Wednesday, February 28, 2018

होली आई रे

डॊ. सौरभ मालवीय
फागुन आते ही चहुंओर होली के रंग दिखाई देने लगते हैं. जगह-जगह होली मिलन समारोहों का आयोजन होने लगता है. होली हर्षोल्लास, उमंग और रंगों का पर्व है. यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इससे एक दिन पूर्व होलिका जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहा जाता है. दूसरे दिन रंग खेला जाता है, जिसे धुलेंडी, धुरखेल तथा धूलिवंदन कहा जाता है. लोग एक-दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल लगाते हैं. रंग में भरे लोगों की टोलियां नाचती-गाती गांव-शहर में घूमती रहती हैं. ढोल बजाते और होली के गीत गाते लोग मार्ग में आते-जाते लोगों को रंग लगाते हुए होली को हर्षोल्लास से खेलते हैं. विदेशी लोग भी होली खेलते हैं. सांध्य काल में लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और मिष्ठान बांटते हैं.

पुरातन धार्मिक पुस्तकों में होली का वर्णन अनेक मिलता है. नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख है. विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से तीन सौ वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी होली का उल्लेख किया गया है. होली के पर्व को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं. सबसे प्रसिद्ध कथा विष्णु भक्त प्रह्लाद की है. माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था. वह स्वयं को भगवान मानने लगा था.  उसने अपने राज्य में भगवान का नाम लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था. जो कोई भगवान का नाम लेता, उसे दंडित किया जाता था. हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था. प्रह्लाद की प्रभु भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने भक्ति के मार्ग का त्याग नहीं किया. हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में भस्म नहीं हो सकती. हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि कुंड में बैठे. अग्नि कुंड में बैठने पर होलिका तो जल गई, परंतु प्रह्लाद बच गया. भक्त प्रह्लाद की स्मृति में इस दिन होली जलाई जाती है. इसके अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी संबंधित है. कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था. इससे प्रसन्न होकर गोपियों और ग्वालों ने रंग खेला था.

देश में होली का पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. ब्रज की होली मुख्य आकर्षण का केंद्र है. बरसाने की लठमार होली भी प्रसिद्ध है. इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं. मथुरा का प्रसिद्ध 40 दिवसीय होली उत्सव वसंत पंचमी से ही प्रारंभ हो जाता है. श्री राधा रानी को गुलाल अर्पित कर होली उत्सव शुरू करने की अनुमति मांगी जाती है. इसी के साथ ही पूरे ब्रज पर फाग का रंग छाने लगता है. वृंदावन के शाहजी मंदिर में प्रसिद्ध वसंती कमरे में श्रीजी के दर्शन किए जाते हैं. यह कमरा वर्ष में केवल दो दिन के लिए खुलता है. मथुरा के अलावा बरसाना, नंदगांव, वृंदावन आदि सभी मंदिरों में भगवान और भक्त पीले रंग में रंग जाते हैं. ब्रह्मर्षि दुर्वासा की पूजा की जाती है. हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी वसंत पंचमी से ही लोग होली खेलना प्रारंभ कर देते हैं. कुल्लू के रघुनाथपुर मंदिर में सबसे पहले वसंत पंचमी के दिन भगवान रघुनाथ पर गुलाल चढ़ाया जाता है, फिर भक्तों की होली शुरू हो जाती है. लोगों का मानना है कि रामायण काल में हनुमान ने इसी स्थान पर भरत से भेंट की थी. कुमाऊं में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं. बिहार का फगुआ प्रसिद्ध है. हरियाणा की धुलंडी में भाभी पल्लू में ईंटें बांधकर देवरों को मारती हैं. पश्चिम बंगाल में दोल जात्रा निकाली जाती है. यह पर्व चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है. शोभायात्रा निकाली जाती है. महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेला जाता है. गोवा के शिमगो में शोभा यात्रा निकलती है और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्ख शक्ति प्रदर्शन करते हैं. तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंत का उत्सव है. मणिपुर के याओसांग में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है, जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है. दक्षिण गुजरात के आदिवासी भी धूमधाम से होली मनाते हैं. छत्तीसगढ़ में लोक गीतों के साथ होली मनाई जाती है.  मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी भगोरिया मनाते हैं. भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी होली मनाई जाती है.

