Thursday, January 10, 2019

भारतीय पत्रकारिता का पिंड है राष्ट्रवाद, फिर इससे गुरेज क्यों?

सौरभ मालवीय ने कहा अटल बिहारी वाजपेयी जन्मजात वक्ता थे, जन्मजात कवि हृदय थे, पत्रकार थे, प्रखर राष्ट्रवादी थे. उनके बारे में कहा जाता था कि यदि वह पाकिस्तान से चुनाव लड़ते तो वहां से भी जीत जाते और पाकिस्तान का नेता कहे जाते.
जय प्रकाश पाण्डेय
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के सहयोग से प्रगति मैदान में लगे विश्व पुस्तक मेला 2019 में लेखक मंच पर 'साहित्य आजतक' का अगला सत्र था डॉ. सौरभ मालवीय की पुस्तक 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष- अटल बिहारी वाजपेयी' पर चर्चा का. जहां सईद अंसारी से बातचीत के लिए मौजूद रहे पं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और इस किताब के लेखक डॉ. सौरभ मालवीय. सत्र के शुरू में सईद ने मालवीय की राजनीतिक और सामाजिक समझ की तारीफ करते हुए पूछा कि किस तरह वह अटल बिहारी वाजपेयी को एक पत्रकार और वह भी एक राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष के रूप में देखते हैं.

डॉ. सौरभ मालवीय ने 'साहित्य आजतक' का आभार जताते हुए, 'तेरा तुझको अर्पण' की बात कही और कहा कि देश और समाज ने हमको जो दिया हमने उसे वही लौटाया. अटल बिहारी वाजपेयी इस सोच के महान नायक थे. मेरा मानना है कि राजनीति एक ऐसी विधा है, एक ऐसा क्षेत्र है, जो किसी भी समाज के विकास की प्रक्रिया के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है. परंतु दुर्भाग्य यह है कि आजादी के बाद राजनीति को देखने की दृष्टि संकुचित कर दी गई. राजनीति में काम करने वाला व्यक्ति, नेता बनने वाला व्यक्ति समाज में उस तरह से नहीं स्वीकार किया गया, जैसे कि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़ कर डॉक्टर बने, वकील बने, इंजीनियर बने पर कोई व्यक्ति यह नहीं कहना चाहता कि मैं राजनेता हूं. ऐसे सवालों के जवाब में जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी उम्र दी उस व्यक्ति का नाम अटल बिहारी वाजपेयी था.

अटल बिहारी वाजपेयी जन्मजात वक्ता थे, जन्मजात कवि हृदय थे, पत्रकार थे, प्रखर राष्ट्रवादी थे. उनके बारे में कहा जाता था कि यदि वह पाकिस्तान से चुनाव लड़ते तो वहां से भी जीत जाते और पाकिस्तान का नेता कहे जाते. राजनीति को जब प्रश्नों के दायरे में खड़ा किया जा रहा है तब अटल जी की स्वीकार्यता जन-जन में थी. राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, नंबूदरीपाद, अटल बिहारी वाजपेयी, दीन दयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं जवाहरलाल नेहरू तमाम ऐसे नेता थे, जिन्होंने पहले यह तय किया कि हमें आजादी, राष्ट्र का विकास चाहिए. इन सबने राष्ट्र को सर्वोपरि रखा.

राष्ट्रवादी पत्रकारिता की व्याख्या करते हुए डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि इसका अर्थ है समाज के सभी वर्गों को, समाज में निचले स्तर पर जीने वाले हर व्यक्ति को सभी संसाधन उपलब्ध कराने में अपना सर्वस्व जीवन निछावर कर देना. अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना जीवन इसीलिए निछावर कर दिया. इसीलिए इस किताब को लिखने की जरूरत पड़ी. अटल बिहारी वाजपेयी केवल नेता भर नहीं थे. उनकी सभाएं देश भर में होती थीं, तो दूसरे दलों के नेता भी उनका भाषण एक नेता के तौर पर सुनने जाते थे, किसी दल के नेता विशेष के तौर पर नहीं.

अटल बिहारी वाजपेयी की पत्रकारिता की उम्र बहुत कम थी. वह आज की पत्रकारिता से अलग थी. उस समय के समाचारपत्रों में वैचारिक पत्रकारिता होती थी. अटल जी जितने भी पत्रपत्रिकाओं से जुड़े रहे उन्होंने अपने छोटे वैचारिक लेखों, संपादकीय से भी अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी. उन्हें पढ़ने के बाद मन झंकृत हो जाता है. मेला, राष्ट्रीय एकता, भाषा, हिंदी भाषा पर उनके अद्भुत लेख हैं.

