ही हिन्दुत्व का प्राणतत्व है और यह साक्षात्कार हमें वर्तमान में करना होता है। अतीत के गुण गाकर हम सत्य का साक्षात्कार नहीं कर सकते। अतीत में क्या था, यह तो इतिहास की बात हो गई, पर क्या होना चाहते हैं, किनकी नकल करना चाहते हैं यह हुई कल्पना की बात। कोई भी समाज इतिहास के कल्पना लोक में जीकर विश्व को नेतृत्व नहीं दे सकता और भविष्य की कोरी कल्पनाओं के आधार पर भी किसी भी समाज ने उन्नति नहीं की है। हिन्दुत्व का आधार है 'चरैवेति'। हिन्दुत्व में ठहराव नहीं है। यह ठीक है कि किन्हीं कारणों से हिन्दुत्व नीचे गहरी खाई में जा गिरा है और यह संभवत: इसलिए हुआ होगा क्योंकि यह प्रकृति का नियम है, लेकिन अब यह कालचक्र उत्कर्ष की ओर बढ़ रहा है। उचित यह होगा कि भारतीय समाज यह समीक्षा करें कि उसके उत्कर्ष में क्या सहायक है और क्या अवरोधक?हिन्दुत्व किन्हीं कारणों से जो भटकावग्रस्त हुआ है, उससे समाज में कलह बढ़ी है, विघटन बढ़ा है, विद्वेष बढ़ा है और दुष्कर्म बढ़ा है तथा उत्कर्ष के स्थान पर पतन हुआ है। हिन्दुत्व का सनातन प्रवाह, जो हमारी राष्ट्रीय चेतना की मुख्यधारा है, उसे शक्तिवान बनाने के स्थान पर यदि कोई उसे प्रदूषित कर रहा है अथवा किसी कारणवश वह प्रवाह प्रदूषणग्रस्त होता चला जा रहा है, तो हमें प्रदूषण की इस सत्यता को स्वीकार करना ही होगा। कपोतवृति अपनाकर हम यथार्थ की उपेक्षा तो कर सकते हैं पर यथार्थ के सत्य को नष्ट नहीं कर सकते।ऐसा नहीं है कि भारतीय समाज ने जिसे आज 'हिन्दू समाज' कहकर संबोधिात किया जाता है उसने समय-समय पर स्वयं की दुर्बलताओं को दूर करने के लिए संघर्ष नहीं किया। समाज सुधारकों का भी जन्म हुआ, पर जो भी आज तक हुआ है, वह बहुत ही आधार अधूरा है। न तो हमने अंधाविश्वास पर पूर्णत: विजय पाकर बुध्दि व विवेक की सत्ता पुन: स्थापित की है और न पाखंड का ही पूर्ण परित्याग कर अपनी कथनी-करनी के भेद को ही मिटाया है। जाति-प्रथा व वर्ण व्यवस्था में आज सर्वाधिक सहारा मनुस्मृति का लिया जाता है और यह जाने समझे बिना कि मनुस्मृति के नाम जो ग्रंथ बाजारों में बिकता है, वास्तव में क्या है। यह निर्विवादित रूप से सिध्द हो चुका है कि आज जिस ग्रंथ को 'मनुस्मृति' के रूप में जाना जाता है, वह किसी व्यक्ति ने नहीं लिखा, इस ग्रंथ को एक कालखंड में भी नहीं लिखा गया और समय-समय पर स्वयं के स्वार्थों की रक्षा के लिए इसमें ऐसे विचारों को भी जोड़ दिया गया जो परस्पर विरोधी है। क्या यह स्वयं में एक क्रूर व्यंग्य नहीं है कि जिस 'मनुस्मृति' का आधार लेकर आज जन्म आधारित जाति व वर्णव्यवस्था का प्रतिपादन किया जाता है, उसी व्यवस्था का विधान है कि कर्म के बदलते ही वर्ण भी बदल जाता है।