होली सदैव ही साहित्यकारों का प्रिय पर्व रहा है. प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली का उल्लेख मिलता है. श्रीमद्भागवत महापुराण में रास का वर्णन है. अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है. इनमें हर्ष की प्रियदर्शिका एवं रत्नावली और कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् सम्मिलित हैं. भारवि एवं माघ सहित अन्य कई संस्कृत कवियों ने अपनी रचनाओं में वसंत एवं रंगों का वर्णन किया है. चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का उल्लेख है. भक्तिकाल तथा रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली विशिष्ट उल्लेख मिलता है. आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि कवियों ने होली को विशेष महत्व दिया है. प्रसिद्ध कृष्ण भक्त महाकवि सूरदास ने वसंत एवं होली पर अनेक पद रचे हैं. भारतीय सिनेमा ने भी होली को मनोहारी रूप में पेश किया है. अनेक फिल्मों में होली के कर्णप्रिय गीत हैं.

होली आपसी ईर्ष्या-द्वेष भावना को बुलाकर संबंधों को मधुर बनाने का पर्व है, परंतु देखने में आता है कि इस दिन बहुत से लोग शराब पीते हैं, जुआ खेलते हैं, लड़ाई-झगड़े करते हैं. रंगों की जगह एक-दूसरे में कीचड़ डालते हैं. काले-नीले पक्के रंग एक-दूसरे पर फेंकते हैं. ये रंग कई दिन तक नहीं उतरते. रसायन युक्त इन रंगों के कारण अकसर लोगों को त्वचा संबंधी रोग भी हो जाते हैं. इससे आपसी कटुता बढ़ती है. होली प्रेम का पर्व है, इसे इस प्रेमभाव के साथ ही मनाना चाहिए. पर्व का अर्थ रंग लगाना या हुड़दंग करना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ आपसी द्वेषभाव को भुलाकर भाईचारे को बढ़ावा देना है. होली खुशियों का पर्व है, इसे शोक में न बदलें.

Saturday, February 10, 2018

भावी भारत, युवा और पंडित दीनदयाल उपध्याय


डॉ. सौरभ मालवीय
वर्ष 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तो देश के सामने उसके स्वरूप की महत्वपूर्ण चुनौती थी कि अंग्रेजों के जाने बाद देश का स्वरूप क्या होगा. कांग्रेसी नेता सहित उस समय के अधिकांश समकालीन विद्वानों का यही मानना था कि अंग्रेजों के जाने के बाद देश अपना स्वरूप स्वतः तय कर लेगा, अर्थात तत्कालीन नेताओं जेहन में देश के स्वरूप से अधिक चिंता अंग्रेजों के जाने को लेकर थी, राष्ट्र के स्वरूप को लेकर गांधी जी के बाद अगर किसी ने सर्वाधिक चिंता या विचार प्रकट किए, उनमें श्यामाप्रसाद मखर्जी के अलावा पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम उन चुनिंदा चिंतकों में शामिल था, जो आजादी मिलने के साथ ही देश का स्वरूप भारतीय परिवेश, परिस्थिति और सांस्कृतिक, आर्थिक मान्यता के अनुरूप करना चाहते थे. वे इस कार्य में पश्चिम के दर्शन और विचार को प्रमुख मानने के बजाय सहयोगी भूमिका तक ही सीमित करना चाहते थे, जबकि तत्कालीन प्रमुख नेता और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू पश्चिमी खाके में ही राष्ट्र का ताना-बाना बुनना चहते थे.

