Monday, November 19, 2018

यह किताब अभिनंदनीय है, सराहनीय है

फ़िरदौस ख़ान
डॊ. सौरभ मालवीय जी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सहाफ़ी ज़िन्दगी पर ऐसी किताब लिखी है, जिसमें उनकी सहाफ़ी ज़िन्दगी पर रौशनी डालने के साथ-साथ उनके विचारों और लेखों को भी संजोया गया है. सौरभ जी समर्पित प्राध्यापक हैं, ओजस्वी वक्ता हैं. अध्ययन से उनका गहरा नाता है. उनका इंद्रधनुषी व्यक्तित्व इस किताब में साफ़ झलकता है. बेशक उनका यह काम क़ाबिले-तारीफ़ है, इसके लिए सौरभ जी मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं.

सौरभ जी ने हमें किताब पर एक तहरीर लिखने की ज़िम्मेदारी सौंपी है, जो कोई आसान काम नहीं है. क्योंकि  बहुत मुश्किल होता है किसी ऐसी शख़्सियत के बारे में लिखना, जो ख़ुद अपनी ही एक मिसाल हुआ करती है. श्री अटल बिहारी वाजपेयी भी एक ऐसी ही शख़्सियत हैं. वे मन से कवि, विचारों से लेखक, कर्म से राजनेता हैं. बहुआयामी प्रतिभा के धनी अटलजी ने कविताएं भी लिखीं, पत्रकारिता भी की, भाषण भी दिए, विपक्ष में रहकर सियासत भी ख़ूब की, सत्ता का सुख भी भोगा. इस सबके बावजूद वे मन से हमेशा कवि ही रहे. सियासत में मसरूफ़ होने की वजह से कविताओं से उनकी कुछ दूरी बन गई या यूं कहें कि वे कविता को उतना वक़्त नहीं दे पाए, जितना वे देना चाहते थे. इसकी कमी उन्हें हमेशा खलती रही. सियासत ने उनके काव्य जीवन को उनसे छीन लिया. बक़ौल श्री अटल बिहारी वाजपेयी, राजनीति में आना, मेरी सबसे बड़ी भूल है. इच्छा थी कि कुछ पठन-पाठन करूंगा. अध्ययन और अध्वयव्साय की पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाऊंगा. अतीत से कुछ लूंगा और भविष्य के कुछ दे जाऊंगा. किंतु राजनीति की रपटीली राह में कमाना तो दूर, गांठ की पूंजी भी गंवा बैठा. मन की शांति मर गई. संतोष समाप्त हो गया. एक विचित्र सा खोखलापन जीवन में भर गया. ममता और करुणा के मानवीय मूल्य मुंह चुराने लगे. आत्मा को कुचलकर ही आगे बढ़ा जा सकता है. स्पष्ट है, सांप-छछूंदर जैसी गति हो गई है. न निग़लते बने, न उग़लते.

अटलजी सियासत के दलदल में रहकर भी इससे अलग रहे. उन्होंने सिर्फ़ विरोध के लिए विरोध नहीं किया. वे ख़ुद कहते हैं, स्वतंत्रता के बाद हमारी उपलब्धियां कम नहीं हैं. मैं उन लोगों में से नहीं हूं, जो आलोचना के लिए आलोचना करूं. मैं प्रतिपक्ष में हूं, पहले भी कह चुका हूं, स्वतंत्रता के बाद हमने कुछ नहीं किया, ये कहना ग़लत होगा.
उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में उसूलों को अहमियत दी. वे कहते हैं, मैं विश्वास दिलाता हूं कि मैंने कभी सत्ता के लालच में सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया है, और न भविष्य में करूंगा. सत्ता का सहवास और विपक्ष का वनवास मेरे लिए एक जैसा है. मैं आपको आश्वासन देना चाहता हूं कि कितनी भी आपत्तियां आएं, हम वरदान के लिए झोली नहीं फैलाएंगे. आख़िरी क्षण तक वरदान की तलाश नहीं करेंगे, न मैं संघर्ष का रास्ता छोड़ूंगा.

अटलजी सादगी पसंद हैं. कामयाबी की बुलंदी पर पहुंच कर भी वह अहंकार से दूर हैं, नम्रता से परिपूर्ण हैं. उन्हीं के शब्दों में-
मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना
गैरों को गले न लगा सकूं
इतनी रुखाई कभी मत देना...

बहरहाल, उम्मीद है कि अटल जी की ज़िन्दगी पर आई अन्य किताबों के बीच यह किताब अपनी मौजूदगी दर्ज कराएगी.
(शायरा, लेखिका व पत्रकार)

स्वच्छता और स्वास्थ्य

डॊ. सौरभ मालवीय
जिस प्रकार स्वच्छ तन में स्वच्छ मन रहता है, ठीक उसी प्रकार स्वच्छ स्थान पर स्वस्थ लोग रहते हैं। स्वच्छता और स्वास्थ्य का गहरा संबंध है। गंदगी के कारण अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। कई बार ये रोग महामारी का कारण भी बन जाते हैं। रोगों के कारण मनुष्य दुर्बल तो होता ही है, साथ ही धन और समय की भी हानि होती है। राष्ट्र की उन्नति के लिए उसके जन का स्वस्थ होना अति आवश्यक है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार देशव्यापी स्वच्छ भारत अभियान चला रही है। इस अभियान के माध्यम से सरकार ने एक ऐसा रचनात्मक और सहयोगात्मक मंच प्रदान किया है, जिसका उद्देश्य गली-मुहल्लों, सड़कों, सार्वजनिक स्थलों तथा अपने आसपास के स्थानों को स्वच्छ रखना है। यह अभियान प्रौद्योगिकी के माध्यम से नागरिकों और संगठनों के अभियान संबंधी प्रयासों के बारे में जानकारी प्रदान करता है। कोई भी व्यक्ति, सरकारी संस्था या निजी संगठन इसमें भागीदार बन सकते हैं। वे अपने दैनिक कार्यों में से कुछ समय निकालकर देश में स्वच्छता संबंधी कार्यों में योगदान दे सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि आधिकारिक रूप से 1 अप्रैल 1999 से केंद्र सरकार ने व्यापक ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम का पुनर्गठन कर पूर्ण स्वच्छता अभियान आरंभ किया था। इसके पश्चात 1 अप्रैल 2012 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा इसे निर्मल भारत अभियान का नाम दिया गया। स्वच्छ भारत अभियान के रूप में 24 सितंबर 2014 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति से निर्मल भारत अभियान का पुनर्गठन किया गया था। केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इस अभियान के प्रचार-प्रसार पर विशेष बल दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महात्मा गांधी की 145वीं जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर 2014 को दिल्ली के राजघाट से स्वच्छ भारत अभियान का प्रारंभ किया था। केंद्र सरकार ने 2 अक्टूबर 2019 तक ग्रामीण क्षेत्रों में 1.96 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के 1.2 करोड़ शौचालयों का निर्माण करके खुले में शौच मुक्त भारत को प्राप्त करने का लक्ष्य रखा था।
प्रधानमंत्री ने कहा था कि गांधीजी के दो सपनों भारत छोड़ो और स्वच्छ भारत में से एक को साकार करने में लोगों ने सहायता की। अपितु स्वच्छ भारत का दूसरा सपना अब भी पूरा होना शेष है। उन्होंने कहा कि एक भारतीय नागरिक होने के नाते यह हमारा सामाजिक दायित्व है कि हम उनके स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करें। प्रधानमंत्री ने देश की सभी पिछली सरकारों और सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संगठनों द्वारा स्वच्छता को लेकर किए गए प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि भारत को स्वच्छ बनाने का काम किसी एक व्यक्ति या अकेले सरकार का नहीं है, यह काम तो देश के 125 करोड़ लोगों द्वारा किया जाना है जो भारत माता के पुत्र-पुत्रियां हैं। स्वच्छ भारत अभियान को एक जन आंदोलन में परिवर्तित करना चाहिए। लोगों को ठान लेना चाहिए कि वह न तो गंदगी करेंगे और न ही करने देंगे। उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार साफ-सफाई न होने के कारण भारत में प्रति व्यक्ति औसतन 6500 रुपये व्यर्थ हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि इसके दृष्टिगत सवच्छ भारत जन स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव डालेगा और इसके साथ ही गरीबों की गाढ़ी कमाई की बचत भी होगी, जिससे अंतत: राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान होगा। उन्होंने लोगों से साफ-सफाई के सपने को साकार करने के लिए इसमें हर वर्ष 100 घंटे योगदान करने की अपील की थी। प्रधानमंत्री ने शौचालय बनाने की अहमियत को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि साफ-सफाई को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे देशभक्ति और जन स्वास्थ्य के प्रति कटिबद्धता से जोड़ कर देखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री द्वारा मृदला सिन्हा, सचिन तेंदुलकर, बाबा रामदेव, शशि थरूर, अनिल अम्बानी, कमल हसन, सलमान खान, प्रियंका चोपड़ा जैसी नौ हस्तियों को आमंत्रित किया गया कि वे भी स्वच्छ भारत अभियान में अपना सहयोग प्रदान करें, इसके चित्र सोशल मीडिया पर साझा करें और अन्य नौ लोगों को भी अपने साथ जोड़ें, ताकि यह एक श्रृंखला बन जाएं। आम जनता को भी सोशल मीडिया पर हैश टैग #MyCleanIndia लिखकर अपने सहयोग को साझा करने के लिए कहा गया।

देश के सामने अस्वच्छता एक बड़ी समस्या है। खुले में शौच के कारण महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्हें रात की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इसके कारण उन्हें शारीरिक और मानसिक कष्ट झेलना पड़ता है। वे कई रोगों की चपेट में आ जाती हैं। खुले में शौच के कारण महिलाओं के साथ आपराधिक घटनाएं भी होती रहती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने प्रथम 2014 के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में शौचालयों की आवश्यकता पर बल दिया था। उन्होंने कहा था- क्या हमें कभी दर्द हुआ है कि हमारी मां और बहनों को खुले में शौच करना पड़ता है? गांव की गरीब महिलाएं रात की प्रतीक्षा करती हैं। जब तक अंधेरा नहीं उतरता है, तब तक वे शौच को बाहर नहीं जा सकती हैं। उन्हें किस प्रकार की शारीरिक यातना होती होगी, क्या हम अपनी मां और बहनों की गरिमा के लिए शौचालयों की व्यवस्था नहीं कर सकते हैं?
इसी प्रकार उन्होंने 2014 के जम्मू और कश्मीर राज्य चुनाव अभियान के दौरान स्कूलों में शौचालयों की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था- विद्यालयों में शौचालयों की कमी के कारण छात्राओं को अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़ देनी पड़ती है। वे अशिक्षित रहती हैं। हमारी बेटियों को गुणवत्ता की शिक्षा का समान अवसर भी मिलना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य व्यक्ति, क्लस्टर और सामुदायिक शौचालयों के निर्माण के माध्यम से खुले में शौच की समस्या को समाप्त करना है। यह अभियान शहरों और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में चलाया जा रहा है। शहरी क्षेत्रों के लिए स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य 1.04 करोड़ परिवारों को लक्षित करते हुए 2.5 लाख समुदायिक शौचालय और 2.6 लाख सार्वजनिक शौचालय का निर्माण कराना है। इसके साथ ही प्रत्येक शहर में एक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सुविधा प्रदान करना है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत आवासीय क्षेत्रों में सामुदायिक शौचालयों का निर्माण करना है, जहां व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण करना कठिन है। इसके अतिरिक्त सार्वजनिक स्थानों जैसे बाजार, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन, पर्यटन स्थल आदि पर सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण करना है। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत देश में लगभग 11 करोड़ 11 लाख शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया। इसका उद्देश्य लोगों को स्वच्छता का महत्व बताते हुए खुले में शौच की समस्या को समाप्त करना है। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी का उपयोग कर ग्रामीण क्षेत्रों में कचरे से जैव उर्वरक और ऊर्जा के विभिन्न रूपों में परिवर्तित करना है। इसे स्वच्छता के साथ-साथ धन उपार्जन भी होगा।
स्कूलों में भी स्वच्छ्ता के लिए अभियान चलाया गया। स्वच्छ भारत स्वच्छ विद्यालय अभियान भारत का प्रारंभ तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने किया था। उन्होंने स्कूल के शिक्षकों और छात्रों के साथ मिलकर स्वच्छता अभियान में भाग भी लिया था।

स्वच्छता अभियान की सफलता सुनिश्चित करने के लिए सर्वेक्षण भी कराया गया और विजेता शहरों को पुरस्कार भी दिए गए। स्वच्छ भारत अभियान (शहरी) के तत्वाधान में केन्द्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने स्वच्छ सर्वेक्षण 2018 का आयोजन किया था। इसमें 4203 शहरी स्थानीय निकायों का मूल्यांकन किया गया। इसके अंतर्गत 2700 मूल्यांकन कर्मियों ने पूरे देश के 40 करोड़ लोगों से संबंधित स्थानीय निकायों का सर्वेक्षण किया। इसके लिए 53.58 लाख स्वच्छता ऐप डाउनलोड किए गए तथा 37.66 लाख नागरिकों के फीडबैक का संग्रह किया गया। नागरिकों के फीडबैक तथा सेवा स्तर में हुई प्रगति में से प्रत्येक को 35 प्रतिशत की भारिता दी गई है, जबकि प्रत्यक्ष निरीक्षण को 30 प्रतिशत की भारिता दी गई है। यह कार्यक्रम 4 जनवरी 2018 से 10 मार्च 2018 तक जारी रहा। सर्वेक्षण में मध्य प्रदेश के इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ नगर होने का सम्मान मिला। इसी राज्य के भोपाल को दूसरा स्थान मिला। चंडीगढ़ तीसरे स्थान पर रहा। राज्यों में सबसे अधिक स्वच्छ रहने वालों में झारखंड पहले स्थान पर रहा, जबकि महाराष्ट्र को दूसरा और छत्तीसगढ़ को तीसरा स्थान मिला। राष्ट्रीय स्तर के कुल 23 और जोनल स्तर के 20 पुरस्कार घोषित किए गए। उल्लेखनीय है कि इसी प्रकार इससे पूर्व भी इस प्रकार के सर्वेक्षण किए गए थे। वर्ष 2017 में 434 नगरों में स्वच्छता सर्वेक्षण किया गया था तथा इंदौर को सर्वाधिक स्वच्छ शहर का पुरस्कार दिया गया था। वर्ष 2016 में 73 नगरों में स्वच्छता सर्वेक्षण किया गया था। इसमें मैसूर को सर्वाधिक स्वच्छ नगर होने का श्रेय प्राप्त हुआ था।

देश में स्वच्छ भारत अभियान के सुखद परिणाम देखने को मिल रहे हैं। सुलभ और सुरक्षित शौचालयों के कारण महिलाओं के जीवन में परिवर्तन आया है। लोग भी इस अभियान में महत्वपूर्ण भागीदारी निभा रहे हैं। लोग यहां-वहां कूड़ा कचरा फेंकने की बजाय कूड़ेदान का प्रयोग करने लगे हैं। बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों व अन्य सार्वजनिक स्थलों पर भी अब सच्छता दिखाई देने लगी है। स्कूली बच्चे और कॊलेज के छात्र भी इस अभियान में भाग ले रहे हैं। वे रैलियों और नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश जन-जन तक पहुंचा रहे हैं।

विदेशों में भी स्वच्छ भारत अभियान की प्रशंसा होने लगी है। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार जापान के प्रधानमंत्री शिन्जो आबे ने स्वच्छ भारत अभियान को अपनी सरकार का समर्थन देने का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने अपने संदेश में कहा है कि साफ पानी को सुरक्षित रखना और स्वच्छता की स्थिति में सुधार करना पूरी दुनिया के सामने आम चुनौती है। हम उम्मीद करते हैं कि इस मिशन को आगे बढ़ाने के लिए हर देश प्रयास करेगा।
माइक्रोसॉफ्ट के को-फाउंडर बिल गेट्स ने भारत में स्वच्छता अभियान चलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना की है. उन्होंने ट्वीट किया- नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और भारत सरकार ने स्वच्छता में सुधार की दिशा में अहम भूमिका निभाई है. अब स्वच्छ भारत को सफल बनाने का समय है।