हिन्दुत्व की इस दुर्बलता को कैसे सुधारा जाए, यह एक बहुत बड़ी समस्या है। अब यदि भारत का पूरा का पूरा मन नहीं बदलता तो उसके जीवन-दर्शन में जो भारी गिरावट आ गई है उसे ठीक नहीं किया जा सकता। पर राष्ट्र एवं समाज का मन बदलने के लिए जैसे प्रयास होने चाहिए, उस ओर ध्‍यान देने की चेष्टा नहीं की जा रही है। भारतीय जीवन दर्शन के मन में जो दुर्बलताएं आ गयी हैं उन्हें दूर करने का काम समाज के सभी वर्गों को एकजुट होकर करना होगा। केवल कानून बना देने से भारतीय समाज स्वयं को पतन के गर्त से बाहर नहीं निकाल सकेगा।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक थे)

राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ और राष्ट्र


डॉ. सौरभ मालवीय
राष्ट्र, किसी भूभाग पर रहने वालो का भू भाग, भूसंस्कृति, उसभूमि का प्राकृतिक वैभव, उस भूमि पर रहने वालों के बीच श्रद्धा और प्रेम, उनकी समान परंपरा, समान सुख¬दुख, किन्ही अर्थों में भाषिक एकरूपता, दैशिक स्तर पर समान शत्रु मित्र आदि अनेक भावों का समेकित रूप होता है. यह भाव बाहर से संप्रेषित नहीं किया जाता, अपितु जन्मजात होता है.
भारत में यह बोध अनादिकाल से है. अभी वैज्ञानिक युग में भी यह तय नहीं हो पा रहा है कि वेदों की रचना कब हुई और वेदों में राष्ट्रवाद अपने उत्कर्ष पर है. इसी संकल्पना के कारण वैदिक ऋषियों ने घोषणा की है-
समानो मन्त्रः समितिः समानी
समानं मनः सहचित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः
समानेन वो हविषा जुहोमि।।
अर्थात् हम लोगों के मंत्र (कार्यसूत्र का सिद्धांत) एक जैसे हो. उस मंत्र के अनुरूप हमलोगो की समिति (संगठन), हमारे चित्त, हमारी मानसिक दशा और कार्यप्रणाली भी समान हो. हमलोग समेकित रूप से लक्ष्य प्राप्ति हेतु परमात्मा से एक समान प्रार्थना करें.
इसी क्रम में हमारे ऋषियों ने आगे कहा-
समानी वः अकूतीः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।
हमारे लक्ष्य, हमारे हृदय के भाव और हमारे चिंतन भी समान हो और हमलोग आपस में संगठित रहे.
संगच्छध्वं संवध्वं सं वो मनांसि जनताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।
अर्थात हमलोग साथ साथ चले, एक साथ बोलें, हमारे मनोभाव समान रहें. हमलोग समानरूप से अपने लक्ष्य सिद्धि हेतु देवाताओं की साधना करें.
ऋषियों ने यह उद्घोष श्रुतियों में शताधिक बार किया है. हर बार वे हमे संगठित और सुव्यवस्थित रहकर अपने लक्ष्य के लिये समर्पित होने का आदेश दे रहे हैं. ऐसा राष्ट्रगीत धरती के किसी समाज में कभी नहीं पैदा हुआ है. पूरा का पूरा वैदिक वाङ्मय ही भारत का राष्ट्रगान है.
ओउम् सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ओउम् शान्तिः शान्ति: शान्ति।।

हम दोनों की परमात्मा साथ साथ रक्षा करें, हमदोनो साथ साथ लक्ष्य भोग करें, साथ साथ पराक्रम करें, हम दोनों के द्वारा पढ़ी गई विद्या तेजस्वी हो और हम कभी आपस में द्वेष न करें. हमारे त्रितापों (दैविक, दैहिक, भौतिक) का शमन हो.