अगर हम गांधीजी और दीनदयाल जी के विचारों के निर्मेष भाव से विवेचना करें, तो दोनों नेता राष्ट्र के अंतिम व्यक्ति के अभ्युदय और उत्थान में ही उसका वास्तविक विकास मानते थे. हालांकि दोनों के दृष्टिकोंण में या इसके लिए अपनाए जाने वाले साधनों और दर्शन तत्त्वों में मूलभूत विभेद भी था. दीनदयाल जी इस राष्ट्र नव-जागरण में युवाओं की भूमिका को भी महत्त्वपूर्ण मानते थे. उनका मानना था कि किसी राष्ट्र का स्वरूप उसके युवा ही तय करते हैं. किसी राष्ट्र को जानना हो तो सर्वप्रथम राष्ट्र के युवा को जानना चाहिए. पथभ्रष्ट और विचलित युवाओं का साम्राज्य खड़ा करके कभी कोई राष्ट्र अपना चिरकालिक सांस्कृतिक स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकता. दीनदयाल जी की दृष्टि में युवा राष्ट्र की थाती है, एवं युवा-युवा के बीच भेद नहीं करता वह समग्र युवाओं को राष्ट्र की थाती मानता है. राष्ट्र जीवंत और प्राणवान सांस्कृतिक अवधारणा है. पंडित जी राष्ट्र को जल, जंगल, जमीन का सिर्फ समन्वय नहीं मानते थे.

राष्ट्र और युवा के संबंध में दीनदयाल जी की मान्यता थी कि राष्ट्र का वास्तविक विकास सिर्फ उसके द्वारा औद्योगिक होना, और बड़े पैमाने पर किया गया पूंजी निवेश मात्र नहीं है. उनका स्पष्ट मानना था कि किसी राष्ट्र का संपूर्ण और समग्र विकास तब तक नहीं जब तक कि राष्ट्र का युवा सुशिक्षित और सुसंस्कृत नहीं होगा. सुसंस्कृत से पंडित जी का आशय सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान तक नहीं था, बल्कि वह ऐसी युवा शक्ति निर्माण की बात करते थे, जो राष्ट्र की मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव महसूस करता हो, उनके अनुसार यह तब तक संभव नहीं था, जब तक युवा, देश की संस्कृति और उसकी बहुलतावादी सोच में राष्ट्र की समग्रता का दर्शन न करता हो. अगर इसे हम भारत जैसे बहुलवादी राष्ट्र के संदर्भ में देखें, तो ज्ञात होगा कि उसकी सांस्कृतिक बहुलता में भी एक समग्र संस्कृति का बोध होता है. जो उसे अनेकता में भी एकता के सूत्र में पिरोये रखने की ताकत रखता है. यही वह धागा है, जिसने सहस्त्रों विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के बाद भी राष्ट्र को कभी विखंडित नहीं होने दिया, और एक सूत्र में पिरोए रखा.

पश्चिमी दार्शनिक मनुष्य के सिर्फ शारीरिक और मानसिक विकास की बात करते हैं. वहीं अधिकांश भारतीय दार्शनिक व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक विकास के साथ ही धार्मिक विकास पर भी जोर देते हैं. पंडित दीनदयाल उपाध्याय एकात्म मानव दर्शन की बाद करते हैं, तो उनका भी आशय यही होता है कि पूर्ण मानव बनना तभी संभव है, जब मनुष्य का शारीरिक और बौद्धिक विकास के साथ-साथ उसका अध्यात्मिक विकास भी हो. इस एकात्म मानव दर्शन में व्यष्टि से समष्टि तक सब एक ही सूत्र में गुंथित है युवा व्यक्तित्व का विकास होगा, तो समाज विकसित होगा, समाज विकसित होगा तो राष्ट्र की उन्नति होगी, और राष्ट्र की उन्नति होगी, तो विश्व का कल्याण होगा. राष्ट्र के संबंध में दीनदयाल जी का विचार था कि जब एक मानव समुदाय के समक्ष, एक वृत्त-विचार आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृ भाव से देखता है, तो वह राष्ट्र कहलाता है, अर्थात पंडित जी के अनुसार देश के युवा राष्ट्र के सच्चे सपूत तभी कहलाएंगे जब वे भारत मां को मातृ जमीन का टुकड़ा न समझें, बल्कि उसे सांस्कृतिक मां के रूप में स्वीकार करें. उनका विचार था कि राष्ट्र की भी एक आत्मा होती है, जिसे चिती रूप में जाना जाता है.