निसंदेह, स्वच्छ भारत अभियान शीघ्र अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लोगों के जीवन को सुखद और समृद्ध बनाएगा।

Thursday, November 15, 2018

राजधानी में वायु प्रदूषण

डॊ. सौरभ मालवीय
हमारे देश में वायु प्रदूषण निरंतर बढ़ रहा है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण घातक स्तर तक पहुंच गया है। हाल में शहर का समग्र वायु गुणवत्ता सूचकांक 401 दर्ज किया गया। इसी प्रकार वायु में घुले हुए अतिसूक्ष्म प्रदूषक कण पीएम 2.5 को 215 दर्ज किया गया, जो कि स्वास्थ्य के लिए अति हानिकारक है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2016 में प्रदूषण के कारण पांच वर्ष से कम आयु के एक लाख से अधिक बच्चों की मृत्यु हुई। इनमें भारत के 60,987, नाइजीरिया के 47,674, पाकिस्तान के 21,136 और कांगों के 12,890 बच्चे सम्मिलित हैं। रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण के कारण 2016 में पांच से 14 साल के 4,360 बच्चों की मत्यु हुई। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में पांच साल से कम उम्र के 98 प्रतिशत बच्चों पर वायु प्रदूषण का बुरा प्रभाव पड़ा, जबकि उच्च आय वाले देशों में 52 प्रतिशत बच्चे प्रभावित हुए। वायु प्रदूषण के कारण विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 70 लाख लोगों की अकाल मृत्यु होती है। संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) के अनुसार भारत में बढ़ता वायु प्रदूषण वर्षा को प्रभावित कर सकता है। इसके कारण लंबे समय तक मानसून कम हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वायु में मौजूद पीएम 2.5 कणों के कारण कुछ स्थानों बहुत अधिक वर्षा हो सकती है, तो कुछ स्थानों पर बहुत कम होने की संभावना है।

दि एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार शीतकाल में 36 प्रतिशत प्रदूषण दिल्ली में ही उत्पन्न होता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से 34 प्रतिशत प्रदूषण यहां आता है। शेष 30 प्रतिशत प्रदूषण एनसीआर और अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से यहां आता है। रिपोर्ट में प्रदूषण के कारणों पर विस्तृत जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रदूषण के लिए वाहनों का योगदान लगभग 28 प्रतिशत है। इसमें भी भारी वाहन सबसे अधिक 9 प्रतिशत प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। इसके पश्चात दो पहिया वाहनों का नंबर आता है, जो 7 प्रतिशत प्रदूषण फैलाते हैं। तीन पहिया वाहनों से 5 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है। चार पहिया वाहन और बसें 3-3 प्रतिशत प्रदूषण उत्पन्न करती हैं। अन्य वाहन एक प्रतिशत प्रदूषण फैलाते हैं।
धूल से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण का योगदान 18 प्रतिशत है। इसमें सड़क पर धूल से प्रदूषण 3 प्रतिशत प्रदूषण होता है। निर्माण कार्यों से एक प्रतिशत व अन्य कारणों से 13 प्रतिशत प्रदूषण है। औद्योगों के कारण भी वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी हो रही है। शहर के प्रदूषण में 30 प्रतिशत योगदान इनका भी है। इसमें पावर प्लांट 6 प्रतिशत तथा ईंट भट्ठे 8 प्रतिशत प्रदूषण फैलाते हैं। इसी प्रकार स्टोन क्रशर के कारण 2 प्रतिशत तथा अन्य उद्योगों से 14 प्रतिशत प्रदूषण उत्पन्न होता है। आवासीय क्षेत्रों के कारण 10 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है।
शीतकाल में पीएम 10 के स्तर पर पहुंचने के कई कारण हैं। इस मौसम में उद्योगों से 27 प्रतिशत प्रदूषण उत्पन्न होता है, जबकि वाहनों से 24 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है। इसी प्रकार धूल से 25 प्रतिशत तथा आवासीय क्षेत्रों से 9 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है। उल्लेखनीय है कि पराली जलाने के कारण और बायोमास से केवल 4 प्रदूषण उत्पन्न होता है, जबकि दिल्ली के प्रदूषण के लिए समीपवर्ती राज्यों पंजाब और हरियाणा को दोषी ठहराया जाता है। कहा जाता है कि पंजाब और हरियाणा के किसान अपने खेतों में पराली जलाते हैं, जिसका धुआं दिल्ली में प्रदूषण का कारण बनता है।

प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दीपावली में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाते हुए, केवल ग्रीन पटाखों की बिक्री को ही स्वाकृति दी है। इतना ही नहीं, पटाखे फोड़ने के लिए भी कोर्ट ने समयसारिणी जारी कर चुका है। इसके अनुसार दीपावली पर लोग रात 8 बजे से 10 बजे तक ही पटाखे जला पाएंगे। इसके अतिरिक्त ऑनलाइन पटाखों की बिक्री पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर राज्य में सुबह साढ़े चार बजे से सुबह साढ़े छह बजे तक भी पटाखे फोड़ने की अनुमति मांगी थी। याचिका में कहा गया था कि दीपावली के उत्सव को लेकर हर राज्य की अपनी अलग-अलग परंपराएं और संस्कृति हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का प्रतिबंध लोगों के धार्मिक अधिकारों को खारिज करता है, परंतु कोर्ट ने प्रतिबंध को हटाने से इनकार करते हुए कहा कि ग्रीन पटाखे बनाने का उनका आदेश पूरे देश के लिए है। अर्थात अब देश मे कहीं भी सामान्य पटाखे नहीं बनेंगे। केवल कम प्रदूषण वाले ग्रीन पटाखे ही बनेंगे। कोर्ट ने यह भी कहा है कि प्रदूषण करने वाले जो पटाखे पहले बन चुके है, उन्हें भी दिल्ली-एनसीआर मे बेचे जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अपितु दिल्ली एनसीआर के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर सामान्य पटाखे चलाए जा सकते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) भी प्रदूषण को लेकर कठोर कदम उठा रहा है। बोर्ड ने पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के राज्य प्रदूषण नियंत्रण निकायों को वायु प्रदूषण की जांच के लिए निर्देशों का पालन नहीं करने वाले लोगों या एजेंसियों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) ने एक नवंबर से निर्माण कार्य जैसी कई गतिविधियों को प्रतिबंध दिया है। इसके अतिरिक्त लोगों से अगले 10 दिनों के लिए सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने के लिए आग्रह किया गया है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में कुल 35 लाख निजी वाहन हैं। वर्ष 2016 में भी ऑड-ईवन योजना को दो बार 1 से 15 जनवरी और 15 से 30 अप्रैल के बीच लागू किया गया था। जीआरपी वायु प्रदूषण से निपटने के लिए एक कारगर योजना है। इसे 15 अक्टूबर से लागू किया गया था। दिल्ली मेट्रो ने भी बुधवार से अपने नेटवर्क पर 21 अतिरिक्त ट्रेनें आरंभ की हैं।

चिकित्सकों के अनुसार वायु में मिले अति सूक्ष्म कण सांस के माध्यम से शरीर के भीतर चले जाते हैं, जिसके कारण अनेक शारीरिक और मानसिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं। ये कण गर्भ में पल रहे शिशु को भी अपनी चपेट में ले लेते हैं, जिससे जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ वातावरण नितांत आवश्यक है। इसके लिए प्रदूषण पर अंकुश लगाना होगा। इस अभियान में लोगों को भी आगे आना चाहिए।

Wednesday, October 31, 2018

राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है स्टैच्यू ऑफ यूनिटी

डॊ. सौरभ मालवीय
हमारे देश में अनेक धर्म, अनेक भाषाएं भी हैं, लेकिन हमारी संस्कृति एक ही है। हर भारतीय का प्रथम कर्त्यव्य है की वह अपने देश की आजादी का अनुभव करे कि उसका देश स्वतंत्र है और इस आजादी की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। जनशक्ति ही राष्ट्र की एकता शक्ति है। ये विचार देश को राष्ट्रीय एकता सूत्र में पिरोने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल के हैं, जो आज भी बेहद प्रासंगिक हैं. 31 अक्टूबर, 1875 गुजरात के नाडियाद में जन्मे सरदार पटेल को भारत का लौह पुरुष भी कहा जाता है। उन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई और देश के प्रथम गृहमंत्री बने। यह विडम्बना ही है कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में केवल 15 भागों को एकत्र करके जर्मनी राष्ट्र खड़ा करने वाले बिस्मार्क नाम के जर्मन राजनीतिज्ञ को विश्व में अभूतपूर्व राजनेता मान लिया गया, परंतु साढ़े 32 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में बसे 565 राज्यों को मिलाकर एक महान भारत का निर्माण करने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल के योगदान को भुला दिया गया। वास्तव में देश के दुर्भाग्य और राजनीतिक कुचक्र के कारण सरदार वल्लभ भाई पटेल को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे।

वर्ष 2009 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल को उनकी गरिमा के अनुरूप सम्मानित करने के लिए विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा बनवाने के बारे में विचार किया। गुजरात विधानसभा में 182 सदस्य चुने जाते हैं, अतएव 182 मीटर ऊंची प्रतिमा बनवाने का निर्णय गुजरात सरकार ने लिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अक्टूबर, 2013 को सरदार पटेल की 138वीं वर्षगांठ के अवसर पर गुजरात में नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के समीप केवड़िया नामक स्थान पर प्रतिमा का शिलान्यास किया। उस समय भारतीय जनता पार्टी ने प्रतिमा के लिए लोहा एकत्रित करने के लिए देशव्यापी अभियान चलाया था। विशेष बात यह है कि नरेंद्र मोदी अब प्रधानमंत्री के रूप में कल इस प्रतिमा का अनावरण करेंगे। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी नामक सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 237.35 मीटर है। लगभग 2,989 करोड़ रुपये की लागत से बनी इस प्रतिमा के भीतर एक लिफ्ट लगाई गई है, जिससे पर्यटक सरदार पटेल के हृदय तक जा सकेंगे।  यहां से प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य को देखा जा सकेगा। प्रतिमा के निर्माण में इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि प्राकृतिक आपदाएं इसे हानि न पहुंचा पाएं। इसमें चार प्रकार की धातुओं का उपयोग किया गया है, जिससे इसे जंग न लग पाए। प्रतिमा का निर्माण भूकंपरोधी तकनीक से किया गया है। इस पर 6.5 तीव्रता के भूकंप का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके अतिरिक्त 220 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलने वाली वायु पर इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत रविवार को आकाशवाणी से प्रसारित अपने मासिक कार्यक्रम ‘मन की बात‘ के 49वें संस्करण में कहा था कि इस बार सरदार पटेल की जयंती विशेष होगी, क्योंकि उस दिन गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर स्थापित उनकी दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा। यह प्रतिमा अमेरिका के स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दो गुनी ऊंची है। यह विश्व की सबसे ऊंची गगनचुम्बी प्रतिमा है। हर भारतीय इस बात पर अब गर्व कर पाएगा कि दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा भारत की धरती पर है। यह उन सरदार पटेल की मूर्ति है जो जमीन से जुड़े थे और अब आसमान की भी शोभा बढ़ाएंगे। मुझे आशा है कि देश का हर नागरिक ‘मां-भारती’ की इस महान उपलब्धि को लेकर विश्व के सामने गर्व के साथ सीना तानकर, सर ऊंचा करके इसका गौरवगान करेगा। मुझे विश्वास है हिन्दुस्तान के हर कोने से लोग, अब इसे भी अपने एक बहुत ही प्रिय गंतव्य स्थल के रूप में पसंद करेंगे। उन्होंने कहा कि जब देश आजाद हुआ था, उस समय हमारे सामने एक ऐसे भारत का नक्शा था जो कई भागों में बंटा हुआ था। भारत को लेकर अंग्रेजों की रुचि खत्म हो चुकी थी, लेकिन वो इस देश को छिन्न-भिन्न करके छोड़ना चाहते थे। देश के लिए उनकी ईमानदारी और प्रतिबद्धता ऐसी थी कि किसान, मजदूर से लेकर उद्योगपति तक, सब उन पर भरोसा करते थे। गांधी जी ने सरदार पटेल से कहा कि राज्यों की समस्याएं इतनी विकट हैं कि केवल आप ही इनका हल निकाल सकते हैं और सरदार पटेल ने एक-एक कर समाधान निकाला और देश को एकता के सूत्र में पिरोने के असंभव कार्य को पूरा कर दिखाया। उन्होंने सभी रियासतों का भारत में विलय कराया। चाहे जूनागढ़ हो या हैदराबाद, त्रावणकोर हो या फिर राजस्थान की रियासतें, वे सरदार पटेल ही थे जिनकी सूझबूझ और रणनीतिक कौशल से आज हम एक हिन्दुस्तान देख पा रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि सरदार पटेल ने माहात्मा गांधी से प्रेरित होकर देश स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया।
जब खेड़ा क्षेत्र में सूखा पड़ा और लोग भूखमरी के शिकार हो गए, तो वहां के किसानों ने ब्रिटिश सरकार से कर में छूट देने की मांग की। परंतु सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया। सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की अगुवाई में अन्य लोगों के साथ मिलकर किसानों के पक्ष में आंदोलन चलाया। अंत में आंदोलन सफल रहा और सरकार को झुकना पड़ा। बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिए उन्हें सरदार कहा गया। बाद में ’सरदार’ शब्द उनके नाम के साथ जुड़ गया।

सरदार पटेल की यह प्रतिमा भारत की एकता का प्रतीक है, जो भारतीय गौरव को आने वाली पीढ़ियों से परिचित कराती रहेगी। यह प्रतिमा हमें सरदार पटेल के विचारों से अवगत कराती रहेगी। उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहेगी। सरदार पटेल वे कहा करते थे-हमारे देश की मिट्टी में कुछ अनूठा है तभी तो कठिन बाधाओं के बावजूद हमेशा महान आत्माओ का निवास स्थान रहा है। वे यह भी कहते थे कि जब तक हमारा अंतिम ध्येय प्राप्त न हो तब तक हमें कष्ट सहने की शक्ति हमारे अंदर आती रहे यही हमारी सच्ची विजय है। त्याग के बारे में उनका कथन था- त्याग के सच्चे मूल्य का पता तभी चलता है, जब हमें अपनी सबसे कीमती चीज को भी त्यागना पड़ता है। जिसने अपने जीवन में कभी त्याग ही नहीं किया हो, उसे त्याग के मूल्य का क्या पता।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय एकता दिवस पहले नहीं था। नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल के जन्मदिवस 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाना प्रारंभ किया।

Wednesday, August 22, 2018

श्री लालजी टण्डन को बधाई


भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं लखनऊ के पूर्व सांसद श्री लालजी टण्डन जी को बिहार का राज्यपाल बनायें जाने की बधाई, शुभकामनाएं...
टण्डन जी बीजेपी के उन नेताओं में है जो अटल जी का अपार स्नेह पाए है। अटलजी पर केंद्रित पुस्तक लेखन से पूर्व चर्चा करते हुए।

जीते जी सम्मानों से बहुत परहेज करते थे अटल जी

वाजपेयी जी के जीवन पर आधारित पुस्तक ‘राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष: अटल बिहार वाजपेयी’ का एक अंश.
महाराष्ट्र की पुणे नगरपालिका द्वारा 23 जनवरी, 1982 को आयोजित गौरव सम्मान समारोह में अटल बिहारी वाजपेयी को सम्मानित किया गया. इस अवसर पर समारोह को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा, 'किन शब्दों में मैं अपने भावों को व्यक्त करूं. व्यक्त न करने का कारण या न कर पाने का कारण ये नहीं है कि मैं भावों से गद्गद हो गया हूं. कारण ये है कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि मेरा यह सम्मान किसलिए किया जा रहा है. मैं साठ वर्ष का हो गया हूं- क्या इसीलिए सम्मान हो रहा है? साठी बुद्धि नाठी. ये मराठी की म्हण (कहावत) है. हिन्दी में इसका दूसरा चरण है साठा सो पाठा. लेकिन अगर मैं जीवित हूं, तो साठ साल का होने वाला हूं. और जीवन तो किसी के हाथ में नहीं है. पता नहीं, उमर बढ़ती है या घटती है. नाना साहब यहां बैठे हैं- वे अस्सी साल के हो गये हैं, उन्होंने स्वयं आपको बताया है. वे सम्मान के अधिकारी हैं. खरात साहब लेखनी के धनी हैं. उनका अभिनन्दन किया जाये, तो स्वाभाविक है.'