आज के दौर की पत्रकारिता पर डॉ. सौरभ मालवीय का कहना था कि पहले की पत्रकारिता में राष्ट्र सर्वोपरि है. गुलामी से आजादी पाने के बाद कोई भी देश टूटा हुआ ही होता है. भारत की स्थिति भी उससे अलग नहीं थी. पर आज की पत्रकारिता जनोन्मुख है. आज की पत्रकारिता जनजागृति की पत्रकारिता है. अब आप चीजों को छुपा नहीं सकते. आज एक चीज बड़े संकट में है कि पत्रकार पक्षकार बन गया है. और जब पत्रकार पक्षकार बनेगा तो देश और मीडिया के सामने चुनौतियां रहेंगी ही. इसका समाधान जनता और मीडिया को खुद करना होगा. अटल बिहारी वाजपेयी ने वैचारिक प्रतिबद्धता होते हुए भी उसे अपनी पत्रकारिता पर हावी नहीं होने दिया. हर मीडिया घराने में न सही पर हर पत्रकार अपने विंडो टाइम में कहीं न कहीं अपने विचारों को ले ही आता है.

लोहिया, गांधी, नेहरू और अटल का जिक्र करते हुए उन्होंने प्राइम टाइम पत्रकारों पर आरोप लगाया कि वे पक्षकार हो गए हैं. इसीलिए पत्रकारिता को राष्ट्रवाद से जोड़ने की बात इस किताब में की गई. जिन्हें राष्ट्रवाद शब्द से दिक्कत है उन्हें पत्रकार कैसे कह सकते हैं, जबकि सच्चाई यही है कि जब कहीं किसी की बात नहीं सुनी जाती तो वह मीडिया के दरवाजे पर आता है. आपको कहीं न्याय न मिल रहा हो तो आप पत्रकार के पास जाइए वहां न्याय मिलेगा, क्योंकि पत्रकार दर्द से जीता है, लेकिन दूसरे के दर्द को पीता है. पत्रकार की जिंदगी मोमबत्ती के समान है, तिल तिल जलना और दूसरों को रोशनी देना. जहां यह मनोभाव है वहां, राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादिता से विरोध क्यों. बाल गंगाधर तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी को देखिए. हमारी पत्रकारिता का पिंड है राष्ट्रवाद.

Monday, November 19, 2018

यह किताब अभिनंदनीय है, सराहनीय है

फ़िरदौस ख़ान
डॊ. सौरभ मालवीय जी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सहाफ़ी ज़िन्दगी पर ऐसी किताब लिखी है, जिसमें उनकी सहाफ़ी ज़िन्दगी पर रौशनी डालने के साथ-साथ उनके विचारों और लेखों को भी संजोया गया है. सौरभ जी समर्पित प्राध्यापक हैं, ओजस्वी वक्ता हैं. अध्ययन से उनका गहरा नाता है. उनका इंद्रधनुषी व्यक्तित्व इस किताब में साफ़ झलकता है. बेशक उनका यह काम क़ाबिले-तारीफ़ है, इसके लिए सौरभ जी मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं.

सौरभ जी ने हमें किताब पर एक तहरीर लिखने की ज़िम्मेदारी सौंपी है, जो कोई आसान काम नहीं है. क्योंकि  बहुत मुश्किल होता है किसी ऐसी शख़्सियत के बारे में लिखना, जो ख़ुद अपनी ही एक मिसाल हुआ करती है. श्री अटल बिहारी वाजपेयी भी एक ऐसी ही शख़्सियत हैं. वे मन से कवि, विचारों से लेखक, कर्म से राजनेता हैं. बहुआयामी प्रतिभा के धनी अटलजी ने कविताएं भी लिखीं, पत्रकारिता भी की, भाषण भी दिए, विपक्ष में रहकर सियासत भी ख़ूब की, सत्ता का सुख भी भोगा. इस सबके बावजूद वे मन से हमेशा कवि ही रहे. सियासत में मसरूफ़ होने की वजह से कविताओं से उनकी कुछ दूरी बन गई या यूं कहें कि वे कविता को उतना वक़्त नहीं दे पाए, जितना वे देना चाहते थे. इसकी कमी उन्हें हमेशा खलती रही. सियासत ने उनके काव्य जीवन को उनसे छीन लिया. बक़ौल श्री अटल बिहारी वाजपेयी, राजनीति में आना, मेरी सबसे बड़ी भूल है. इच्छा थी कि कुछ पठन-पाठन करूंगा. अध्ययन और अध्वयव्साय की पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाऊंगा. अतीत से कुछ लूंगा और भविष्य के कुछ दे जाऊंगा. किंतु राजनीति की रपटीली राह में कमाना तो दूर, गांठ की पूंजी भी गंवा बैठा. मन की शांति मर गई. संतोष समाप्त हो गया. एक विचित्र सा खोखलापन जीवन में भर गया. ममता और करुणा के मानवीय मूल्य मुंह चुराने लगे. आत्मा को कुचलकर ही आगे बढ़ा जा सकता है. स्पष्ट है, सांप-छछूंदर जैसी गति हो गई है. न निग़लते बने, न उग़लते.