प्रसिद्ध विद्वान मैक्डूगल के अनुसार किसी भी समूह की एक मूल प्रवृत्ति होती है, वैसे ही चिती किसी समाज की मूल प्रवृत्ति है, जो जन्मजात है, और उसके होने का कारण ऐतिहासिक नहीं है. इसी क्रम में वर्तमान परिप्रेक्ष्य के भौतिकवादी स्वरूप को देखते हुए एवं युवाओं की मौजूदा स्थिति और स्वभाव के बारे में चिंता प्रकट करते हुए एक बार अपने उद्बोधन में पंडित दीनदयाल जी कहा था कि किसी भी राष्ट्र का युवा का इस कद्र भौतिकवादी होना और राष्ट्र राज्य के प्रति उदासीन होना अत्यंत घातक है. दीनदयाल जी का युवाओं के लिए चिंतन था कि भारत जैसा विशाल एवं सर्वसंपन्न राष्ट्र जिसने अपनी ऐतिहासिक तथा सांस्कृति पृष्ठभूमि के आधार पर संपूर्ण विश्व को अपने ज्ञान पुंज के आलोकित कर मानवता का पाठ पढ़ाया तथा विश्व में जगत गुरु के पद पर प्रतिष्ठापित हुआ. ऐसे विशाल राष्ट्र के पराधीनता के कारणों पर दीनदयाल जी का विचार और स्वाधीनता पश्चात समर्थ सशक्त भारत बनाने में युवाओं के योगदान को महत्त्वपूर्ण माना है.

पंडित दीनदयाल उपध्याय के मन में जो मानवता के प्रति विचार थे, उसे गति 1920 में प्रकाशित पंडित बद्रीशाह कुलधारिया की पुस्तक ‘दैशिक शास्त्रश् से मिली. दैशिक शास्त्र की भावभूमि तो दीनदयाल जी के मन में पहले से ही थी और एक नया विचार उनके मन में उदित हुआ कि संपूर्ण विश्व का प्रतिनिधित्व युवा ही करते हैं. अतः युवाओं के विचारों का अध्ययन करके मानवता के लिए एक शाश्वत जीवन प्रणाली दी जाए, जो युवाओं के लिए प्रेरक तो हो, साथ ही साथ युवाओं के माध्यम से भारत एक वैश्विक शक्ति बन सके.