'मोरे साहब से तो मेरी मुलाकात हाल में ही हुई है. वे लोकसभा में हैं और मैं परलोक सभा में हूं. राज्यसभा को लोग पार्लियामेंट नहीं मानते. मुझसे मिलने आते हैं-कहते हैं हमें पार्लियामेंट देखनी है. मैं कहता हूं, मैं राज्यसभा देखने का प्रबन्ध कर सकता हूं. तो राज्यसभा नहीं, लोकसभा देखनी है. तो मैं उन्हें पूछता हूं कि मैं यहां क्या कर रहा हूं? लेकिन यहां सबका भाषण सुनकर मुझे आनन्द हुआ. सब दलों के प्रतिनिधियों ने भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के प्रवक्ताओं ने मुझे अपने स्नेह का पात्र समझा, ये मेरे लिए कुछ नहीं तो जीवन का पाथेय है. मैं इसे स्नेह कहूंगा-क्योंकि जब स्नेह होता, तो दोष छिप जाते हैं और जो गुण नहीं होते हैं, उनका आविष्कार भी किया जाता है. अब नानासाहब मेरी तारीफ में कुछ कहें यह अच्छा नहीं. मुझे अब उनकी जितनी उम्र पाने के लिए बीस साल और जीना पड़ेगा. और आने वाला कल क्या लेकर आयेगा कोई नहीं जानता.'

सचमुच में व्यक्ति तब तक सम्मान का अधिकारी नहीं होता, जब तक कि जीवन की कथा का अन्तिम परिच्छेद नहीं लिखा जाता. कब, कहां, कौन फिसल जाये? जिन्दगी की सफेद चादर पर कब, कहां, कौन सा दाग लग जाये. इसीलिए मैं इसे मानपत्र नहीं मानता. पुणे के नागरिकों को मुझसे आशाएं हैं, अपेक्षाएं हैं, मैं इसे उसकी अभिव्यक्ति मानता हूं. जब कभी मेरे पांव डगमगाने को होंगे, होंगे तो नहीं, अगर कर्तव्य के पथ पर कभी आकर्षण मुझे बांधकर कर्तव्य के पथ से हटाने की कोशिश करेगा, तो आपका मानपत्र मुझे ये चेतावनी देता रहेगा. यह चेतावनी देता रहेगा कि पुणे नगर के निवासियों की आशा और अपेक्षाओं पर पानी फेरने का काम कभी मत करना.

मेरे लिए राजनीति सेवा का एक साधन है. परिवर्तन का माध्यम है. सत्ता सत्ता के लिए नहीं है. विरोध विरोध के लिए नहीं है. सत्ता सेवा के लिए है और विरोध सुधार के लिए-परिष्कार के लिए है. लोकशाही एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें बिना हिंसा के परिवर्तन लाया जा सकता है. आज सार्वजनिक जीवन में अस्पृश्यता बढ़ रही है, यह खेद का विषय है. लेकिन आज का समारोह मेरे मन में कुछ आशा जगाता है. मतभेद के बावजूद हम इकट्ठे हो सकते हैं. प्रामाणिक मतभेद रहेंगे. ‘पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना’. और मतों की टक्कर में ही भविष्य का पथ प्रशस्त होगा, लेकिन मतभेद एक बात है और मनभेद दूसरी बात है. मतभेद होना चाहिए, मनभेद नहीं होना चाहिए. आखिर तो इस देश का हृदय एक होना चाहिए.

उस दिन संसद में खड़ा था भारत के संविधान की चर्चा करने के लिए. हम भारत के लोग. संविधान में दलों का उल्लेख नहीं है. वैसे संसदीय लोकतन्त्र में दल आवश्यक है, अनिवार्य है. संविधान के प्रथम पृष्ठ पर अगर किसी का उल्लेख है- हम भारत के लोग. हम भारत के नागरिक नहीं है. हम इस देश के लोग, भारत के जन. अलग-अलग प्रदेशों में रहने वाले, अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले, अलग-अलग उपासना पद्धतियों का अवलम्बन करने वाले, मगर देश की मिट्टी के साथ अनन्य रूप से जुड़े हुए लोग. यहां की संस्कृति के उत्तराधिकारी और उसके सन्देश वाहक हैं. कोई फॉर्म भर कर नागरिकता प्राप्त कर सकता है, मगर देश का आत्मीय बनने के लिए, देश का जन बनने के लिए संस्कारों की आवश्यकता है-मिट्टी की अनन्य सम्पत्ति आवश्यक है.

मैं अमेरिका जाकर अमेरिका का नागरिक बन सकता हूं, मगर अमेरिकन नहीं बन सकता. इस राष्ट्रीयता का आधार संकुचित नहीं है, संकीर्ण है. स्मृतियां बदलती नहीं हैं. कुछ व्यवस्थाएं कालबाह्य जरूर हो जाती हैं. वे त्याज्य बन जाती हैं. उन्हें छोड़ देना चाहिए. दिल्ली से हम पुणे आते हैं, तो गरम कपड़े छोड़ आते हैं. समय आने पर काया भी बदली जा सकती है, मगर जीवन मूल्यों की आत्मा परिवर्तित नहीं होनी चाहिए.

हम स्वाधीन हुए, हमने अपना संविधान बनाया. उसमें संशोधन की गुंजाइश है और संशोधन की व्यवस्था संविधान में ही है. उसमें व्यक्ति की स्वाधीनता की धारणा है. धार्मिक स्वतन्त्रता है. व्यक्ति की महत्ता है. हमें लोकशाही चाहिए. लोकशाही को हम अक्षुण्ण रखेंगे. मगर स्वतन्त्रता के साथ हमें संयम भी चाहिए. समता के साथ हमें ममता भी चाहिए. अधिकार के साथ कर्तव्य भी चाहिए. और जैसा कि मैंने पहले कहा कि सत्ता के साथ सेवा भी चाहिए. संविधान में हमारे कर्तव्यों का भी उल्लेख है. वह बाद में किया गया था. जिस पृष्ठभूमि में किया गया था, वह ठीक नहीं था. लेकिन अधिकार के साथ कर्तव्य जुड़ा हुआ है. दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. अगर हमारे कुछ अधिकार हैं, तो इस देश के प्रति कुछ कर्तव्य भी हैं. अभी 26 जनवरी का त्योहार आने वाला है. आज 23 जनवरी है. नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्मदिन है. मैं उनको अपनी श्रद्धांजलि देना चाहता हूँ. स्वतन्त्रता संग्राम के सभी सेनानियों को हम श्रद्धा निवेदन करें. उनमें से जो जीवित हैं, हम उनका सम्मान करें.

महापौर महोदय, मैं आप से और आपके साथियों से कहना चाहूंगा- राजनीतिक नेताओं का ज्यादा सम्मान मत करिए. पहले ही वे जरूरत से ज्यादा रोशनी में रहते हैं. अब देखिए सारी रोशनी यहां जुटी हुई है और आप अंधेरे में बैठे हैं. राजनीति जीवन पर हावी हो गयी है. सम्मान होना चाहिए काश्तकारों का, कलाकारों का, वैज्ञानिकों का, रचनात्मक कार्यकर्ताओं का, जो उपेक्षित हैं उनका. कुष्ठ रोगियों के लिए जो आश्रम चला रहे हैं,उनका अभिनन्दन होना चाहिए. उनका वन्दन होना चाहिए. जनरल वैद्य रिटायर होकर आये. मैं नहीं जानता पुणे महानगर पालिका ने उनका अभिनन्दन किया था या नहीं. उनका अभिनन्दन होना चाहिए. कैसा विचित्र संयोग है. घटनाचक्र किस तरह से वक्र हो सकता है. जो सेनापति रणभूमि में शत्रुओं के टैंकों को भेदकर जीवित वापस चला आया, वह अपने देश में, अपने ही घर में, देश के कुछ गद्दारों के हाथों शहीद हुआ. मित्रों,हम परकीयों से परास्त नहीं हुए. हम तो अपनों से ही मार खाते रहे, मार खाते रहे. स्वर्गीय वैद्य का मरणोपरान्त भी सत्कार हो सकता है-समारोह हो सकता है. आज मैंने अपनी सुरक्षा का काफी प्रबन्ध पाया. मगर कहीं यह सुरक्षा पर्याप्त नहीं है. आज ये नौबत क्यों आ गयी? आम आदमी की सुरक्षा कहां है? मैं पंजाब जाता हूं. अनेक दलों के कार्यकर्ता मारे गये. और सचमुच मैंने साठ वर्ष पूरे कर लिए, इसके लिए पंजाब के आतंकवादियों को भी धन्यवाद देता हूं. जिनकी लिस्ट में मेरा भी नाम है. और वे कहीं भी, किसी पर भी हमला करने में समर्थ हैं. आम आदमी सुरक्षा का अनुभव कैसे करता है?

मित्रो, राजनीति को मूल्यों से नहीं जोड़ना चाहिए. यह मात्र सत्ता का खेल नहीं है. आज सचमुच में स्वस्थ परम्पराएं डालने का अवसर है, जो दल केन्द्र में सत्तारूढ़ है, वह अनेक प्रदेशों में प्रतिपक्ष में बैठा है. इससे वह प्रतिपक्ष के तकाजे को भी समझ सकता है और सत्ता के दायित्व को भी ठीक तरह से अनुभव कर सकता है. राजनीति में तो प्रतिस्पर्धा चलेगी. लेकिन एक मर्यादा होनी चाहिए, एक लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए. इस लक्ष्मण रेखा का अगर उल्लंघन किया जाये, हर प्रश्न को अगर वोट से जोड़ा जायेगा, हर समस्या का विचार अगर चुनाव में हानि या लाभ की दृष्टि से किया जायेगा, तो कहीं ऐसा न हो, सारे पुरखों के बलिदानों पर पानी फिर जाये और एक-दूसरे को मानपत्र देने की बजाय इतिहास कहीं हमारे लिए अपमान का पत्र छोड़कर न चला जाये. सचमुच में हम किसका सम्मान करें, किसे मानपत्र दें, कौन अधिकारी है.

किसी की आलोचना या दोषारोपण पर मैं भावुक होना नहीं चाहता. दो साल पहले सारे राष्ट्र में सन्ताप की लहर जगी थी. हम चुनाव में परास्त हुए थे. हमने अपनी पराजय को स्वीकार किया था. आज निराशा क्यों मन में डेरा डाल रही है? समस्याओं को मिलकर हल करना होगा. एक दूसरे की प्रामाणिकता पर सन्देह नहीं करना चाहिए. मतभेद रहेंगे. लेकिन ऐसी दीवार नहीं खड़ी होनी चाहिए, जो हमारे राष्ट्र जीवन का सारा तानाबाना तोड़ दे. जो सार्वजनिक जीवन में हैं उनके सामने निरन्तर ये द्वन्द्व चलता रहता है, यह श्रेय की साधना करें या प्रेय के पीछे दौड़ें? कभी-कभी जो हितकर है,वह लोकप्रिय नहीं होता. बीमार को कड़वी दवा अच्छी नहीं लगती. लेकिन मरीज का भला चाहने वाला उसको मिठाई नहीं खिलाता. अगर हम लोकप्रियता के पीछे दौड़ें और चुनौतियों का विस्मरण करें, तात्कालिक लाभ के लिए दूरगामी लाभ की बलि चढ़ा दें, और व्यक्ति या दल का विचार करते हुए हम राष्ट्र के तकाजों को, आवश्यकताओं को भूल जायें, तो आने वाला समय हमें कभी क्षमा नहीं करेगा.

महानगरपालिका हमारी स्वराज्य संस्थाओं का एक महत्त्वपूर्ण अंग है. हमारा सामाजिक जीवन पांच स्तम्भों पर खड़ा है. एक है परिवार, दूसरी पाठशाला, तीसरा पूजा गृह, चौथा धर्म और पांचवां पंचायत. ये पांच स्तम्भ हैं. पंचदीप हैं, जो व्यक्ति के निर्माण में, व्यक्ति के विकास में, समाज के गठन में, समाज को धारण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं. महानगरपालिका इसी महत्त्वपूर्ण पंचायत का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है. अच्छा होता अगर हम कॉर्पोरेशन की जगह नगर पंचायत कहते, महानगर पंचायत कहते. ग्राम पंचायत, तालुका पंचायत, जिला पंचायत, महानगर पंचायत. और असेम्बली को भी प्रदेश पंचायत कहा जा सकता था और पार्लियामेंट को राष्ट्रीय पंचायत.

महापौर महोदय, मुझे क्षमा करें, कॉर्पोरेशन को तो लोग अंग्रेजी में सही-सही कह भी नहीं सकते. वे कभी-कभी कह जाते हैं-करप्शन. एक जगह मैंने देखा वे कॉर्पोरेशन को कह रहे थे चोरपोरेशन-चोर्पोरेशन. मैंने कहा नहीं-नहीं, ये शुद्ध उच्चारण नहीं हैं, क्योंकि उच्चारण तो हम जानते हैं, पर हम कुछ और कहना चाहते हैं. पंचायत नाम अगर होता, तो इस तरह का भ्रम नहीं पैदा होता. हमारे जीवन से ज्यादा जुड़ जाता. हमने अपने संविधान में केन्द्र और प्रदेशों के बीच अधिकारों का, साधनों का बंटवारा नहीं किया. ये काम होना चाहिए-ये काम संविधान में छूट गया है. पंचायत का चलते-चलते उल्लेख काफी है. क्या म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन, म्युनिसिपलिटी और अन्य स्थानीय स्वराज्य संस्थाएं प्रदेश सरकार की दया पर होनी चाहिए? वह जब चाहे चुनाव करें, जब चाहें, चुनाव न करें. जब चाहे भंग कर दें, जब चाहे बहाल कर दें.

चुनाव का समय निश्चित होना चाहिए, अवधि तय होनी चाहिए. अधिकारों की व्याख्या होनी चाहिए, साधनों का ठीक तरह से बंटवारा होना चाहिए. शहर बढ़ रहे हैं, शहर फैल रहे हैं. रोजगार की तलाश में, औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप शहरीकरण हो रहा है-शहरों में लोग बड़ी संख्या में आ रहे हैं. नगर की सड़कें छोटी पड़ रही हैं, विद्यालयों में स्थान नहीं है, अस्पतालों में जगह नहीं है. पीने का पानी एक बड़ी समस्या बनने वाला है. क्या इसका दीर्घकालिक नियोजन आवश्यक नहीं? पंचायत कहां से पूंजी लाये?

अभी महापौर महोदय कह रहे थे, हमने कॉर्पोरेशन की तरफ से कुछ इमारतें बनायी हैं, दुकानें बनायी हैं. उनसे रुपया आने वाला है, कुछ किराया आयेगा. तो मैंने उन्हें बधाई दी कि आप और ऐसे काम करिए. तब वे मुझसे कहने लगे कि इस बारे में थोड़ा सरकार से हमारी तरफ से कहिए. मैंने कहा-मेरे कहने की क्या जरूरत है? अब तो आप स्वयं सरकार हैं. मगर एक बात मैं जानता हूं-सरकार के दरबार में महापौर की बात बड़ी मुश्किल से सुनी जायेगी, क्योंकि व्यवस्था ऐसी है, जो साधनों का ठीक तरह से बंटवारा नहीं करती. मध्य प्रदेश में ऑक्ट्रॉय खत्म हो गया. प्रदेश सरकार ने टैक्स लगा दिया, जो स्वयं इकट्ठा करती है और प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी है कि कॉर्पोरेशन को-म्युनिसिपलिटीज को उसमें से उचित हिस्सा दे. मगर नहीं दे रही है. ग्वालियर का हमारा कॉर्पोरेशन मुश्किल में है. इन्दौर में कठिनाई हो रही है. इसलिए मांग हो रही है कि ऑक्ट्रॉय खत्म मत करो. मैंने सुना है कि महाराष्ट्र में तो ऑक्ट्रॉय भी चल रहा है और टर्नओवर टैक्स भी चल रहा है. ऑक्ट्रॉय अगर खत्म कर दिया जाये, तो कॉर्पोरेशन का काम कैसे चलेगा? क्या आमदनी के और साधन बढ़ने नहीं चाहिए? कैसे बढ़ें? सत्ता का विकेन्द्रीकरण कीजिए. शक्तिशाली केन्द्र मगर सत्ता का विकेन्द्रीकरण. सुनने में अन्तर्विरोध दिखाई देता है, मगर अन्तर्विरोध नहीं है. और विकेन्द्रीकरण संविधान सम्मत है. प्रशासन में नागरिकों की भागीदारी जरूरी है. केवल पाँच साल में एक बार वोट देना पर्याप्त नहीं है. हर नागरिक प्रशासन में कैसे भागीदार बनेगा. इस पर विचार किया जा सकता है.