अटलजी सियासत के दलदल में रहकर भी इससे अलग रहे. उन्होंने सिर्फ़ विरोध के लिए विरोध नहीं किया. वे ख़ुद कहते हैं, स्वतंत्रता के बाद हमारी उपलब्धियां कम नहीं हैं. मैं उन लोगों में से नहीं हूं, जो आलोचना के लिए आलोचना करूं. मैं प्रतिपक्ष में हूं, पहले भी कह चुका हूं, स्वतंत्रता के बाद हमने कुछ नहीं किया, ये कहना ग़लत होगा.
उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में उसूलों को अहमियत दी. वे कहते हैं, मैं विश्वास दिलाता हूं कि मैंने कभी सत्ता के लालच में सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया है, और न भविष्य में करूंगा. सत्ता का सहवास और विपक्ष का वनवास मेरे लिए एक जैसा है. मैं आपको आश्वासन देना चाहता हूं कि कितनी भी आपत्तियां आएं, हम वरदान के लिए झोली नहीं फैलाएंगे. आख़िरी क्षण तक वरदान की तलाश नहीं करेंगे, न मैं संघर्ष का रास्ता छोड़ूंगा.

अटलजी सादगी पसंद हैं. कामयाबी की बुलंदी पर पहुंच कर भी वह अहंकार से दूर हैं, नम्रता से परिपूर्ण हैं. उन्हीं के शब्दों में-
मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना
गैरों को गले न लगा सकूं
इतनी रुखाई कभी मत देना...

बहरहाल, उम्मीद है कि अटल जी की ज़िन्दगी पर आई अन्य किताबों के बीच यह किताब अपनी मौजूदगी दर्ज कराएगी.
(शायरा, लेखिका व पत्रकार)

स्वच्छता और स्वास्थ्य

डॊ. सौरभ मालवीय
जिस प्रकार स्वच्छ तन में स्वच्छ मन रहता है, ठीक उसी प्रकार स्वच्छ स्थान पर स्वस्थ लोग रहते हैं। स्वच्छता और स्वास्थ्य का गहरा संबंध है। गंदगी के कारण अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। कई बार ये रोग महामारी का कारण भी बन जाते हैं। रोगों के कारण मनुष्य दुर्बल तो होता ही है, साथ ही धन और समय की भी हानि होती है। राष्ट्र की उन्नति के लिए उसके जन का स्वस्थ होना अति आवश्यक है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार देशव्यापी स्वच्छ भारत अभियान चला रही है। इस अभियान के माध्यम से सरकार ने एक ऐसा रचनात्मक और सहयोगात्मक मंच प्रदान किया है, जिसका उद्देश्य गली-मुहल्लों, सड़कों, सार्वजनिक स्थलों तथा अपने आसपास के स्थानों को स्वच्छ रखना है। यह अभियान प्रौद्योगिकी के माध्यम से नागरिकों और संगठनों के अभियान संबंधी प्रयासों के बारे में जानकारी प्रदान करता है। कोई भी व्यक्ति, सरकारी संस्था या निजी संगठन इसमें भागीदार बन सकते हैं। वे अपने दैनिक कार्यों में से कुछ समय निकालकर देश में स्वच्छता संबंधी कार्यों में योगदान दे सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि आधिकारिक रूप से 1 अप्रैल 1999 से केंद्र सरकार ने व्यापक ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम का पुनर्गठन कर पूर्ण स्वच्छता अभियान आरंभ किया था। इसके पश्चात 1 अप्रैल 2012 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा इसे निर्मल भारत अभियान का नाम दिया गया। स्वच्छ भारत अभियान के रूप में 24 सितंबर 2014 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति से निर्मल भारत अभियान का पुनर्गठन किया गया था। केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इस अभियान के प्रचार-प्रसार पर विशेष बल दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महात्मा गांधी की 145वीं जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर 2014 को दिल्ली के राजघाट से स्वच्छ भारत अभियान का प्रारंभ किया था। केंद्र सरकार ने 2 अक्टूबर 2019 तक ग्रामीण क्षेत्रों में 1.96 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के 1.2 करोड़ शौचालयों का निर्माण करके खुले में शौच मुक्त भारत को प्राप्त करने का लक्ष्य रखा था।
प्रधानमंत्री ने कहा था कि गांधीजी के दो सपनों भारत छोड़ो और स्वच्छ भारत में से एक को साकार करने में लोगों ने सहायता की। अपितु स्वच्छ भारत का दूसरा सपना अब भी पूरा होना शेष है। उन्होंने कहा कि एक भारतीय नागरिक होने के नाते यह हमारा सामाजिक दायित्व है कि हम उनके स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करें। प्रधानमंत्री ने देश की सभी पिछली सरकारों और सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संगठनों द्वारा स्वच्छता को लेकर किए गए प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि भारत को स्वच्छ बनाने का काम किसी एक व्यक्ति या अकेले सरकार का नहीं है, यह काम तो देश के 125 करोड़ लोगों द्वारा किया जाना है जो भारत माता के पुत्र-पुत्रियां हैं। स्वच्छ भारत अभियान को एक जन आंदोलन में परिवर्तित करना चाहिए। लोगों को ठान लेना चाहिए कि वह न तो गंदगी करेंगे और न ही करने देंगे। उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार साफ-सफाई न होने के कारण भारत में प्रति व्यक्ति औसतन 6500 रुपये व्यर्थ हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि इसके दृष्टिगत सवच्छ भारत जन स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव डालेगा और इसके साथ ही गरीबों की गाढ़ी कमाई की बचत भी होगी, जिससे अंतत: राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान होगा। उन्होंने लोगों से साफ-सफाई के सपने को साकार करने के लिए इसमें हर वर्ष 100 घंटे योगदान करने की अपील की थी। प्रधानमंत्री ने शौचालय बनाने की अहमियत को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि साफ-सफाई को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे देशभक्ति और जन स्वास्थ्य के प्रति कटिबद्धता से जोड़ कर देखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री द्वारा मृदला सिन्हा, सचिन तेंदुलकर, बाबा रामदेव, शशि थरूर, अनिल अम्बानी, कमल हसन, सलमान खान, प्रियंका चोपड़ा जैसी नौ हस्तियों को आमंत्रित किया गया कि वे भी स्वच्छ भारत अभियान में अपना सहयोग प्रदान करें, इसके चित्र सोशल मीडिया पर साझा करें और अन्य नौ लोगों को भी अपने साथ जोड़ें, ताकि यह एक श्रृंखला बन जाएं। आम जनता को भी सोशल मीडिया पर हैश टैग #MyCleanIndia लिखकर अपने सहयोग को साझा करने के लिए कहा गया।