सर्वे भवंतु सुखिनः को साकार करेगा एकात्म मानवदर्शन


डॉ. सौरभ मालवीय
परम पावन भारत भूमि अजन्मी है यह देव निर्मित है और देवताओं के द्वारा इस धरा पर विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग प्रकार की शक्तियां अवतरित होती रहती हैं. जो देव निर्मित भू-भाग को अपनी ऊर्जा से समाज का मार्गदर्शन करते हैं, ऐसे महापुरुषों की अनंत श्रृंखला भारत में विराजमान है.
 श्रीकृष्ण की भूमि मथुरा के गांव नगला चन्द्रभान के निवासी पंडित हरिराम उपाध्याय एक ख्यातिनाम ज्योतिषी थे. उनके कुल में आचार और विचार संपन्न लोगों की एक आदरणीय परंपरा थी. पंडित हरिराम उपाध्याय की समाज में इतनी प्रतिष्ठा थी कि उनकी मृत्यु पर पूरे तहसील में समाज के लोगों ने अपना व्यापर और कार्य बंद करके श्रद्धांजलि अर्पित की थी. काल के कराल का उच्छेद करके विपरीत परिस्थितियों में ही तो परमात्मा जनमते हैं. इसी परंपरा में आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को जब पूरा जगत भगवान शिव की स्तुति में लीन था, तो 25 सितंबर 1916 को श्री दीनदयाल जी का जन्म हुआ. पंडित हरिराम के घर में संयुक्त परंपरा थी. अतएव बालपन से ही दीनदयाल जी के चित्त में सामूहिक जीवन शैली का विकास हुआ. काल चक्र घूमता रहा और दीनदयाल जी की मां फिर, पिता जी दिवंगत हो गए. उनका पालन-पोषण ननिहाल में हुआ जो राजस्थान में था. पूत के पांव पालने में ही दिखने लगते हैं, दीनदयाल की प्रखर मेधा के धनी थे. हाईस्कूल और बारहवीं में राजस्थान प्रदेश में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए. इसी बीच उनके नाना-नानी, मामी और छोटा भाई भी संसार छोड़ कर चले गए. ऐसी भयंकर परिस्थितियों में दीनदयाल जी दृढ़ संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ते रहे. कानपुर के सनातन धर्म कालेज में गणित विषय लेकर बी.ए प्रथम श्रेणी में सफल हुए. ई.सी.एस.की परीक्षा में चयनित होने के बाद भी नौकरी नहीं की. आगे की पढ़ाई के लिए प्रयाग चले आए. नियति ने कुछ और ही तय किया था, यही पर उनका संपर्क माननीय भाऊराव देवरस से हुआ और वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गए और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. दीनदयाल जी को बालपन से ही रामायण और महाभारत के लगभग सभी प्रसंग कंठस्थ थे. उपनिषदों के अथाह ज्ञान सागर में वे रमे रहते थे. उनके चित्त के विकास का मूल श्लोक ही "गृद्धः कस्यस्विद्धनम्" था. उन्होंने कानपुर में पढ़ते समय ही सबसे कम अंक पाने वाले विद्यार्थियों का एक संगठन बनाया था, जिसका नाम "जीरो एसोशिएसन" रखा था और अपने पढ़ाई से समय निकाल कर वे उन विद्यार्थियों की सहायता करते थे. उनमें से अनेक विद्यार्थी सफल हो कर बड़े उंचाई पर पहुंचे.
उनके मन में जो मानवता के प्रति विचार थे, उसे गति 1920 में प्रकाशित पंडित बद्रीशाह कुलधारिया की पुस्तक ‘दैशिक शास्त्र’ से मिली. दैशिक शास्त्र की भावभूमि तो दीनदयाल जी के मन में पहले से ही थी और एक नया विचार उनके मन में उदित हुआ कि संपूर्ण विश्व के विचारों का अध्ययन करके मानवता के लिए एक शास्वत जीवन प्रणाली दी जाए. यूं तो ये शास्वत जीवन प्रणाली भारत में चिरकाल से ही विद्यमान है, परंतु इसकी व्याख्या आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में करने लिए उन्होंने करीब सवा सौ विदेशी विचारकों का गहन अध्ययन किया. सामान्यतः पाश्चात्य दर्शन के नाम पर हम लोग केवल यूरोप, ब्रिटेन, अमेरिका को ही पूरा मान लेते हैं और इसके बाहर के विचारकों पर हमारी दृष्टि ही नहीं जाती. दीनदयाल जी ने इस भ्रामक मिथक को तोड़ा. वे ब्राजील के लुइपेरिया, मैक्सिको के जुस्टोपिया और कविनोवारेड़ा पेरू के मरियनोकानेर्जो और आलेयांड्रोडस्तुवा, चिली के लास्टरिया, क्यूबा के अनरेकिक तोसेवारोना आदि अनेक विचारकों को सांगोपांग अध्ययन किया. रेन्डेकार्ड, स्पिनोजा, जानलाँक, चीन जेम्स रुसो अनेक मुख्यधारा के विद्वान थे. सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, अगस्टीन, ओरिजेन, अरेजिना, ओखैम ,काम्पार्ज, वरनेट, जेल, जेलर आर्लिक आदि को दीनदयाल जी ने खंगाल डाला. इन सभी का निहितार्थ यह पाया कि यह सभी विचारधाराएं अधिकतम ढाई हजार साल पुरानी हैं और खंड सः सोचती हैं.  कोई भी खंड सः सोच का परिणाम शास्वत और मंगलकारी नहीं हो सकता है. इस प्रकार के खंड सः सोच पर पिछले दो सौ वर्षों में बहुत बार विश्व को एकत्र करने का प्रयास किया गया और अनेक नामों से किया गया, जिसमें इंटनेशनल कम्युनलिजम,इंटरनेशनल सेक्टरिजम और इंटरनेशनल ह्युम्नलिजम प्रमुख रहे. पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के समक्ष ये सभी प्रयास और इसके परिणाम थे. वह इस बात का भी अध्ययन किया था कि इन प्रयासों में वैचारिक त्रुटि क्या रह गई है और इन प्रयासों के वैचारिक निहितार्थ क्या है ? अंत में वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सोच की संकीर्णता और अधूरापन ही इसका मुख्य कारण है और इस विचार के परिणाम की विफलता के पीछे चित्त का तालमेल नहीं होना भी है. इस निदान हेतु वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जब तक समग्र मानव जाति की चेतना से एकीभूति नहीं हुआ जाए, तब तक इस तरह के सभी प्रयास नक्कारखाने में तूती की आवाज ही सिद्ध होंगे. यही से प्रारंभ हो गया उनका मानव मन को जोड़ने का अद्भुत प्रयोग. उन्होंने सहज ही अनुभव कर लिया कि भारतीय मनीषा में इस तरह के प्रयोग की अपार संभावनाएं है.