स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं में, स्वायत्त संस्थाओं में जो चुनाव की पद्धति है, उसमें कुछ परिवर्तन की अपेक्षा है. अभी क्षेत्र के अनुसार प्रतिनिधि चुने जाते हैं. क्या इसमें धन्धा लाया जा सकता है, व्यवसाय लाया जा सकता है? क्या मजदूरों को अलग से प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है? क्या किसानों के प्रतिनिधि के रूप में कोई आ सकते हैं? सोशलिज्म के साथ क्या हम गिल्ड सोशलिज्म पर विचार कर सकते हैं? ये विविधता से भरा हुआ समाज-बहुरंगी समाज, इसका कोई वर्ग अपने को उपेक्षित न समझे. शासन में भागीदार बनकर वह परिवर्तन प्रक्रिया में हिस्सा ले. सरकारिया कमीशन के सामने हमने इस तरह के विचार रखे. सारा विवाद खत्म हो गया मध्य प्रदेश और केन्द्र के बीच. प्रदेशों को भी अधिक वित्तीय साधन मिलना चाहिए,लेकिन सबसे बड़ी समस्या ये है कि राष्ट्र जीवन के कार्यों में, विकास के कार्यों में, नगर को स्वच्छ रखने के काम में, इसको हरित रखने के काम में,नागरिकों का सक्रिय सहयोग कैसे प्राप्त होगा? नागरिक चेतना कैसे जगाएँ? नगर को स्वच्छ, नगर को सुन्दर बनाने का काम देकर जन अभियान का रूप कैसे दें? हर चीज प्रशासन पर छोड़ दी जाती है. प्रशासन भी पंगु हो रहा है. क्या लोकशक्ति को जगाकर प्रशासन पर नियन्त्रण नहीं रखा जा सकता है? क्या ये सम्भव है कि प्रशासन को सबल भी किया जाये? नागरिक मूक दर्शक न बनें, बल्कि नागरिक इस खम्भे को टिकाने में भागीदार बनें, इस दृष्टि से विचार होना चाहिए.

मित्रो, हमारे राष्ट्र जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. नाना साहब अभी मुझसे बातचीत कर रहे थे और आपने उनके भाषण में भी सुना होगा, जो उनके मन में एक दर्द है, एक पीड़ा है. एक टीस है. ये दर्द उन सबके दिल में है, जो देश का भला चाहते हैं. स्वतन्त्रता के बाद हमारी उपलब्धियां कम नहीं हैं. मैं उन लोगों में से नहीं हूं, जो आलोचना के लिए आलोचना करूं. मैं प्रतिपक्ष में हूं, पहले भी पुणे में कह चुका हूं, स्वतन्त्रता के बाद हमने कुछ नहीं किया, ये कहना गलत होगा. लेकिन हम जितना कर सकते थे, उतना नहीं कर पाये. जिस तरह से करना चाहिए, उस तरह से नहीं कर पाये. तो क्या हिम्मत हार जायें? निराश हो जायें? हमने सपने देखे थे, आज सपने टूट गये तो क्या हुआ? हमें सपनों को उत्तराधिकार के रूप में नयी पीढ़ी को सौंपकर जाना है. सपने भंग होने के बाद भी साबुत रहते हैं. सपने टूट जाने के बाद भी जुड़ जाते हैं. आने वाली पीढ़ी को हम कौन से सपने उत्तराधिकार के रूप में सौंप कर जायें? आज भी देश में नौजवानों का बहुमत है. उनमें कुछ करने की उमंग है, उत्साह है. वे कुछ करें. हमारा सहयोग उन्हें होगा, हमारा समर्थन उन्हें मिलेगा. हमारा आशीर्वाद उन्हें मिलेगा. लेकिन क्रिया ऐसी होनी चाहिए, जो कल्याणकारी हो. हमारा चिन्तन ऐसा होना चाहिए, जो उदात्त हो. राजकारण ऐसा होना चाहिए, जो हमारे राष्ट्र जीवन के शाश्वत मूल्यों की वृद्धि कर सके. खरात साहब ने ठीक कहा, ‘अभी सामाजिक क्षेत्र में बहुत परिवर्तन की आवश्यकता है.’ वे अभी सालूपुर का उल्लेख कर कहे थे. शायद आपको मालूम नहीं है कि सालूपुर में जो हत्याकांड हुआ था, उसमें जो अभियुक्त पकड़े गये, उन पर अभी तक मुकदमा नहीं चलाया गया है, क्योंकि प्रशासन गवाह ढूंढ़ने में असमर्थ है. किसी को सजा नहीं मिली.

मैं उस दिन दिल्ली पहुंच गया था. हरिजन भाइयों का सामूहिक चिता में स्नान हो रहा था. एक ओर सूरज छुप रहा था, मानो सूरज शर्म से लाल मुंह करके भाग जाना चाहता था और दूसरी ओर सामूहिक चिता जल रही थी. क्या जन्म के कारण व्यक्ति को जीने का अधिकार नहीं होगा? सम्मान का अधिकार नहीं होगा? किस मुंह से हम दक्षिण अफ्रीका में होने वाले रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाएं? फिर भी उठा रहे हैं, उठाना चाहिए. लेकिन यहां तो रंग भी एक है, चमड़ी का रंग भी एक है, रक्त का रंग भी एक है. समाज को टुकड़ों में बांटकर, अलग-अलग खेमों में विभाजित करके, हम सारे संसार को एक परिवार मानते हैं. ऐसी ऊंची-ऊंची बातें नहीं कर सकते. और अगर करेंगे, तो इनका कोई असर नहीं होगा.

भगवान बुद्ध, महावीर, गांधी ने चाहे अहिंसा को परम धर्म माना हो. मनुष्य के जीवन में हिंसा का कोई मूल्य नहीं. पंजाब लहूलुहान पड़ा है. मैं मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि वे पराये हैं. जो आतंकवादी हैं, उन्हें सजा मिलनी चाहिए. उनको अलग-थलग किया जाना चाहिए. इसीलिए मैंने शब्द प्रयोग किया-समता पर आधारित ममत्व. ममतायुक्त समता. कथनी और करनी में बढ़ता हुआ अन्तर विश्व में भी हमारी विश्वसनीयता को कम कर रहा है. और देश के भीतर कदम-कदम पर कठिनाइयां पैदा कर रहा है. आवश्यकता इस बात की है कि हम समय की चुनौतियों को समझें और उन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए साहस जुटाएं, विवेक जुटाएं, शक्ति जुटाएं और छोटे-छोटे मतभेदों को ताक पर रखकर, ये गणतन्त्र चिरंजीवी हो इस तरह की व्यवस्था का विकास हो, इस तरह का प्रबन्ध करने की तैयारी हो.

आपने मुझे सम्मान का अधिकारी समझा, इसके लिए मैं आपको हृदय से धन्यवाद देना चाहता हूं. मैंने प्रयत्न किया है कि सारे देश का चित्र अपने सामने रख कर काम करूं. मैं जनता सरकार में विदेश मन्त्री बना, तब मैंने दो राजदूत प्रधानमन्त्री की सलाह से नियुक्त किये. एक नाना साहब और दूसरे थे नानी पालखीवाला. दोनों किसी पार्टी के नहीं थे. श्री कैलाशचन्द्र हमारे हाई-कमिश्नर होकर मॉरिशस में गये. मैंने ये कभी नहीं सोचा-’ये वेगले आहेत, ये वेगले आहेत. आपल्याच पैकी नाही. ये आपल्याच पैकी काय?’ और मैं उस दिन कश्मीरियों में बैठा था-तो कहने लगे, ये हमारी जाति वाले नहीं हैं-गैर जाति वाले हैं. अरे सब की एक ही जाति है. मनुष्य की एक ही जाति है. जाति जन्म से है. जन्म लेने की प्रक्रिया से है. सारे मनुष्य एक तरह से पैदा होते हैं और गधे दूसरी तरह से पैदा होते हैं. इसलिए जानवरों की अलग जाति है. और कहां मानव जाति का सपना. ’वसुधैव कुटुम्बकम्’ और कहां दल, और दल में भी गुट. जनता पार्टी टूट गयी-बड़ा दुख हुआ. मैं जानता हूं, हमारे कुछ मित्र इस दुख में सहभागी नहीं होंगे. वे सोचते हैं-टूट गया, तो अच्छा हुआ. मगर आप अपने को संभाल कर रखिए. ये टूटना इस देश की नियति हो गयी है. बिखरना हमारा स्वभाव बन गया है. अकारण झगड़ा करना, ऐसा लगता है कि हमारे खून में घुस गया है.

आज भारत अगर चाहे, तो संसार में प्रथम पंक्ति का राष्ट्र बन सकता है. फिर मैं कहना चाहूंगा कि परकीय हमारे पैर नहीं खींच रहे. हम अपने ही पैरों में बेड़ियां डाले हैं. इन्हें हम तोड़ने का संकल्प करें. राष्ट्र को मिलन भूमि मानकर व्यक्ति से ऊपर उठकर जरूरत हो तो दल से ऊपर उठकर- ’तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें.’ व्यक्ति तो नहीं रहेगा. किसी ने मुझसे पूछा था-आपका सपना क्या है? मैंने कहा- एक महान भारत की रचना. कहने लगे कि आपका सपना, क्या आपको भरोसा है कि आपके जीवन में पूरा हो पायेगा? मैंने कहा-नहीं होगा, लेकिन सपना पूरा करने के लिए फिर से इस देश में जन्म लेना पड़ेगा. मैं जन्म-मरण के चक्र से छूटना चाहता हूँ. लेकिन अगर मेरे देश की हालत सुधरती नहीं है, भारत एक महान-दिव्य-भव्य राष्ट्र नहीं बनता है, अगर हर व्यक्ति के लिए हम गरिमा की, स्वतन्त्रता की गारंटी नहीं कर सकते, अगर विविधताओं को बनाये रखते हुए एकता की रक्षा नहीं कर सकते, तो फिर दूसरा जन्म लेकर भी जूझने के लिए तैयार रहना पड़ेगा. मैं आपको हृदय से धन्यवाद देता हूं. परमात्मा मुझे शक्ति दे. आपने मुझसे जो आशाएं प्रकट की हैं, मैं उनको पूरा करने के लिए बल जुटा रहा हूं.
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं)

Thursday, August 16, 2018

शुभसंसन

लाल जी टंडन
अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व किसी एक दिशा में नहीं देखा जा सकता। वे एक राजनीतिज्ञ, संसदीय परंपराओं के ज्ञाता, लोकमर्यादा के आदर्श और देश की विभिन्न समस्याओं की धरातल तक की जानकारी रखने वाले नेता हैं। अटलजी को साहित्यकार कहा जाए, कवि कहा जाए या पत्रकार, समझ नहीं आता। वे विविध विधाओं से संपन्न व्यक्तित्व हैं अटल बिहारी वाजपेयी। वे एक ओजस्वी वक्ता हैं। उनकी भाषा शैली प्रभावशाली है, जिसे सुनकर, पढ़कर लोग उनके मुरीद हो जाते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी साहित्यिक भाषा अपने में एक अलग विधा है। उनके संपादकीय राष्ट्रवाद से ओतप्रोत हैं, जिनमें देश के ज्वलंत मुद्दों को उठाते हुए समाधान भी होता है। यह एक अनूठा उदहारण है। वीर अर्जुन, स्वदेश, राष्ट्रधर्म, पांचजन्य आदि में अटलजी ने कार्य किया। अटलजी की सक्रिय पत्रकारिता से समाज लाभान्वित हुआ है। मैं सौभाग्यशाली हूं कि अटलजी के साथ काम करने अवसर मिला। उनके साथ एक लम्बा समय व्यतीत किया है। अटलजी ने विषम परिस्थितियों में पत्रकारिता शुरू की थी।  उन्होंने राष्ट्रधर्म के प्रारंभिक दौर में छपाई की मशीन को खुद अपने हाथों से चलाने से लेकर वितरण तक सब कार्य किए। अटलजी की इसी जिजीविषा ने उन्हें भारतीय राजनीति में एक अच्छे मुकाम तक पहुंचाया।
डॉ। सौरभ मालवीय जी द्वारा लिखित पुस्तक सभी के प्रिय और हमारे आदर्श श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के पत्रकारीय और साहित्यिक पहलू को रेखांकित करती है तथा उनके जीवन का यह पक्ष लोगों के सामने लाने में सफल सिद्ध होती है। निश्चित तौर पर यह पुस्तक एक थाती है। मेरी हार्दिक शुभकामनाएं हैं कि आपकी यह पुस्तक अटलजी के विभिन्न उत्कृष्ट कार्यों और उनके व्यक्तित्व के विविध रूपों से पाठकों को अवगत कराते हुए पुस्तकों के संसार में अपनी एक अलग पहचान बनाए।

पुनः डॉ। सौरभ मालवीय जी को शुभकामनाएं।

अटल जी की यह अमूल्य धरोहर

हृदयनारायण दीक्षित
पूर्व प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी पर ढेर सारी पुस्तकें हैं। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व पर बहुत कुछ लिखा गया है। लेकिन उनके पत्रकारीय जीवन पर आधारित पुस्तक का प्रकाशन अनूठा है। श्रद्धेय अटल बिहारी बाजपेयी प्रखर राष्ट्रवादी नेता, श्रेष्ठ वक्ता, सर्वश्रेष्ठ सांसद और सफल प्रधानमंत्री रहे हैं। उनका राजनीतिक जीवन सभी के लिए प्रशंसनीय व अनुकरणीय है। उनका जीवन त्याग, तपस्या और राष्ट्र प्रेम से ओत प्रोत हैं। उनके जीवन का एक-एक क्षण भारत माता को समर्पित हैं। उनका व्यक्तित्व कृतित्व आनंदवर्द्धन है। श्री अटल जी का शिष्ट, सौम्य, अजातशत्रु स्वरूप बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता है। मुझे उनके निकट रहने का सौभाग्य मिला है। उनके चिंतन की गहनता, वैचारिक विविधता, प्रशासक की दृढ़ता सहज आकर्षण रही है। जनसंघ के संस्थापक से लेकर भारतीय जनता पार्टी को शिखर तक पहुंचाने में उनका योगदान प्रशंसनीय है। उनकी कविताओं में संवेदनशीलता है। उनकी लेखनी झकझोर कर रख देने वाली है। उनके विचार स्पष्ट हैं। भाषा तरल सरल विरल है। वे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और सीधे पत्रकारिता में आ गए थे। पत्रकारिता का चुनाव करना, उनके जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। उस समय पूरे देश में स्वतंत्रता की लहर चल रही थी। पत्रकार के रूप में उन्होंने अपने दायित्व का पूरी लगन और निष्ठा से पालन किया। अटल जी प्रतिभाशाली लेखक, उच्चकोटि के संपादक तथा विलक्षण प्रतिभा वाले सहृदय कवि हैं।
श्री अटल जी के पत्रकारीय जीवन पर पुस्तक लिखने का यह प्रयास निसंदेह सराहनीय है। अटल जी जैसे विराट व्यक्तित्व वाले लेखक, कवि और पत्रकार के कृतित्व को एक जगह संग्रहित करना कोई सरल कार्य नहीं है। विभिन्न विषयों राष्ट्र, समाज, संस्कृति आदि पर उनके लेखों को प्रस्तुत कर उसे पुस्तक का रूप देना दुरूह कार्य है। सौरभ जी इस अनुष्ठान में शत-प्रतिशत सफल रहे हैं। पुस्तक प्रेरक हैं। डॉ0 सौरभ मालवीय जी का वैचारिक धरातल स्पष्ट है। वे प्राध्यापक और प्रखर वक्ता हैं। इनकी यह कृति अभिनंदनीय है। शुभकामनाएं। इस पुस्तक से पत्रकारों, कवियों, पाठकों व लेखकों को प्रेरणा मिलेगी।

Thursday, August 9, 2018

सत्यम शिवम सुंदरम

डॊ. सौरभ मालवीय
सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है. भगवान शिव को देवों का देव महादेव भी कहा जाता है। भगवान शिव को आदि गुरु माना जाता है। भगवान शिव की आराधना का मूल मंत्र तो ऊं नम: शिवाय ही है, परंतु इस मंत्र के अतिरिक्त भी कुछ मंत्र हैं, जिनके जाप से भोले शंकर प्रसन्न हो जाते हैं। शिवरात्रि हिन्दुओं विशेषकर शिव भक्तों का प्रमुख त्योहार है। शिव रात्रि भगवान शिव को अतिप्रिय है। शिव पुराण के ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए थे-
फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥
मानयता यह भी है कि इसी दिन प्रलय आएगा, जब प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से नष्ट कर देंगे। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि भी कहा जाता है।

वर्ष में 12 शिवरात्रियां आती हैं। इनमें महाशिवरात्रि की सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। महाशिवरात्रि का पावन पर्व फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार अग्निलिंग के उदय के साथ इसी दिन सृष्टि का प्रारंभ हुआ था। यह भी मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ सम्पन्न हुआ था। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था, जो समुद्र मंथन के समय समुद्र से निकला था। इससे शिवशंकर का कंठ नीला हो गया था. इसीलिए उन्हें नीलकंठ नाम से भी जाना जाता है. शैव परंपरा की एक पौराणिक कथा के अनुसार, इस रात भगवान शिव ने संरक्षण और विनाश के स्वर्गीय नृत्य का सृजन किया था.