देश के सामने अस्वच्छता एक बड़ी समस्या है। खुले में शौच के कारण महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्हें रात की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इसके कारण उन्हें शारीरिक और मानसिक कष्ट झेलना पड़ता है। वे कई रोगों की चपेट में आ जाती हैं। खुले में शौच के कारण महिलाओं के साथ आपराधिक घटनाएं भी होती रहती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने प्रथम 2014 के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में शौचालयों की आवश्यकता पर बल दिया था। उन्होंने कहा था- क्या हमें कभी दर्द हुआ है कि हमारी मां और बहनों को खुले में शौच करना पड़ता है? गांव की गरीब महिलाएं रात की प्रतीक्षा करती हैं। जब तक अंधेरा नहीं उतरता है, तब तक वे शौच को बाहर नहीं जा सकती हैं। उन्हें किस प्रकार की शारीरिक यातना होती होगी, क्या हम अपनी मां और बहनों की गरिमा के लिए शौचालयों की व्यवस्था नहीं कर सकते हैं?
इसी प्रकार उन्होंने 2014 के जम्मू और कश्मीर राज्य चुनाव अभियान के दौरान स्कूलों में शौचालयों की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था- विद्यालयों में शौचालयों की कमी के कारण छात्राओं को अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़ देनी पड़ती है। वे अशिक्षित रहती हैं। हमारी बेटियों को गुणवत्ता की शिक्षा का समान अवसर भी मिलना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य व्यक्ति, क्लस्टर और सामुदायिक शौचालयों के निर्माण के माध्यम से खुले में शौच की समस्या को समाप्त करना है। यह अभियान शहरों और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में चलाया जा रहा है। शहरी क्षेत्रों के लिए स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य 1.04 करोड़ परिवारों को लक्षित करते हुए 2.5 लाख समुदायिक शौचालय और 2.6 लाख सार्वजनिक शौचालय का निर्माण कराना है। इसके साथ ही प्रत्येक शहर में एक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सुविधा प्रदान करना है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत आवासीय क्षेत्रों में सामुदायिक शौचालयों का निर्माण करना है, जहां व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण करना कठिन है। इसके अतिरिक्त सार्वजनिक स्थानों जैसे बाजार, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन, पर्यटन स्थल आदि पर सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण करना है। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत देश में लगभग 11 करोड़ 11 लाख शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया। इसका उद्देश्य लोगों को स्वच्छता का महत्व बताते हुए खुले में शौच की समस्या को समाप्त करना है। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी का उपयोग कर ग्रामीण क्षेत्रों में कचरे से जैव उर्वरक और ऊर्जा के विभिन्न रूपों में परिवर्तित करना है। इसे स्वच्छता के साथ-साथ धन उपार्जन भी होगा।
स्कूलों में भी स्वच्छ्ता के लिए अभियान चलाया गया। स्वच्छ भारत स्वच्छ विद्यालय अभियान भारत का प्रारंभ तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने किया था। उन्होंने स्कूल के शिक्षकों और छात्रों के साथ मिलकर स्वच्छता अभियान में भाग भी लिया था।