यहां ऋषि हम दोनो का अर्थ केवल दो से ही नहीं कह रहे हैं, अपितु गुरु शिष्य से है. यह एक परंपरा की वार्ता है. जो सगम्र गुरुओं द्वारा समग्र शिष्यों को अनादिकाल से अविच्छिन्न रूप से दी गईशिक्षा है जिससे भारत की राष्ट्रीयता सिंचित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होती रही है.
भारत का यह अक्षुण्ण राष्ट्र भारत के चप्पे-चप्पे पर सदैव दृष्टिगोचर होता रहता है. देश मे दुर्भाग्य से देश में पराधीनता का काल आ गया. 1235 वर्षो तक के प्रदीर्घ पराधीन काल में, हिमालय, गंगा, काशी, प्रयाग, कुंभमेला, अनेकतीर्थ, अनंत ऋषि, महात्मा, महापुरूष, समुद्र, सरिता पेड, पौधे आदि भारत के राष्ट्रीयता गीत तो अहर्निश गाते ही रहते हैं, पर उनकी मानवीय अभिव्यक्ति सुप्त पड़ गई थी. इस कोढ में खाज जैसी स्थिती मैकाले की शिक्षा पद्धति ने पूरी कर दी. हमें बताया गया कि वेद गडरियो के गीत हैं, भारत कभी एक राष्ट्र नहीं रहा. यहां के मूल निवासी तो कोल भील द्रविड आदि रहे हैं, आर्यों ने मध्य एशिया से आकर उन पर आक्रमण करके देश पर कब्जा कर लिया, भारत गर्म देश है, सपेरों और नटों का बाहुल्य रहा है, यह एक देश ही नहीं रहा है, बल्कि उपमहाद्वीप है, मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत को कपड़ा, भोजन, और अन्य तहजीब सिखाया, अब ईसाई आक्रांता भारतीयों के पाप का बोझ उतारने के लिए भगवान के आदेश पर भारत आए हैं. यह भारत का सौभाग्य है कि प्रभु ईसा मसीह भारत पर प्रसन्न हो गए हैं. अब भारत इन ईसाइयों की कृपा से सुशिक्षित और सभ्य हो जाएगा, शैतानी परंपराओं और झूठे देवताओं से मुक्त होकर असली देवताओं की कृपा पा जाएगा. इस प्रकार के सुझावों को जब सत्ता सहयोग मिल जाता है, तो करैला नीम चढ़ जाता है. और इस स्थिति ने हमें इतना आत्म विस्मृत कर दिया कि हम मूढता की सीमा तक विक्षिप्त हो गए. वैदिक ऋषियों की गरिमावान परंपरा को अपना कहने में लज्जानुभव होने लगा. यत्किञ्चित इसका प्रभाव अभी भी अवशेष है. हम जान ही लिए थे कि हम जादू टोने वालों के वंशज हैं. अपनी किसी भी बात की साक्षी के लिए विदेशी प्रमाण खोजने लगे. यदि गौराड्ग शासकों ने मान्यता दी, तो हमार सीना फूल गया वरना एक अघोषित आत्मग्लानि से हम छूट भी नहीं पाते थे. और तो और हम धर्म की परिभाषा भी ह्विटने, स्पेंसर, थोरो, नीत्से, फिक्टे आदि की डायरियों से खोजना चालू कर दिए. वेदो के भाष्य के संदर्भ में मेक्समूलकर, ए.बी. कीथ अदि भगवान वेदव्यास पर भी भारी पडने लगे. आत्मदीनता की इस पराकाष्ठा में महानायक स्वामी विवेकानंद ने अमृत तत्व भरा और बडे शान से घोषित किया कि हमे हिन्दू होने पर गर्व है. इसी घोषणा के बाद हमारी तंद्रा टूटने लगी. बडे सौभाग्य की बात है कि इस वर्ष उसी महानायक की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ है.