महाशिवरात्रि से संबंधित कई पौराणिक कथाएं हैं. एक कथा के अनुसार चित्रभानु नामक एक शिकारी था. वह वन्य पशुओं का शिकार करके अपना जीवन यापन करता था. एक बार महाशिवरात्रि के दिन अनजाने में उसने शिवकथा सुन ली. इसके बाद वह शिकार की खोज में वन में गया. वह बेल के वृक्ष के ऊपर चढ़कर शिकार की प्रतीक्षा करने लगा और अनजाने में बेल के पत्ते तोड़कर नीचे  फेंकने लगा. वृक्ष के नीचे घास-फूंस से ढका एक शिवलिंग था. बेलपत्र शिवलिंग पर गिरते रहे. इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसका ह्रदय निर्मल बना दिया. उसके मन से हिंसा के विचार समाप्त हो गया. वह वन में शिकार करने गया था, परंतु उसने चार हिरणों को जीवनदान दे दिया. इसके बाद उसके जीवन में परिवर्तन आ गया. यह कथा अहिंसा पर की शिक्षा देती है.

मान्यता है कि शिवरात्रि को ग्रहों की विशेष स्थिति होती है. इसके कारण मानव शरीर में ऊर्जा का एक शक्तिशाली पुंज प्रवेश करता है. इसलिए इस रात्रि में जागरण करना बहुत उत्तम माना गया है. इसी कारण शिवरात्रि के पर्व का उत्सव एक दिन पहले से ही प्रारंभ हो जाता है. भगवान शिव के मंदिरों में पूरी रात पूजा-अर्चना की जाती है. भक्तजन रात्रिभर कीर्तन करते हैं.  भक्तजन सूर्योदय के समय पवित्र स्थानों पर स्नान करते हैं. नदी किनारों पर भक्तों का तांता लग जाता है. स्नान के बाद भगवान शिव के मंदिरों में पूजा-अर्चना की जाती है. भक्त शिवलिंग की परिक्रमा करते हैं और फिर भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। भक्तजन शिवलिंग का जलाभिषेक या दुग्धाभिषेक करते हैं. शिवलिंग पर जल से जो अभिषेक जाता है, उसे जलाभिषेक कहा जाता है. इसी प्रकार शिवलिंग पर दूध से जो अभिषेक किया जाता है, उसे दुग्‍धाभिषेक  कहते हैं. शहद से भी अभिषेक किया जाता है. इसके अतिरिक्त शिवलिंग पर सिंदूर लगाया जाता है. सुगंधित धूप जलाई जाती है. दीपक जलाता जाता है. फल, अन्न और धन चढ़ाया जाता है. बेल पत्र और पान के पत्ते अर्पित किए जाते हैं. इनके अतिरिक्त वे वस्तुएं भी भगवान शिव को अर्पित करना चाहिए, जो उन्हें प्रिय हैं. धतूरा और धतूरे के पुष्प भगवान शिव को प्रिय हैं. मुक्तिदायिनी गंगा के जल का भी विशेष महत्व है, क्योंकि  गंगा देवलोक से भगवान श‌िव की जटा से होकर ही पृथ्वी लोक में उतरी हैं. इसील‌िए सभी नद‌ियों में गंगा का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। भक्तजन महाशिवरात्रि के दिन उपवास भी रखते हैं. कुछ लोग निर्जल रहकर भी उपवास करते हैं. कई स्थानों पर इस दिन भगवान शिव की बारात भी निकाली जाती है. इसमें कलाकार शिव-पार्वती का रूप धारण करते हैं. भक्तजन इसमें बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं. शिवरात्रि का महिलाओं के लिए विशेष महत्व है। विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं, जबकि अविवाहित लड़कियां भगवान शिव से अपने लिए सुयोग्य वर मांगती हैं. भगवान शिव को आदर्श पति के रूप में माना जाता है. लड़कियां सुयोग्य वर के लिए सोलह सोमवार का व्रत भी करती हैं.

महाशिवरात्रि पर ज्योतिर्लिंग पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग अर्थात प्रकाश के लिंग हैं. ये स्वयम्भू के रूप में जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है स्वयं उत्पन्न। इनमें गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित सोमनाथ शिवलिंग, मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग, मध्यप्रदेश के उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, मध्यप्रदेश के ही ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर स्थापित ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग, गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, बिहार के बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग, महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र के नासिक के समीप त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र के ही औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गांव में स्थापित घुमेश्वर ज्योतिर्लिंग, उत्तराखंड में हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग, उत्तर प्रदेश के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग एवं मद्रास में रामेश्वरम्‌ त्रिचनापल्ली समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग  सम्मिलित हैं.

भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी शिवरात्रि का पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है. त्योहार मनुष्य को पुण्य कर्मो की शिक्षा देते हैं. हमें समाज के हित के कार्य करने चाहिए. अपने सामर्थ्य के अनुसार मानव कल्याण के लिए अपना योगदान सबको देना चाहिए.

Wednesday, August 8, 2018

विदेश नीति : अटल बिहारी वाजपेयी के अनमोल विचार


  1. आप मित्र बदल सकते हैं, पर पड़ोसी नहीं. 
  2. नेपाल हमारा पड़ोसी देश है. दुनिया के कोई देश इतने निकट नहीं हो सकते, जितने भारत और नेपाल हैं.
  3. जो लोग हमें यह पूछते हैं कि हम कब पाकिस्तान के साथ वार्ता करेंगे, वे शायद इस तथ्य से वाकिफ नहीं हैं कि पिछले  वर्षों में पाकिस्तान के साथ बातचीत के लिए हर बार पहल भारत ने ही किया है.
  4. भारत में भारी जन भावना थी कि पाकिस्तान के साथ तब तक कोई सार्थक बातचीत नहीं हो सकती जब तक कि वह आतंकवाद का प्रयोग अपनी विदेशी नीति के एक साधन के रूप में करना नहीं छोड़ देता.
  5. सबके साथ दोस्ती करें, लेकिन राष्ट्र की शक्ति पर विश्वास रखें. राष्ट्र का हित इसी में है कि हम आर्थिक दृष्टि से सबल हों, सैन्य दृष्टि से स्वावलम्बी हों.
  6. पाकिस्तान कश्मीर, कश्मीरियों के लिए नहीं चाहता. वह कश्मीर चाहता है पाकिस्तान के लिए. वह कश्मीरियों को बलि का बकरा बनाना चाहता है.
  7. मैं पाकिस्तान से दोस्ती करने के खिलाफ नहीं हूं. सारा देश पाकिस्तान से संबंधों को सुधारना चाहता है, लेकिन जब तक कश्मीर पर पाकिस्तान का दावा कायम है, तब तक शांति नहीं हो सकती.
  8. पाकिस्तान हमें बार-बार उलझन में डाल रहा है, पर वह स्वयं उलझ जाता है. वह भारत के किरीट कश्मीर की ओर वक्र दृष्टि लगाए है. कश्मीर भारत का अंग है और रहेगा. हमें पाकिस्तान से साफ-साफ कह देना चाहिए कि वह कश्मीर को हथियाने का इरादा छोड़ दे.
  9. हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव के कल्याण तथा उसकी कीर्ति के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे पग नहीं हटाएंगे.
  10. कौन हमारे साथ है? कौन हमारा मित्र है? इस विदेश नीति ने हमको मित्रविहीन बना दिया है. यह विदेश नीति राष्ट्रीय हितों का संरक्षण करने में विफल रही है. इस विदेश नीति पर पुनर्विचार होना चाहिए. कल्पना के लोक से उतरकर हम अपनी विदेश नीति का निर्धारण करें.
  11. इस संसार में यदि स्वाधीनता की, अखंडता की रक्षा करनी है, तो शक्ति के और शस्त्रों के बल पर होगी, हवाई सिद्धांतों के जरिए नहीं.
  12. आज परस्पर वैश्विक निर्भरता का मतलब है कि विकासशील देशों में आर्थिक आपदायें, विकसित देशों पर एक प्रतिक्षेप पैदा कर सकता है.
  13. किसी भी देश को खुले आम आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक गठबंधन के साथ साझेदारी, सहायता, उकसाना और आतंकवाद प्रायोजित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.
  14. पहले एक दृढ विश्वास था कि संयुक्त राष्ट्र अपने घटक राज्यों की कुल शक्ति की तुलना में अधिक मजबूत होगा.
  15. वास्तविकता यह है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी केवल उतनी ही प्रभावी हो सकती है, जितनी उसके सदस्यों की अनुमति है.
  16. वैश्विक स्तर पर आज परस्पर निर्भरता का मतलब विकासशील देशों में आर्थिक आपदाओं का विकसित देशों पर प्रतिघात करना होगा.
  17. शीत युद्ध के बाद अब एक गलत धारणा यह बन गई है कि संयुक्त राष्ट्र कहीं भी कोई भी समस्या का समाधान कर सकता है.
  18. संयुक्त राष्ट्र की अद्वितीय वैधता इस सार्वभौमिक धारणा में निहित है कि वह किसी विशेष देश या देशों के समूह के हितों की तुलना में एक बड़े उद्देश्य के लिए काम करता है.
  19. हम मानते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका और शेष अंतर्राष्ट्रीय समुदाये पाकिस्तान पर भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद को हमेशा के लिए खत्म करने का दबाव बना सकते हैं.
  20. हमारे परमाणु हथियार विशुद्ध रूप से किसी विरोधी के परमाणु हमले को हतोत्साहित करने के लिए हैं.
  21. एटम बम का जवाब क्या है? एटम बम का जवाब एटम बम है और कोई जवाब नहीं.
  22. हमें विश्वास है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और बाकी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के भारत के विरुद्ध सीमा पार आतंकवाद को स्थायी और पारदर्शी रूप से खत्म कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा सकते हैं.
  23. हम उम्मीद करते हैं कि विश्व प्रबुद्ध स्वार्थ की भावना से काम करेगा.
  24. किसी भी देश को आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक साझदारी का हिस्सा होने का ढोंग नहीं करना चाहिए , जबकि वह आतंकवाद को बढ़ाने, उकसाने, और प्रायोजित करने में लगा हुआ हो.
  25. आज वैश्विक निर्भरता का अर्थ यह है कि विकासशील देशों में आई आर्थिक आपदाएं विकसित देशों में संकट ला सकती हैं.
  26. राज्य को, व्यक्तिगत सम्पत्ति को जब चाहे तब जब्त कर लेने का अधिकार देना एक खतरनाक चीज होगी.
  27. संयुक्त राष्ट्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि वह समरत मानवता का सबल स्वर बन सके और देशों के बीच एक-दूसरे पर अवलम्बित सामूहिक सहयोग का गतिशील माध्यम बन सके.
  28. कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकता है कि देश मूल्यों के संकट में फंसा है.
  29. इस देश में पुरुषार्थी नवजवानों की कमी नहीं है, लेकिन उनमें से कोई कार बनाने का कारखाना नहीं खोल सकता, क्योंकि किसी को प्रधानमंत्री के घर में जन्म लेने का सौभाग्य नहीं प्राप्त है.
  30. यदि भारत को बहुराष्ट्रीय राज्य के रूप में वर्णित करने की प्रवृत्ति को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो भारत के अनेक टुकड़ों में बंट जानै का खतरा पैदा हो जाएगा.
  31. इतिहास में हुई भूल के लिए आज किसी से बदला लेने का समय नहीं है, लेकिन उस भूल को ठीक करने का सवाल है.
  32. एटम बम का जवाब क्या है? एटम बम का जवाब एटम बम है और कोई जवाब नहीं.
  33. भारत की सुरक्षा की अवधारणा सैनिक शक्ति नहीं है. भारत अनुभव करता है सुरक्षा आंतरिक शक्ति से आती है.
  34. अगर हम देशभक्त न होते और अगर हम निःस्वार्थ भाव से राजनीति में अपना स्थान बनाने का प्रयास न करते और हमारे इन प्रयासों के साथ इतने साल की साधना न होती तो हम यहां तक न पहुंचते.
  35. सेना के उन जवानों का अभिनन्दन होना चाहिए, जिन्होंने अपने रक्त से विजय की गाथा लिखी. विजय का सर्वाधिक श्रेय अगर किसी को दिया जा सकता है, तो हमारे बहादुर जवानों को और उनके कुशल सेनापतियों को. अभी मुझे ऐसा सैनिक मिलना बाकी है, जिसकी पीठ में गोली का निशान हो. जितने भी गोली के निशान हैं, सब निशान सामने लगे हैं. अगर अपनी सेनाओं या रेजिमेंटों के नाम हमें रखने हैं, तो राजपूत रेजिमेंट के स्थान पर राणा प्रताप रेजिमेंट रखें, मराठा रेजिमेंट के स्थान पर शिवाजी रेजिमेंट और ताना रेजिमेंट रखे, सिख रेजिमेंट की जगह रणजीत सिंह रेजिमेंट रखें.

कृषि : अटल बिहारी वाजपेयी के अनमोल विचार


  • खेती भारत का बुनियादी उद्योग है.
  • अन्न उत्पादन द्वारा आत्मनिर्भरता के बिना हम न तो औद्योगिक विकास का सुदृढ़ ढांचा ही तैयार कर सकते है और न विदेशों पर अपनी खतरनाक निर्भरता ही समाप्त कर सकते हैं.
  • हमारा कृषि-विकास संतुलित नहीं है और न उसे स्थायी ही माना जा सकता है.
  • कृषि-विकास का एक चिंताजनक पहलू यह है कि पैदावार बढ़ते ही दामों में गिरावट आने लगती है.

शिक्षा : अटल बिहारी वाजपेयी के अनमोल विचार


  1. शिक्षा आज व्यापार बन गई है. ऐसी दशा में उसमें प्राणवत्ता कहां रहेगी? उपनिषदों या अन्य प्राचीन ग्रंथों की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता. आज विद्यालयों में छात्र थोक में आते हैं. 
  2. शिक्षा के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है. व्यक्तित्व के उत्तम विकास के लिए शिक्षा का स्वरूप आदर्शों से युक्त होना चाहिए. हमारी माटी में आदर्शों की कमी नहीं है. शिक्षा द्वारा ही हम नवयुवकों में राष्ट्रप्रेम की भावना जाग्रत कर सकते हैं.
  3. मुझे शिक्षकों का मान-सम्मान करने में गर्व की अनुभूति होती है. अध्यापकों को शासन द्वारा प्रोत्साहन मिलना चाहिए. प्राचीनकाल में अध्यापक का बहत सम्मान था. आज तो अध्यापक पिस रहा है.
  4. किशोरों को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है. आरक्षण के कारण योग्यता व्यर्थ हो गई है. छात्रों का प्रवेश विद्यालयों में नहीं हो पा रहा है. किसी को शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता. यह मौलिक अधिकार है.
  5. निरक्षरता का और निर्धनता का बड़ा गहरा संबंध है.
  6. वर्तमान शिक्षा-पद्धति की विकृतियों से, उसके दोषों से, कमियों से सारा देश परिचित है. मगर नई शिक्षा-नीति कहां है? 
  7. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए. ऊंची-से-ऊंची शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से दी जानी चाहिए .
  8. मोटे तौर पर शिक्षा रोजगार या धंधे से जुड़ी होनी चाहिए. वह राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में सहायक हो और व्यक्ति को सुसंस्कारित करे.