स्वच्छता अभियान की सफलता सुनिश्चित करने के लिए सर्वेक्षण भी कराया गया और विजेता शहरों को पुरस्कार भी दिए गए। स्वच्छ भारत अभियान (शहरी) के तत्वाधान में केन्द्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने स्वच्छ सर्वेक्षण 2018 का आयोजन किया था। इसमें 4203 शहरी स्थानीय निकायों का मूल्यांकन किया गया। इसके अंतर्गत 2700 मूल्यांकन कर्मियों ने पूरे देश के 40 करोड़ लोगों से संबंधित स्थानीय निकायों का सर्वेक्षण किया। इसके लिए 53.58 लाख स्वच्छता ऐप डाउनलोड किए गए तथा 37.66 लाख नागरिकों के फीडबैक का संग्रह किया गया। नागरिकों के फीडबैक तथा सेवा स्तर में हुई प्रगति में से प्रत्येक को 35 प्रतिशत की भारिता दी गई है, जबकि प्रत्यक्ष निरीक्षण को 30 प्रतिशत की भारिता दी गई है। यह कार्यक्रम 4 जनवरी 2018 से 10 मार्च 2018 तक जारी रहा। सर्वेक्षण में मध्य प्रदेश के इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ नगर होने का सम्मान मिला। इसी राज्य के भोपाल को दूसरा स्थान मिला। चंडीगढ़ तीसरे स्थान पर रहा। राज्यों में सबसे अधिक स्वच्छ रहने वालों में झारखंड पहले स्थान पर रहा, जबकि महाराष्ट्र को दूसरा और छत्तीसगढ़ को तीसरा स्थान मिला। राष्ट्रीय स्तर के कुल 23 और जोनल स्तर के 20 पुरस्कार घोषित किए गए। उल्लेखनीय है कि इसी प्रकार इससे पूर्व भी इस प्रकार के सर्वेक्षण किए गए थे। वर्ष 2017 में 434 नगरों में स्वच्छता सर्वेक्षण किया गया था तथा इंदौर को सर्वाधिक स्वच्छ शहर का पुरस्कार दिया गया था। वर्ष 2016 में 73 नगरों में स्वच्छता सर्वेक्षण किया गया था। इसमें मैसूर को सर्वाधिक स्वच्छ नगर होने का श्रेय प्राप्त हुआ था।

देश में स्वच्छ भारत अभियान के सुखद परिणाम देखने को मिल रहे हैं। सुलभ और सुरक्षित शौचालयों के कारण महिलाओं के जीवन में परिवर्तन आया है। लोग भी इस अभियान में महत्वपूर्ण भागीदारी निभा रहे हैं। लोग यहां-वहां कूड़ा कचरा फेंकने की बजाय कूड़ेदान का प्रयोग करने लगे हैं। बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों व अन्य सार्वजनिक स्थलों पर भी अब सच्छता दिखाई देने लगी है। स्कूली बच्चे और कॊलेज के छात्र भी इस अभियान में भाग ले रहे हैं। वे रैलियों और नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश जन-जन तक पहुंचा रहे हैं।

विदेशों में भी स्वच्छ भारत अभियान की प्रशंसा होने लगी है। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार जापान के प्रधानमंत्री शिन्जो आबे ने स्वच्छ भारत अभियान को अपनी सरकार का समर्थन देने का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने अपने संदेश में कहा है कि साफ पानी को सुरक्षित रखना और स्वच्छता की स्थिति में सुधार करना पूरी दुनिया के सामने आम चुनौती है। हम उम्मीद करते हैं कि इस मिशन को आगे बढ़ाने के लिए हर देश प्रयास करेगा।
माइक्रोसॉफ्ट के को-फाउंडर बिल गेट्स ने भारत में स्वच्छता अभियान चलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना की है. उन्होंने ट्वीट किया- नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और भारत सरकार ने स्वच्छता में सुधार की दिशा में अहम भूमिका निभाई है. अब स्वच्छ भारत को सफल बनाने का समय है।

निसंदेह, स्वच्छ भारत अभियान शीघ्र अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लोगों के जीवन को सुखद और समृद्ध बनाएगा।

