Monday, December 5, 2016

‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श

पटना। भारत हमेशा से ही ज्ञान आराधक राष्ट्र रहा है। भारत की ज्ञान परंपरा औरों से विशेष इसलिए है क्योंकि यह केवल हमारे बाहर मौजूद लौकिक (मटेरियल) ज्ञान को ही महत्वपूर्ण नहीं मानती बल्कि आत्म-चिंतन द्वारा प्राप्त भीतर के ज्ञान को भी समान महत्व देती है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व इन दोनों ही प्रकार के ज्ञान को कड़ी साधना से अर्जित कर ग्रंथो के रूप में मानव समाज के लिए प्रस्तुत किया। आज चाहे योग की बात हो, विज्ञान की या फिर गणित की, पूरी दुनिया ने भारतीय ज्ञान से कुछ न कुछ लिया है। इस प्रकार हम एक श्रेष्ठ ज्ञान परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। यह विचार ‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले व्यक्त किए। अपने रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में इस संविमर्श का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा पटना में किया है।
श्री होसबोले ने कहा की ज्ञान केवल पुस्तकें पढ़कर सूचनाओं को एकत्र करना नहीं है। बल्कि इन सूचनाओं का मानव हित में उपयोग कर पाने की क्षमता ज्ञान है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार पुस्तकों के अलावा, आत्म-चिंतन के द्वारा और विभिन्न प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़कर भी ज्ञान हासिल कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में इस बात तक का उल्लेख किया गया है कि हजारों वर्ष पूर्व किस प्रकार नदियों के रास्तों का भी वैज्ञानिक पद्धति से निर्माण कर उनको प्रवाहित किया गया। उन्होंने भारत की ज्ञान परंपरा के पुनरोत्थान में पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा किये जाने वाले कार्यों की सराहना करते हुए कहा की आज जहाँ कुछ विश्वविद्यालय अपने मूल उद्देश्य से भटक गए हैं, वहीँ यह विश्वविद्यालय सही मायने में ज्ञान साधना कर रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में किये गए अपने महत्वपूर्ण कार्यों को विश्वविद्यालय ने देश के अलग-अलग राज्यों में पहुँचाया है।
संविमर्श की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि आज के परिदृश्य तथा भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए हमें अपने ज्ञान की समृद्ध परंपरा को उपयोग में लाने की आवश्यकता है। आज से हजारों साल पहले जिस प्रकार हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति को समझा था और उसके साथ जैसा सम्बन्ध स्थापित किया था, उसे आज लागू करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा की उस ज्ञान को प्राप्त करने का सबसे प्रभावशाली माध्यम संस्कृत भाषा है, जिसकी आज उपेक्षा हो रही है। उनका मानना है कि आज जिस स्तर पर संस्कृत स्कूल तथा महाविद्यालयों में पढाई जा रही है, वह नाकाफी है। उन्होंने कहा कि आज विश्व को भारत की प्राचीन और समृद्ध ज्ञान की आवश्यकता है, लेकिन हमारे इस ज्ञान के भण्डार को आज पश्चिम के कुछ कथित विद्वान अपनी समझ के अनुसार उसकी व्याख्या करने की चेष्टा कर रहे हैं जबकि आवश्यकता है कि हम उस ज्ञान को भारतीय परंपरा के अनुसार व्याख्या कर दुनिया तक ले जायें ताकि उसमे कोई त्रुटी न हो और उसके औचित्य को सही मायनों में दुनिया को समझा सकें। वहीँ, उद्घाटन समारोह के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शत्रुघ्न प्रसाद ने कहा कि पश्चिमी देशों ने हमेशा से ही अपने ज्ञान परंपरा को हमारे ऊपर थोपने का प्रयास किया है जबकि हमारे देश के विद्वानों ने समय-समय पर इसका विरोध किया। आज आवश्यकता है कि वर्षों से उपेक्षित अपने ज्ञान को आगे लायें।
संविमर्श में सोमवार को ‘भारत में संवाद की परंपरा’ विषय पर काठमांडू विश्वविद्यालय, नेपाल से आये डॉ. निर्मल मणि अधिकारी ने व्याख्यान दिया। उन्होंने भरत मुनि और महर्षि नारद को उल्लेखित करते हुए बताया कि भारत में सदैव लोकहित में संवाद की परंपरा रही है। दूसरे सत्र में ‘भारत में अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र की परंपरा’ विषय पर प्रख्यात साहित्यकार एवं शिक्षाविद प्रो. रामेश्वर पंकज मिश्र ने व्याख्यान दिया। जबकि ‘भारत में अध्यात्म का आधार’ विषय पर बीकानेर से आये स्वामी सुबोधगिरि और ‘आयुर्वेद और जीव विज्ञान की परंपरा’ पर भोपाल से आये वैद्य चन्द्रशेखर ने अपने व्याख्यान दिए।


      आज इन विषयों पर विमर्श : संविमर्श में मंगलवार को वैदिक गणित पर रोहतक के राकेश भाटिया, भारत में विज्ञान की परंपरा पर महाराष्ट्र के प्रो. पीपी होले, डॉ. श्रीराम ज्योतिषी, डॉ. सीएस वार्नेकर, भारत की मेगालिथ रचनाओं की वैज्ञानिकता विषय पर फ़्रांस से आये डॉ. सर्जे ली गुरियक सहित पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. संजय पासवान के व्याख्यान होंगे।

‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श का समापन

पटना। भारतीय परंपरा के अनुसार हमारे चिंतन में कई धाराएँ हैं, लेकिन पश्चिम ने केवल एक ही धारा को समझा और फैलाया। विदेशी ताकतों ने हमेशा से ही हमारी ज्ञान परंपरा को दबाकर रखने की कोशिश की है। हमारे विज्ञान और सेवा भाव को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश की गयी है, जिसके कारण हमने अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा को बहुत हद तक खो दिया है। आज फिर से हमें अपनी ज्ञान परंपरा और सामाजिक व्यवस्था को समझने और अपने तरीके से परिभाषित करने की ज़रूरत है। यह विचार पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने ‘भारतीय की ज्ञान परंपरा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श में व्यक्त किये। यह कार्यक्रम माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा पटना में आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय ने अपने रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में विमर्शों का आयोजन कर रहा है।
श्री पासवान ने कहा की आज हमें अपनी ज्ञान परंपरा, सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली को बाजारवाद से बचने की ज़रूरत है। हमें पश्चिमी सभ्यताओं और विदेशी ज्ञान-विज्ञान को दरकिनार कर अपनी परम्पराओं और मान्यताओं का पुनरोत्थान करते हुए भारतीयता में पूरी तरह रमना होगा। उन्होंने इसके लिए इस बात पर जोर दिया की हमें आज सभी विचारधाराओं के लोगों से संवाद करना होगा और उनको साथ लेकर चलना होगा। जाति व्यवस्था पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा की जातियों के मिटाने की नहीं बल्कि आज उन्हें मिलाने की आवश्यकता है। हमारी परंपरा विविधताओं का सम्मान करने की है और उनमे एकता स्थापित करने की है, जिसे आज अच्छी तरह से व्यवहार में उतारना होगा ताकि भारत पूरे विश्व में एक बड़ी ताकत के रूप में उभर सके।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा की भारतीय ज्ञान को स्थापित करने की नहीं बल्कि इस ज्ञान के व्यापक भंडार को खोजने की ज़रूरत है। प्राचीन ग्रंथों में छुपे इस ज्ञान के खजाने को खोजकर, उसे संवार कर मानव कल्याण के लिए उसको इस्तेमाल में लाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा की आज भारत के शैक्षणिक संस्थाओं को इस कार्य के लिए आगे आना होगा और समर्पित भाव से ऐसी परियोजनाओं में जुटना होगा ताकि कोई बाहरी संस्था या इंसान इस भण्डार की खोजकर उसको एक विकृत रूप में दुनिया के सामने पेश न करे। उन्होंने कहा कि यहाँ का ज्ञान-विज्ञान युगों से प्रकृति के अनुकूल रहा है और इसी कारण भारत की जीवनशैली भी औरों से हमेशा श्रेष्ठ रही है। प्रो. कुठियाला ने कहा की आज इस कार्य को करने में हम पूरी तरह सक्षम हैं आवश्यकता है तो सिर्फ संकल्प की। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग प्राचीन भारतीय ज्ञान की खोज में लगे हैं उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि वह अपने कार्यों को केवल सेमिनार, कांफ्रेंस और पठन-पाठन तक सीमित न रखकर समाज और पूरी मानवता तक लेकर जायें ताकि इससे परम वैभव की स्थिति को प्राप्त किया जा सके। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता विश्वविद्यालय इस कार्य को विद्यार्थियों तक ले जाने की भरपूर कोशिश कर रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार और पांचजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर ने अपने उद्बोधन में कहा की आज पं. दीनदयाल के विचारों को व्यवहार में लाने की आवश्यकता है जिसमें वह समाज और सृष्टि को समझने की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा के उद्द्येश्य, विषयों का चयन, पाठ्यक्रमों में प्रवेश और पात्रता, वातावरण तथा मूल्यांकन जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए ताकि शिक्षा से समाज का पूर्ण विकास हो सके।
सामाजिक कार्यकर्ता स्वांत रंजन ने शिक्षा और ज्ञान को समाज के निचले स्तर तक ले जाने की बात पर जोर दिया और कहा कि ऐसा करने से समाज के हर वर्ग में जागरूकता आयेगी। साथ ही उन्होंने भारत की प्राचीन व्यवस्थाओं और मान्यताओं को समझकर आज के सन्दर्भ में उन्हें इस्तेमाल में लाने की बात कही। श्री रंजन ने पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा किये जा रहे इस अनूठे कार्य की सराहना करते हुए कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान पद्दति को फिर से समझना और इसके लिए विभिन्न जगहों पर जाकर युवाओं और लोगों को प्रेरित करने अपने आप में बेहद प्रशंशनीय कार्य है।

  इससे पूर्व संविमर्श में वैदिक गणित पर रोहतक के राकेश भाटिया, भारत में विज्ञान की परंपरा पर महाराष्ट्र के प्रो. पीपी होले, डॉ. श्रीराम ज्योतिषी, डॉ. सीएस वार्नेकर, भारत की मेगालिथ रचनाओं की वैज्ञानिकता विषय पर फ़्रांस से आये डॉ. सर्जे ली गुरियक ने व्याख्यान दिए। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. सौरभ मालवीय और लोकेन्द्र सिंह ने किया। इस कार्यक्रम में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी, इलेक्ट्रोनिक मीडिया विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्रीकांत सिंह, जनसंपर्क एवं विज्ञापन विभाग के अध्यक्ष डॉ. पवित्र श्रीवास्तव, नॉएडा परिसर से डॉ. अरुण भगत भी शामिल हुए।