एकात्म मानव दर्शन प्राचीन अवधारणा है. यह सांस्कृतिक चेतना है. इस विचार दर्शन में राष्ट्र की संकल्पना स्पष्ट है कि राष्ट्र वही होगा, जहां संस्कृति होगी. जहां संस्कृति विहीन स्थिति होगी, वहां राष्ट्र की कल्पना भी बेमानी है. भारत में आजादी के बाद शब्दों की विलासिता का जबरदस्त दौर कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने चलाया. इन्होंने देश में तत्कालीन सत्ताधारियों को छल-कपट से अपने घेरे में ले लिया. परिणामस्वरूप राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत जीवनशैली का मार्ग निरंतर अवरुद्ध होता गया. अब अवरुद्ध मार्ग खुलने लगा है. संस्कृति से उपजा संस्कार बोलने लगा है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है, जो सदियों से चली आ रही है. यह सांस्कृतिक एकता है, जो किसी भी बंधन से अधिक मजबूत और टिकाऊ है, जो किसी देश में लोगों को एकजुट करने में सक्षम है और जिसमें इस देश को एक राष्ट्र के सूत्र में बांध रखा है. भारत की संस्कृति भारत की धरती की उपज है. उसकी चेतना की देन है. साधना की पूंजी है. उसकी एकता, एकात्मता, विशालता, समन्वय धरती से निकला है. भारत में आसेतु-हिमालय एक संस्कृति है. उससे भारतीय राष्ट्र जीवन प्रेरित हुआ है. अनादिकाल से यहां का समाज अनेक संप्रदायों को उत्पन्न करके भी एक ही मूल से जीवन रस ग्रहण करता आया है, यही एकात्म मानव दर्शन की दृष्टि है.


राष्ट्र को आक्रांत करने वाली समस्याओं का अलग-अलग समाधान खोजने की जगह एक ऐसे दर्शन की बात एकात्म मानव दर्शन में है, जहां एकात्म दृष्टि से कार्य करने की संकल्पना है. शरीर, मन और बुद्धि प्रत्येक इंसान की आत्मा पर बल देकर राजनीति के आध्यात्मीकरण की दृष्टि एकात्म मानव दर्शन में दिखती है. पंडित दीनदयाल जी का मुख्य विचार उनकी भारतीयता, धर्म, राज्य और अंत्योदय की अवधारणा से स्पष्ट है. भारतीय से उनका आशय था- वह भारतीय संस्कृति जो पश्चिमी विचारों के विपरीत एकात्म संपूर्णता में जीवन को देखती है. उनके अनुसार भारतीयता राजनीति के माध्यम से नहीं, बल्कि संस्कृति से स्वयं को प्रकट कर सकती है. किसी भी समस्या को खंड-खंड रूप में न देखें, क्योंकि खंड-खंड पाखंड है और वहीं एकात्म दर्शन संपूर्णता से परिपूर्ण है. दीनदयाल जी का चिंतन था कि वसुधैव कुटुम्बकम के इस मूल सिद्धांत को हम अपनाते तो पूरा विश्व एक ही सूत्र में जुड़ा हुआ मिलता. एक दूसरे के पूरक के रूप में काम करते और सर्वे भवन्तु सुखिनः की अवधारणा को परिपूर्ण करते.