Thursday, November 15, 2018

राजधानी में वायु प्रदूषण

डॊ. सौरभ मालवीय
हमारे देश में वायु प्रदूषण निरंतर बढ़ रहा है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण घातक स्तर तक पहुंच गया है। हाल में शहर का समग्र वायु गुणवत्ता सूचकांक 401 दर्ज किया गया। इसी प्रकार वायु में घुले हुए अतिसूक्ष्म प्रदूषक कण पीएम 2.5 को 215 दर्ज किया गया, जो कि स्वास्थ्य के लिए अति हानिकारक है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2016 में प्रदूषण के कारण पांच वर्ष से कम आयु के एक लाख से अधिक बच्चों की मृत्यु हुई। इनमें भारत के 60,987, नाइजीरिया के 47,674, पाकिस्तान के 21,136 और कांगों के 12,890 बच्चे सम्मिलित हैं। रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण के कारण 2016 में पांच से 14 साल के 4,360 बच्चों की मत्यु हुई। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में पांच साल से कम उम्र के 98 प्रतिशत बच्चों पर वायु प्रदूषण का बुरा प्रभाव पड़ा, जबकि उच्च आय वाले देशों में 52 प्रतिशत बच्चे प्रभावित हुए। वायु प्रदूषण के कारण विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 70 लाख लोगों की अकाल मृत्यु होती है। संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) के अनुसार भारत में बढ़ता वायु प्रदूषण वर्षा को प्रभावित कर सकता है। इसके कारण लंबे समय तक मानसून कम हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वायु में मौजूद पीएम 2.5 कणों के कारण कुछ स्थानों बहुत अधिक वर्षा हो सकती है, तो कुछ स्थानों पर बहुत कम होने की संभावना है।

दि एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार शीतकाल में 36 प्रतिशत प्रदूषण दिल्ली में ही उत्पन्न होता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से 34 प्रतिशत प्रदूषण यहां आता है। शेष 30 प्रतिशत प्रदूषण एनसीआर और अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से यहां आता है। रिपोर्ट में प्रदूषण के कारणों पर विस्तृत जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रदूषण के लिए वाहनों का योगदान लगभग 28 प्रतिशत है। इसमें भी भारी वाहन सबसे अधिक 9 प्रतिशत प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। इसके पश्चात दो पहिया वाहनों का नंबर आता है, जो 7 प्रतिशत प्रदूषण फैलाते हैं। तीन पहिया वाहनों से 5 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है। चार पहिया वाहन और बसें 3-3 प्रतिशत प्रदूषण उत्पन्न करती हैं। अन्य वाहन एक प्रतिशत प्रदूषण फैलाते हैं।
धूल से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण का योगदान 18 प्रतिशत है। इसमें सड़क पर धूल से प्रदूषण 3 प्रतिशत प्रदूषण होता है। निर्माण कार्यों से एक प्रतिशत व अन्य कारणों से 13 प्रतिशत प्रदूषण है। औद्योगों के कारण भी वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी हो रही है। शहर के प्रदूषण में 30 प्रतिशत योगदान इनका भी है। इसमें पावर प्लांट 6 प्रतिशत तथा ईंट भट्ठे 8 प्रतिशत प्रदूषण फैलाते हैं। इसी प्रकार स्टोन क्रशर के कारण 2 प्रतिशत तथा अन्य उद्योगों से 14 प्रतिशत प्रदूषण उत्पन्न होता है। आवासीय क्षेत्रों के कारण 10 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है।
शीतकाल में पीएम 10 के स्तर पर पहुंचने के कई कारण हैं। इस मौसम में उद्योगों से 27 प्रतिशत प्रदूषण उत्पन्न होता है, जबकि वाहनों से 24 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है। इसी प्रकार धूल से 25 प्रतिशत तथा आवासीय क्षेत्रों से 9 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है। उल्लेखनीय है कि पराली जलाने के कारण और बायोमास से केवल 4 प्रदूषण उत्पन्न होता है, जबकि दिल्ली के प्रदूषण के लिए समीपवर्ती राज्यों पंजाब और हरियाणा को दोषी ठहराया जाता है। कहा जाता है कि पंजाब और हरियाणा के किसान अपने खेतों में पराली जलाते हैं, जिसका धुआं दिल्ली में प्रदूषण का कारण बनता है।