संघ के प्रथमपुरूष जन्मजात क्रांतदर्शी थे. भारत पराधीनदासता से छूटे यह प्रथम प्रयास था, पर उस स्वतंत्रता के बाद का भारत कैसा हो इसका ब्लू प्रिंट समग्र भारत में केवल और केवल डॊ. केशव बलिराम हेडगेवार नें ही तैयार किया था. वे स्वामी विवेकानंद के राष्ट्रीयत्व जागरण से अपने अभियान की ऊर्जा ले रहे थे. या यूं कहें कि स्वामी जी के संकल्पना के 100 तरुण डॊ. हेडगेवार जी ने तैयार किया और भारत की आत्मा को बचा लिया, वरना भारतीय संस्कृति भी बेबीलोन, मिस्र, एजटेक, इन्का, यूफ्रेटस और यूनान आदि की सभ्यताओं जैसे बडे-बडे पुस्तकालयों में भी नही मिलती. प्रो. अर्नाल्ड टायनवी जैसा विद्वान भी भारतीय संस्कृति नहीं खोज पाता.
डॊ. हेडगेवार जी ने अनुभव किया कि भारतीय मानस की आत्म विस्मृति केवल राष्ट्रवाद के मंत्र से ही टूटेगी. इसके लिए स्वामी जी का सैद्धांतिक राजपथ तो उन्होने चुन ही लिया था, पर साक्षात् दर्शन हेतु योगी अरविंद घोष का राष्ट्रीय आह्वान उन्हें सशरीर गुरुतुल्य लगा. श्री अरविंद घोष के संगठन “अनुशीलन समिति” से जुडकर वे सिद्धांत और क्रिया दोनों का अभूतपूर्व प्रयोग किए. सन 1915 से 1925 तक के कालखंड में वे केवल और केवल राष्ट्रवाद का ही चिंतन, मनन और प्रयोग करते रहे. योगी अरविंद अलीपुर जेल से बाहर आने पर कहे थे-
 “ भारत जब भी जागा है तो केवल अपने लिए नहीं, अपितु सनातन धर्म के लिए जागा है. जब भी यह कहा जाता है कि भारत महान है तो इसका अर्थ है कि सनातन धर्म महान है. सनातन धर्म का प्रसार ही भारत का प्रसार है. भारत धर्म है और धर्म ही भारत है.
राष्ट्रीयता केवल राजनीति नहीं है, अपितु यह एक विश्वास है, एक आस्था है, एक धर्म है. मैं इतना ही नहीं कह रहा हूं, अपितु यह भी कि सनातन धर्म ही हमारी राष्ट्रीयता है. इस हिंदू राष्ट्र की उत्पत्ति ही सनातान धर्म के साथ हुई है. सनातन धर्म के साथ ही यह राष्ट्र आंदोलित होता है और उसी के साथ बढता है. सनातन धर्म कभी नष्ट होगा, तो उसके साथ ही हिन्दू राष्ट्र भी नष्ट हो जाएगा. सनातन धर्म अर्थात् हिन्दू राष्ट्र.”
संघ संस्थापक डॊ. हेडगेवार इन विचारों से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने स्वामी विवेकानंद के समान सगर्व घोषित किया-
“हो ओउम् । हे भारत हिन्दू राष्ट्र आहे ”
और उपर्युक्त मंत्र राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का पथ प्रदर्शक मंत्र बन गया. इसके उच्चारण मात्र से एक ही साथ स्वामी विवेकानंद और योगी अरविंद दोनो ऋषियों की आत्माएं तृप्त होती हैं, अनादि काल से चला आरहा सत्य सनातन धर्म परिपुष्ट होता है, अनादिकाल से चला आर हा सत्य, विज्ञान, धर्म, संस्कार सब मजबूत होते हैं, भारतीय जनमें आत्मविश्वास पैदा होता है, भारत माता गर्वोन्नत होती है और प्रसन्न भाव से अपने पुत्रों को लाख¬लाख आशीषें देती है. यह भारत माता की स्तुति का बीज मंत्र है. इससे सम्पुटित कर काई भी पूजन अर्चन लोक परलोक दोनों में अभ्युदय ओर निःश्रेयस का कारण होता है.