दरिद्रता : अटल बिहारी वाजपेयी के अनमोल विचार


  1. गरीबी बहुआयामी है. यह पैसे की आय से परे शिक्षा, स्वास्थ्य की देखरेख, राजनीतिक भागीदारी और व्यक्ति की अपनी संस्कृति और सामाजिक संगठन की उन्नति तक फैली हुई है.
  2. दरिद्र में जिन्होंने पूर्ण नारायण के दर्शन किए और उन नारायण की उपासना का उपदेश दिया, उनका अंतःकरण करुणा से भरा हुआ था. गरीबी, बेकारी, भुखमरी ईश्वर का विधान नहीं, मानवीय व्यवस्था की विफलता का परिणाम है.
  3. नर को नारायण का रूप देने वाले भारत ने दरिद्र और लक्ष्मीवान, दोनों में एक ही परम तत्व का दर्शन किया है.
  4. दरिद्रता का सर्वथा उन्मूलन कर हमें प्रत्येक व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुसार कार्य लेना चाहिए और उसकी आवश्यकता के अनुसार उसे देना चाहिए.


जातिवाद : अटल बिहारी वाजपेयी के अनमोल विचार


  1. मनुष्य-मनुष्य के संबंध अच्छे रहें, सांप्रदायिक सद्भाव रहे, मजहब का शोषण न किया जाए, जाति के आधार पर लोगों की हीन भावना को उत्तेजित न किया जाए, इसमें कोई मतभेद नहीं है.
  2. जातिवाद का जहर समाज के हर वर्ग में पहुंच रहा है. यह स्थिति सबके लिए चिंताजनक है. हमें सामाजिक समता भी चाहिए और सामाजिक समरसता भी चाहिए.
  3. समता के साथ ममता, अधिकार के साथ आत्मीयता, वैभव के साथ सादगी-नवनिर्माण के प्राचीन आधार स्तंभ हैं. इन्हीं स्तम्भों पर हमें भावी भारत का भवन खड़ा करना है.
  4. अगर परमात्मा भी आ जाए और कहे कि छुआछूत मानो, तो मैं ऐसे परमात्मा को भी मानने को तैयार नहीं हूं किंतु परमात्मा ऐसा कह ही नहीं सकता.
  5. मानव और मानव के बीच में जो भेद की दीवारें खड़ी हैं, उनको ढहाना होगा, और इसके लिए एक राष्ट्रीय अभियान की आवश्यकता है.
  6. अस्पृश्यता कानून के विरुद्ध ही नहीं, वह परमात्मा तथा मानवता के विरुद्ध भी एक गंभीर अपराध है.
  7. मनुष्य-मनुष्य के बीच में भेदभाव का व्यवहार चल रहा है. इस समस्या को हल करने के लिए हमें एक राष्ट्रीय अभियान की आवश्यकता है.
  8. हरिजनों के कल्याण के साथ गिरिजनों तथा अन्य कबीलों की दशा सुधारने का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है.
  9. आदिवासियों की समस्याओं पर हमें सहानुभूति के साथ विचार करना होगा.
  10. पारस्परिक सहकारिता और त्याग की प्रवृत्ति को बल देकर ही मानव-समाज प्रगति और समृद्धि का पूरा-पूरा लाभ उठा सकता है.
  11. सेवा-कार्यों की उम्मीद सरकार से नहीं की जा सकती. उसके लिए समाज-सेवी संस्थाओं को ही आगे उगना पड़ेगा.


लोकतंत्र : अटल बिहारी वाजपेयी के अनमोल विचार


  1. हमारा लोकतंत्र संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. लोकतंत्र की परंपरा हमारे यहां बड़ी प्राचीन है.. चालीस साल से ऊपर का मेरा संसद का अनुभव कभी-कभी मुझे बहुत पीड़ित कर देता है. हम किधर जा रहे हैं?
  2. भारत के लोग जिस संविधान को आत्म समर्पित कर चुके हैं, उसे विकृत करने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता.
  3. लोकतंत्र बड़ा नाजुक पौधा है. लोकतंत्र को धीरे- धीरे विकसित करना होगा. केन्द्र को सबको साथ लेकर चलने की भावना से आगे बढ़ना होगा.
  4. अगर किसी को दल बदलना है, तो उसे जनता की नजर के सामने दल बदलना चाहिए. उसमें जनता का सामना करने का साहस होना चाहिए. हमारे लोकतंत्र को तभी शक्ति मिलेगी, जब हम दल बदलने वालों को जनता का सामना करने का साहस जुटाने की सलाह देंगे.
  5. हमें अपनी स्वाधीनता को अमर बनाना है, राष्ट्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखना है और विश्व में स्वाभिमान और सम्मान के साथ जीवित रहना है.
  6. लोकतंत्र वह व्यवस्था है, जिसमें बिना घृणा जगाए विरोध किया जा सकता है और बिना हिंसा का आश्रय लिए शासन बदला जा सकता है.
  7. राजनीति सर्वांग जीवन नहीं है. उसका एक पहलू है. यही शिक्षा हमने पाई है, यही संस्कार हमने पाए हैं.
  8. कोई भी दल हो, पूजा का कोई भी स्थान हो, उसको अपनी राजनीतिक गतिविधियां वहां नहीं चलानी चाहिए.
  9. राजनीति काजल की कोठरी है. जो इसमें जाता है, काला होकर ही निकलता है. ऐसी राजनीतिक व्यवस्था में ईमानदार होकर भी सक्रिय रहना, बेदाग छवि बनाए रखना, क्या कठिन नहीं हो गया है? 
  10. कर्सी की मुझे कोई कामना नहीं है. मुझे उन पर दया उगती है, जो विरोधी दल में बैठने का सम्मान छोड़कर कुर्सी की कामना से लालायित होकर सरकारी पार्टी का पन्तु पकड़ने के लिए लालायित हैं.

हिन्दी : अटल बिहारी वाजपेयी के अनमोल विचार


  1. भारत की जितनी भी भाषाएं हैं, वे हमारी भाषाएं हैं, वे हमारी अपनी हैं, उनमें हमारी आत्मा का प्रतिबिम्ब है, वे हमारी आत्माभिव्यक्ति का साधन हैं. उनमें कोई छोटी-बड़ी नहीं है.
  2. भारतीय भाषाओं को लाने का निर्णय एक क्रांतिकारी निर्णय है, लेकिन अगर उससे देश की एकता खतरे में पड़ती है, तो अहिन्दी प्रांत वाले अंग्रेजी चलाएं, मगर हम पटना में, जयपुर में, लखनऊ में अंग्रेजी नहीं चलने देंगे.
  3. राष्ट्र की सच्ची एकता तब पैदा होगी, जब भारतीय भाषाएं अपना स्थान ग्रहण करेंगी.
  4. हिन्दी का किसी भारतीय भाषा से झगड़ा नहीं है. हिन्दी सभी भारतीय भाषाओं को विकसित देखना चाहती है, लेकिन यह निर्णय संविधान सभा का है कि हिन्दी केन्द्र की भाषा बने.
  5. अंग्रेजी केवल हिन्दी की दुश्मन नहीं है, अंग्रेजी हर एक भारतीय भाषा के विकास के मार्ग में, हमारी संस्कृति की उन्नति के मार्ग में रोड़ा है. जो लोग अंग्रेजी के द्वारा राष्ट्रीय एकता की रक्षा करना चाहते हैं वे राष्ट्र की एकता का मतलब नहीं समझते.
  6. हिन्दी की कितनी दयनीय स्थिति है, यह उस दिन भली-भांति पता लग गया, जब भारत-पाक समझौते की हिन्दी प्रति न तो संसद सदस्यों को और न हिन्दी पत्रकारों को उपलब्ध कराई गई.
  7. हिन्दी वालों को चाहिए कि हिन्दी प्रदेशों में हिन्दी को पूरी तरह जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रतिष्ठित करें.
  8. हिन्दी को अपनाने का फैसला केवल हिन्दी वालों ने ही नहीं किया. हिन्दी की आवाज पहले अहिन्दी प्रान्तों से उठी. स्वामी दयानन्दजी, महात्मा गांधी या बंगाल के नेता हिन्दीभाषी नहीं थे. हिन्दी हमारी आजादी के आन्दोलन का एक कार्यक्रम बनी.


धर्म और संस्कृति : अटल बिहारी वाजपेयी के अनमोल विचार

  1. हिन्दू धर्म तथा संस्कृति की एक बड़ी विशेषता समय के साथ बदलने की उसकी क्षमता रही है.
  2. हिन्दू धर्म के प्रति मेरे आकर्षण का सबसे मुख्य कारण है कि यह मानव का सर्वोत्कृष्ट धर्म है.
  3. हिन्दू धर्म ऐसा जीवन्त धर्म है, जो धार्मिक अनुभवों की वृद्धि और उसके आचरण की चेतना के साथ निरंतर विकास करता रहता है.
  4. हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन का न प्रारंभ है और न अंत ही. यह एक अनंत चक्र है.
  5. मुझे अपने हिन्दूत्व पर अभिमान है, किंतु इसका उरर्थ यह नहीं है कि मैं मुस्तिम-विरोधी हूं. 
  6. हमें हिन्दू कहलाने में गर्व महसूस करना चाहिए, बशर्ते कि हम भारतीय होने में भी आत्मगौरव महसूस करें. 
  7. हिन्दू समाज इतना विशाल है, इतना विविध है कि किसी बैंक में नहीं समा सकता.
  8. हिन्दू समाज गतिशील है, हिंदू समाज में परिवर्तन हुए हैं, परिवर्तन की प्रक्रिया चल रही है. हिन्दू समाज जड़ समाज नहीं है.
  9. भारत के ऋषियों-महर्षियों ने जिस एकात्मक जीवन के ताने-बाने को बुना था, आज वह उपेक्षा तथा उपहास का विषय बनाया जा रहा है.
  10. भारतीय संस्कृति कभी किसी एक उपासना पद्धति से बंधी नहीं रही और न उसका आधार प्रादेशिक रहा.
  11. उपासना, मत और ईश्वर संबंधी विश्वास की स्वतंत्रता भारतीय संस्कृति की परम्परा रही है.
  12. मजहब बदलने से न राष्ट्रीयता बदलती है और न संस्कृति में परिवर्तन होता.
  13. सभ्यता कलेवर है, संस्कृति उसका अन्तरंग. सभ्यता स्थूल होती है, संस्कृति सूक्ष्म. सभ्यता समय के साथ बदलती है, किंतु संस्कृति अधिक स्थायी होती है.
  14. इंसान बनो, केवल नाम से नहीं, रूप से नहीं, शक्ल से नहीं, हृदय से, बुद्धि से, सरकार से, ज्ञान से.
  15. जीवन के फूल को पूर्ण ताकत से खिलाएं.
  16. मनुष्य जीवन अनमोल निधि है, पुण्य का प्रसाद है. हम केवल अपने लिए न जिएं, औरों के लिए भी जिएं. जीवन जीना एक कला है, एक विज्ञान है. दोनों का समन्वय आवश्यक है.
  17. समता के साथ ममता, अधिकार के साथ आत्मीयता, वैभव के साथ सादगी-नवनिर्माण के प्राचीन स्तंभ हैं.
  18. मैं अपनी सीमाओं से परिचित हूं. मुझे अपनी कमियों का अहसास है. सद्भाव में अभाव दिखाई नहीं देता है. यह देश बड़ा ही अद्भुत है, बड़ा अनूठा है. किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा सकता है, अभिनन्दन किया जा सकता है.
  19. भगवान जो कुछ करता है, वह भलाई के लिए ही करता है.
  20. परमात्मा एक ही है, लेकिन उसकी प्राप्ति के अनेकानेक मार्ग हैं.
  21. जीवन को टुकड़ों में नहीं बांटा जा सकता, उसका ‘पूर्णता’ में ही विचार किया जाना चाहिए.
  22. मैं हिन्दू परंपरा में गर्व महसूस करता हूं, लेकिन मुझे भारतीय परंपरा में और ज्यादा गर्व है.
  23. सदा से ही हमारी धार्मिक और दार्शनिक विचारधारा का केन्द्र बिंदु व्यक्ति रहा है. हमारे धर्मग्रंथों और महाकाव्यों में सदैव यह संदेश निहित रहा है कि समस्त ब्रह्मांड और सृष्टि का मूल व्यक्ति औरउसका संपूर्ण विकास है.
  24. राष्ट्रशक्ति को अपमानित करने का मूल्य रावण को अपने दस शीशों के रूप में सव्याज चुकाना पड़ा. असुरों की लंका भारत के पावन चरणों में भक्तिभाव से भरकर कन्दकली की भांति सुशोभित हुई. धर्म की स्थापना हुई, अधर्म का नाश हुआ.