प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दीपावली में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाते हुए, केवल ग्रीन पटाखों की बिक्री को ही स्वाकृति दी है। इतना ही नहीं, पटाखे फोड़ने के लिए भी कोर्ट ने समयसारिणी जारी कर चुका है। इसके अनुसार दीपावली पर लोग रात 8 बजे से 10 बजे तक ही पटाखे जला पाएंगे। इसके अतिरिक्त ऑनलाइन पटाखों की बिक्री पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर राज्य में सुबह साढ़े चार बजे से सुबह साढ़े छह बजे तक भी पटाखे फोड़ने की अनुमति मांगी थी। याचिका में कहा गया था कि दीपावली के उत्सव को लेकर हर राज्य की अपनी अलग-अलग परंपराएं और संस्कृति हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का प्रतिबंध लोगों के धार्मिक अधिकारों को खारिज करता है, परंतु कोर्ट ने प्रतिबंध को हटाने से इनकार करते हुए कहा कि ग्रीन पटाखे बनाने का उनका आदेश पूरे देश के लिए है। अर्थात अब देश मे कहीं भी सामान्य पटाखे नहीं बनेंगे। केवल कम प्रदूषण वाले ग्रीन पटाखे ही बनेंगे। कोर्ट ने यह भी कहा है कि प्रदूषण करने वाले जो पटाखे पहले बन चुके है, उन्हें भी दिल्ली-एनसीआर मे बेचे जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अपितु दिल्ली एनसीआर के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर सामान्य पटाखे चलाए जा सकते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) भी प्रदूषण को लेकर कठोर कदम उठा रहा है। बोर्ड ने पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के राज्य प्रदूषण नियंत्रण निकायों को वायु प्रदूषण की जांच के लिए निर्देशों का पालन नहीं करने वाले लोगों या एजेंसियों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) ने एक नवंबर से निर्माण कार्य जैसी कई गतिविधियों को प्रतिबंध दिया है। इसके अतिरिक्त लोगों से अगले 10 दिनों के लिए सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने के लिए आग्रह किया गया है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में कुल 35 लाख निजी वाहन हैं। वर्ष 2016 में भी ऑड-ईवन योजना को दो बार 1 से 15 जनवरी और 15 से 30 अप्रैल के बीच लागू किया गया था। जीआरपी वायु प्रदूषण से निपटने के लिए एक कारगर योजना है। इसे 15 अक्टूबर से लागू किया गया था। दिल्ली मेट्रो ने भी बुधवार से अपने नेटवर्क पर 21 अतिरिक्त ट्रेनें आरंभ की हैं।

चिकित्सकों के अनुसार वायु में मिले अति सूक्ष्म कण सांस के माध्यम से शरीर के भीतर चले जाते हैं, जिसके कारण अनेक शारीरिक और मानसिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं। ये कण गर्भ में पल रहे शिशु को भी अपनी चपेट में ले लेते हैं, जिससे जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ वातावरण नितांत आवश्यक है। इसके लिए प्रदूषण पर अंकुश लगाना होगा। इस अभियान में लोगों को भी आगे आना चाहिए।

Wednesday, October 31, 2018

राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है स्टैच्यू ऑफ यूनिटी

डॊ. सौरभ मालवीय
हमारे देश में अनेक धर्म, अनेक भाषाएं भी हैं, लेकिन हमारी संस्कृति एक ही है। हर भारतीय का प्रथम कर्त्यव्य है की वह अपने देश की आजादी का अनुभव करे कि उसका देश स्वतंत्र है और इस आजादी की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। जनशक्ति ही राष्ट्र की एकता शक्ति है। ये विचार देश को राष्ट्रीय एकता सूत्र में पिरोने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल के हैं, जो आज भी बेहद प्रासंगिक हैं. 31 अक्टूबर, 1875 गुजरात के नाडियाद में जन्मे सरदार पटेल को भारत का लौह पुरुष भी कहा जाता है। उन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई और देश के प्रथम गृहमंत्री बने। यह विडम्बना ही है कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में केवल 15 भागों को एकत्र करके जर्मनी राष्ट्र खड़ा करने वाले बिस्मार्क नाम के जर्मन राजनीतिज्ञ को विश्व में अभूतपूर्व राजनेता मान लिया गया, परंतु साढ़े 32 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में बसे 565 राज्यों को मिलाकर एक महान भारत का निर्माण करने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल के योगदान को भुला दिया गया। वास्तव में देश के दुर्भाग्य और राजनीतिक कुचक्र के कारण सरदार वल्लभ भाई पटेल को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे।