यह कोई योगायोग की बात नही है. नियति के चक्र में सब कुछ नियत है. सड्घ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरुजी स्वामी विवेकानंद के गुरुभाई स्वामी श्री अखंडनंदनजी के दीक्षित शिष्य थे. निश्चित ही स्वामी विवेकानंद अपने सिद्धांतों को साकाररूप देखने हेतु श्री गुरुजी को शिष्य बनन के लिए प्रेरित किए होंगे.
संघ की राष्ट्रभक्ति का ज्वलंत उदाहरण पग पग पर दष्टिगोचर होता है.
शाखा की नित्य प्रार्थना की प्रत्येक पंक्ति इसकी दुंदुभी बजा रही है. नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे से लेकर परं वैभवंनेतु मेतत्स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वा शिषा ते मृशम् तक और अंततः भारत माता की जय में भी केवल राष्ट्रवाद ही तो भासित हो रहा है. कोई पंक्ति ऐसी नही है, जिसमें राष्ट्रवाद का साक्षात्कार न हो. इससे बडा राष्ट्रगीत क्या हो सकता है.
एकात्मता स्त्रोत्र, एकात्मता मंत्र, प्रातःस्मरण, संघ की शाखओं के गीत, बौद्धिक, और शाखा की पूरी संचरना विशुद्ध राष्ट्रवादी प्रयोग है जिससे स्वामी विवेकानंद की आकांक्षाओं के राष्ट्रीय पुरुषों की अखंड मालिका पैदा होती रहे. संघ ने समग्र सांस्कृतिक भारत की वंदना के गीत गाए है, जो किसी भी दृष्टिकोण से भगवान परशुराम, जगद्गुरु शड्कराचार्य और आचार्य चाणक्य के राष्ट्रिय अभियान को ही पुष्ट करते हैं. संघ के कारण सबने जाना कि भारत का परिमाप “हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम्” तक है. छुआछूत, भाषा, क्षेत्र, जाति और ऊंचनीच के भाव तो संघ को समाप्त करने की जरूरत ही नहीं पड़ी. भारत गान की पवित्र गंगा मे स्नान करते ही उपर्युक्त समास्त विकार अनायास भाग गए. बए एक ही मंत्र गूंज उठा कि
रत्नाकराद्यौत पदां हिमालयं किरीटिनीम्।
ब्रम्हराजर्षि रत्नाद्रयां वन्दे भारत मातरम्।।
यही तो राष्ट्रर्षि वंकिम बाबू का राष्ट्रवाद है. श्री गुरुजी ने तो इससे भी आगे बढ़कर शुक्ल यजुर्वेद मे मंत्र में एक नव प्राण भर दिया-
“राष्ट्रीय स्वाहा. राष्ट्रायमिदं न मम।।
यही भारत का सनातन राष्ट्रवाद है जो हिन्दुत्व की जड़ है.
भाषागत समानता राष्ट्रवाद के लिए आति महत्वपूर्ण तत्व नही है. इसी से संघ देश की सारी आंचलिक भाषाओं के पिष्टपोषण की बात कहते हुए संस्कृत को केंद्र में रखता है, क्योंकि संस्कृत समस्त भाषाओं की जननी है.
अमेरिका मे अंग्रेजी भाषी लोग ब्रिटिश सत्ता से अलग होकर (1774 अड) में फ्रेंच और स्पेनिशों के साथ मिलकर स्वतंत्र अमेरिकन राष्ट्र गठित कर लिए.
भाषा ही राष्ट्र हेतु मुख्य तत्व होता तो स्विटजर्लेंड चार देशों मे टूट गया होता. वहां चार भाषाएं जर्मन, फ्रेंच, इटेलियन और रोमन चलती है, पर एक ही राष्ट्र है. बेल्जियम के फ्रेंची अपने को बेल्जियमी कहते है फ्रेंच नहीं. भाषाई दृष्टि से स्पेनिश और पोर्तगीज एकदम निकट हैं, पर दो राष्ट्र है.