राष्ट्र : अटल बिहारी वाजपेयी के अनमोल विचार

  1. निराशा की अमावस की गहन निशा के अंधकार में हम अपना मस्तक आत्म-गौरव के साथ तनिक 
  2. ऊंचा उठाकर देखें. विश्व के गगनमंडल पर हमारी कलित कीर्ति के असंख्य दीपक जल रहे हैं.
  3. अमावस के अभेद्य अंधकार का अंतःकरण पूर्णिमा की उज्ज्वलता का स्मरण कर थर्रा उठता है.
  4. इतिहास ने, भूगोल ने, परंपरा ने, संस्कृति ने, धर्म ने, नदियों ने हमें आपस में बांधा है.
  5. भारतीय जहां जाता है, वहां लक्ष्मी की साधना में लग जाता है. मगर इस देश में उगते ही ऐसा लगता है कि उसकी प्रतिभा कुंठित हो जाती है. भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता-जागता राष्ट्रपुरुष है. हिमालय इसका मस्तक है, गौरीशंकर शिखा है. कश्मीर किरीट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं. दिल्ली इसका दिल है. विन्ध्याचल कटि है, नर्मदा करधनी है. पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघाएं हैं. कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है. पावस के काले-काले मेघ इसके कुंतल केश हैं. चांद और सूरज इसकी आरती उतारते हैं, मलयानिल चंवर घुलता है. यह वन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है. यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है. इसका कंकर-कंकर शंकर है, इसका बिंदु-बिंदु गंगाजल है. हम जिएंगे तो इसके लिए, मरेंगे तो इसके लिए.
  6. कंधे-से-कंधा लगाकर, कदम-से-कदम मिलाकर हमें अपनी जीवन-यात्रा को ध्येय-सिद्धि के शिखर तक ले जाना है. भावी भारत हमारे प्रयत्नों और परिश्रम पर निर्भर करता है. हम अपना कर्तव्य पालन करें, हमारी सफलता सुनिश्चित है.
  7. देश को हमसे बड़ी आशाएं हैं. हम परिस्थिति की चुनौती को स्वीकार करें. आखों में एक महान भारत के सपने, हृदय में उस सपने को सत्य सृष्टि में परिणत करने के लिए प्रयत्नों की पराकाष्ठा करने का संकल्प, भुजाओं में समूची भारतीय जनता को समेटकर उसे सीने से लगाए रखने का सात्त्विक बल और पैरों में युग-परिवर्तन की गति लेकर हमें चलना है.
  8. भारत एक प्राचीन राष्ट्र है.  अगस्त, को किसी नए राष्ट्र का जन्म नहीं, इस प्राचीन राष्ट्र को ही स्वतंत्रता मिली.
  9. पौरुष, पराक्रम, वीरता हमारे रक्त के रंग में मिली है. यह हमारी महान परंपरा का अंग है. यह संस्कारों द्वारा हमारे जीवन में ढाली जाती है.
  10. इस देश में कभी मजहब के आधार पर, मत-भिन्नता के उगधार पर उत्पीड़न की बात नहीं उठी, न उठेगी, न उठनी चाहिए.
  11. भारत के प्रति अनन्य निष्ठा रखने वाले सभी भारतीय एक हैं, फिर उनका मजहब, भाषा तथा प्रदेश कोई भी क्यों न हो.
  12. भारत कोई इतना छोटा देश नहीं है कि कोई उसको जेब में रख ले और वह उसका पिछलग्गू हो जाए. हम अपनी आजादी के लिए लड़े, दुनिया की आजादी के लिए लड़े.
  13. दुर्गा समाज की संघटित शक्ति की प्रतीक है. व्यक्तिगत और पारिवारिक स्वार्थ-साधना को एक ओर रखकर हमें राष्ट्र की आकांक्षा प्रदीप्त करनी होगी. दलगत स्वार्थों की सीमा छोड़कर विशाल राष्ट्र की हित-चिंता में अपना जीवन लगाना होगा. हमारी विजिगीषु वृत्ति हमारे अंदर अनंत गतिमय कर्मचेतना उत्पन्न करे
  14. राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है.
  15. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैला हुआ यह भारत एक राष्ट्र है, अनेक राष्ट्रीयताओं का समूह नहीं.
  16. मैं चाहता हूं भारत एक महान राष्ट्र बने, शक्तिशाली बने, संसार के राष्ट्रों में प्रथम पंक्ति में आए.
  17. राजनीति की दृष्टि से हमारे बीच में कोई भी मतभेद हो, जहां तक राष्ट्रीय सुरक्षा और रचतंत्रता के संरक्षण का प्रश्न है, सारा भारत एक है और किसी भी संकट का सामना हम सब पूर्ण शक्ति के साथ करेंगे.
  18. यह संघर्ष जितने बलिदान की मांग करेगा, वे बलिदान दिए जाएंगे, जितने अनुशासन का तकाजा होगा, यह देश उतने अनुशासन का परिचय देगा.
  19. देश एक रहेगा तो किसी एक पार्टी की वजह से एक नहीं रहेगा, किसी एक व्यक्ति की वजह से एक नहीं रहेगा, किसी एक परिवार की वजह से एक नहीं रहेगा. देश एक रहेगा तो देश की जनता की देशभक्ति की वजह से रहेगा.
  20. शहीदों का रक्त अभी गीला है और चिता की राख में चिनगारियां बाकी हैं. उजड़े हुए सुहाग और जंजीरों में जकड़ी हुई जवानियां उन अत्याचारों की गवाह हैं.
  21. देश एक मंदिर है, हम पुजारी हैं. राष्ट्रदेव की पूजा में हमें अपने को समर्पित कर देना चाहिए. 
  22. भारतीयकरण का एक ही अर्थ है भारत में रहने वाले सभी व्यक्ति, चाहे उनकी भाषा कछ भी हो, वह भारत के प्रति अनन्य, अविभाज्य, अव्यभिचारी निष्ठा रखें.
  23. भारतीयकरण आधुनिकीकरण का विरोधी नहीं है. न भारतीयकरण एक बंधी-बंधाई परिकल्पना है.
  24. भारतीयकरण एक नारा नहीं है . यह राष्ट्रीय पुनर्जागरण का मंत्र है. भारत में रहने वाले सभी व्यक्ति भारत के प्रति अनन्य, अविभाज्य, अव्यभिचारी निष्ठा रखें. भारत पहले आना चाहिए, बाकी सब कुछ बाद में.
  25. हम अहिंसा में आस्था रखते हैं और चाहते हैं कि विश्व के संघर्षों का समाधान शांति और समझौते के मार्ग से हो. अहिंसा की भावना उसी में होती है, जिसकी आत्मा में सत्य बैठा होता है, जो समभाव से सभी को देखता है.

Tuesday, June 5, 2018

भारतीय संस्कृति और पर्यावरण

डॊ. सौरभ मालवीय
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसी कारण भारत में प्रकृति के विभिन्न अंगों को देवता तुल्य मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। भूमि को माता माना जाता है। आकाश को भी उच्च स्थान प्राप्त है। वृक्षों की पूजा की जाती है। पीपल को पूजा जाता है। पंचवटी की पूजा होती है। घरों में तुलसी को पूजने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। नदियों को माता मानकर पूजा जाता है। कुंआ पूजन होता है। अग्नि और वायु के प्रति भी लोगों के मन में श्रद्धा है। वेदों के अनुसार ब्रह्मांड का निर्माण पंचतत्व के योग से हुआ है, जिनमें पृथ्वी, वायु, आकाश, जल एवं अग्नि सम्मिलित है।
इमानि पंचमहाभूतानि पृथिवीं, वायुः, आकाशः, आपज्योतिषि

पृथ्वी ही वह ग्रह है, जहां पर जीवन है। वेदों में पृथ्वी को माता और आकाश को पिता कहा गया है।
ऋग्वेद के अनुसार-
द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्
अर्थात् आकाश मेरे पिता हैं, बंधु वातावरण मेरी नाभि है, और यह महान पृथ्वी मेरी माता है।

अथर्ववेद में भी पृथ्वी को माता के रूप में पूजने की बात कही गई है। अथर्ववेद के अनुसार-
माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः

इतना ही नहीं वेदों में सभी जीवों की रक्षा का भी कामना की गई है। ऋग्वेद के अनुसार–
पिता माता च भुवनानि रक्षतः

जल जीवन के लिए अति आवश्यक है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
वेदों में जल को अमृत कहा गया है।
अमृत वा आपः

जल ही है, जो मनुष्य के तन और मन के मैल को धोता है। तन और मन को पवित्र करता है।
इदमाप: प्र वहत यत् किं च दुरितं मयि
यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेष उतानृतम्
अर्थात हे जल देवता, मुझसे जो भी पाप हुआ हो, उसे मुझसे दूर बहा दो अथवा मुझसे जो भी द्रोह हुआ हो, मेरे किसी कृत्य से किसी को कष्ट हुआ हो अथवा मैंने किसी को अपशब्द कहे हों, अथवा असत्य वचन बोले हों, तो वह सब भी दूर बहा दो।

वेदों में जल को सखदायी बताया गया है। साथ ही जल के शोधन की बात भी कही गई है।
आपोSअस्मान् मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्व: पुनन्तु
विश्व हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्य: शुचिरा पूतSएमि
दीक्षातपसोस्तनूरसि तां त्वा शिवा शग्मां परिदधे भद्रं वर्णम पुष्यन
अर्थात मनुष्य को चाहिए कि जो सब सुखों को देने वाला, प्राणों को धारण करने वाला एवं माता के समान, पालन-पोषण करने वाला जो जल है, उससे शुचिता को प्राप्त कर, जल का शोधन करने के पश्चात ही, उसका उपयोग करना चाहिए, जिससे देह को सुंदर वर्ण, रोग मुक्त देह प्राप्त कर, अनवरत उपक्रम सहित, धार्मिक अनुष्ठान करते हुए अपने पुरुषार्थ से आनंद की प्राप्ति हो सके।

वेदों में स्वच्छ एवं शुद्ध जल को स्वस्थ जीवन के लिए अति आवश्यक माना गया है। अथर्ववेद के अनुसार-
शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु

जीवन के लिए वायु अति आवश्यक है। वेदों में वायु के महत्व का उल्लेख किया गया है। ऋग्वेद के अनुसार-
वायुर्ड वा प्राणो भूत्वा शरीरमाविशत्

वेदों में वायु का शुद्धता पर बल देते हुए कहा गया है कि जीवन के लिए शुद्ध एवं प्रदूषण रहित वायु अति आवश्यक है।
वात आ वातु भेषतं शंभु मयोभु नो हृदे

वेदों में वृक्षों की महत्ता पर भी प्रकाश डाला गया है। वृक्षों में देवताओं का वास माना जाता है।
मूलतो ब्रम्हरूपाय मधयतो विष्णुरूपिणें
अग्रत: शिवरूपाय वृक्षराजाए ते नम:
अर्थात वृक्ष के मूल में ब्रम्हा, मध्य में भग्वान विष्णु और शिरोभाग में शिव का वास होता है।

वेदों में वनस्पतियों से पूर्ण वनदेवी की पूजा की गई है. ऋग्वेद में कहा गया है-
आजनगन्धिं सुरभि बहवन्नामड्डषीवलाम्
प्राहं मृगाणां मातररमण्याभिशंसिषम्
अर्थात अब मैं वनदेवी की पूजा करता हूं, जो मधुर सुगंध परिपूर्ण है और सभी वनस्पतियों की माता है और भोजन का भंडार है।

निसंदेह, हमारी भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को बहुत महत्व दिया गया है, किन्तु आज प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। परिणाम स्वरूप पर्यावरण असंतुलन उत्पन्न हो गया है, जिससे प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं। पर्यावरण असंतुलन से बचने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों का उतना ही दोहन करे, जितनी उसे आवश्यकता है. ईशावस्योपनिषत् के अनुसार-
ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किच जगत्यां जगत्
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्वि नम्

वेदों में पर्यावरण संरक्षण पर बल दिया गया है। यजुर्वेद के अनुसार-
पृथिवी मातर्मा हिंसी मा अहं त्वाम्
अर्थात मैं पृथ्वी सम्पदा को हानि न पहुंचाऊं

ऋग्वेद में समग्र पृथ्वी की स्वच्छता पर बल देते हुए कहा गया है-
पृथ्वीः पूः च उर्वी भव:
अर्थात समग्र पृथ्वी, सम्पूर्ण परिवेश परिशुद्ध रहे।
यदि हमारी पृथ्वी स्वच्छ रहेगी, तो हमारा जीवन भी सुखदायी होगा। जीवन के सम्यक विकास के लिए पर्यावरण का स्वच्छ रहना नितांत आवश्यक है।

Thursday, May 24, 2018

हिन्दी गजल और दुष्यंत कुमार

डॊ. सौरभ मालवीय
हिन्दी गजल हिन्दी साहित्य की एक नई विधा है. नई विधा इसलिए है, क्योंकि गजल मूलत फारसी की काव्य विधा है. फारसी से यह उर्दू में आई. गजल उर्दू भाषा की आत्मा है. गजल का अर्थ है प्रेमी-प्रेमिका का वार्तालाप. आरंभ में गजल प्रेम की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम थी, किन्तु समय बीतने के साथ-साथ इसमें बदलाव आया और प्रेम के अतिरिक्त अन्य विषय भी इसमें सम्मिलित हो गए. आज हिन्दी गजल ने अपनी पहचान बना ली है. हिन्दी गजल को शिखर तक पहुंचाने में समकालीन कवि दुष्यंत कुमार की भूमिका सराहनीय रही है. वे दुष्यंत कुमार ही हैं, जिन्होंने हिन्दी गजल की रचना कर इसे विशेष पहचान दिलाई.

दुष्यंत कुमार का जन्म 1 सितम्बर, 1933 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के गांव राजपुर नवादा में हुआ था. उनका पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी था. उन्होंने इलाहबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी. उन्होंने आकाशवाणी भोपाल में सहायक निर्माता के रूप में कार्य शुरू किया था. प्रारंभ में वे परदेशी के नाम से लिखा करते थे, किन्तु बाद में वे अपने ही नाम से लिखने लगे. वे साहित्य की कई विधाओं में लेखन करते थे. उन्होंने कई उपन्यास लिखे, जिनमें सूर्य का स्वागत, आवाजों के घेरे, जलते हुए वन का बसंत, छोटे-छोटे सवाल, आंगन में एक वृक्ष, दुहरी जिंदगी सम्मिलित हैं. उन्होंने एक मसीहा मर गया नामक नाटक भी लिखा. उन्होंने काव्य नाटक एक कंठ विषपायी की भी रचना की. उन्होंने लघुकथाएं भी लिखीं. उनके इस संग्रह का नाम मन के कोण है.  उनका गजल संग्रह साये में धूप बहुत लोकप्रिय हुआ.

दुष्यंत कुमार की गजलों में उनके समय की परिस्थितियों का वर्णन मिलता है. वे केवल प्रेम की बात नहीं करते, अपितु अपने आसपास के परिवेश को अपनी गजल का विषय बनाते है. वे कहते हैं-
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा
यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा
यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने वहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा

उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भ्रष्टाचार का उल्लेख किया. वे कहते हैं-
इस सड़क पर इस कद्र कीचड़ बिछी है
हर किसी का पांव घुटने तक सना है

शासन-प्रशासन की व्यवस्था पर भी वे कटाक्ष करते हैं. वे कहते हैं-
भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दा

वे सामाजिक परिस्थितियों पर भी अपनी लेखनी चलाते हैं. समाज में पनप रही संवेदनहीनता और मानवीय संवेदनाओं के ह्रास पर वे कहते हैं-
इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां

वे पलायनवादी कवि नहीं हैं. उन्होंने परिस्थितियों के दबाव में पलायन को नहीं चुना. वे हर विपरीत परिस्थिति में धैर्य के साथ आगे बढ़ने की बात करते हैं. उनका मानना था कि अगर साहस के साथ मुकाबला किया जाए, तो कोई शक्ति आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती. वे कहते हैं-
एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों
इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है
कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालों यारों

वास्तव में दुष्यंत कुमार आम आदमी के कवि हैं. उन्होंने आम लोगों की पीड़ा को अपनी गजलों में स्थान दिया. उनके दुखों को गहराई से अनुभव किया. वे कहते हैं-
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

वे एक ऐसे समाज की कल्पना करते थे, जिसमें कोई अभाव में न रहे. किन्तु देश में गरीबी है. लोग अभाव में जीवन व्यतीत कर रहे हैं. उन्हें भरपेट खाने को भी नहीं मिलता. इन परिस्थतियों से दुष्यंत कुमार कराह उठते हैं. वे कहते हैं-
कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए
कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए
जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

दुष्यंत कुमार ने बहुत कम समय में वह लोकप्रियता प्राप्त कर ली थी, जो हर किसी को नहीं मिलती. किन्तु नियति के क्रूर हाथों ने उन्हें छीन लिया. उनका निधन 30 दिसम्बर, 1975 में हुआ. केवल 42 वर्ष की अवस्था में हिन्दी गजल का एक नक्षत्र हमेशा के लिए अस्त हो गया. हिन्दी साहित्य जगत में उनकी कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता.

Thursday, April 12, 2018

सामाजिक क्रांति के अग्रदूत : बाबासाहेब आंबेडकर

डॊ. सौरभ मालवीय
सामाजिक समता, सामाजिक न्याय, सामाजिक अभिसरण जैसे समाज परिवर्तन के मुद्दों को प्रमुखता से स्वर देने और परिणाम तक लाने वाले प्रमुख लोगों में डॊ. भीमराव आंबेडकर का नाम अग्रणीय है. उन्हें बाबा साहेब के नाम से जाना जाता है. एकात्म समाज निर्माण, सामाजिक समस्याओं, अस्पृश्यता जैसे सामजिक मसले पर उनका मन संवेदनशील एवं व्यापक था.  उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ऊंच-नीच, भेदभाव, छुआछूत के उन्मूलन के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया.  वे कहा करते थे- एक महान आदमी एक आम आदमी से इस तरह से अलग है कि वह समाज का सेवक बनने को तैयार रहता है.

4 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महू में जन्मे भीमराव आंबेडकर रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की चौदहवीं संतान थे. वह हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो अछूत कहे जाते थे. इसके कारण उनके साथ समाज में भेदभाव किया जाता था. उनके पिता भारतीय सेना में सेवारत थे. पहले भीमराव का उपनाम सकपाल था, लेकिन उनके पिता ने अपने मूल गांव अंबाडवे के नाम पर उनका उपनाम अंबावडेकर लिखवाया, जो बाद में आंबेडकर हो गया.
पिता की स्वानिवृति के बाद उनका परिवार महाराष्ट्र के सतारा में चला गया. उनकी मां की मृत्यु के बाद उनके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया और बॉम्बे में जाकर बस गए. यहीं उन्होंने शिक्षा ग्रहण की. वर्ष 1906 में मात्र 15 वर्ष की आयु में उनका विवाह नौ वर्षीय रमाबाई से कर दिया गया. वर्ष 1908 में उन्होंने बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की. विद्यालय की शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने बॉम्बे के एल्फिनस्टोन कॉलेज में दाखिला लिया. उन्हें गायकवाड़ के राजा सहयाजी से 25 रुपये मासिक की स्कॉलरशिप मिलने लगी थी.
वर्ष 1912 में उन्होंने राजनीति विज्ञान व अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि ली.  इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका चले गए. वर्ष 1916 में उन्हें उनके एक शोध के लिए पीएचडी से सम्मानित किया गया. इसके बाद वह लंदन चले गए, किन्तु उन्हें बीच में ही लौटना पड़ा. आजीविका के लिए इस समयावधि में उन्होंने कई कार्य किए. वह मुंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स में राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्राध्यापक भी रहे. इसके पश्चात एक बार फिर वह इंग्लैंड चले गए. वर्ष 1923 में उन्होंने अपना शोध ’रुपये की समस्याएं’ पूरा कर लिया. उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा ’डॉक्टर ऑफ साईंस’ की उपाधि प्रदान की गई.  उन्हें ब्रिटिश बार में बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया. स्वदेश वापस लौटते हुए भीमराव आंबेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके और बॉन विश्वविद्यालय में  उन्होंने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन जारी रखा. उन्हें  8 जून, 1927 कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी प्रदान की गई.