वर्ष 2009 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल को उनकी गरिमा के अनुरूप सम्मानित करने के लिए विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा बनवाने के बारे में विचार किया। गुजरात विधानसभा में 182 सदस्य चुने जाते हैं, अतएव 182 मीटर ऊंची प्रतिमा बनवाने का निर्णय गुजरात सरकार ने लिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अक्टूबर, 2013 को सरदार पटेल की 138वीं वर्षगांठ के अवसर पर गुजरात में नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के समीप केवड़िया नामक स्थान पर प्रतिमा का शिलान्यास किया। उस समय भारतीय जनता पार्टी ने प्रतिमा के लिए लोहा एकत्रित करने के लिए देशव्यापी अभियान चलाया था। विशेष बात यह है कि नरेंद्र मोदी अब प्रधानमंत्री के रूप में कल इस प्रतिमा का अनावरण करेंगे। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी नामक सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 237.35 मीटर है। लगभग 2,989 करोड़ रुपये की लागत से बनी इस प्रतिमा के भीतर एक लिफ्ट लगाई गई है, जिससे पर्यटक सरदार पटेल के हृदय तक जा सकेंगे।  यहां से प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य को देखा जा सकेगा। प्रतिमा के निर्माण में इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि प्राकृतिक आपदाएं इसे हानि न पहुंचा पाएं। इसमें चार प्रकार की धातुओं का उपयोग किया गया है, जिससे इसे जंग न लग पाए। प्रतिमा का निर्माण भूकंपरोधी तकनीक से किया गया है। इस पर 6.5 तीव्रता के भूकंप का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके अतिरिक्त 220 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलने वाली वायु पर इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत रविवार को आकाशवाणी से प्रसारित अपने मासिक कार्यक्रम ‘मन की बात‘ के 49वें संस्करण में कहा था कि इस बार सरदार पटेल की जयंती विशेष होगी, क्योंकि उस दिन गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर स्थापित उनकी दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा। यह प्रतिमा अमेरिका के स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दो गुनी ऊंची है। यह विश्व की सबसे ऊंची गगनचुम्बी प्रतिमा है। हर भारतीय इस बात पर अब गर्व कर पाएगा कि दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा भारत की धरती पर है। यह उन सरदार पटेल की मूर्ति है जो जमीन से जुड़े थे और अब आसमान की भी शोभा बढ़ाएंगे। मुझे आशा है कि देश का हर नागरिक ‘मां-भारती’ की इस महान उपलब्धि को लेकर विश्व के सामने गर्व के साथ सीना तानकर, सर ऊंचा करके इसका गौरवगान करेगा। मुझे विश्वास है हिन्दुस्तान के हर कोने से लोग, अब इसे भी अपने एक बहुत ही प्रिय गंतव्य स्थल के रूप में पसंद करेंगे। उन्होंने कहा कि जब देश आजाद हुआ था, उस समय हमारे सामने एक ऐसे भारत का नक्शा था जो कई भागों में बंटा हुआ था। भारत को लेकर अंग्रेजों की रुचि खत्म हो चुकी थी, लेकिन वो इस देश को छिन्न-भिन्न करके छोड़ना चाहते थे। देश के लिए उनकी ईमानदारी और प्रतिबद्धता ऐसी थी कि किसान, मजदूर से लेकर उद्योगपति तक, सब उन पर भरोसा करते थे। गांधी जी ने सरदार पटेल से कहा कि राज्यों की समस्याएं इतनी विकट हैं कि केवल आप ही इनका हल निकाल सकते हैं और सरदार पटेल ने एक-एक कर समाधान निकाला और देश को एकता के सूत्र में पिरोने के असंभव कार्य को पूरा कर दिखाया। उन्होंने सभी रियासतों का भारत में विलय कराया। चाहे जूनागढ़ हो या हैदराबाद, त्रावणकोर हो या फिर राजस्थान की रियासतें, वे सरदार पटेल ही थे जिनकी सूझबूझ और रणनीतिक कौशल से आज हम एक हिन्दुस्तान देख पा रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि सरदार पटेल ने माहात्मा गांधी से प्रेरित होकर देश स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया।
जब खेड़ा क्षेत्र में सूखा पड़ा और लोग भूखमरी के शिकार हो गए, तो वहां के किसानों ने ब्रिटिश सरकार से कर में छूट देने की मांग की। परंतु सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया। सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की अगुवाई में अन्य लोगों के साथ मिलकर किसानों के पक्ष में आंदोलन चलाया। अंत में आंदोलन सफल रहा और सरकार को झुकना पड़ा। बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिए उन्हें सरदार कहा गया। बाद में ’सरदार’ शब्द उनके नाम के साथ जुड़ गया।

सरदार पटेल की यह प्रतिमा भारत की एकता का प्रतीक है, जो भारतीय गौरव को आने वाली पीढ़ियों से परिचित कराती रहेगी। यह प्रतिमा हमें सरदार पटेल के विचारों से अवगत कराती रहेगी। उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहेगी। सरदार पटेल वे कहा करते थे-हमारे देश की मिट्टी में कुछ अनूठा है तभी तो कठिन बाधाओं के बावजूद हमेशा महान आत्माओ का निवास स्थान रहा है। वे यह भी कहते थे कि जब तक हमारा अंतिम ध्येय प्राप्त न हो तब तक हमें कष्ट सहने की शक्ति हमारे अंदर आती रहे यही हमारी सच्ची विजय है। त्याग के बारे में उनका कथन था- त्याग के सच्चे मूल्य का पता तभी चलता है, जब हमें अपनी सबसे कीमती चीज को भी त्यागना पड़ता है। जिसने अपने जीवन में कभी त्याग ही नहीं किया हो, उसे त्याग के मूल्य का क्या पता।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय एकता दिवस पहले नहीं था। नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल के जन्मदिवस 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाना प्रारंभ किया।