समान पूजा पद्धति भी राष्ट्र का आधार होती, तो विश्व मे 63 मुस्लिम देश एक राष्ट्र बन जाते. संसार में शाताधिक ईसाई देश एक राष्ट्र बन जाते. पर और तो और अरब के यहूदी और मुस्लिम ही एक राष्ट्र न बन सके. ईरान¬ईराक, लीबिया, मिश्र, सूडान, यमन आदि इसके जीवंत उदाहरण हैं.
रक्तगट भी राष्ट्र का आवश्यक तत्व न होने से स्कैन्डिनेविया और आइबेरिया भी अनेक राष्ट्रों में विभक्त हैं.
राष्ट्र हेतु सर्वाधिक आवश्यक तत्व राष्ट्रजन के हृदय की एकता है. संघ अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा केवल इसी बात पर खर्च कर रहा है-
“भारतवासी एक हृदय हैं”
संघ का भारत राष्ट्र वृहत्तर है. इसमें वे सब देश समाहित हैं, जो किन्हीं राजनीतिक कारणों से अलग हो गए, परंतु उनकी राष्ट्रीय पहचान तो भारत ही है.
पाकिस्तान के “जिए सिंध” के नेता श्री जी.एम. सईद कहते हैं- पाकिस्तान के निर्माण का अर्थ है भारत के भूगोल और इतिहास को नकारना. पाकिस्तान को अब एक संघ राज्य बनकर विशाल भारत में सम्मिलित हो जाना चाहिए. मुहाजिरों को कृष्ण तथा कबीर का अनुयायी होना चाहिए. पंजाबी मुसलमान तो नानक, वारिस शाह तथा बुल्ले शाह के वारिस हैं. मै स्वयं 50 वर्षों से पाकिस्तानी हूं, 500 वर्षो से मुसलमान हूं, लेकिन 5000 वर्षों से सिंधी हूं. मुहम्मद बिन कासिम तो लुटेरा था. सिंध स्वातंत्र्य के बाद वहां का बंदरगाह राजा दाहर सेन के नाम पर हो गया.
(इंडियन एक्सप्रेस 02.02.1992)

यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ही सोच थी कि पंडित श्री दीनदयाल उपाध्याय ने भारत-पाक और बांग्ला संघ बनाने की बात कही थी. बाद में प्रख्यात समाजवादी डॊ. राममनोहर लोहिया भी उपाध्याय जी के साथ जुड गए.
संघ के वरिष्ठतम प्रचारक श्री दत्तोपंत ठेगडी ने तो गहन शोध के उपरांत यह सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्र की और नेशन की अवधारणा अलग-अलग बातें है. “राष्ट्र नेशन एक नहीं है. योगी अरविंद ने भी संयुक्त राष्ट्र संघ मे नामकरण का विरोध किया था. उन्होंने कहा था कि जब तक राष्ट्र की परिभाषा तय न हो, तब तक यह नाम रखना ठीक नहीं होगा. सच में राष्ट्र के समग्र अर्थों में सांगोपांग रूपेण कोई देश इस धरा पर है, तो वह केवल भारत है. भारत में ही राष्ट्र की परिभाषा वैज्ञानिक, सांस्कृतिक तथा दार्शनिक रूपेण तृप्त होती है. अन्य किसी देश में नहीं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मौन तपस्वी के रूप में अहर्निश भारतवासियों में राष्ट्र तत्व भरने का कार्य कर रहा है. संघ के ही कारण राष्ट्र शब्द की गरिमा और महिमा जानने का योग बना है, वरना इतना महत्वपूर्ण शब्द केवल वैदिक वाडम्य का कैदी बनकर रह गया होता.
“संघे शक्ति सर्वदा”
“भारत मातरम् विजयते तराम्”