भीमराव आंबेडकर को बचपन से ही अस्पृश्यता से जूझना पड़ा. विद्यालय से लेकर नौकरी करने तक उनके साथ भेदभाव किया जाता रहा.  इस भेदभाव और निरादर ने उनके मन को बहुत ठेस पहुंचाई. उन्होंने छूआछूत के समूल नाश के लिए कार्य करने का प्रण लिया. उन्होंने कहा कि नीची जाति व जनजाति एवं दलित के लिए देश में एक भिन्न चुनाव प्रणाली होनी चाहिए. उन्होंने देशभर में घूम-घूम कर दलितों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई और लोगों को जागरूक करने का कार्य किया. उन्होंने एक समाचार-पत्र ‘मूक्नायका’ (लीडर ऑफ़ साइलेंट) प्रारंभ किया. एक बार उनके भाषण से प्रभावित होकर कोल्हापुर के शासक शाहूकर ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया, जिसकी देशभर में चर्चा हुई. इस घटना ने भारतीय राजनीति को एक नया आयाम दिया.

वर्ष 1936 में भीमराव आंबेडकर ने स्वतंत्र मजदूर पार्टी की स्थापना की. अगले वर्ष 1937 के केन्द्रीय विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 15 सीटों पर विजय प्राप्त की. उन्होंने इस दल को ऒल इंडिया शिड्यूल कास्ट पार्टी में परिवर्तित कर दिया. वह वर्ष 1946 में संविधान सभा के चुनाव में खड़े हुए, किन्तु उन्हें असफलता मिली. वह रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे. वह देश के पहले कानून मंत्री बने. उन्हें संविधान गठन समिति का अध्यक्ष बनाया गया.

भीमराव आंबेडकर समानता पर विशेष बल देते थे. वह कहते थे- अगर देश की अलग अलग जाति एक दुसरे से अपनी लड़ाई समाप्त नहीं करेंगी, तो देश एकजुट कभी नहीं हो सकता. यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्म-शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए. हमारे पास यह आजादी इसलिए है ताकि हम उन चीजों को सुधार सकें, जो सामाजिक व्यवस्था, असमानता, भेदभाव और अन्य चीजों से भरी है जो हमारे मौलिक अधिकारों के विरोधी हैं. एक सफल क्रांति के लिए केवल असंतोष का होना ही काफी नहीं है बल्कि इसके लिए न्याय, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों में गहरी आस्था का होना भी बहुत आवश्यक है. राजनीतिक अत्याचार सामाजिक अत्याचार की तुलना में कुछ भी नहीं है और जो सुधारक समाज की अवज्ञा करता है, वह सरकार की अवज्ञा करने वाले राजनीतिज्ञ से ज्यादा साहसी हैं. जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते तब तक आपको कानून चाहे जो भी स्वतंत्रता देता है वह आपके किसी काम की नहीं.यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्म-शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए.

भीमराव आंबेडकर का बचपन परिवार के अत्यंत संस्कारी एवं धार्मिक वातावरण में बीता था. उनके घर में रामायण, पाण्डव प्रताप, ज्ञानेश्वरी व अन्य संत वांग्मय के नित्य पाठन होते थे, जिसके कारण उन्हें श्रेष्ठ संस्कार मिले. वह कहते थे- मैं एक ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाई-चारा सिखाये. वर्ष 1950 में वह एक बौद्धिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका गए, जहां वह बौद्ध धर्म से अत्यधिक प्रभावित हुए. स्वदेश वापसी पर उन्होंने बौद्ध व उनके धर्म के बारे में पुस्तक लिखी. उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया. उन्होंने वर्ष 1955 में भारतीय बौध्या महासभा की स्थापना की. उन्होंने 14 अक्टूबर, 1956 को एक आम सभा का आयोजन किया, जिसमें उनके पांच लाख समर्थकों ने  बौद्ध धर्म अपनाया. इसके कुछ समय पश्चात 6 दिसम्बर, 1956 को दिल्ली में उनका निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार बौद्ध धर्म की रीति के अनुसार किया गया. वर्ष 1990 में मरणोपरांत उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान  भारत रत्न से सम्मानित किया गया. कई भाषाओं के ज्ञाता बाबासाहब ने अनेक पुस्तकें भी लिखी हैं.

बाबासाहब ने जीवनपर्यंत छूआछूत का विरोध किया. उन्होंने दलित समाज के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए सरहानीय कार्य किए. वह कहते है कि आप स्वयं को अस्पृस्य न मानें, अपना घर साफ रखें.  पुराने और घिनौने रीति-रिवाजों को छोड़ देना चाहिए.
निसंदेह, देश उनके योगदान को कभी भुला नहीं पाएगा.

Saturday, March 17, 2018

भारतीय नववर्ष : सृष्टि की रचना का दिन


डॊ. सौरभ मालवीय
नव रात्र हवन के झोके, सुरभित करते जनमन को।
है शक्तिपूत भारत, अब कुचलो आतंकी फन को॥
नव सम्वत् पर संस्कृति का, सादर वन्दन करते हैं।
हो अमित ख्याति भारत की, हम अभिनन्दन करते हैं॥
18 मार्च विक्रम संवत 2075 का प्रारंभ हो रहा है. भारतीय पंचांग में हर नवीन संवत्सर को एक विशेष नाम से जाना जाता है. इस वर्ष इस नवीन संवत्सर का नाम विरोधकर्त है. भारतीय संस्कृति में विक्रम संवत का बहुत महत्व है. चैत्र का महीना भारतीय कैलंडर के हिसाब से वर्ष का प्रथम महीना है. नवीन संवत्सर के संबंध में अन्य पौराणिक कथाएं हैं. वैदिक पुराण एवं शास्त्रों के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को आदिशक्ति प्रकट हुईं थी. आदिशक्ति के आदेश पर ब्रह्मा ने सृष्टि की प्रारंभ की थी. इसीलिए इस दिन को अनादिकाल से नववर्ष के रूप में जाना जाता है. मान्यता यह भी है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था. इसी दिन सतयुग का प्रारंभ  हुआ था. इसी तिथि को राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी. विजय को चिर स्थायी बनाने के लिए उन्होंने विक्रम संवत का शुभारंभ किया था, तभी से विक्रम संवत चली आ रही है. इसी दिन से महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और साल की गणना कर पंचांग की रचना की थी.

सृष्टि की सर्वाधिक उत्कृष्ट काल गणना का श्रीगणेश भारतीय ऋषियों ने अति प्राचीन काल से ही कर दिया था. तदनुसार हमारे सौरमंडल की आयु चार अरब 32 करोड़ वर्ष हैं. आधुनिक विज्ञान भी, कार्बन डेटिंग और हॉफ लाइफ पीरियड की सहायता से इसे चार अरब वर्ष पुराना मान रहा है. यही नहीं हमारी इस पृथ्वी की आयु भी 2018 मार्च को, एक अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार एक सौ 23 वर्ष पूरी हो गई. इतना ही नहीं, श्रीमद्भागवद पुराण, श्री मारकंडेय पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार अभिशेत् बाराह कल्प चल रहा है और एक कल्प में एक हजार चतुरयुग होते है. इस खगोल शास्त्रीय गणना के अनुसार हमारी पृथ्वी 14 मनवंतरों में से सातवें वैवस्वत मनवंतर के 28वें चतुरयुगी के  अंतिम चरण कलयुग भी. आज 51 सौ 18 वर्ष में प्रवेश कर लिया.जिस दिन सृष्टि का प्रारंभ हुआ, वह आज ही का पवित्र दिन है. इसी कारण मदुराई के परम पावन शक्तिपीठ मीनाक्षी देवी के मंदिर में चैत्र पर्व की परंपरा बन गई.

भारतीय महीनों के नाम जिस महीने की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में पड़ती है, उसी के नाम पर पड़ा. जैसे इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं, इसलिए इसे चैत्र महीने का नाम हुआ. श्रीमद्भागवत के द्वादश  स्कंध के द्वितीय अध्याय के अनुसार जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर यह उसी समय से कलयुग का प्रारंभ हुआ, महाभारत और भागवत के इस खगोलीय गणना को आधार मान कर विश्वविख्यात डॉ. वेली ने यह निष्कर्ष दिया है कि कलयुग का प्रारंभ 3102 बी.सी. की रात दो बजकर 20 मिनट 30 सेकेंड पर हुआ था. डॉ. बेली महोदय आश्चर्य चकित है कि अत्यंत प्रागैतिहासिक काल में भी भारतीय ऋणियों ने इतनी सूक्ष्तम और सटीक गणना कैसे कर ली. क्रांति वृंत पर 12 हो महीने की सीमाएं तय करने के लिए आकाश में 30-30 अंश के 12 भाग किए गए और नाम भी तारा मंडलों की आकृतियों के आधार पर रखे गए. जो मेष, वृष, मिथुन इत्यादित 12 राशियां बनीं.

चूंकि सूर्य क्रांति मंडल के ठीक केंद्र में नहीं हैं, अत: कोणों के निकट धरती सूर्य की प्रदक्षिणा 28 दिन में कर लेती है और जब अधिक भाग वाले पक्ष में 32 दिन लगता है. प्रति तीन वर्ष में एक मास अधिक मास कहलाता है. संयोग से यह अधिक मास अगले महीने ही प्रारंभ हो रहा है.
भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि सदियों-सदियों तक एक पल का भी अंतर नहीं पड़ता, जबकि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365.2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते हैं. इस प्रकार प्रत्येक चार वर्ष में फरवरी महीने को लीप ईयर घोषित कर देते हैं फिर भी. नौ मिनट 11 सेकेंड का समय बच जाता है, तो प्रत्येक चार सौ वर्षों में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है, तब भी पूर्णाकन नहीं हो पाता है. अभी 10 साल पहले ही पेरिस के अंतर्राष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकेंड स्लो कर दिया गया. फिर भी 22 सेकेंड का समय अधिक चल रहा है. यह पेरिस की वही प्रयोगशाला है, जहां के सीजीएस सिस्टम से संसार भर के सारे मानक तय किए जाते हैं. रोमन कैलेंडर में तो पहले 10 ही महीने होते थे. किंगनुमापाजुलियस ने 355 दिनों का ही वर्ष माना था, जिसे जुलियस सीजर ने 365 दिन घोषित कर दिया और उसी के नाम पर एक महीना जुलाई बनाया गया. उसके एक सौ साल बाद किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्ट भी बढ़ाया गया. चूंकि ये दोनों राजा थे, इसलिए इनके नाम वाले महीनों के दिन 31 ही रखे गए. आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यह कितनी हास्यास्पद बात है कि लगातार दो महीने के दिन समान हैं, जबकि अन्य महीनों में ऐसा नहीं है. यदि नहीं जिसे हम अंग्रेजी कैलेंडर का नौवां महीना सितंबर कहते हैं, दसवां महीना अक्टूबर कहते हैं, ग्यारहवां महीना नवंबर और बारहवां महीना दिसंबर हैं. इनके शब्दों के अर्थ भी लैटिन भाषा में 7,8,9 और 10 होते हैं. भाषा विज्ञानियों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमुच सितंबर का अर्थ सप्ताम्बर था, आकाश का सातवां भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवंबर तो नवमअम्बर और दिसंबर दशाम्बर है.

सन् 1608 में एक संवैधानिक परिवर्तन द्वारा एक जनवरी को नव वर्ष घोषित किया गया. जेनदअवेस्ता के अनुसार धरती की आयु 12 हजार वर्ष है, जबकि बाइबिल केवल दो हजार वर्ष पुराना मानता है. चीनी कैलेंडर एक करोड़ वर्ष पुराना मानता है, जबकि खताईमत के अनुसार इस धरती की आयु 8 करोड़ 88 लाख 40 हजार तीन सौ 18 वर्षों की है. चालडियन कैलेंडर धरती को दो करोड़ 15 लाख वर्ष पुराना मानता है. फीनीसयन इसे मात्र 30 हजार वर्ष की बताते हैं. सीसरो के अनुसार यह 4 लाख 80 हजार वर्ष पुरानी है. सूर्य सिद्धांत और सिद्धांत शिरोमाणि आदि ग्रंथों में चैत्रशुक्ल प्रतिपदा रविवार का दिन ही सृष्टि का प्रथम दिन माना गया है.

संस्कृत के होरा शब्द से ही, अंग्रेजी का आवर (Hour) शब्द बना है. इस प्रकार यह सिद्ध हो रहा है कि वर्ष प्रतिपदा ही नव वर्ष का प्रथम दिन है. एक जनवरी को नव वर्ष मनाने वाले दोहरी भूल के शिकार होते हैं, क्योंकि भारत में जब 31 दिसंबर की रात को 12 बजता है, तो ब्रिटेन में सायंकाल होता है, जो कि नव वर्ष की पहली सुबह हो ही नहीं सकता. और जब उनका एक जनवरी का सूर्योदय होता है, तो यहां के Happy New Year वालों का नशा उतर चुका रहता है. सनसनाती हुई ठंडी हवायें कितना भी सुरा डालने पर शरीर को गरम नहीं कर पाती हैं. ऐसे में सवेरे सवेरे नहा धोकर भगवान सूर्य की पूजा करना तो अत्यंत दुष्कर रहता है. वही पर भारतीय नव वर्ष में वातावरण अत्यंत मनोहारी रहता है. केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु जड़ चेतना नर-नाग यक्ष रक्ष किन्नर-गंधर्व, पशु-पक्षी लता, पादप, नदी नद, देवी, देव, मानव से समष्टि तक सब प्रसन्न होकर उस परम शक्ति के स्वागत में सन्नध रहते हैं.
दिवस सुनहले रात रूपहली उषा सांझ की लाली छन-छन कर पत्तों में बनती हुई चांदनी जाली. शीतल मंद सुगंध पवन वातावरण में हवन की सुरभि कर देते हैं. ऐसे ही शुभ वातावरण में जब मध्य दिवस अतिशित न धामा की स्थिति बनती है, तो अखिल लोकनायक श्रीराम का अवतार होता है. आइए इस शुभ अवसर पर हम भारत को पुन: जगतगुरू के पद पर आसीन करने में कृत संकल्प हों.

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस वर्ष के राजा सूर्य हैं और शनि मंत्री होंगे. यह वर्ष सभी के लिए काफी सुखद रहेगा. उल्लेखनीय है कि ज्योतिष विद्या में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र प्रतिपदा से ही की जाती है. मान्यता है कि नव संवत्सर के दिन नीम की कोमल पत्तियों और पुष्पों का मिश्रण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, मिश्री, जीरा और अजवाइन मिलाकर उसका सेवन करने से शरीर स्वस्थ रहता है. इस दिन आंवले का सेवन भी बहुत लाभदायद बताया गया है. माना जाता है कि आंवला नवमीं को जगत पिता ने सृष्टि पर पहला सृजन पौधे के रूप में किया था. यह पौधा आंवले का था. इस तिथि को पवित्र माना जाता है. इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है.
निसंदेह, जब भारतीय नववर्ष का प्रारंभ होता है, तो चहुंओर प्रकृति चहक उठती है. भारत की बात ही निराली है.
कवि श्री जयशंकर प्रसाद के शब्दों में-
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जहां पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा
अरुण यह मधुमय देश हमारा